Tuesday, December 20, 2005

आँख के बदले आँख

मुझे लगता है कि दुनिया अभी भी मध्‍य-युग से ज़्यादा आगे नहीं बढ़ पायी है। हालही में एक ख़बर देखी कि सउदी अरब की अदालत में एक भारतीय की आँख फोड़ने की सजा सुनाई गयी। दरअसल, हुआ यूं कि मूल रूप से केरल का निवासी नौशाद सउदी अरब में एक पेट्रोल पम्प पर काम करता था और गलती से उसके हाथों एक व्‍यक्ति की आँख फूट गयी। बस, तुरन्त ही मध्‍य-युगीन जंगली कानून जिसे लोग ‘शरीयत’ के नाम से भी जानते हैं, हरकत में आ गया और बेचारे नौशाद की भी आँख फोड़ने की सज़ा सुनायी गयी। हाँलाकि भारत सरकार और नौशाद के परिवार ने सउदी अरब से दया की अपील की है; लेकिन अभी तो बस इतना ही कहा जा सकता है कि नौशाद का सिर्फ़ ‘अल्लाह’ ही मालिक है, जो उसे बचा सकता है। शरीयत में आँख फोड़ने, हाथ काटने और पत्‍थर मार-मार कर जान से मारने जैसी कई सज़ाओं का प्रावधान है।

वैसे, इस घटना से एक विचार मेरे मस्तिष्क में उद्भूत हो र‍हा है। वो यह कि अगर भारत में मुसलमानों के लिये शरयी कानून लागू कर दिया जाए, तो भारत के सारे मुसलमान पन्‍थान्‍तरण कर हिन्‍दू बन जाएँगे।

Sunday, December 11, 2005

Movie Review : Apaharan


फ़िल्म समीक्षा : अपहरण

गंगाजल के बाद निर्देशक प्रकाश झा एक बार फिर दर्शकों की उम्मीदों पर खरे उतरे हैं। झा का कसा हुआ निर्देशन और अजय देवगन, नाना पाटेकर का मंझा हुआ अभिनय इस फ़िल्म की जान हैं। हाँलाकि फ़िल्म अन्तिम क्षणों में कुछ नाटकीय मोड़ ले लेती है, लेकिन फिर भी यह फ़िल्म आपको पूरे ढाई घण्टे तक बान्धे रखती है।

कहानी केन्द्रित है बिहार में व्यापक रूप से फल-फूल रहे अपहरण उद्योगपर। राजनीति में पूरी तरह हो चुके अपराधीकरण को दर्शाने में भी यह फ़िल्म सफल रही है। अपहरण उद्योगमें इस्तेमाल की जानी वाली शब्दावली शुरूआत में दर्शकों में हास्य भी पैदा करती है। जैसे – ‘माल में कोई डिफेक्ट नहीं होना चाहिएका मतलब है अपहृत व्यक्ति के शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं होना चाहिए वगैरह। साथ ही यह भी दिखाया गया है कि किसी संगठित उद्योग की ही तरह अपहरण के इस धन्धे में भी किस तरह माल के ट्रांसपोर्टसे लेकर खाने-पीने तक हर एक छोटी चीज़ का भी हिसाब-किताब रखा जाता है।

कथानक बुना गया है अजय शास्त्री (अजय देवगन) और विधायक तबरेज़ आलम (नाना पाटेकर) के आस-पास। अजय शास्त्री एक साधारण छात्र है, जो पुलिस में भर्ती होने के लिये जी तोड़ मेहनत करता है, लेकिन फिर भी घूसखोरी और आरक्षण के चलते अपने इस प्रयास में विफल रहता है। रिश्वत मांगे जाने पर कहीं से जैसे-तैसे ५ लाख रू. लाकर देता है, लेकिन अपने आदर्शवादी पिता के चलते नौकरी पाने से वंचित रह जाता है, पैसे जाते हैं सो अलग। और उन पैसों को चुकाने के लिये विवश हो कर उसे भी अपहरण की इस घिनौने कीचड़ में उतरना पड़ता है। फिर वह इस दलदल में फँसता ही चला जाता है और विधायक तबरेज़ आलम उसका इस्तेमाल आपराधिक कामों और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिये करता है। फिल्म बिहार के बदहाल हालात, भ्रष्ट प्राशासनिक तन्त्र और राजनितिज्ञ-अपराधी गठजोड़ को उजागर करती है। कुल मिलाकर यह फिल्म देखने लायक बन पड़ी है।

अरे... दो ख़ास चीज़ों के बारे में तो बताना भूल ही गया, जो आपको इस फिल्म में मिलेंगी। बिपाशा बसु, वो भी पूरे कपड़ों में और आज-कल की हिन्दी पिक्चरों के लिये ज़रूरी एक खामखां का आइटम नम्बर।

इसे पढ़ने के बाद अगर थोड़ा और वक्त बर्बाद करना चाहते हैं, तो फिल्म की वेब साइट और ब्लॉग भी देख सकते हैं।

Monday, December 05, 2005

Ideal of Art

कला का आदर्श

यूनानी कला का रहस्‍य है प्रकृति के सूक्ष्‍मतम ब्‍योरों तक का अनुकरण करना, पर भारतीय कला का रहस्‍य है आदर्श की अभिव्‍यक्ति करना। यूनानी चित्रकार की सारी शक्ति कदाचित् मांस के एक टुकड़े को चित्रित करने में ही व्‍यय हो जाती है, और वह उसमें इतना सफल होता है कि यदि कुत्ता उसे देख ले, तो उसे सचमुच का मांस समझकर खाने दौड़ आये। किन्‍तु इस प्रकार की प्रकृति के अनुकरण में क्‍या गौरव है? कुत्ते के सामने यथार्थ मांस का एक टुकड़ा की क्‍यों न डाल दिया जाय?

दूसरी ओर, आदर्श को – अतीन्द्रिय अवस्‍था को – अभिव्‍यक्त करने की भारतीय प्रवृत्ति भद्दे और कुरूप बिम्‍बों के चित्रण में विकृत हो गयी है। वास्‍तविक कला की उपमा लिली से दी जा सकती है, जो कि पृथ्‍वी से उत्पन्‍न होती है, उसीसे अपना खाद्य ग्रहण करती है, उसके संस्‍पर्श में रहती है, किन्‍तु फिर भी उससे ऊपर ही उठी रहती है। इसी प्रकार कला को भी प्रकृति के सम्‍पर्क में होना चाहिए – क्‍योंकि यह सम्‍पर्क न रहने पर कला का अध:पतन हो जाता है – पर साथ ही कला का प्रकृति से ऊंचा उठा रहना भी आवश्‍यक है।

कला सौन्‍दर्य की अभिव्‍यक्ति है। प्रत्‍येक वस्‍तु कलापूर्ण होनी चाहिए।

वास्‍तु और साधारण ईमारत में अन्‍तर यह है कि प्रथम एक भाव व्‍यक्त करता है, जब कि दूसरी आर्थिक सिद्धान्‍तों पर निर्मित एक ईमारत मात्र है। जड़ पदार्थ का महत्व भावों को व्‍यक्त कर सकने की उसकी क्षमता पर ही निर्भर है।

हमारे भगवान् श्री रामकृष्‍ण देव में कला-शक्ति का बड़ा उच्‍च विकास हुआ था, और वे कहा करते थे कि बिना इस शक्ति के कोई भी व्‍यक्ति यथार्थ आध्‍यात्मिक नहीं हो स‍कता।

कला में ध्‍यान प्रधान वस्‍तु पर केन्द्रित होना चाहिए। नाटक सब कलाओं में कठिनतम है। उसमें दो चीज़ों को सन्‍तुष्ट करना पड़ता है – पहले, कान; दूसरे, आँखें। दृश्‍य का चित्रण करने में, यदि एक ही चीज़ का अंकन हो जाय, तो काफ़ी है; परन्‍तु अनेक विषयों का चित्रांकन करके भी केन्द्रिय रस अक्षुण्‍ण रख पाना बहुत कठिन है। दूसरी मुश्किल चीज़ है मंच-व्‍यवस्‍था; यानी विविध वस्‍तुओं को इस तरह विन्‍यस्‍त करना कि केन्द्रिय रस अक्षुण्‍ण बना रहे।

(साभार: विवेकानन्‍द साहित्‍य)

‘‘कुछ बतकही’’ के लेखक ‘‘धनञ्जय शर्मा’’ नहीं रहे

मेरे ख्‍याल से शायद यह बात आप लोगों को मालूम नहीं है। अभी-अभी जब मैंने यह चिट्ठा खोला तो उनके किसी परिचित ‘विवेक’ की निम्न टिप्‍पणी उनकी आखिरी प्रविष्टि पर पायी –

"आओ हम सब मिलकर इस धरती को स्वर्ग बनाएँ,
हम सब स्वर्गीय हो जाएँ ।"

यह थे धनन्जय के आखिरी ब्लॉग की शुरूआती शब्द. जैसे कि उन्हें पूर्वानुमान था.

मैं धनन्जय शर्मा से कभी नहीं मिला.

