Sunday, April 24, 2005

अनुगूंज 9 – ”आशा ही जीवन है”

आशा ही मृत्‍यु भी है

यह बात बिल्‍कुल सही है कि आशा ही जीवन है। लेकिन हमें यह बात याद रखनी होगी कि हर सिक्‍के के दो पहलू होते हैं। दिन के साथ रात, अन्‍धकार के साथ प्रकाश और जीवन के साथ मृत्‍यु का चिर-तादात्‍म्‍य है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता है। अगर आशा को जीवन मानते हो तो तुम्‍हें यह भी मानना पड़ेगा कि आशा ही मृत्‍यु भी है। इंसान अमर होना चाहता है – मौत से छुटकारा पाना चाहता है – लेकिन साथ ही जीवन से भी चिपके रहना चाहता है। लेकिन अमर वही है, जो जीवन-मुक्‍त हो – जो जीवन से भी छूट चुका हो। अगर सत्‍य के दर्शन की अभीप्‍सा है तो आशा को त्‍यागना होगा – जीवन और मरण दोनों श्रंखलाओं से मुक्‍त होना पड़ेगा।
Akshargram Anugunj
आशा बन्‍धन का कारण है। आशा सापेक्षिकता पैदा करती है, दृष्‍टिकोण की सापेक्षिकता – और फिर वही दिखता है जो तुम देखना चाहते हो। निरपेक्ष सत्‍य आंखों से ओझल हो जाता है। जो हमारी आशा है, कामना है, तृष्‍णा है; उसी के अनुरूप हम सारा संसार अपने चारों ओर गढ़ते हैं। और इस तरह आशा द्वन्‍द्व पैदा करती है, संघर्ष उत्‍पन्‍न करती है। एक लड़का था जो अभी-अभी 12वीं में उत्‍तीर्ण होकर कॉलेज में आया था। उसके सभी दोस्‍त कार से कॉलेज जाते थे, लेकिन वह बेचारा पैदल ही कॉलेज जाता था। उसके दिल में केवल एक ही उम्‍मीद थी कि पिताजी उसकी बेचारगी को देखें और उसे भी एक कार दिलवा दें। लेकिन उसे अपनी ये आशा धूमिल होती नज़र आयी, पितीजी इस ओर कभी ध्‍यान ही नहीं देते ‍थे। सो वह एक ‍‍‍िदन अपने ‍िपताजी के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। पिताजी बोले - अरे ओ नालायक! घर की दीवार से लगा हुआ तो तेरा कॉलेज है वहां भी कार से जाना चाहता है, भगवान ने ये दो पैर किस लिए दिए हैं? – आखिर पिताजी भी यूंही करोड़पति नहीं बन गये थे, कंजूसी में पीएचडी की थी और पाई-पाई को निचोड़ना अच्‍छी तरह से जानते थे, उन्‍हें उम्‍मीद थी कि बेटा भी यही गुण सीखेगा लेकिन हो उल्‍टा रहा था – बेटा बोला, दो पैर किस लिए दिये हैं? आपने बिल्‍कुल ठीक सवाल पूछा। एक पैर दिया है एक्‍सिलरेटर पर रखने ‍के लिए और दूसरा पैर दिया है ब्रेक पर रखने के लिए। दोनों ही नज़रिए ठीक है अपनी-अपनी जगह पर। पर यह मज़ाक नहीं है, यह वास्‍तविक द्वन्‍द्व है जो उम्‍मीदों के, आशाओं के टकराने से पैदा होता है और इन्‍सान केवल अपना ही पहलू देख पाता है।

