Tuesday, April 12, 2005

ये ‘भारत भाग्‍य विधाता’ कौन है भाई?

अभी हालही में उच्‍चतम न्‍यायालय में एक सज्‍जन ने याचिका दायर की है और सरकार से स्‍पष्‍टीकरण मांगा है‍ कि राष्‍ट्रगान में ‘भारत भाग्‍य विधाता’ से क्‍या आशय है। ये वही सज्‍जन हैं जिन्‍होने अभी कुछ दिनों पहले सिन्‍ध शब्‍द हटाने की मांग की थी। न्‍यायालय ने सरकार को स्‍पष्‍टीकरण देने का निर्देश भी दे दिया है। वैसे सरकार का कहना है कि वह इस पहलू पर विचार कर रही है और जल्‍दी ही इसका उत्‍तर दे देगी।

हांलाकि बात तो सोचने लायक है, लेकिन पहले कभी इसका मौका ही नहीं मिला। स्‍कूल के दिनों में गणतन्‍त्र दिवस, स्‍वतन्‍त्रता दिवस जैसे मौकों पर तो सारा ध्‍यान सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों के बाद मिलने वाले लड्डुओं पर ही लगा रहता था। लेकिन अब राष्‍ट्रगान के बारे में सोचने पर समझ नहीं आता कि ‘जन-गण-मन’ का अधिनायक और भारत के ‘भाग्‍य का विधाता’ कौन है?

राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ के लोगों का कहना है‍ कि ‘भारत भाग्‍य विधाता’ जॉर्ज पंचम को कहा गया है, इसलिये जन-गण-मन को हटाकर वन्‍दे मातरम् को राष्‍ट्रगान का स्‍थान दिया जाना चाहिये। अगर ऐसा है तो निश्‍चय ही यह प्रशंसा-गीत राष्‍ट्रगान कहलाने लायक नहीं है। लेकिन इस तथ्‍य का विरोध करने वाले कहते हैं कि ‘भारत भाग्‍य विधाता’ जॉर्ज पंचम को नहीं, बल्‍कि भगवान को कहा गया है। ऐसी सूरत में तो जन-गण-मन सिर्फ एक भजन की तरह होगा, जिसमें भगवान का गुणगान किया गया है। फिर सवाल यह उठता है कि अगर किसी भजन को ही राष्‍ट्रगान बनाना था, तो ‘रघुपति राघव राजा राम’, ‘ओम् जय जगदीश हरे’ या ‘अपने तो वैष्‍णव जन कहिए’ जैसे विख्‍यात भजनों को छोड़कर जन-गण-मन जैसे अलोकप्रिय गीत को ही राष्‍ट्रगान के पद पर क्‍यों आसीन किया गया।

मेरी नज़र मैं तो ‘भारत भाग्‍य विधाता’ चाहे जॉर्ज पंचम को कहा गया हो या भगवान को, दोनों ही सूरत में राष्‍ट्रगान के रूप में जन-गण-मन की कोई उपयोगिता नहीं है। राष्‍ट्रगान तो किसी ऐसे गीत को होना चाहिये; जिसे सुनकर देशप्रेम की भावना उद्दीप्‍त हो और भारतीय होने के गौरव की अनुभूति से धमनियों व‍ शिराओं में रक्‍त-संचार तेज़ हो जाए। इस उद्देश्‍य की पूर्ति के लिये ‘वन्‍दे मातरम्’ या ‘सारे जहां से अच्‍छा’ जैसा कोई गीत ही राष्‍ट्रगान के तौर पर ज़्यादा कारगर साबित होगा।

8 comments:

  1. हाँ ये आपत्ति बिल्कुल सही है, पहले सिंध वाली आपत्ति बकवास थी।

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  2. Anonymous12:32 PM

    निश्चित ही...महानुभाव आप बिलकुल सही उवाच रहे हैं।

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  3. Anonymous1:51 PM

    बहुत फुरसत म॓ हो यार

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  4. ek baar sochna hoga bahut se masalo pe jo galtiya humne atit me ki hai.

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  5. i think ki jan gan man jorge ki chaplusi me likha gaya tha jisne bhi ye masla utaya hai wo yakinan bharat ka jagruk nagrik hai

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  6. बड़े-बूड़े तो यही बताते हैं कि गीत हमारे भाग्यविधाता अंग्रेज राजा के लिए ही लिखा गया था। लेकिन जिस मर्जी के लिए लिखा गया हो, अब यह हमारा राष्ट्रगान है और हमें इसका सम्मान करना ही चाहिए।

    अनिल जी के चिट्ठे पर निम्न जानकारी थी:

    "टैगोर ने सफाई दी कि जॉर्ज पंचम की सेवा में लगे एक अधिकारी (जो गुरु टैगोर का मित्र भी था) ने उनसे इस तरह का स्वागत गीत लिखने को कहा था, लेकिन उनके लिखे गीत में भाग्य विधाता का अर्थ ईश्वर से है जो भारत के सामूहिक मानस का अधिनायक है और कोई भी जॉर्ज पंचम या षष्टम उसकी जगह नहीं ले सकता।"

    यानि सच यही है कि गीत अंग्रेज राजा के लिए ही लिखा गया था, बाद में सफाई देकर लीपापोती की गई। वैसे भी पुराने समय में कांग्रेस अंग्रेज भक्त ही हुआ करती थी।

    "राष्‍ट्रगान तो किसी ऐसे गीत को होना चाहिये; जिसे सुनकर देशप्रेम की भावना उद्दीप्‍त हो और भारतीय होने के गौरव की अनुभूति से धमनियों व‍ शिराओं में रक्‍त-संचार तेज़ हो जाए। इस उद्देश्‍य की पूर्ति के लिये ‘वन्‍दे मातरम्’ या ‘सारे जहां से अच्‍छा’ जैसा कोई गीत ही राष्‍ट्रगान के तौर पर ज़्यादा कारगर साबित होगा।"

    पूर्णतया सहमत।

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  7. Anonymous9:38 PM

    pata nhi aaplogon ko kya ho gya hai?rastr-bhakti ki bhavna ko prerit karne ke liye kisi geet ki zarurat hai main is baat se sahmat nhi hun. jahan tak sawal hai "JAN-GAN-MAN..." ki to main aapko ye batana chahunga ki "BHARAT BHAGYA VIDHATA" un logo ke liye hai jo is desh ko chalarhe hai. yani ki hamare desh ke neta. agar galat hai kuchh to hum aur aap jaise log,jo apne mulk ko hi nhi sambhal pa rhe hai.agar aap "JAB-GAN-MAN" pe aapatti jata rhe hai to aap "RAVINDRA NATH TAIGOR" ki kabliyat par sak kar rhe hai.

    main aapki baat se katai sahmat nhi hun,kyun ki rastra bhakti ki bhawna dil se hoti hai na ki kisi geet se.

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  8. bhaisaheb,desh main aur bhi badi-badi samasyayen hai.is geet ke rashtragan hone ya nahi hone se koi fark nahi padata.aap se hath jodkar nivedan hai ki koi nayee mushkil paida na karen. pahle se hi kam nahi hain.

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