जब मैं लिनक्स के स्थानीयकरण में रूचि के चलते गूगल पर हिन्दी में कुछ खोज रहा था, तो उनके वेबपृष्ट "हिन्दी में लिनक्स, लिनक्स में हिन्दी" पर नज़र पड़ी.

तब मुझे पता चला की गुजरात के जामनगर में बैठे इस इन्सान ने अकेले ही, पूरे मैन्ड्रेक लिनक्स का हिन्दी अनुवाद कर डाला है.

अनुवादों को प्राप्त करने के सिलसिले में उनसे एक बार इमेल का अदान प्रदान भी हुआ. बस, उन्हें मैं इतना ही जानता हुँ.

खबर मिली की उनका आकस्मिक निधन हो गया है. उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता, पर धनन्जय, आपके द्वारा किया परिश्रम और आपका योगदान बहुत सराहनीय है.

आपने भारत की जनता तक उनकी भाषा में एक मुक्त व मुफ्त सॉफ्टवेयर के विकास के लिये इतना परीश्रम किया. आपने अकेले ही समूचे मैन्ड्रेक वितरण का हिन्दी अनुवाद कर डाला. यह कोई आसान काम नहीं, निश्चय ही आपने अपने जीवन के कई बहुमूल्य पल इस पर लगाये.

क्या ये सब व्यर्थ जायेगा? क्या जिन भारतीयों के लिये आपने इतना परिश्रम किया वो आपको जानते भी हैं? क्या यह सब समय की धूल में मिट कर रह जायेगा. हम मध्यम वर्ग के भारतवासी अपने सनसनीखेज मीडिया द्वारा प्रस्तुत नकली नायकों में ही काफी मशगूल रहते हैं. हममें से बहुतों को अपनी भाषा और अपनी संस्कृति पर कोई खास गर्व भी नहीं. अगली पीढ़ी के बच्चे अब अंग्रेज़ी बोलना ही ज्यादा पसंद करते हैं, यहां तक की हिन्दी का प्रयोग "फ़ैशनेबल" नहीं समझा जाता.

अगर हमारी भाषायें आज से 100 साल बाद तक इन्टर्नेट और कम्प्यूटर के युग में भी जीवित रह गयीं, तो मुझे यकीन है कि इस ब्लॉग को कोई 100 साल बाद पड़ रहा होगा. और उस व्यक्ति को यह बताने की आव्श्यकता नहीं पड़ेगी की धनंजय शर्मा कौन था. उस समय तक लोग धनंजय शर्मा के हिन्दी में लिनक्स संचालन तंत्र के विकास के लिये किये गये महत्वपूर्ण योगदान से भलि भांति परिचित होंगे.

क्या ये सपना सच होगा?

Sunday, December 04, 2005

Timepass: My New Hindi Blog

टाइमपास: मेरा नया हिन्‍दी चिट्ठा

देखिए मेरा नया हिन्‍दी चिट्ठा और बताइये कि यह आपको कैसा लगा -

टाइमपास: समय नष्ट करने का एक श्रेष्ठ साधन

Monday, November 28, 2005

क्‍या आपने कोहिनूर हीरा देखा है?

दुनिया के सबसे दुर्लभ और बेशकीमती हीरे 'कोहिनूर' की ब्रिटेन की महारानी के मुकुट तक पहुँचने की दास्‍तान महाभारत के कुरुक्षेत्र से लेकर गोलकुण्‍डा के ग़रीब मजदूर की कुटिया तक फैली हुई है। ब्रिटेन की महारानी के ताज में जड़ा और दुनिया के अनेक बादशाहों के दिलों को ललचाने की क्षमता रखने वाला अनोखा कोहिनूर दुनिया में आखिर कहाँ से आया, इस बारे में ऐतिहासिक घटनाओं के अलावा बहुत सी कथाएँ और किंवदन्तियाँ भी प्रचलित हैं। यह हीरा अनेक युद्धों, साज़िशों, लालच, रक्तपात और जय-पराजयों का साक्षी रहा है।...............

इंटरनेट पर विचरण करते हुए रीडिफ पर यह बहुत ही रोचक लेख दिखाई दिया। कोहिनूर की कहानी आप लोग भी पढ़ें-

क्‍या आपने कोहिनूर हीरा देखा है?

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Saturday, November 26, 2005

After Khushboo, Now It's Sania's Turn


खुश्बू के बाद अब सानिया के बयान पर बवाल

हिन्‍दुस्‍तान एक ऐसा देश है, जहाँ पर आपको फालतू लोग बहुतायत में मिल जाएंगे। दुनिया में कई मुल्‍कों की इतनी आबादी नहीं है, जितनी की भारत में फालतू लोगों की तादाद है। किसी नुक्कड़ पर चाहे कोई मदारी बन्‍दर और भालू का खेल दिखा रहा हो या फिर सड़क के किनारे कोई चमत्‍कारी दन्‍त-मंजन बेच रहा हो, चारों ओर खड़ी भारी भीड़ इस तथ्‍य की पुष्टि के लिये काफ़ी है। ऐसे ही बेहद फालतू लोगों में से कुछ हैं, जो खामोखां ही दूसरों के छोटे-मोटे बयानों पर भारतीय संस्‍कृति की दुहाई दे कर मुकदमा ठोंक देते हैं। ताज़ातरीन उदाहरण है सानिया मिर्ज़ा का। हालही में जयपुर के किसी सरफिरे सज्‍जन ने सानिया पर खुश्‍बू का पक्ष लेने के कारण मुकदमा कर दिया। खुश्‍बू को तो खैर छोड़ ही दीजिए, उन पर तो पहले से ही दर्जनों की संख्‍या में मुकदमे हैं।

भारतीय संस्‍कृति भी अपने आप में एक कमाल की चीज़ है। सौरव गांगुली की तरह न जाने क्‍यों हर वक़्त खतरे में ही बनी रहती है। वैसे, मेरी समझ में नहीं आता कि जिसके लिये इतने सारे लोग हमेशा लट्ठ भांजते रहते हैं, वो बात-बात में खतरे में कैसे आ जाती है। बल्कि मुझको तो उल्‍टे ऐसा लगता है कि इस तथाकथित भारतीय संस्‍कृति के कारण आर्चीज़ गैलरी और मैकडोनल्‍ड्स जैसी कम्‍पनियाँ ज़्यादा खतरे में रहती हैं। सोचने वाली बात यह है कि बवालन भारतीय संस्कृति है क्‍या चीज़। क्‍या ये वैसी ही है, जैसी इसके स्वघोषित ठेकेदार इसे बताते हैं?

लेकिन जितना मैंने जानने की कोशिश की, भारतीय संस्‍कृति का कुछ और ही रूप उभर के सामने आया। सानिया मिर्ज़ा के कपड़ो से जिन्‍हें दिक्‍कत है, वे ज़रा प्राचीन भारतीय मन्दिर गौर से देखें और उनपर बनी हुए कई सारी मूर्तियों का अवलोकन करें। मेरे हिसाब से तो सिर से पांव तक शरीर को ढ़क कर रखने की परम्‍परा भारतीय नहीं है। पुराने समय से ही यहाँ पर कम कपड़े पहनने का रिवाज़ था। क्‍या पुरूष, क्‍या स्त्रियाँ; सभी सिर्फ कटि मात्र वस्त्र पहनते थे। और मेरा ऐसा अनुमान है कि आज-कल के कॉलेजों की तरह प्राचीन गुरुकुलों में जब-तब कोई ड्रेस-कोड नहीं लागू किया जाता होगा। आज-कल जिसे पश्चिमी सभ्‍यता कहकर दुत्‍कारा जाता है, दरअसल उसका मूल पुरातन भारतीय संस्‍कृति ही है। पूरा शरीर ढ़क कर रखना मूलत: पश्चिमी परम्‍परा है। यूरोप में बहुत पुराने ज़माने से विक्‍टोरिया युग तक महिलाएँ सर से पाँव तक कपड़ों से ढकी रहती थीं। पश्चिम में आज-कल पहने जा रहे कपड़ों का चलन तो ख़ासा आधुनिक है।

लेकिन इस बारे में भारतीय संस्‍कृति का दृष्टिकोण ज़रा अलग था। प्राचीन आर्य अपने कपड़ों को लेकर बिल्‍कुल सहज थे। इसके पीछे किसी भी तरह का कोई कुत्सित भाव नहीं था। वैचारिक तौर पर भी भारतीय काफ़ी स्वतन्‍त्र और उदारवादी थे। प्राचीन वैदिक भारत में चार्वाक सम्‍प्रदाय के लोगों और जैन-बौद्धों ने वैदिक धर्म को जी भर कर लताड़ा, भला-बुरा कहा; लेकिन कभी भी किसी को यहाँ शारीरिक रूप से प्रताडि़त नहीं किया गया। विवाह के बिना सेक्‍स को भी ज़्यादा बुरा नहीं माना जाता था, जैसा कि आज-कल खुश्‍बू के बयान से खफ़ा लोग इसे मानते हैं। उदाहरण के तौर पर अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने पूर्वोत्तर की राजकुमारी उलूपी से शारीरिक सम्‍बन्‍ध स्‍थापित किये थे और उसका पुत्र बभ्रूवाहन महाभारत के युद्ध में ससम्‍मान पाण्‍डवों की ओर से आमन्त्रि किया गया था। भीम ने भी हिडिम्बा से बर्बरीक नामक पुत्र पाया था, ऐसे उदाहरणों से प्राचीन इतिहास ग्रन्‍थ भरे पड़े हैं।