आशा दु:ख की जननी है। जो व्‍यक्‍ति कुछ प्राप्‍त करने की आशा रखता है, प्रतिदान चाहता है; वह हमेशा दु:खी रहेगा। वह कष्‍ट भोगने के लिए बाध्‍य है। आदमी अपनी पत्‍नी से इस आशा में प्‍यार करता है कि बदले में वह भी प्‍यार पाएगा, और जब उसे प्‍यार नहीं मिलता या कहें कि वैसा प्‍यार नहीं मिलता जैसी उसने आशा की थी, जैसी उसने कल्‍पना की थी; तो वह कष्‍ट का अनुभव करता है। कोई इस आशा में उपकार करता है कि उसे प्रत्‍युपकार भी प्राप्‍त होगा, लेकिन जब उसे उसके उपकार का फल नहीं मिलता तो वह दु:खी हो जाता है। अगर दु:ख से, कष्‍ट से, निराशा से छुटकारा पाना है; तो आशा की ज़ंजीरों से भी छुटकारा पाना पड़ेगा। क्‍योंकि निराशा और आशा दोनों एक ही सिक्‍के के दो पहलू हैं, एक को पकड़कर दूसरे से छूटना नामुमकिन है।

लेकिन मेरा मतलब यह नहीं है कि तुम प्‍यार करना ही बन्‍द कर दो। कांटों के भय से गुलाब को छोड़ना कहां की बुद्धिमानी है? प्रेम करो – पत्‍नी से, बच्‍चों से, संसार से – लेकिन आशा-विहीन होकर। द़रअसल जीवन के आनन्‍द का उपभोग वही कर सकता है, जो आशा-मुक्‍त हो। बच्‍चों के साथ वही खेल सकता है, बारिश में वही भीग सकता है, उल्‍लास से भरकर वही नाच सकता है और दिल खोलकर गाने का आनन्‍द वही उठा सकता है; जिसने बदले में कुछ न चाहा हो, जिसने प्रतिदान न चाहा हो, जिसने कोई आशा न की हो। दुनिया में जो भी सर्वश्रेष्‍ठ है, वह आशा-विहीन अवस्‍था से उत्‍पन्‍न होता है। एक बार दरबार में तानसेन के गाने को सुनकर अकबर मुग्‍ध हो गये और बोले – तुम दुनिया के सर्वोत्‍तम गायक हो। तुमसे बेहतर गायक तो इस ‍दुनिया में हो ही नहीं सकता। इसपर तानसेन ने कहा – मेरे गुरु स्‍वामी हरिदास मुझसे भी बेहतर गायक हैं, मैं उनके सामने कुछ भी नहीं हूं। अकबर को यकीन नहीं हुआ तो तानसेन अकबर को लेकर वृंदावन पहुंचे, जहां हरिदास रहते थे। बहुत दिनों के बाद उन्‍होने राग मल्‍हार गाया, सभी मंत्रमुग्‍ध हो गये और ज़ोरों की वर्षा होने लगी। अकबर ने लौटकर तानसेन से पूछा – तुम स्‍वामी हरिदास के सौंवे अंश जितना अच्‍छा भी नहीं गा पाते। क्‍या तुम उनके जितना अच्‍छा नहीं गा सकते? तानसेन ने उत्‍तर दिया – मैं कभी भी उनके जैसा श्रेष्‍ठ गायन नहीं कर सकता, क्‍योंकि मैं इस आशा से गाता हूं कि आप प्रसन्‍न हों। लेकिन वे आशा-विहीन हैं, वे केवल स्‍वान्‍त:सुखाय गाते हैं।

यही सारा रहस्‍य है। अगर संसार का असली आनन्‍द उठाना है, सर्वश्रेष्‍ठ कार्य करना है ; तो ऐसा मन चाहिये, जो कोरा कागज़ हो, जिसपर आशा की स्‍याही न लगी हो। जो आशा के बन्‍धन को छिन्‍न करने में सक्षम हो जाता है ; वह आनन्‍द प्राप्‍त कर लेता है, वह पूर्णता प्राप्‍त कर लेता है, वह जीवन्‍मुक्‍ति की अवस्‍था को प्राप्‍त कर लेता है। उसके लिए अन्‍य कुछ शेष नहीं रहता।

