Friday, August 27, 2004

India: the next economic giant

भारत: अगली आर्थिक महाशक्ति

थिंक टैंक लोवी इन्स्टीट्यूट, सिडनी के एक नवीन अध्ययन के अनुसार भारत एक आर्थिक महाशक्ति के रूप में तेज़ी से उभर रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में सबसे तीव्र गति से बढ़ रही अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। इस कारण आर्थिक शक्ति संतुलन के एशिया की तरफ स्थानान्तरित होने की प्रक्रिया भी तेज़ हो रही है। डॉ मार्क थर्लवेल की ''इंडिया: द नेक्ट इकोनोमिक जाइंट'' नामक इस रिपोर्ट के अनुसार इसका प्रमुख कारण है, भारत के पास अन्‍य विकसित देशों की अपेक्षा तुलनात्‍मक रूप से कम वेतन पर काम करने वाले लोगों की भारी संख्या और उनकी अंग्रेज़ी समझने की योग्यता।

इस रिपोर्ट के लोकार्पण के अवसर पर ऑस्ट्रेलिया के वाणिज्य मन्त्री ने कहा कि उनका देश भारत के बढ़ते बाज़ार में निवेश करने का इच्छुक है। इससे दोनों देशों के आर्थिक सम्बन्ध और अधिक मज़बूत होंगे।

यह विचारणीय बात है कि भ्रष्टाचार और जटिल नौकरशाही संरचना जैसे अवरोधों के बावज़ूद भी भारत तीव्रता से उन्नति के शिखर पर चढ़ रहा है। परन्तु भ्रष्टाचार के कारण देश की अधिकांश गरीब जनता तक इस आर्थिक विकास का कोई विशेष लाभ नहीं पहुंच पा रहा है। यदि इन दोनों नकारात्मक कारकों पर लगाम कसी जा सके तो शीघ्र ही भारत अपना नाम विकसित देशों की सूची में दर्ज करा सकता है।

Monday, August 23, 2004

जनचेतना उन्‍नायक गोस्‍वामी तुलसीदास

जो राम राज्‍य गाया तुमने, छाया है जिसका यश-वितान,
थे राव रंक सब सुखी जहाँ, थे ज्ञान-कर्म से मुखर प्राण,
युग-युग की दृढ़ शृंखला तोड़, हो शुभ्र स्‍वराज्‍य का फिर विहान,
इस राष्‍ट्र जागरण के इस युग में, कवि उठो पुन: तुम बन महान।
- श्री सोहनलाल द्विवेदी कृत 'तुलसीदास' कविता से


श्रावण मास के शुक्‍ल पक्ष की सप्‍तमी (22 अगस्त) को एक और यथार्थ जनचेतना उन्‍नायक की जयन्‍ती गुज़र गयी; लेकिन भारत उदय के खोखले प्रचार और सत्‍तधारी पक्ष के एक तथाकथित महान स्‍वर्गवासी नेता की जयन्‍ती पर जितना हो-हल्‍ला होता है, उसका चतुर्थांश भी देखने को नहीं मिला।

वस्‍तुत: गोस्‍वामी तुलसीदास एक तत्‍वदर्शी कवि और क्रान्‍तिकारी मनीषी थे। उन्‍होने भारत की तत्‍कालीन स्‍थित को समझ कर राष्‍ट्र की जर्जर चेतना में नवप्राण का संचार करने के लिये रामचरित की रचना की थी। उन्‍होने अपनी लेखनी से स्‍वयं को हतभाग्‍य समझने वाले पराधीन राष्‍ट्र में आत्‍मविश्‍वास का तेज उत्‍पन्‍न करने का कार्य किया। यद्यपि यह सब उन्‍होने सीधे न कहकर रामकथा के माध्‍यम से व्‍यक्‍त किया। क्‍योंकि वे राष्‍ट्रीय स्‍वर के आरोह-अवरोह की लय को पहचानते थे और यह जानते थे कि भारत में राष्‍ट्रीय चेतना का जागरण भी केवल आध्‍यात्‍मिक उन्‍नति से ही सम्‍भव है।

तुलसी साहित्‍य, विश्‍व साहित्‍य के प्रमुख रत्‍नों में विशिष्‍ट स्‍‍थान रखता है। काव्‍य के रूप में यह अद्वितीय है ही, किन्‍तु साथ ही यह वैचारिक क्षितिज पर अपने पाठक के सम्‍मुख नये आयामों को उद्घटित करता है। इसके बारे में कहा जा सकता है कि जो जितना गहरा उतरता है, वो उतने ही भव्‍य रत्‍न पाता है। अत: तुलसी साहित्‍य का अनुशीलन प्रत्‍येक भारतीय के लिये आवश्‍यक ही नहीं, अपितु अपरिहार्य है।