भारतीय संस्‍कृति की सेक्‍स और अपने शरीर के प्रति इस सहज सोच पर पहला कुठाराघात तब हुआ, जब 9वीं शताब्‍दी में मुहम्‍मद बिन कासिम ने पहली दफ़ा भारत पर हमला किया। इसस घटना के बाद सिलसिलेवार विदेशी आक्रमणों से भारत में तलवार के ज़ोर पर इस्‍लाम की लहर आयी और साथ ही आयी दकियानूसी अरबी संस्‍कृति (अगर उसे ‘संस्‍कृति’ का जा सके तो)। मुस्लिम आक्रान्‍ताओं द्वारा भारतीय महिलाओं के शील-हरण की घटनाएँ आम हो गयीं और इससे बचने के लिये परदा प्रथा जैसी वाहियात प्रथाएँ शुरू हुईं। महिलाओं के शील की रक्षा के लिये भारतीय संस्‍कृति को कुछ ज़्यादा ही रक्षात्‍मक होना पड़ा, जिससे सेक्‍स के प्रति उसका मूल भाव विकृत हो गया और विडम्‍बना ये है कि यह विकृत भाव ही आज ‘भारतीय संस्‍कृति’ के नाम से पुकारा जा रहा है।

Wednesday, November 23, 2005

आखिर लग ही गया लालू का खेल


लगता है अब मवेशियों के अच्‍छे दिन आने वाले हैं। गाय-भैसों और भेड़-बकरियों के लिये अब भरपूर चारा उपलब्‍ध होगा। ‘बिहारी’ शब्द के दिन भी सुधरने वाले हैं, शायद यह शब्‍द अपना पुराना गौरव फिर प्राप्‍त करेगा और एक गाली के तौर पर इसका इस्‍तेमाल बन्‍द हो जाएगा। लेकिन बिहार के उद्योग जगत को गहरा धक्का लगा है और उससे जुड़े लोगों के लिये यह सबसे बुरी ख़बरों में से एक है। चकराइये मत, इस समय बिहार के एकमात्र उद्योग – अपहरण उद्योग के बारे में ही मैं यह बात कह रहा हूँ; दूसरे उद्योग-धन्‍धे बिहार में बचे ही कहाँ हैं।

वैसे, लालू यादव उन नेताओं में से हैं; जिन्‍होने जनता पर ही नहीं, बल्कि दूसरे नेताओं पर भी गहरा असर डाला है। अब प्रधानमन्‍त्री डॉ. मनमोहन सिंह को ही ले लीजिए। हाँलाकि डॉ. मनमोहन सिंह का पुराना रिकार्ड दिखाता है कि वे ख़ासे बुद्धिमान हैं, लेकिन इस चुनाव के दौरान उन्‍हें भी लालू की लंगोट छू गयी और वो बेचारे भी जाने क्‍या-क्‍या बोलने लगे। उन्‍होने एक चुनावी रैली में लालू को ‘विकास पुरूष’ की संज्ञा से नवाज़ा; लेकिन इस बात को सुनकर आप लोगों की तरह बिहारी पेट पकड़ कर नहीं हँस पाये, क्‍योंकि उस सभा में बमुश्किल 50-100 लोग ही जुटे थे। वहीं जब कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी ने ‘विकास के लिये’ लालू को वोट देने का आह्वान किया, तो मुझे न जाने ऐसा क्‍यों लगा कि उनका आई क्‍यू परीक्षण किया जाना चाहिए। शायद हमारे देश से सोनिया जी ही जॉर्ज बुश से लोहा लेना चाहती हैं।

Thursday, September 08, 2005

Why are girls scared of visiting Elephant tower?


क्‍यों घबराती हैं लड़कियाँ हिरन मीनार में जाने से

ऐसा हो नहीं सकता कि कोई आगरा घूमने आए और फतेहपुर सीकरी न जाए। फतेहपुर सीकर आगरा से लगभग ४० किमी दूर है। इसे अकबर ने पहले अपनी राजधानी बनाया था।

फतेहपुर सीकरी घूमने के लिये जाने वाली लड़कियाँ अक्‍सर लड़कों के साथ हिरन मीनार (या elephant tower) में घुसने से घबराती हैं। क्‍यों, ऐसा नहीं है कि उन्‍हें हाथियों या हिरनों से डर लगता है और न ही इसलिये कि मीनार बहुत ही जर्जर हालत में है। न ही यह मीनार अन्‍धेरी और डरावनी है। फिर लड़कियाँ इसमें जाने से इतना क्‍यों डरती हैं?

हालही में जब मैं अपने दोस्‍तों के साथ फतेहपुर सीकरी गया, तब एक स्‍थानीय गाइड ने इसका खुलासा किया, ‘‘जो मीनार में साथ-साथ ऊपर जाते हैं, वे पति-पत्‍नी बन जाते हैं। उनकी शादी हो कर ही रहती है। ऐसा इसलिये क्‍योंकि इस मीनार की सीढियाँ सात चक्‍कर काटती हुई ऊपर जाती हैं, जो अग्नि के चारों ओर सात फेरों का प्रतीक हैं।’’ हाँलाकि यह पूरी तरह अन्‍धविश्‍वास है; लेकिन जो लड़के वहाँ गये हैं, साथ चलने की बात कहने पर उन्‍हें लड़कियों की तरफ से हमेशा ‘न’ ही सुनने को मिलता है। शायद आज-कल लड़कियाँ अपने ‘बॉय-फ्रेण्‍ड्स’ से भी शादी नहीं करना चाहतीं हैं। कई लोग मानते हैं कि यह महज़ एक मिथक है। लेकिन इसे तब तक गलत साबित नहीं किया जा सकता, जब तक कि कोई लड़की किसी अनजान लड़के के साथ मीनार में जाने का साहस दिखाए।

खैर, यह तो कहानी का एक पहलू है। दूसरा और महत्‍वपूर्ण पहलू ये है कि अगर जल्‍दी ही सरकार द्वारा आवश्‍यक कदम नहीं उठाये गये, तो यह जीर्ण-शीर्ण मीनार ढहने वाली है। ऐसा माना जाता है कि मुगल सम्राट अकबर ने अपने प्‍यारे हाथी या हिरन की याद में ये मीनार बनवाई थी। नीचे की ओर बड़ी-बड़ी दरारें साफ दिखाई देती हैं। महराब और गुम्‍बद की नक्‍काशी बुरी तरह क्षतिग्रस्‍त हो गयी है।

शायद भारतीय पुरातत्‍व विभाग अपनी गहरी नींद से तभी जगेगा, जब यह मीनार ध्‍वस्‍त हो जाएगी।

Wednesday, September 07, 2005

My Experiences in Gym

जिम में हमारे अनुभव

आजकल युवाओं में जिम जाने का बड़ा क्रेज़ है। हमारे पिताजी बताते हैं कि पहले अखाड़े हुआ करते थे, जहाँ बड़े-बड़े पहलवान कुश्‍ती लड़ते थे। हांलाकि आजकल ये अखाड़े पूरी तरह लुप्‍त हो चुके हैं और खोजने पर भी नहीं मिलते।

खैर, मुहल्‍ले के दूसरे लड़कों और दोस्‍तों को जिम जाते देखकर हमें भी बॉडी बिल्‍डिंग का शौक चर्राया, सो अपने कमरे में अर्नोल्‍ड श्‍वार्ज़ेनेगर का पोस्‍टर चिपकाया और हम भी चल दिये जिम की ओर पहलवानी करने। जिम का नज़ारा अद्भुत होता है। आपको हर तरह के लोग जिम में देखने को मिल जाएंगे। बहुत से गोल-मटोल लोग सलमान खान बनने का सपना साकार करने की कोशिश में लगे दिखाई देते हैं। कई सारे सीकड़ी पहलवान इस आस में कसरत करते दिखाई दिये कि जल्‍द ही वे अर्नोल्‍ड श्‍वार्ज़ेनेगर बन जाएंगे। इनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि ज़रा सी तारीफ की नहीं कि फूल के कुप्‍पा हो जाते हैं – अरे, चोर बॉडी है ब्रूसली की नांई। देखने में ज़रूर दुबले-पतले हैं, लेकिन ताकत ऐसी कि ज़मीन में लात मार दें तो पानी का फुव्‍वारा फूट पड़े। - बस इतना कहने की देर है और लो, अपने मुंह मियाँ मिट्ठू हो गये चालू - अरे नहीं, अब तो बॉडी डाउन हो गयी है। तीन महीने पहले देखते, मुहल्‍ले के लौंडे देखकर थर-थर काँपते थे, ऐसी बॉडी थी। कॉलेज में अपना टेरर था। ............ और फिर कसरत बन्‍द और आत्‍मप्रशंसा का अनलिमिटेड स्‍टॉक खुल गया समझो। हांलाकि इन्‍हें देखकर आपको ऐसा लग सकता है कि कहीं हवा तेज़ चल रही हो तो गिर न जाए बेचारा। जिम से निकलने के बाद आगरा की तंग गलियों में ये सीना चौड़ाकर इस तरह चलते हैं कि आने-जाने वाले दूसरे लोग इनके निकलने का इन्‍तज़ार गली के बाहर खड़े रह कर ही करना पसन्‍द करते हैं।