Saturday, April 23, 2005

Vivekananda : His call to Nation

अभी कुछ ही दिनों पहले मैंने Vivekananda : His call to Nation नामक किताब पढ़ी, जो कि मुझे बहुत पसन्‍द आयी। मेरे पसन्‍दीदा अंश नीचे पढिए, साथ ही आशा है कि कॉपीराइट का कोई पेंच नहीं फंसेगा। (क्‍योंकि आप सभी अच्‍छी तरह से जानते हैं कि आशा ही जीवन है) :

जिसमें आत्‍मविश्‍वास नहीं है वही नास्‍तिक है। प्राचीन धर्मों में कहा गया है, जो ईश्‍वर में विश्‍वास नहीं करता वह नास्‍तिक है। नूतन धर्म कहता है, जो आत्‍मविश्‍वास नहीं रखता वही नास्‍तिक है।

संसार का इतिहास उन थोड़े से व्‍यक्‍तियों का इतिहास है, जिनमें आत्‍मविश्‍वास था। यह विश्‍वास अन्‍त:स्‍थित देवत्‍व को ललकार कर प्रकट कर देता है। तब व्‍यक्‍ति कुछ भी कर सकता है, सर्व समर्थ हो जाता है। असफलता तभी होती है, जब तुम अन्‍त:स्‍थ अमोघ शक्‍ति को व्‍यक्‍त करने का यथेष्‍ट प्रयत्‍न नहीं करते। जिस क्षण व्‍यक्‍ति अथवा राष्‍ट्र आत्‍मविश्‍वास खो देता है, उसी क्षण उसकी मृत्‍यु हो जाती है।

विश्‍वास-विश्‍वास! अपने आप पर विश्‍वास, परमात्‍मा के ऊपर‍ विश्‍वास – यही उन्‍नति करने का एकमात्र उपाय है। यदि पुराणों में कहे गये तेंतीस करोड़ देवताओं के ऊपर‍ और विदेशियों ने बीच-बीच में जिन देवताओं को तुम्‍हारे बीच में घुसा दिया है, उन सब पर भी तुम्‍हारा विश्‍वास हो और अपने आप पर विश्‍वास न हो, तो तुम कदापि मोक्ष के अधिकारी नहीं हो सकते।

यह कभी न सोचना कि आत्‍मा ‍के लिये कुछ असम्‍भव है। ऐसा कहना ही भयानक नास्‍तिकता है। यदि पाप नामक कोई वस्‍तु है तो यह कहना ही एकमात्र पाप है कि मैं दुर्बल हूं अथवा अन्‍य कोई दुर्बल है।

तुम जो कुछ सोचोगे, तुम वही हो जाओगे ; यदि तुम अपने को दुर्बल समझोगे, तो तुम दुर्बल हो जाओगे ; बलवान सोचोगे तो बलवान बन जाओगे।

मुक्‍त होओ, किसी दूसरे के पास से कुछ न चाहो। मैं निश्‍चित रूप से यह कह सकता हूं कि यदि तुम अपने जीवन की अतीत घटनाएं याद करो तो देखोगे कि तुम सदैव व्‍यर्थ ही दूसरों से सहायता पाने की चेष्‍टा करते रहे, किन्‍तु कभी पा नहीं सके ; जो कुछ सहायता पायी, वह अपने अन्‍दर से ही थी।

कभी ‘नहीं’ मत कहना, ‘मैं नहीं कर सकता’ यह कभी न कहना। ऐसा कभी नहीं हो सकता, क्‍योंकि तुम अनन्‍तस्‍वरूप हो। तुम्‍हारे स्‍वरूप की तुलना में देश-काल भी कुछ नहीं है। तुम्‍हारी जो इच्‍छा होगी वही कर सकते हो, तुम सर्वशक्‍तिमान हो।