Saturday, August 21, 2004

सावरकर पर विवाद की काली छाया

स्वातन्त्र्य वीर सावरकर पर एक बार फिर विवाद का काला साया छा गया और इसके चलते संसद में दो दिनों तक गतिरोध कायम रहा। यह अत्यन्त विक्षोभ की बात है कि ऐसे व्यक्ति के बारे में, जिसने अपना सम्पूर्ण जीवन राष्ट्र के प्रति समर्पित कर दिया, सरकार ऐसा नकारात्मक रुख रखती है। सत्ताधारी दल की एकमात्र हास्यास्पद दलील यह है कि सावरकर ने अंग्रेजों से क्षमा याचना कर कारागार से मुक्ति की प्रार्थना की थी, अत: वे स्वतन्त्रता सेनानी कहलाने के हकदार नहीं है; यद्यपि इसका कोई भी प्रमाण सत्ताधारी दल के पास नहीं है।

कांग्रेस ने पहले भी वीर सावरकर के तैलचित्र को संसद भवन में स्‍थापित करने का विरोध किया था। परन्‍तु शायद उन्‍हें यह स्‍मरण नहीं है कि श्रीमती इन्‍दिरा गाँधी ने स्‍वयं सावरकर जयन्‍ती को उत्‍साह पूर्वक मनाये जाने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की थी। सावरकर रचित '1857 का स्‍वातंत्र्य समर' नामक पुस्‍तक ने सभी क्रान्‍तिकारियों के लिये सतत प्रेरणा स्रोत का कार्य किया, ऐसे ही क्रान्‍तिकारियों की सूची में चन्‍द्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह भी सम्‍मिलित हैं।

वीर सावरकर के प्रति सत्ताधारी पक्ष के इस नकारात्मक रवैये का एकमात्र कारण है उनकी हिन्दुत्वनिष्ठा। किन्तु वोटों के लालच में राजनीतिक दल प्राय: यह भूल जाते हैं कि देशभक्त क्रांतिकारियों को क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थ की ऐनक से नहीं देखना चाहिये, अपितु उनकी मान-प्रतिष्ठा करके राष्ट्र के समक्ष एक आदर्श प्रस्तुत करना चाहिये। चाहे वे किसी भी विचारधारा से क्यों न जुडे हुए हों।

Sunday, August 08, 2004

Teaching Astrology in Universities Appropriate?

विश्‍वविद्यालयों में ज्‍योतिष अध्‍यापन का औचित्‍य

श्री अर्जुन सिंह जहाँ एक तरफ पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री श्री मुरली मनोहर जोशी के सभी निर्णयों को परिवर्तित करते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उन्‍होंने विश्‍वविद्यालयों में ज्‍योतिष पढाये जाने का पूर्ण समर्थन किया है। यद्यपि वे सम्‍भवत: यह भूल गये हैं कि वे उसी दल से सम्‍बद्ध हैं, जिसने मुरली मनोहर जोशी के इस कदम की अंधविश्‍वास कहकर तीव्र आलोचना की थी।

यह भारत का दुर्भाग्‍य ही कहा जाएगा कि देश में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के बजाय सरकार अन्‍धविश्‍वास को बढ़ावा देने के लिए लाखों रुपय खर्च कर रही है। श्री अर्जुन सिंह का तर्क है कि सभी लोग मुहूर्त देखकर कार्य करते हैं, अत: इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। परन्‍तु यह तर्क न होकर एक मूर्खतापूर्ण कुतर्क है। यदि कोई कार्य अन्‍धविश्‍वासपूर्ण है, तो उसे सुधारा जाना चाहिये न कि उसका समर्थन किया जाना चाहिये। राहु काल आदि का विचार करके देश में अनेकों लोग अपना बहुमूल्‍य समय नष्‍ट करते हैं और इससे सम्‍पूर्ण राष्‍ट्र की उत्‍पादकता पर नकारात्‍मक प्रभाव पड़ता है। यदि ज्‍योतिष से इस प्रकार का कोई लाभ हो, तो भारत एक विकसित राष्‍ट्र होता, न कि अमेरिका और पश्‍चिमी यूरोप के वे देश जहाँ ज्‍योतिष जैसे अन्‍धविश्‍वासों को प्रत्‍येक कार्य के बीच नहीं घसीटा जाता है।

