विश्वविद्यालयों में ज्योतिष अध्यापन का औचित्य
श्री अर्जुन सिंह जहाँ एक तरफ पूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री श्री मुरली मनोहर जोशी के सभी निर्णयों को परिवर्तित करते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उन्होंने विश्वविद्यालयों में ज्योतिष पढाये जाने का पूर्ण समर्थन किया है। यद्यपि वे सम्भवत: यह भूल गये हैं कि वे उसी दल से सम्बद्ध हैं, जिसने मुरली मनोहर जोशी के इस कदम की अंधविश्वास कहकर तीव्र आलोचना की थी।
यह भारत का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि देश में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के बजाय सरकार अन्धविश्वास को बढ़ावा देने के लिए लाखों रुपय खर्च कर रही है। श्री अर्जुन सिंह का तर्क है कि सभी लोग मुहूर्त देखकर कार्य करते हैं, अत: इसका विरोध नहीं किया जाना चाहिए। परन्तु यह तर्क न होकर एक मूर्खतापूर्ण कुतर्क है। यदि कोई कार्य अन्धविश्वासपूर्ण है, तो उसे सुधारा जाना चाहिये न कि उसका समर्थन किया जाना चाहिये। राहु काल आदि का विचार करके देश में अनेकों लोग अपना बहुमूल्य समय नष्ट करते हैं और इससे सम्पूर्ण राष्ट्र की उत्पादकता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि ज्योतिष से इस प्रकार का कोई लाभ हो, तो भारत एक विकसित राष्ट्र होता, न कि अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के वे देश जहाँ ज्योतिष जैसे अन्धविश्वासों को प्रत्येक कार्य के बीच नहीं घसीटा जाता है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती और महात्मा गाँधी जैसे महापुरुषों ने भी ज्योतिष को एक घातक अन्धविश्वास की संज्ञा दी है। महर्षि दयानन्द सरस्वती के अनुसार वेदों में कहीं भी ज्योतिष का उल्लेख नहीं है, फिर भी इस अन्धविश्वास का प्रचार वैदिक ज्योतिष के नाम से किया जाता है। विज्ञान और सामान्य युक्ति, दोनों ये प्रमाणित करते हैं कि पौरुष और परिश्रम से मनुष्य अपना भाग्य स्वयं गढ़ता है।
अत: सम्पूर्ण राष्ट्र के लिए यही उचित होगा कि विश्वविद्यालयों में ज्योतिष का अध्यापन न हो, अपितु सिर्फ और सिर्फ वे विषय ही पढ़ाए जाएं जोकि विज्ञान की कसौटी पर सही सिद्ध हों।
1 comments:
Thanks for the information, i did not know Mahatma Gandhi & Mahrshi Dayanand Sarswati were scientist.
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