फिर हमें एक बात यह देखने को मिली की वहां हर कोई विशेषज्ञ था, भले ही उसने आपसे बस दो दिन पहले ही कसरत करना शुरू की हो। जैसे पहले कहावत थी कि वही मुनि है, जिसका मत (दर्शन) भिन्न हो; वैसे ही यहां आकर पता चला कि वही सच्‍चा पहलवान है, जिसके कसरत करने का ‘इश्‍टाइल’ ज़रा हट कर हो। सींकड़ी पहलवान बिना पूछे ही आपको आकर समझाएगा – अर्र... ये क्‍या कर रहे हो। ये तरीका गलत है, इससे बाइसेप्‍स पर पूरा प्रेशर नहीं आता। डम्‍बल को आधा ऊपर लाओ, तीन गिनने तक रोको और फिर नीचे ले जाओ। रुस्‍तम-ए-हिन्‍द आपको आकर समझाएंगे – वो तो #$%@^& है। पहले डम्‍फल (ये पहलवान जी ऐसा ही बोलते हैं) को छाती तक ऊपर लाओ और बिना रुके तुरन्‍त नीचे ले जाओ। ‘जितने मुंह उतनी बातें’ इस कहावत का क्‍या मतलब है, यहां आकर हमें पता लगा।

फिर जिम में घुसते ही तरह-तरह की हुंकार सुनाई पड़ती हैं, हांलाकि बाद में हमें इसकी आदत हो गयी। वैसे ये शोध का विषय हो सकता है कि कौन कब कैसी आवाज़ पैदा करता है। बेंच प्रेस के वक्‍त – हुआ....., कर्लिंग के वक्‍त – इया......, पैकडैक के समय – उह....... वगैरह वगैरह। अखाड़े बन्‍द होने की वजह से आस-पास के गाँव के कई लोग भी जिम में आते हैं; ये लोग कसरत करते समय जै बजरंगबली की, जै काली मैया की जैसे निनाद भी करते हैं। वैसे कतई ज़रूरी नहीं है कि कसरत करते वक्‍त किसी तरह की आवाज़ की ही जाए, लेकिन हमारी जिम की परम्‍परा को कायम रखने के लिये हमने भी इस कोलाहल में इज़ाफा करना शुरू कर दिया।

हांलाकि हमसे एक बड़ी भारी भूल हो गयी, वो यह कि हमने कसरत के साथ स्‍ट्रेचिंग नहीं की (इससे पहले जो कुछ लिखा है, सब छोटी सी भूमिका है और यह उपसंहार है)। जिसका परिणाम यह हुआ कि हमारी मांसपेशियां छ:-आठ महीन में ही ज़रूरत से ज़्यादा सख्‍त हो गयीं और डॉक्‍टर ने कम से कम दो हफ्ते तक जिम जाने को मना कर दिया। अब दोनों हाथों और कन्‍धे पर पट्टियां बंधी हुई हैं और हम ये पोस्‍ट टाइप करने के अलावा और कोई कायदे का काम नहीं कर सकते। हाँ, इस बारे में लोगों को हम ये बताते हैं कि, ‘‘कॉलेज में ज़रा मार-पीट हो गयी थी; सो ये पट्टियां बन्‍ध गयी हैं। देखो, केवल हाथों में ही बन्‍धी हैं चेहरे पर एक भी निशान नहीं है; क्‍योंकि हमने केवल दूसरों की मार लगाई, पिटे ज़रा भी नहीं। कॉलेज में अब हमारा भी टेरर है।’’

Famous Hindi Literary Magazine “Hans” on Internet

प्रसिद्ध साहित्‍यिक पत्रिका "हंस" इंटरनेट पर

प्रसिद्ध साहित्‍यिक पत्रिका 'हंस' इंटरनेट पर भी उपलब्‍ध है। हंस का हिन्‍दी साहित्‍य के इतिहास में महत्‍वपूर्ण योगदान है। देखिए हंस की वेब साइट -

मासिक हंस

इस वेब साइट पर हंस के पुराने अंक भी उपलब्‍ध हैं। प्रस्‍तुत अंक में "नैतिकताओं का टकराव" शीर्षक के अर्न्‍गत विभिन्‍न विद्वानों के लेख काफी विचारोत्‍तेजक हैं। समय मिले तो ज़रूर पढ़ें।

Wednesday, August 10, 2005

रेलवे ने की ई-टिकिटिंग की व्‍यवस्‍था बहाल

लम्‍बी-लम्‍बी कतारों में घण्‍टों धक्‍के खाने से अब जल्‍दी ही आपको छुटकारा मिल सकता है। क्‍योंकि रेलवे ने कम्‍प्‍यूटर प्रिंट-आउट को ‍टिकिट की वैधानिक मान्‍यता दे दी है। बस आपको करना यह होगा कि इस टिकिट के साथ आपको एक पहचान-पत्र (पासपोर्ट, पैन कार्ड वगैरह) साथ लेकर चलना पड़ेगा। हांलाकि यह सुविधा फिलहाल दिल्‍ली-कालका शताब्‍दी के लिए ही उपलब्‍ध है। अगर यहां यह स्‍कीम सफल सिद्ध हुई, तो इसे दूसरी गाडियों पर भी लागू किया जायेगा।

Tuesday, August 09, 2005

अगर होता राष्‍ट्रीय बहुसंख्‍यक आयोग तो ..........

अभी हालही में राष्‍ट्रीय अल्‍पसंख्‍यक आयोग ने मांग उठायी है कि रामचरित मानस से 'ढोल गंवार शूद्र पशु नारी ...' वाला दोहा हटा देना चाहिये। अब सवाल ये उठता है कि क्‍योंकर हटा देना चाहिये भई? भला क्‍या दिक्‍कत है आपको? वैसे इसपर उनका कहना है कि इससे दलितों की भावनाएं आहत होती हैं।

पहली बात तो यह है कि इससे अल्‍पसंख्‍यक आयोग को क्‍या लेना-देना। दलित कोई अलग से अल्‍पसंख्‍यक तो हैं नहीं, मुसलमानों और ईसाइयों की तरह। वे हिन्‍दुओं का ही हिस्‍सा हैं, इसलिये वे बहुसंख्‍यक हिन्‍दुओं में से हैं न कि अल्‍पसंख्‍यकों में से। दूसरी बात यह कि रामचरित मानस में यह बात कही गयी है 'समुद्र' के द्वारा, जो श्री राम को लंका जाने देने में बाधा पैदा कर रहा था और मार्ग नहीं दे रहा था। जब भगवान राम ने समुद्र को एक ज़ोरदार हुड़की पिलाई, तब जाकर उसका दिमाग ठिकाने पर आया और वह मान गया। अब अगर रावण ब्राह्मणों की निन्‍दा करे तो क्‍या ब्राह्मणों का बुरा मानना चाहिए। नहीं, क्‍योंकि है ही वह एक नकारात्‍मक किरदार। वैसे ही अगर समुद्र जैसा मूढ़ पात्र किसी में मीन-मेख निकाले, तो इसमें बुरा मानने जैसी क्‍या बात है।

तीसरी बात यह कि यदि राष्‍ट्रीय बहुसंख्‍यक आयोग जैसा कुछ होता; तो शायद वह यह मांग उठा सकता था कि आधी से ज़्यादा क़ुरआन को बदला जाए, जिसमें विधर्मियों को मारने और ‍जेहाद जैसी बातें कही गयी हैं। इससे मुल्‍क़ के 70 करोड़ से ज़्यादा बहुसंख्‍यकों की भावना आहत होती है। लेकिन चूंकि ऐसा कोई आयोग नहीं है, इसलिये अल्‍पसंख्‍यक आयोग को फिलहाल कोई चिन्‍ता नहीं है और वह ऐसे बेकार सवाल उठा रहा है।

Friday, May 06, 2005

दर्शन शास्‍त्र और बे-सिरपैर की उड़ानें

… दुनिया दो तत्‍वों से बनी है – मन और जड़। तभी एक और आवाज़ आई – नहीं, दुनिया बनी है आकार और जड़ से। … ये सब युक्‍तिसंगत नहीं है, इस संसार में सब कुछ चिद्बिन्‍दुओं से निर्मित है। ‘जानना चाहते हैं कि ये सब क्‍या है … और आगे पढिए।’

