कुम्भकोणम की हृदयविदारक त्रासदी पर:
कुम्भकोणम का वह काला दिन
जिस व्यथा-कथा का वर्णन करने में अक्षम हैं शब्द
जहाँ गूंजती थी किलकारियां वह स्थान है निस्तब्ध
माँ की सिसकियों और क्रन्दन का वह सतत नाद
पूछता यह हर पल कि क्या उत्तरदायी है बस प्रारब्ध
कुम्भकोणम का वह काला दिन
अग्नि की विकट ज्वालाएं लीलती रही जीवन लीलाएं
पर हाय! कलियुगी गुरुजन देखते रहे जलती चिताएं
त्रासदी की पराकाष्ठा और सरकारी हताशा के स्वर
मिल उठाते यक्ष-प्रश्न क्या हलविहीन हैं ऐसी बलाएं
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