ये संघर्ष, ये भूलें रहने से हर्ज़ भी क्‍या है ? मैंने गाय को कभी झूठ बोलते नहीं सुना, पर वह सदा गाय ही रहती है, मनुष्‍य कभी नहीं हो जाती। अतएव यदि एक बार असफल हो जाओ, तो भी क्‍या? कोई हानि नहीं, सहस्र बार इस आदर्श को हृदय में धारण करो और यदि सहस्र बार भी विफल हो जाओ, तो एक बार पुन: प्रयत्‍न करो।

उपनिषदों में यदि कोई ऐसा शब्‍द है जो वज्र-वेग से अज्ञान-राशि के ऊपर पतित होता है, उसे बिल्‍‍कुल उड़ा देता है, तो वह है ‘अभी:’ – निर्भयता।

हे मेरे युवक बन्‍धुगण! बलवान बनो – यही तुम्‍हारे लिए मेरा उपदेश है। गीता पाठ करने की अपेक्षा फुटबॉल खेलने से तुम स्‍वर्ग के अधिक समीप पहुंचोगे। मैंने अत्‍यन्‍त साहसपूर्वक ये बातें कहीं हैं और इनको कहना अत्‍यावश्‍यक है, कारण मैं तुमको प्‍यार करता हूं। मैं जानता हूं कि कंकड़ कहां चुभता है। मैंने कुछ अनुभव प्राप्‍त किया है। बलवान शरीर से और मज़बूत पुट्ठों से तुम गीता को अधिक समझ सकोगे।

केवल मनुष्‍यों की आवश्‍यकता है; और सब कुछ हो जाएगा, किन्‍तु आवश्‍यकता है वीर्यवान, तेजस्‍वी, श्रद्धासम्‍पन्‍न और अन्‍त तक कपट रहित नवयुवकों की। इस प्रकार के सौ नवयुवकों से संसार के सभी भाव बदल दिये जा सकते हैं।

दुन्‍दुभी नगाड़े क्‍या देश में तैयार नहीं होते? तुरही भेरी क्‍या भारत में नहीं मिलती? वही सब गुरु गम्‍भीर ध्‍वनि लड़कों को सुना। बचपन से जनाने बाजे सुन सुनकर, कीर्तन सुन सुनकर, देश लगभग स्‍त्रियों का देश बन गया है।

जिसका जो जी चाहे कहे, आपे में मस्‍त रहो – दुनिया तुम्‍हारे पैरों तले आ जाएगी, चिन्‍ता मत करो। लोग कहते हैं – इस पर विश्‍वास करो, उस पर विश्‍वास करो; मैं कहता हूं – पहले अपने आप पर विश्‍वास करो। अपने पर विश्‍वास करो – सब शक्‍ति तुम में है – इसकी धारणा करो और शक्‍ति जगाओ – कहो हम सब कुछ कर सकते हैं। ‘‘नहीं-नहीं कहने से सांप का विष भी असर नहीं करता।’’