… आत्‍मा सर्वव्‍यापी है। … अरे नहीं, हकीकत तो यह है कि आत्‍मा पीनियल ग्रन्‍थि में रहती है और वहीं से शरीर का नियन्‍त्रण करती है। … ज्ञान का आधार अनुभव है। … लेकिन यह अतार्किक मत है ज्ञान का आधार चिन्‍तन और सम्‍वेदन है।

आपका सर चकराने लगा और कुछ भी समझ नहीं आ रहा है। घबराइये नहीं, दर्शन शास्‍त्र पढ़ने वालों के साथ ऐसी दुर्घटना अक्‍सर होती है। एक सच्‍चे आगरा विश्‍वविद्यालय के छात्र की तरह मैंने भी पाठ्यपुस्‍तकें अन्‍तिम क्षणों में उठायीं और दार्शनिकों की मनमानी कल्‍पना की उड़ानों को बड़े धैर्य के साथ समझने की कोशिश की। लेकिन अपनी सारी शक्‍ति लगाने के बावजूद भी मैं परीक्षा में दार्शनिकों के 5 विषयों पर विभिन्‍न 500 मत याद नहीं रख सका। समाधान … मैं खुद ही दार्शनिक बन गया और जो भी मेरे मन में आंय-बांय कल्‍पना आई, उसे ही उत्‍तर के रूप में लिख दिया। उम्‍मीद है मुझे अच्‍छे अंक प्राप्‍त होंगे (साथ ही उम्‍मीद है कि परीक्षक सोते-सोते मेरे उत्‍तरों को जांचेगा)। Norman Vincent Peale की किताब The Power of Positive Thinking में जो कुछ पड़ा है, उसे इस्‍तेमाल करने का समय शायद अब आ गया है।

Thursday, May 05, 2005

हर साहित्‍यप्रेमी के द्वार पर हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत

आप लोगों की मेहनत अब रंग लाने लगी है। हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत धीरे-धीरे गुमनामी के अन्‍धेरे से निकल रहा है। प्रमुख साहित्‍यिक पत्रिका ‘का‍दम्‍बिनी’ ने हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत को हर साहित्‍य प्रेमी के द्वार तक पहुंचा दिया है। मई के कम्‍प्‍यूटर विशेषांक में ‘चिट्ठा विश्‍व’ का नाम प्रमुख हिन्‍दी वेब साइटों की सूची में शामिल है और इसके बारे में पर्याप्‍त विवरण भी है। हिन्‍दी की प्रथम ब्‍लॉगज़ीन ‘निरन्‍तर’ का ‍उल्‍लेख भी किया गया है। ‍‍हांलाकि ‘चिट्ठा विश्‍व’ का URL गलत लिखा हुआ है। लेकिन रवि जी, यकीन मानिए कि ‘ब्लाँग’ की ही तरह यह भी टाइपिंग की ही गलती है।

Monday, May 02, 2005

आँखें खोलने वाले दो समाचार

आज सुबह उठकर जब मैंने अख़बार खोला, तो एक ख़बर पर नज़रें थम गयीं – ‘‘इंडोनेशियाई मुस्‍लिमों के नायकों में हैं राम, कृष्‍ण, हनुमान और गणेश।’’ इंडोनेशिया विश्‍व में सर्वाधिक मस्‍लिम आबादी वाला देश है, क़रीब 88 प्रतिशत मुस्‍लिम और 3 प्रतिशत हिन्‍दू इण्‍डोनेशिया में रहते हैं। वहां की मुद्रा पर ‘गणेश’ की छवि अंकित है। गगनचुम्‍बी इमारतों के बीच जगह-जगह हनुमान, राम, कृष्‍ण और अर्जुन (वैसे अर्जुन की मूर्ति आपने कहीं हिन्‍दुस्‍तान में देखी है?) की मूर्तियां स्‍थापित हैं, जिससे उनकी धर्मनिरपेक्षता पर कोई आंच नहीं आती। वहां के संस्‍कृति मंत्रालय ने डचों पर विजय के प्रतीक रूप में स्‍वतंत्रता मैदान में अर्जुन रथ स्‍थापित किया है। एशिया-अफ्रीका शिखर सम्‍मेलन में भाग लेने गये प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके साथ गया भारतीय पत्रकारों का प्रतिनिधि मण्‍डल यह देखकर चकित रह गया।

शाम को टीवी पर एक दूसरी ख़बर देखी। BA II, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में पिछले 25 सालों से इतिहास की एक पुस्‍तक पढ़ाई जा रही है। लेखक श्री सि‍द्दकी के अनुसार गांधी जी का अहिंसा आन्‍दोलन हिन्‍दूवादी था और यह पराजय का प्रतीक है। सरदार पटेल हिन्‍दुओं से मिले हुए थे और साम्‍प्रदायिक दंगों को बढ़ावा देते थे। संघ फासिस्‍ट संस्‍था है और सरसंघचालक तानाशाह की तरह होता है। संघ की शाखाओं में दूसरे धर्मों के प्रति नफरत सिखाई जाती है। संविधान निहित हिन्‍दू स्‍वार्थों की रक्षा के लिए बनाया गया ‍था। सुभाषचन्‍द्र बोस ने फासिस्‍टों से दोस्‍ती करके भारी भूल की, उन्‍हें सोवियत रूस से दोस्‍ती करनी चाहिये थी जोकि दुनिया की सबसे बड़ी शक्‍ति है।

अब मुझे पूरा यकीन हो चला है कि भारत एक सेकुलर राष्‍ट्र है, साम्‍प्रदायिक मुल्‍क तो इण्‍डोनेशिया वगैरह हैं।

Sunday, April 24, 2005

अनुगूंज 9 – ”आशा ही जीवन है”

आशा ही मृत्‍यु भी है

यह बात बिल्‍कुल सही है कि आशा ही जीवन है। लेकिन हमें यह बात याद रखनी होगी कि हर सिक्‍के के दो पहलू होते हैं। दिन के साथ रात, अन्‍धकार के साथ प्रकाश और जीवन के साथ मृत्‍यु का चिर-तादात्‍म्‍य है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता है। अगर आशा को जीवन मानते हो तो तुम्‍हें यह भी मानना पड़ेगा कि आशा ही मृत्‍यु भी है। इंसान अमर होना चाहता है – मौत से छुटकारा पाना चाहता है – लेकिन साथ ही जीवन से भी चिपके रहना चाहता है। लेकिन अमर वही है, जो जीवन-मुक्‍त हो – जो जीवन से भी छूट चुका हो। अगर सत्‍य के दर्शन की अभीप्‍सा है तो आशा को त्‍यागना होगा – जीवन और मरण दोनों श्रंखलाओं से मुक्‍त होना पड़ेगा।
Akshargram Anugunj
आशा बन्‍धन का कारण है। आशा सापेक्षिकता पैदा करती है, दृष्‍टिकोण की सापेक्षिकता – और फिर वही दिखता है जो तुम देखना चाहते हो। निरपेक्ष सत्‍य आंखों से ओझल हो जाता है। जो हमारी आशा है, कामना है, तृष्‍णा है; उसी के अनुरूप हम सारा संसार अपने चारों ओर गढ़ते हैं। और इस तरह आशा द्वन्‍द्व पैदा करती है, संघर्ष उत्‍पन्‍न करती है। एक लड़का था जो अभी-अभी 12वीं में उत्‍तीर्ण होकर कॉलेज में आया था। उसके सभी दोस्‍त कार से कॉलेज जाते थे, लेकिन वह बेचारा पैदल ही कॉलेज जाता था। उसके दिल में केवल एक ही उम्‍मीद थी कि पिताजी उसकी बेचारगी को देखें और उसे भी एक कार दिलवा दें। लेकिन उसे अपनी ये आशा धूमिल होती नज़र आयी, पितीजी इस ओर कभी ध्‍यान ही नहीं देते ‍थे। सो वह एक ‍‍‍िदन अपने ‍िपताजी के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। पिताजी बोले - अरे ओ नालायक! घर की दीवार से लगा हुआ तो तेरा कॉलेज है वहां भी कार से जाना चाहता है, भगवान ने ये दो पैर किस लिए दिए हैं? – आखिर पिताजी भी यूंही करोड़पति नहीं बन गये थे, कंजूसी में पीएचडी की थी और पाई-पाई को निचोड़ना अच्‍छी तरह से जानते थे, उन्‍हें उम्‍मीद थी कि बेटा भी यही गुण सीखेगा लेकिन हो उल्‍टा रहा था – बेटा बोला, दो पैर किस लिए दिये हैं? आपने बिल्‍कुल ठीक सवाल पूछा। एक पैर दिया है एक्‍सिलरेटर पर रखने ‍के लिए और दूसरा पैर दिया है ब्रेक पर रखने के लिए। दोनों ही नज़रिए ठीक है अपनी-अपनी जगह पर। पर यह मज़ाक नहीं है, यह वास्‍तविक द्वन्‍द्व है जो उम्‍मीदों के, आशाओं के टकराने से पैदा होता है और इन्‍सान केवल अपना ही पहलू देख पाता है।