महर्षि दयानन्‍द सरस्‍वती और महात्‍मा गाँधी जैसे महापुरुषों ने भी ज्‍योतिष को एक घातक अन्‍धविश्‍वास की संज्ञा दी है। महर्षि दयानन्‍द सरस्‍वती के अनुसार वेदों में कहीं भी ज्‍योतिष का उल्‍लेख नहीं है, फिर भी इस अन्‍धविश्‍वास का प्रचार वैदिक ज्‍योतिष के नाम से किया जाता है। विज्ञान और सामान्‍य युक्‍ति, दोनों ये प्रमाणित करते हैं कि पौरुष और परिश्रम से मनुष्‍य अपना भाग्‍य स्‍वयं गढ़ता है।

अत: सम्‍पूर्ण राष्‍ट्र के लिए यही उचित होगा कि विश्‍वविद्यालयों में ज्‍योतिष का अध्‍यापन न हो, अपितु सिर्फ और सिर्फ वे विषय ही पढ़ाए जाएं जोकि विज्ञान की कसौटी पर सही सिद्ध हों।

Monday, August 02, 2004

Kahanii TV Serials Kay

कहानी टीवी धारावाहिकों की

आजकल के हिन्दी धारावाहिक बड़े ही अद्भुत हैं। इन्हें देखकर मैं प्राय: ही आश्चर्यचकित हो जाता हूँ। प्रथम तो इनका नाम ही दर्शनीय होता है। मैंने दर्शनीय कहा, न कि पठनीय; क्योंकि इनके नामों की वर्तनी ही इतनी निराली होती है कि उसे पढ़ना अपने आप में दुष्कर कार्य है। e की जगह a का व a की जगह e का और स्थान-स्थान पर ii (दो बार आई) का प्रयोग तो एक सामान्य सी बात है। फिर इन धारावाहिकों के नाम के प्रथम अक्षर में 'क' का वही महत्व है; जो वेदों में ओंकार का, नाजियों में स्वास्तिक का और मर्सिडीज़ कार में आगे लगे सितारे का होता है।

खैर ये तो कुछ भी नहीं है श्रीमान् ! इनकी विषय-वस्तु तो दर्शकों का सिर घुमा देती है। आपकी सारी पूर्वनिर्धारित धारणाएं ध्वस्त हो जाती हैं। उदाहरणार्थ इन धारावाहिकों में दिखाए जाने वाले विभिन्न चरित्रों को बार-बार संस्कारी कहा जाता है। लीजिए, खा गए न गच्चा। अरे ये वो संस्कारी नहीं हैं, जो आप समझ रहे हैं। इनकी परिभाषा ज़रा हट कर है। अब आप पूछेंगे भला कैसे हटकर है? इनके अनुसार संस्कारी होने से अभिप्राय उस व्यक्ति से है; जिसके विवाहेतर सम्बन्ध हों, जो दूसरों की बातें बाहर से दरवाज़े पर कान लगाकर सुनने का चिर अभ्यासी हो, जो दूसरे को नीचा दिखाने का कोई भी अवसर न छोड़ता हो और षड्यन्त्र करने में सिद्धहस्त हो।

इन धारावाहिकों के सम्‍वाद बड़े ही उबाऊ होते हैं, लेकिन दर्शक फिर भी पूरी तल्‍लीनता से कान लगाकर इन्‍हें सुनते हैं। यद्यपि आरम्‍भ में सम्‍वाद-लेखक का नाम भी लिखा आता है, किन्‍तु मैं नहीं मानता कि ये सम्‍वाद किसी मनुष्‍य ने लिखे हैं। मुझे पूरा विश्‍वास है कि ये सम्‍वाद कम्‍प्‍यूटरीकृत होते हैं। मेरे हिसाब से सम्‍वाद लेखन का कार्य कोई सॉफ्टवेयर करता है, जो अपने सीमित डेटाबेस के संस्‍कार, सिंदूर, आदर्श, परम्‍परा, परिवार और आदर इत्‍यादि शब्‍दों को randomly लगाकर नए-नए वाक्‍यों का निर्माण करता है। जैसेकि 'बुजुर्गों का आदर करना हमारे परिवार की परम्‍परा है' वगैरह वगैरह।

ये सभी 'क' वर्णारम्‍भ धारावाहिक समय नष्‍ट करने के लिए सर्वश्रेष्‍ठ साधन हैं। यदि आप खाली बैठे हैं और समय काटे नहीं कट रहा (भगवान करे ऐसा आपके साथ कभी न हो, क्‍योंकि ऐसा तो सिर्फ नौकरी छूटने के बाद ही होता है), तो अपना टीवी खोलें और ऐसा ही कोई धारावाहिक ज़रूर देखें। फिर मुझे बताएं कि इन धारावाहिकों के बारे में मेरे विचार कितने सही हैं।
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