Tuesday, April 19, 2005

आफरीदी की दवा और कश्‍मीर

कश्‍मीर और आफरीदी की दवा, आप पूछेंगे- अरे भई ! कश्‍मीर का आफरीदी की दवा से भला क्‍या लेना-देना है? हांलाकि आपका प्रश्‍न तो बिल्‍कुल उचित है, लेकिन इसका जवाब ज़रा टेढ़ा है। मुशर्रफ साहब और मनमोहन जी दोनों ही बातचीत के ज़रिए कश्‍मीर मुद्दे को सुलझाने पर सहमत हो गए हैं और साथ ही दोनों का यह भी कहना है कि उनका रवैया बड़ा ही flexible है। लेकिन यह flexibility ज़रा हटकर है, जो मुझ जैसे अतिसाधारण मनुष्‍यों की समझ से परे है। जहां एक ओर मुशर्रफ साहब का कहना है कि नियन्‍त्रण रेखा को अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सीमा नहीं माना जा सकता, वहीं दूसरी तरफ मनमोहन सिंह जी का कहना है कि अब सीमा का निर्धारण ‍‍फिर से करना सम्‍भव नहीं है। इन बयानों से तो लगता है कि वाकई बड़ा ही ‘लचीला’ रूख है दोनों का। तो फिर सोचने वाली बात ये है कि दोनों बैठकर किस चीज़ पर चर्चा करेंगे। ऐसी स्‍थि‍ति में फिर तो मेरे हिसाब से चर्चा का मुद्दा ये हो सकता है कि आफरीदी कौनसी शक्‍तिवर्धक दवा या टॉनिक लेते हैं, जिसकी बदौलत वे हिन्‍दुस्‍तानी टीम की इतनी मार लगाते हैं ; या फिर ज़हर में मीरा के कितने चुम्‍बन दृश्‍य हैं, बारह या सतरह वगैरह वगैरह। लेकिन अब आप मुझसे या दोनों राष्‍ट्राध्‍यक्षों से यह मत पूछिएगा कि इन गम्‍भीर चर्चाओं से कश्‍मीर समस्‍या का हल कैसे निकलेगा।

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