आशा दु:ख की जननी है। जो व्‍यक्‍ति कुछ प्राप्‍त करने की आशा रखता है, प्रतिदान चाहता है; वह हमेशा दु:खी रहेगा। वह कष्‍ट भोगने के लिए बाध्‍य है। आदमी अपनी पत्‍नी से इस आशा में प्‍यार करता है कि बदले में वह भी प्‍यार पाएगा, और जब उसे प्‍यार नहीं मिलता या कहें कि वैसा प्‍यार नहीं मिलता जैसी उसने आशा की थी, जैसी उसने कल्‍पना की थी; तो वह कष्‍ट का अनुभव करता है। कोई इस आशा में उपकार करता है कि उसे प्रत्‍युपकार भी प्राप्‍त होगा, लेकिन जब उसे उसके उपकार का फल नहीं मिलता तो वह दु:खी हो जाता है। अगर दु:ख से, कष्‍ट से, निराशा से छुटकारा पाना है; तो आशा की ज़ंजीरों से भी छुटकारा पाना पड़ेगा। क्‍योंकि निराशा और आशा दोनों एक ही सिक्‍के के दो पहलू हैं, एक को पकड़कर दूसरे से छूटना नामुमकिन है।

लेकिन मेरा मतलब यह नहीं है कि तुम प्‍यार करना ही बन्‍द कर दो। कांटों के भय से गुलाब को छोड़ना कहां की बुद्धिमानी है? प्रेम करो – पत्‍नी से, बच्‍चों से, संसार से – लेकिन आशा-विहीन होकर। द़रअसल जीवन के आनन्‍द का उपभोग वही कर सकता है, जो आशा-मुक्‍त हो। बच्‍चों के साथ वही खेल सकता है, बारिश में वही भीग सकता है, उल्‍लास से भरकर वही नाच सकता है और दिल खोलकर गाने का आनन्‍द वही उठा सकता है; जिसने बदले में कुछ न चाहा हो, जिसने प्रतिदान न चाहा हो, जिसने कोई आशा न की हो। दुनिया में जो भी सर्वश्रेष्‍ठ है, वह आशा-विहीन अवस्‍था से उत्‍पन्‍न होता है। एक बार दरबार में तानसेन के गाने को सुनकर अकबर मुग्‍ध हो गये और बोले – तुम दुनिया के सर्वोत्‍तम गायक हो। तुमसे बेहतर गायक तो इस ‍दुनिया में हो ही नहीं सकता। इसपर तानसेन ने कहा – मेरे गुरु स्‍वामी हरिदास मुझसे भी बेहतर गायक हैं, मैं उनके सामने कुछ भी नहीं हूं। अकबर को यकीन नहीं हुआ तो तानसेन अकबर को लेकर वृंदावन पहुंचे, जहां हरिदास रहते थे। बहुत दिनों के बाद उन्‍होने राग मल्‍हार गाया, सभी मंत्रमुग्‍ध हो गये और ज़ोरों की वर्षा होने लगी। अकबर ने लौटकर तानसेन से पूछा – तुम स्‍वामी हरिदास के सौंवे अंश जितना अच्‍छा भी नहीं गा पाते। क्‍या तुम उनके जितना अच्‍छा नहीं गा सकते? तानसेन ने उत्‍तर दिया – मैं कभी भी उनके जैसा श्रेष्‍ठ गायन नहीं कर सकता, क्‍योंकि मैं इस आशा से गाता हूं कि आप प्रसन्‍न हों। लेकिन वे आशा-विहीन हैं, वे केवल स्‍वान्‍त:सुखाय गाते हैं।

यही सारा रहस्‍य है। अगर संसार का असली आनन्‍द उठाना है, सर्वश्रेष्‍ठ कार्य करना है ; तो ऐसा मन चाहिये, जो कोरा कागज़ हो, जिसपर आशा की स्‍याही न लगी हो। जो आशा के बन्‍धन को छिन्‍न करने में सक्षम हो जाता है ; वह आनन्‍द प्राप्‍त कर लेता है, वह पूर्णता प्राप्‍त कर लेता है, वह जीवन्‍मुक्‍ति की अवस्‍था को प्राप्‍त कर लेता है। उसके लिए अन्‍य कुछ शेष नहीं रहता।

Saturday, April 23, 2005

Vivekananda : His call to Nation

अभी कुछ ही दिनों पहले मैंने Vivekananda : His call to Nation नामक किताब पढ़ी, जो कि मुझे बहुत पसन्‍द आयी। मेरे पसन्‍दीदा अंश नीचे पढिए, साथ ही आशा है कि कॉपीराइट का कोई पेंच नहीं फंसेगा। (क्‍योंकि आप सभी अच्‍छी तरह से जानते हैं कि आशा ही जीवन है) :

जिसमें आत्‍मविश्‍वास नहीं है वही नास्‍तिक है। प्राचीन धर्मों में कहा गया है, जो ईश्‍वर में विश्‍वास नहीं करता वह नास्‍तिक है। नूतन धर्म कहता है, जो आत्‍मविश्‍वास नहीं रखता वही नास्‍तिक है।

संसार का इतिहास उन थोड़े से व्‍यक्‍तियों का इतिहास है, जिनमें आत्‍मविश्‍वास था। यह विश्‍वास अन्‍त:स्‍थित देवत्‍व को ललकार कर प्रकट कर देता है। तब व्‍यक्‍ति कुछ भी कर सकता है, सर्व समर्थ हो जाता है। असफलता तभी होती है, जब तुम अन्‍त:स्‍थ अमोघ शक्‍ति को व्‍यक्‍त करने का यथेष्‍ट प्रयत्‍न नहीं करते। जिस क्षण व्‍यक्‍ति अथवा राष्‍ट्र आत्‍मविश्‍वास खो देता है, उसी क्षण उसकी मृत्‍यु हो जाती है।

विश्‍वास-विश्‍वास! अपने आप पर विश्‍वास, परमात्‍मा के ऊपर‍ विश्‍वास – यही उन्‍नति करने का एकमात्र उपाय है। यदि पुराणों में कहे गये तेंतीस करोड़ देवताओं के ऊपर‍ और विदेशियों ने बीच-बीच में जिन देवताओं को तुम्‍हारे बीच में घुसा दिया है, उन सब पर भी तुम्‍हारा विश्‍वास हो और अपने आप पर विश्‍वास न हो, तो तुम कदापि मोक्ष के अधिकारी नहीं हो सकते।

यह कभी न सोचना कि आत्‍मा ‍के लिये कुछ असम्‍भव है। ऐसा कहना ही भयानक नास्‍तिकता है। यदि पाप नामक कोई वस्‍तु है तो यह कहना ही एकमात्र पाप है कि मैं दुर्बल हूं अथवा अन्‍य कोई दुर्बल है।

तुम जो कुछ सोचोगे, तुम वही हो जाओगे ; यदि तुम अपने को दुर्बल समझोगे, तो तुम दुर्बल हो जाओगे ; बलवान सोचोगे तो बलवान बन जाओगे।

मुक्‍त होओ, किसी दूसरे के पास से कुछ न चाहो। मैं निश्‍चित रूप से यह कह सकता हूं कि यदि तुम अपने जीवन की अतीत घटनाएं याद करो तो देखोगे कि तुम सदैव व्‍यर्थ ही दूसरों से सहायता पाने की चेष्‍टा करते रहे, किन्‍तु कभी पा नहीं सके ; जो कुछ सहायता पायी, वह अपने अन्‍दर से ही थी।

कभी ‘नहीं’ मत कहना, ‘मैं नहीं कर सकता’ यह कभी न कहना। ऐसा कभी नहीं हो सकता, क्‍योंकि तुम अनन्‍तस्‍वरूप हो। तुम्‍हारे स्‍वरूप की तुलना में देश-काल भी कुछ नहीं है। तुम्‍हारी जो इच्‍छा होगी वही कर सकते हो, तुम सर्वशक्‍तिमान हो।

ये संघर्ष, ये भूलें रहने से हर्ज़ भी क्‍या है ? मैंने गाय को कभी झूठ बोलते नहीं सुना, पर वह सदा गाय ही रहती है, मनुष्‍य कभी नहीं हो जाती। अतएव यदि एक बार असफल हो जाओ, तो भी क्‍या? कोई हानि नहीं, सहस्र बार इस आदर्श को हृदय में धारण करो और यदि सहस्र बार भी विफल हो जाओ, तो एक बार पुन: प्रयत्‍न करो।

उपनिषदों में यदि कोई ऐसा शब्‍द है जो वज्र-वेग से अज्ञान-राशि के ऊपर पतित होता है, उसे बिल्‍‍कुल उड़ा देता है, तो वह है ‘अभी:’ – निर्भयता।

हे मेरे युवक बन्‍धुगण! बलवान बनो – यही तुम्‍हारे लिए मेरा उपदेश है। गीता पाठ करने की अपेक्षा फुटबॉल खेलने से तुम स्‍वर्ग के अधिक समीप पहुंचोगे। मैंने अत्‍यन्‍त साहसपूर्वक ये बातें कहीं हैं और इनको कहना अत्‍यावश्‍यक है, कारण मैं तुमको प्‍यार करता हूं। मैं जानता हूं कि कंकड़ कहां चुभता है। मैंने कुछ अनुभव प्राप्‍त किया है। बलवान शरीर से और मज़बूत पुट्ठों से तुम गीता को अधिक समझ सकोगे।

