Thursday, July 29, 2004

हिन्दी भाषा - ई समूह

विचार-सम्प्रेषण मानव-विकास के इतिहास का मूल है। किंतु यदि सम्प्रेषण स्वभाषा में न हो; तो वह प्रगति में सहायक नहीं होता, अपितु मार्ग में अवरोधक बनकर उसे कुंठित कर देता है। अत: यह नवीन ई-समूह स्वभाषा और निर्बाध वैचारिक-सम्प्रेषण के प्रति समर्पित है। कृपया सम्मिलित होना न भूले -
हिन्दी भाषा

Wednesday, July 28, 2004

कुम्भकोणम का वह काला दिन

कुम्भकोणम की हृदयविदारक त्रासदी पर:

कुम्भकोणम का वह काला दिन
जिस व्यथा-कथा का वर्णन करने में अक्षम हैं शब्द
जहाँ गूंजती थी किलकारियां वह स्थान है निस्तब्ध
माँ की सिसकियों और क्रन्दन का वह सतत नाद
पूछता यह हर पल कि क्या उत्तरदायी है बस प्रारब्ध

कुम्भकोणम का वह काला दिन
अग्नि की विकट ज्वालाएं लीलती रही जीवन लीलाएं
पर हाय! कलियुगी गुरुजन देखते रहे जलती चिताएं
त्रासदी की पराकाष्ठा और सरकारी हताशा के स्वर
मिल उठाते यक्ष-प्रश्न क्या हलविहीन हैं ऐसी बलाएं

महंगाई

पहले से ही करों के बोझ से पिसी आम जनता पर मनमोहन सरकार द्वारा (पेट्रोल, डीज़ल और रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि के कारण) पड़ी मार से उपजी कवि व्यथा का प्रतिफल यह कुण्डलिया छन्द :

महंगाई इतनी क्यों बढी,ये समझ न पावे कोय
बहुत अधिक गुस्सा आवे, मन का आपा खोय।
मन का आपा खोय,पर कर कोई कछहुं न पावे
ज़ोर-ज़ोर से हर कोई चीखे,चिल्लावे और गावे।
कहत प्रतीक यही,सबने लेख लिखे कविता गायी
कहत-सुनत जीवन बीता,पर कम न हुई महंगाई।

भागो-भागो वामपन्थी आए

आजकल वामपन्थी मिसाइलें शेयर बाज़ार को ध्वस्त करने में व्यस्त हैं। हांलाकि वे बयान जिनसे शेयर बाज़ार औंधे मुंह गिर पड़ता है, काफी पुराने और सड़े गले हैं। लेकिन उनमें उतना ही दम है, जितना पुराने सड़े-गले टमाटरों में होता है। जिस तरह श्रोताओं व दर्शकों के हाथों में शोभायमान सड़े-गले टमाटरों के सामने मंच पर खड़े वक्ताओं और अभिनेताओं का मुंह सूख जाता है और मन में भय का अथाह सागर हिलोर मारने लगता है, ठीक यही हाल वामपन्थियों के सामने शेयर बाज़ार का है। अगर आप शहर के किसी अंग्रेज़ी स्कूल से पढ़े हुए हैं और जानना चाहते हैं कि गांव की किसी टाट-पट्टी वाली पाठशाला में मास्टर जी के सामने छात्र किस तरह थर थर कांपते हैं, तो आप इसका अनुभव वामपन्थियों के सामने शेयर बाज़ार की कल्पना कर सहज ही कर सकते हैं।

क्या आपने गॉडजिला फिल्म देखी है। हां, आप सब कम्प्यूटर वाले लोग हैं, तो अब फाइंड एंड रिप्लेस कमांड का प्रयोग करके गॉडजिला को कॉमरेड हरकिशन सिंह सुरजीत या सोमनाथ चटर्जी से रिप्लेस कर दीजिए और न्यूयॉर्क को दलाल स्ट्रीट से। अब कल्पना कीजिए उस दृश्य की जिसमें गॉडजिला (वामपन्थी) न्यूयॉर्क (दलाल स्ट्रीट) में तबाही मचाता है (संवेदी सूचकांक गिराता है), भगदड़ मच जाती है, माहौल में दहशत छा जाती है। क्या धांसू सीन है, वाकई रोमांचक है।

लेकिन सोचने वाली बात यह है कि वामपन्थियों की आर्थिक नीतियों की वजह से जो हाल अभी शेयर बाज़ार का हुआ है, कहीं वही हाल सारी अर्थव्यवस्था का न हो जाए।

Online Hindi Literature

ऑनलाइन हिन्दी साहित्य

इंटरनेट एक ऐसा स्थान है, जहां किसी भी विषय से सम्बंधित विस्तृत जानकारी प्राप्त की जा सकती है। हांलाकि हिन्दी दुनिया की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली तीसरी भाषा है, लेकिन फिर भी इस भाषा में इंटरनेट पर बहुत कम सूचनाएं उपलब्ध हैं। हिन्दी को इंटरनेट पर बढ़ावा देने के कई प्रयास किए जा रहे हैं। यदि आप मेरा अंग्रेज़ी ब्लॉग नियमित रूप से पढ़ते हैं, तो आपको पता होगा कि मैंने यह नया हिन्दी ब्लॉग बनाया है।

लेकिन ऐसा भी नहीं है कि हिन्दी में कुछ उपलब्ध ही न हो। हां,यह ज़रूर है कि उसे खोजना काफी कठिन है। वेबसर्फिंग के दौरान मुझे एक बहुत ही उपयोबी और रुचिकर वेब साइट मिली जहां पर अनेक पुस्तकें बहुतायात में डाउनलोड के लिए उपलब्ध हैं। यह वेबसाइट भारतसरकार के सूचना प्रौद्यौगिकी विभाग नें बनाई है। आप यहां पर अपने कुछ पसंदीदा लेखकों जैसे प्रेमचन्द, शिवानन्द एवं यशपाल जी को वहां पाएंगे।

ठीक है - ठीक है अब में लिखना बन्द करके आपको वेबसाइट का पता देता हूं कृपया नोट कीजिए -
सीडैक की डिजिटल लाइब्रेरी

कृपया ध्यान दें कि मुझे डाउनलोड की हुई फाइलों को माइक्रोसॉफट वर्ड 2000 में कुछ समस्याएं आ रही थीं और अन्त में मुझे वर्डपैड का सहारा लेना पड़ा।
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