Tuesday, April 19, 2005

आफरीदी की दवा और कश्‍मीर

कश्‍मीर और आफरीदी की दवा, आप पूछेंगे- अरे भई ! कश्‍मीर का आफरीदी की दवा से भला क्‍या लेना-देना है? हांलाकि आपका प्रश्‍न तो बिल्‍कुल उचित है, लेकिन इसका जवाब ज़रा टेढ़ा है। मुशर्रफ साहब और मनमोहन जी दोनों ही बातचीत के ज़रिए कश्‍मीर मुद्दे को सुलझाने पर सहमत हो गए हैं और साथ ही दोनों का यह भी कहना है कि उनका रवैया बड़ा ही flexible है। लेकिन यह flexibility ज़रा हटकर है, जो मुझ जैसे अतिसाधारण मनुष्‍यों की समझ से परे है। जहां एक ओर मुशर्रफ साहब का कहना है कि नियन्‍त्रण रेखा को अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सीमा नहीं माना जा सकता, वहीं दूसरी तरफ मनमोहन सिंह जी का कहना है कि अब सीमा का निर्धारण ‍‍फिर से करना सम्‍भव नहीं है। इन बयानों से तो लगता है कि वाकई बड़ा ही ‘लचीला’ रूख है दोनों का। तो फिर सोचने वाली बात ये है कि दोनों बैठकर किस चीज़ पर चर्चा करेंगे। ऐसी स्‍थि‍ति में फिर तो मेरे हिसाब से चर्चा का मुद्दा ये हो सकता है कि आफरीदी कौनसी शक्‍तिवर्धक दवा या टॉनिक लेते हैं, जिसकी बदौलत वे हिन्‍दुस्‍तानी टीम की इतनी मार लगाते हैं ; या फिर ज़हर में मीरा के कितने चुम्‍बन दृश्‍य हैं, बारह या सतरह वगैरह वगैरह। लेकिन अब आप मुझसे या दोनों राष्‍ट्राध्‍यक्षों से यह मत पूछिएगा कि इन गम्‍भीर चर्चाओं से कश्‍मीर समस्‍या का हल कैसे निकलेगा।

Sunday, April 17, 2005

राजनीतिक नहीं, धार्मिक समस्‍या है कश्‍मीर

कश्‍मीर को लेकर बार-बार होने वाली नौटंकी मन में अब कोई खास जिज्ञासा पैदा नहीं करती है, क्‍योंकि यह बात स्‍पष्‍ट है कि हर बार की तरह इस बार भी कुछ होना-जाना नहीं है और वही ढाक के तीन पात साबित होंगे। पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रपति (तानाशाह) श्री मुशर्रफ भारत पहुंच चुके हैं और उनका स्‍वागत भी बड़ी गर्मजोशी से हो रहा है। इस भारत-यात्रा से पूर्व कुछ दिनों पहले मुशर्रफ साहब ने इस्‍लामाबाद में इस मसले के हल का एक नया फॉर्मूला पेश किया था। उन्‍होने कहा था कि ‘गुलाम कश्‍मीर’ को सात भागों में बांटा जाना चाहिए, जो 5 मुस्‍लिम बाहुल हिस्‍से हैं वे पाकिस्‍तान को दे देने चाहिये और शेष दो भाग भारत को रख लेने चाहिए जहां कि हिन्‍दू ज़्यादा हैं।

द़रअसल कश्‍मीर एक राजनीतिक नहीं, बल्‍कि मज़हबी मसला है। भारत के ‍इ‍ितहास से यह साफ है कि इस देश के जिस भाग में भी हिन्‍दुओं की संख्‍या कम हुई है, वहीं से देश से अलग होने की आवाज़ आने लगती है। चाहे वह कश्‍मीर का मुद्दा हो या ‍‍‍‍पूर्वोत्‍तर का। अभी हालही में देश के सबसे दक्षिणी नगर कन्‍याकुमारी में मांग उठी है कि कन्‍याकुमारी का नाम बदल कर केप कोमारेन कर देना चाहिये। इसकी केवल यही वजह है कि वहां ईसाई समुदाय की तादाद हिन्‍दुओं से अधिक हो गयी है। भूमि को संस्‍कृति से जोड़कर हिन्‍दू ही भू-सांस्‍कृतिक राष्‍ट्रवाद की भावना पैदा करता है।

कश्‍मीर में पाकिस्‍तान की इसे पैंठ का एक बड़ा कारण है वहां मुस्‍लिमों का जनसंख्‍या में अधिक होना। कश्‍मीर समस्‍या का हल केवल तभी हो सकता है, जब वहां धारा 370 को समाप्‍त किया जाए। कश्‍मीरी पंडितों की वापसी और देश के दूसरे भागों से आकर कश्‍मीर में बसने की छूट जब तक नहीं दी जाती, कश्‍मीर विवाद यूं ही चलता रहेगा। सरकार को स्‍वयं सुनियोजित तरीके से हिन्‍दुओं को कश्‍मीर में बसाने का प्रयत्‍न करना चाहिये।

Tuesday, April 12, 2005

ये ‘भारत भाग्‍य विधाता’ कौन है भाई?