केवल मनुष्‍यों की आवश्‍यकता है; और सब कुछ हो जाएगा, किन्‍तु आवश्‍यकता है वीर्यवान, तेजस्‍वी, श्रद्धासम्‍पन्‍न और अन्‍त तक कपट रहित नवयुवकों की। इस प्रकार के सौ नवयुवकों से संसार के सभी भाव बदल दिये जा सकते हैं।

दुन्‍दुभी नगाड़े क्‍या देश में तैयार नहीं होते? तुरही भेरी क्‍या भारत में नहीं मिलती? वही सब गुरु गम्‍भीर ध्‍वनि लड़कों को सुना। बचपन से जनाने बाजे सुन सुनकर, कीर्तन सुन सुनकर, देश लगभग स्‍त्रियों का देश बन गया है।

जिसका जो जी चाहे कहे, आपे में मस्‍त रहो – दुनिया तुम्‍हारे पैरों तले आ जाएगी, चिन्‍ता मत करो। लोग कहते हैं – इस पर विश्‍वास करो, उस पर विश्‍वास करो; मैं कहता हूं – पहले अपने आप पर विश्‍वास करो। अपने पर विश्‍वास करो – सब शक्‍ति तुम में है – इसकी धारणा करो और शक्‍ति जगाओ – कहो हम सब कुछ कर सकते हैं। ‘‘नहीं-नहीं कहने से सांप का विष भी असर नहीं करता।’’

Tuesday, April 19, 2005

आफरीदी की दवा और कश्‍मीर

कश्‍मीर और आफरीदी की दवा, आप पूछेंगे- अरे भई ! कश्‍मीर का आफरीदी की दवा से भला क्‍या लेना-देना है? हांलाकि आपका प्रश्‍न तो बिल्‍कुल उचित है, लेकिन इसका जवाब ज़रा टेढ़ा है। मुशर्रफ साहब और मनमोहन जी दोनों ही बातचीत के ज़रिए कश्‍मीर मुद्दे को सुलझाने पर सहमत हो गए हैं और साथ ही दोनों का यह भी कहना है कि उनका रवैया बड़ा ही flexible है। लेकिन यह flexibility ज़रा हटकर है, जो मुझ जैसे अतिसाधारण मनुष्‍यों की समझ से परे है। जहां एक ओर मुशर्रफ साहब का कहना है कि नियन्‍त्रण रेखा को अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सीमा नहीं माना जा सकता, वहीं दूसरी तरफ मनमोहन सिंह जी का कहना है कि अब सीमा का निर्धारण ‍‍फिर से करना सम्‍भव नहीं है। इन बयानों से तो लगता है कि वाकई बड़ा ही ‘लचीला’ रूख है दोनों का। तो फिर सोचने वाली बात ये है कि दोनों बैठकर किस चीज़ पर चर्चा करेंगे। ऐसी स्‍थि‍ति में फिर तो मेरे हिसाब से चर्चा का मुद्दा ये हो सकता है कि आफरीदी कौनसी शक्‍तिवर्धक दवा या टॉनिक लेते हैं, जिसकी बदौलत वे हिन्‍दुस्‍तानी टीम की इतनी मार लगाते हैं ; या फिर ज़हर में मीरा के कितने चुम्‍बन दृश्‍य हैं, बारह या सतरह वगैरह वगैरह। लेकिन अब आप मुझसे या दोनों राष्‍ट्राध्‍यक्षों से यह मत पूछिएगा कि इन गम्‍भीर चर्चाओं से कश्‍मीर समस्‍या का हल कैसे निकलेगा।

Sunday, April 17, 2005

राजनीतिक नहीं, धार्मिक समस्‍या है कश्‍मीर

कश्‍मीर को लेकर बार-बार होने वाली नौटंकी मन में अब कोई खास जिज्ञासा पैदा नहीं करती है, क्‍योंकि यह बात स्‍पष्‍ट है कि हर बार की तरह इस बार भी कुछ होना-जाना नहीं है और वही ढाक के तीन पात साबित होंगे। पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रपति (तानाशाह) श्री मुशर्रफ भारत पहुंच चुके हैं और उनका स्‍वागत भी बड़ी गर्मजोशी से हो रहा है। इस भारत-यात्रा से पूर्व कुछ दिनों पहले मुशर्रफ साहब ने इस्‍लामाबाद में इस मसले के हल का एक नया फॉर्मूला पेश किया था। उन्‍होने कहा था कि ‘गुलाम कश्‍मीर’ को सात भागों में बांटा जाना चाहिए, जो 5 मुस्‍लिम बाहुल हिस्‍से हैं वे पाकिस्‍तान को दे देने चाहिये और शेष दो भाग भारत को रख लेने चाहिए जहां कि हिन्‍दू ज़्यादा हैं।

द़रअसल कश्‍मीर एक राजनीतिक नहीं, बल्‍कि मज़हबी मसला है। भारत के ‍इ‍ितहास से यह साफ है कि इस देश के जिस भाग में भी हिन्‍दुओं की संख्‍या कम हुई है, वहीं से देश से अलग होने की आवाज़ आने लगती है। चाहे वह कश्‍मीर का मुद्दा हो या ‍‍‍‍पूर्वोत्‍तर का। अभी हालही में देश के सबसे दक्षिणी नगर कन्‍याकुमारी में मांग उठी है कि कन्‍याकुमारी का नाम बदल कर केप कोमारेन कर देना चाहिये। इसकी केवल यही वजह है कि वहां ईसाई समुदाय की तादाद हिन्‍दुओं से अधिक हो गयी है। भूमि को संस्‍कृति से जोड़कर हिन्‍दू ही भू-सांस्‍कृतिक राष्‍ट्रवाद की भावना पैदा करता है।

कश्‍मीर में पाकिस्‍तान की इसे पैंठ का एक बड़ा कारण है वहां मुस्‍लिमों का जनसंख्‍या में अधिक होना। कश्‍मीर समस्‍या का हल केवल तभी हो सकता है, जब वहां धारा 370 को समाप्‍त किया जाए। कश्‍मीरी पंडितों की वापसी और देश के दूसरे भागों से आकर कश्‍मीर में बसने की छूट जब तक नहीं दी जाती, कश्‍मीर विवाद यूं ही चलता रहेगा। सरकार को स्‍वयं सुनियोजित तरीके से हिन्‍दुओं को कश्‍मीर में बसाने का प्रयत्‍न करना चाहिये।

Tuesday, April 12, 2005

ये ‘भारत भाग्‍य विधाता’ कौन है भाई?

अभी हालही में उच्‍चतम न्‍यायालय में एक सज्‍जन ने याचिका दायर की है और सरकार से स्‍पष्‍टीकरण मांगा है‍ कि राष्‍ट्रगान में ‘भारत भाग्‍य विधाता’ से क्‍या आशय है। ये वही सज्‍जन हैं जिन्‍होने अभी कुछ दिनों पहले सिन्‍ध शब्‍द हटाने की मांग की थी। न्‍यायालय ने सरकार को स्‍पष्‍टीकरण देने का निर्देश भी दे दिया है। वैसे सरकार का कहना है कि वह इस पहलू पर विचार कर रही है और जल्‍दी ही इसका उत्‍तर दे देगी।

हांलाकि बात तो सोचने लायक है, लेकिन पहले कभी इसका मौका ही नहीं मिला। स्‍कूल के दिनों में गणतन्‍त्र दिवस, स्‍वतन्‍त्रता दिवस जैसे मौकों पर तो सारा ध्‍यान सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों के बाद मिलने वाले लड्डुओं पर ही लगा रहता था। लेकिन अब राष्‍ट्रगान के बारे में सोचने पर समझ नहीं आता कि ‘जन-गण-मन’ का अधिनायक और भारत के ‘भाग्‍य का विधाता’ कौन है?

राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के लोगों का कहना है‍ कि ‘भारत भाग्‍य विधाता’ जॉर्ज पंचम को कहा गया है, इसलिये जन-गण-मन को हटाकर वन्‍दे मातरम् को राष्‍ट्रगान का स्‍थान दिया जाना चाहिये। अगर ऐसा है तो निश्‍चय ही यह प्रशंसा-गीत राष्‍ट्रगान कहलाने लायक नहीं है। लेकिन इस तथ्‍य का विरोध करने वाले कहते हैं कि ‘भारत भाग्‍य विधाता’ जॉर्ज पंचम को नहीं, बल्‍कि भगवान को कहा गया है। ऐसी सूरत में तो जन-गण-मन सिर्फ एक भजन की तरह होगा, जिसमें भगवान का गुणगान किया गया है। फिर सवाल यह उठता है कि अगर किसी भजन को ही राष्‍ट्रगान बनाना था, तो ‘रघुपति राघव राजा राम’, ‘ओम् जय जगदीश हरे’ या ‘अपने तो वैष्‍णव जन कहिए’ जैसे विख्‍यात भजनों को छोड़कर जन-गण-मन जैसे अलोकप्रिय गीत को ही राष्‍ट्रगान के पद पर क्‍यों आसीन किया गया।

मेरी नज़र मैं तो ‘भारत भाग्‍य विधाता’ चाहे जॉर्ज पंचम को कहा गया हो या भगवान को, दोनों ही सूरत में राष्‍ट्रगान के रूप में जन-गण-मन की कोई उपयोगिता नहीं है। राष्‍ट्रगान तो किसी ऐसे गीत को होना चाहिये; जिसे सुनकर देशप्रेम की भावना उद्दीप्‍त हो और भारतीय होने के गौरव की अनुभूति से धमनियों व‍ शिराओं में रक्‍त-संचार तेज़ हो जाए। इस उद्देश्‍य की पूर्ति के लिये ‘वन्‍दे मातरम्’ या ‘सारे जहां से अच्‍छा’ जैसा कोई गीत ही राष्‍ट्रगान के तौर पर ज़्यादा कारगर साबित होगा।

Monday, April 04, 2005

The Taj Mahal is a Temple Place

ताजमहल है एक शिव-मन्दिर

अभी हाल ही में सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड के नये दावे के बाद ताजमहल एक बार ‍पुन: विवादों के घेरे में आ गया है। सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड का दावा है कि ताजमहल पर उसका हक है क्‍योंकि शाहजहाँ ने अपनी वसीयत में ताज के रख-रखाव का जिम्‍मा उसे दिया था। वहीं दूसरी ओर दीदार-ए-अंजुमन नाम की एक दूसरी संस्‍था ने भी ताज पर अपना दावा ठोक दिया है। भला यह सब देखकर हिन्‍दूवादी कैसे चुप रहते, इसलिये उन्‍होने भी दावा किया है कि ताजमहल मूलत: एक म‍न्‍दिर है और इसे फिर से हिन्‍दुओं को सौंप देना चाहिये। संघर्ष दलों के गठन में महारथी श्री विनय कटियार ने बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी के बाद अब ताजमहल की मु‍क्‍ति के लिये भोलेनाथ सेना को गठित करने की घोषणा भी लगे हाथों कर दी है। श्री विनय कटियार के ‍इस विश्‍वास का आधार विख्‍यात इतिहासकार श्री पी एन ओक द्वारा लिखित पुस्‍तक The Taj Mahal is a Temple Place है। इन सभी पक्षों को लट्ठम-लट्ठा होते देखकर मुझे भी इस पुस्‍तक को पढने की इच्‍छा हुई। श्री ओक द्वारा दिये गये तर्क काफी ठोस प्रतीत होते हैं, कुछ प्रमुख तर्क पढें और बताएं कि आपका इस बारे में क्‍या कहना है।

मन्‍दिर परम्‍परा

(1) ताजमहल संस्‍कृत शब्‍द तेजोमहालय यानि शिव मन्‍दिर का अपभ्रंश होने से पता चलता है कि अग्रेश्‍वर महादेव अर्थात अग्रनगर के नाथ ईश्‍वर शंकर जी को यहां स्‍थापित किया गया है।

(2) ताजमहल के शिखर पर लगा धातु चिह्न चांद-तारा नहीं अपितु स्‍पष्‍टत: त्रिशूल है, जिसपर नीचे की ओर स्‍वस्‍तिक का चिह्न अभी भी देखा जा सकता है। कश्‍मीर में अभी ऐसे कई मन्‍दिर हैं, जहां शिखर पर इसी प्रकार के स्‍वस्‍तिक चिह्न-अंकित त्रिशूल लगे हुए हैं।

(3) संगमरमरी तहखाने में संगमरमरी जाली के शिखर पर बने कलश कुल 108 हैं, जो संख्‍या पवित्र हिन्‍दू मन्‍दिरों की परम्‍परा है।

कार्बन-14 जाँच

(4) श्री ओक की इस पुस्‍तक को पढकर एक अमेरिकन प्राध्‍यापक Marvin Mills भारत आए थे। ताजमहल के पिछवाड़े में यमुना के किनारे पर ताजमहल का एक प्राचीन लकड़ी का टूटा हुआ द्वार है, उसका एक टुकड़ा वे ले गये। उस टुकड़े की उन्‍होनें New York में Carbon-14 जाँच कराई। उससे भी यही सिद्ध हुआ कि ताजमहल शाहजहाँ के काल से सैकड़ों वर्ष पूर्व बनी ईमारत है।

असंगत तथ्‍य

(5) केन्‍द्रीय अष्‍टकोने कक्ष में जहां मुमताज की नकली कब्र है (और जहां उससे पूर्व शिवलिंग होता था) उसके द्वार में प्रवेश करने से पूर्व पर्यटक दाएं-बाएं दीवारों पर अंकित संगमरमरी चित्रकला देखें। उसमें शंख के आकार के पत्‍ते वाले पौधे तथा ऊँ आकार के पुष्‍प दिखेंगे। कक्ष के अन्‍दर जालियों का अष्‍टकोना आलय बना है उन जालियों के ऊपरी किनारे में गुलाबी रंग के कमल जड़े हैं। यह सारे चिह्न हिन्‍दू हैं। विश्‍व के किसी भी इस्‍लामी मकबरे में इस प्रकार की कलाकृतियां नहीं हैं।

(6) कब्र के ऊपर गुम्‍बद के मध्‍य से अष्‍टधातु की एक ज़ंजीर लटक रही है। शिवलिंग पर जलसिंचन करने वाला सुवर्ण कलश इसी ज़ंजीर से टंगा था। उसे निकालकर जब शाहजहाँ के खज़ाने में जमा करा दिया गया तो वह ज़ंजीर भद्दी दीखने लगी। अत: लॉर्ड कर्ज़न ने उस ज़ंजीर से एक दीव लटकवा दिया। यह दीप अभी भी वहां लटका देखा जा सकता है।

(7) संगमरमरी चबूतरे के तहखाने में जहां मुमताज की कब्र बतायी जाती है, उतरते समय पांच-सात सीढियां उतरने के बाद एक आला सा बना हुआ है। उसके दाएं-बाएं की दीवारें देखें। वे बेजोड़ संगमरमरी शिलाओं से बन्‍द हैं। उससे पता चलता है कि तहखाने के जो अन्‍य सैकड़ों कक्ष बन्‍द हैं, उनमें पहुंचने के जीने यहां से निकलते थे। वे शाहजहाँ ने बन्‍द करा दिये।

(8) जब प्रेक्षक सीढियां चढकर संगमरमरी चबूतरे पर पहुंचते हैं तो वे उस स्‍थान को पैरों से थपथपा कर देखें, जिससे पोली-सी आवाज़ आती है। यदि यह शिला निकाली जाए तो चबूतरे के अन्‍दर जो सैकड़ों कक्ष हैं उनमें उतरने के जीने दिखाई देंगे। एक बार वहां के पुरातत्‍व अधिकारी श्री आर के वर्मा ने यह शिला निकलवाई तो उसमें अन्‍दर मोटी दीवार की गहराई में एक जीना उतरता दिखाई दिया। लेकिन दिल्‍ली स्‍थित वरिष्‍ठ पुरातत्‍व अधिकारी के कहने पर उसे पुन: बन्‍द करा दिया गया। इन कक्षों में वे देव प्रतिमाएं बन्‍द हैं जिन्‍हें शाहजहाँ ने पूरे मन्‍दिर से निकलवा कर इन कक्षों में ठूंस दिया था और इनका द्वार बन्‍द कर दिया गया। पुरातत्‍व विभाग को इन्‍हें पुन: खुलवाना चाहिये।

यमुना तट

(9) विश्‍व की अन्‍य कोई भी इस्‍लाम से सम्‍ब‍न्‍धित ईमारत किसी नदी के तट पर नहीं है। लेकिन नदियों के किनारों पर मन्‍दिर बनाने के प्रथा अति प्राचीन है।

मूर्तियों वाला कक्ष

(10) मुख्‍य द्वार के आगे अन्‍दर जाने के लिए दाएं-बाएं कोने पर दो द्वार बने हुए हैं, किन्‍तु वे ईटों से चुनवा दिए गये हैं। सन 1932-34 में उसमें दरार पड़ने से अन्‍दर कई स्‍तम्‍भों वाला एक कक्ष दिखाई दिया, उन स्‍तम्‍भों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां खुदी हुई हैं। किन्‍तु उन दरारों को पुन: भरवा दिया गया। ताजमहल वस्‍तुत: सात मंजिला ईमारत है। एक मंजिल उपर और शेष छ: मंजिल नीचे हैं, जो अभी तक बन्‍द हैं तथा जिन्‍हें पुरातत्‍व विभाग द्वारा कभी खोला नहीं गया। यदि सातों मंजिलों के सैकड़ों कक्ष खुलवाकर देखे जाएं तो वहां निश्‍चय ही देवमूर्तियां और संस्‍कृत शिलालेख प्राप्‍त होंगे।
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