अभी हालही में उच्‍चतम न्‍यायालय में एक सज्‍जन ने याचिका दायर की है और सरकार से स्‍पष्‍टीकरण मांगा है‍ कि राष्‍ट्रगान में ‘भारत भाग्‍य विधाता’ से क्‍या आशय है। ये वही सज्‍जन हैं जिन्‍होने अभी कुछ दिनों पहले सिन्‍ध शब्‍द हटाने की मांग की थी। न्‍यायालय ने सरकार को स्‍पष्‍टीकरण देने का निर्देश भी दे दिया है। वैसे सरकार का कहना है कि वह इस पहलू पर विचार कर रही है और जल्‍दी ही इसका उत्‍तर दे देगी।

हांलाकि बात तो सोचने लायक है, लेकिन पहले कभी इसका मौका ही नहीं मिला। स्‍कूल के दिनों में गणतन्‍त्र दिवस, स्‍वतन्‍त्रता दिवस जैसे मौकों पर तो सारा ध्‍यान सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों के बाद मिलने वाले लड्डुओं पर ही लगा रहता था। लेकिन अब राष्‍ट्रगान के बारे में सोचने पर समझ नहीं आता कि ‘जन-गण-मन’ का अधिनायक और भारत के ‘भाग्‍य का विधाता’ कौन है?

राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के लोगों का कहना है‍ कि ‘भारत भाग्‍य विधाता’ जॉर्ज पंचम को कहा गया है, इसलिये जन-गण-मन को हटाकर वन्‍दे मातरम् को राष्‍ट्रगान का स्‍थान दिया जाना चाहिये। अगर ऐसा है तो निश्‍चय ही यह प्रशंसा-गीत राष्‍ट्रगान कहलाने लायक नहीं है। लेकिन इस तथ्‍य का विरोध करने वाले कहते हैं कि ‘भारत भाग्‍य विधाता’ जॉर्ज पंचम को नहीं, बल्‍कि भगवान को कहा गया है। ऐसी सूरत में तो जन-गण-मन सिर्फ एक भजन की तरह होगा, जिसमें भगवान का गुणगान किया गया है। फिर सवाल यह उठता है कि अगर किसी भजन को ही राष्‍ट्रगान बनाना था, तो ‘रघुपति राघव राजा राम’, ‘ओम् जय जगदीश हरे’ या ‘अपने तो वैष्‍णव जन कहिए’ जैसे विख्‍यात भजनों को छोड़कर जन-गण-मन जैसे अलोकप्रिय गीत को ही राष्‍ट्रगान के पद पर क्‍यों आसीन किया गया।

मेरी नज़र मैं तो ‘भारत भाग्‍य विधाता’ चाहे जॉर्ज पंचम को कहा गया हो या भगवान को, दोनों ही सूरत में राष्‍ट्रगान के रूप में जन-गण-मन की कोई उपयोगिता नहीं है। राष्‍ट्रगान तो किसी ऐसे गीत को होना चाहिये; जिसे सुनकर देशप्रेम की भावना उद्दीप्‍त हो और भारतीय होने के गौरव की अनुभूति से धमनियों व‍ शिराओं में रक्‍त-संचार तेज़ हो जाए। इस उद्देश्‍य की पूर्ति के लिये ‘वन्‍दे मातरम्’ या ‘सारे जहां से अच्‍छा’ जैसा कोई गीत ही राष्‍ट्रगान के तौर पर ज़्यादा कारगर साबित होगा।

Monday, April 04, 2005

The Taj Mahal is a Temple Place

ताजमहल है एक शिव-मन्दिर

अभी हाल ही में सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड के नये दावे के बाद ताजमहल एक बार ‍पुन: विवादों के घेरे में आ गया है। सुन्‍नी वक्‍फ बोर्ड का दावा है कि ताजमहल पर उसका हक है क्‍योंकि शाहजहाँ ने अपनी वसीयत में ताज के रख-रखाव का जिम्‍मा उसे दिया था। वहीं दूसरी ओर दीदार-ए-अंजुमन नाम की एक दूसरी संस्‍था ने भी ताज पर अपना दावा ठोक दिया है। भला यह सब देखकर हिन्‍दूवादी कैसे चुप रहते, इसलिये उन्‍होने भी दावा किया है कि ताजमहल मूलत: एक म‍न्‍दिर है और इसे फिर से हिन्‍दुओं को सौंप देना चाहिये। संघर्ष दलों के गठन में महारथी श्री विनय कटियार ने बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी के बाद अब ताजमहल की मु‍क्‍ति के लिये भोलेनाथ सेना को गठित करने की घोषणा भी लगे हाथों कर दी है। श्री विनय कटियार के ‍इस विश्‍वास का आधार विख्‍यात इतिहासकार श्री पी एन ओक द्वारा लिखित पुस्‍तक The Taj Mahal is a Temple Place है। इन सभी पक्षों को लट्ठम-लट्ठा होते देखकर मुझे भी इस पुस्‍तक को पढने की इच्‍छा हुई। श्री ओक द्वारा दिये गये तर्क काफी ठोस प्रतीत होते हैं, कुछ प्रमुख तर्क पढें और बताएं कि आपका इस बारे में क्‍या कहना है।

मन्‍दिर परम्‍परा

(1) ताजमहल संस्‍कृत शब्‍द तेजोमहालय यानि शिव मन्‍दिर का अपभ्रंश होने से पता चलता है कि अग्रेश्‍वर महादेव अर्थात अग्रनगर के नाथ ईश्‍वर शंकर जी को यहां स्‍थापित किया गया है।

(2) ताजमहल के शिखर पर लगा धातु चिह्न चांद-तारा नहीं अपितु स्‍पष्‍टत: त्रिशूल है, जिसपर नीचे की ओर स्‍वस्‍तिक का चिह्न अभी भी देखा जा सकता है। कश्‍मीर में अभी ऐसे कई मन्‍दिर हैं, जहां शिखर पर इसी प्रकार के स्‍वस्‍तिक चिह्न-अंकित त्रिशूल लगे हुए हैं।

(3) संगमरमरी तहखाने में संगमरमरी जाली के शिखर पर बने कलश कुल 108 हैं, जो संख्‍या पवित्र हिन्‍दू मन्‍दिरों की परम्‍परा है।

कार्बन-14 जाँच

(4) श्री ओक की इस पुस्‍तक को पढकर एक अमेरिकन प्राध्‍यापक Marvin Mills भारत आए थे। ताजमहल के पिछवाड़े में यमुना के किनारे पर ताजमहल का एक प्राचीन लकड़ी का टूटा हुआ द्वार है, उसका एक टुकड़ा वे ले गये। उस टुकड़े की उन्‍होनें New York में Carbon-14 जाँच कराई। उससे भी यही सिद्ध हुआ कि ताजमहल शाहजहाँ के काल से सैकड़ों वर्ष पूर्व बनी ईमारत है।

असंगत तथ्‍य

(5) केन्‍द्रीय अष्‍टकोने कक्ष में जहां मुमताज की नकली कब्र है (और जहां उससे पूर्व शिवलिंग होता था) उसके द्वार में प्रवेश करने से पूर्व पर्यटक दाएं-बाएं दीवारों पर अंकित संगमरमरी चित्रकला देखें। उसमें शंख के आकार के पत्‍ते वाले पौधे तथा ऊँ आकार के पुष्‍प दिखेंगे। कक्ष के अन्‍दर जालियों का अष्‍टकोना आलय बना है उन जालियों के ऊपरी किनारे में गुलाबी रंग के कमल जड़े हैं। यह सारे चिह्न हिन्‍दू हैं। विश्‍व के किसी भी इस्‍लामी मकबरे में इस प्रकार की कलाकृतियां नहीं हैं।

(6) कब्र के ऊपर गुम्‍बद के मध्‍य से अष्‍टधातु की एक ज़ंजीर लटक रही है। शिवलिंग पर जलसिंचन करने वाला सुवर्ण कलश इसी ज़ंजीर से टंगा था। उसे निकालकर जब शाहजहाँ के खज़ाने में जमा करा दिया गया तो वह ज़ंजीर भद्दी दीखने लगी। अत: लॉर्ड कर्ज़न ने उस ज़ंजीर से एक दीव लटकवा दिया। यह दीप अभी भी वहां लटका देखा जा सकता है।

(7) संगमरमरी चबूतरे के तहखाने में जहां मुमताज की कब्र बतायी जाती है, उतरते समय पांच-सात सीढियां उतरने के बाद एक आला सा बना हुआ है। उसके दाएं-बाएं की दीवारें देखें। वे बेजोड़ संगमरमरी शिलाओं से बन्‍द हैं। उससे पता चलता है कि तहखाने के जो अन्‍य सैकड़ों कक्ष बन्‍द हैं, उनमें पहुंचने के जीने यहां से निकलते थे। वे शाहजहाँ ने बन्‍द करा दिये।

(8) जब प्रेक्षक सीढियां चढकर संगमरमरी चबूतरे पर पहुंचते हैं तो वे उस स्‍थान को पैरों से थपथपा कर देखें, जिससे पोली-सी आवाज़ आती है। यदि यह शिला निकाली जाए तो चबूतरे के अन्‍दर जो सैकड़ों कक्ष हैं उनमें उतरने के जीने दिखाई देंगे। एक बार वहां के पुरातत्‍व अधिकारी श्री आर के वर्मा ने यह शिला निकलवाई तो उसमें अन्‍दर मोटी दीवार की गहराई में एक जीना उतरता दिखाई दिया। लेकिन दिल्‍ली स्‍थित वरिष्‍ठ पुरातत्‍व अधिकारी के कहने पर उसे पुन: बन्‍द करा दिया गया। इन कक्षों में वे देव प्रतिमाएं बन्‍द हैं जिन्‍हें शाहजहाँ ने पूरे मन्‍दिर से निकलवा कर इन कक्षों में ठूंस दिया था और इनका द्वार बन्‍द कर दिया गया। पुरातत्‍व विभाग को इन्‍हें पुन: खुलवाना चाहिये।

यमुना तट

(9) विश्‍व की अन्‍य कोई भी इस्‍लाम से सम्‍ब‍न्‍धित ईमारत किसी नदी के तट पर नहीं है। लेकिन नदियों के किनारों पर मन्‍दिर बनाने के प्रथा अति प्राचीन है।

मूर्तियों वाला कक्ष

(10) मुख्‍य द्वार के आगे अन्‍दर जाने के लिए दाएं-बाएं कोने पर दो द्वार बने हुए हैं, किन्‍तु वे ईटों से चुनवा दिए गये हैं। सन 1932-34 में उसमें दरार पड़ने से अन्‍दर कई स्‍तम्‍भों वाला एक कक्ष दिखाई दिया, उन स्‍तम्‍भों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां खुदी हुई हैं। किन्‍तु उन दरारों को पुन: भरवा दिया गया। ताजमहल वस्‍तुत: सात मंजिला ईमारत है। एक मंजिल उपर और शेष छ: मंजिल नीचे हैं, जो अभी तक बन्‍द हैं तथा जिन्‍हें पुरातत्‍व विभाग द्वारा कभी खोला नहीं गया। यदि सातों मंजिलों के सैकड़ों कक्ष खुलवाकर देखे जाएं तो वहां निश्‍चय ही देवमूर्तियां और संस्‍कृत शिलालेख प्राप्‍त होंगे।
Related Posts with Thumbnails