Wednesday, August 10, 2005

रेलवे ने की ई-टिकिटिंग की व्‍यवस्‍था बहाल

लम्‍बी-लम्‍बी कतारों में घण्‍टों धक्‍के खाने से अब जल्‍दी ही आपको छुटकारा मिल सकता है। क्‍योंकि रेलवे ने कम्‍प्‍यूटर प्रिंट-आउट को ‍टिकिट की वैधानिक मान्‍यता दे दी है। बस आपको करना यह होगा कि इस टिकिट के साथ आपको एक पहचान-पत्र (पासपोर्ट, पैन कार्ड वगैरह) साथ लेकर चलना पड़ेगा। हांलाकि यह सुविधा फिलहाल दिल्‍ली-कालका शताब्‍दी के लिए ही उपलब्‍ध है। अगर यहां यह स्‍कीम सफल सिद्ध हुई, तो इसे दूसरी गाडियों पर भी लागू किया जायेगा।

Tuesday, August 09, 2005

अगर होता राष्‍ट्रीय बहुसंख्‍यक आयोग तो ..........

अभी हालही में राष्‍ट्रीय अल्‍पसंख्‍यक आयोग ने मांग उठायी है कि रामचरित मानस से 'ढोल गंवार शूद्र पशु नारी ...' वाला दोहा हटा देना चाहिये। अब सवाल ये उठता है कि क्‍योंकर हटा देना चाहिये भई? भला क्‍या दिक्‍कत है आपको? वैसे इसपर उनका कहना है कि इससे दलितों की भावनाएं आहत होती हैं।

पहली बात तो यह है कि इससे अल्‍पसंख्‍यक आयोग को क्‍या लेना-देना। दलित कोई अलग से अल्‍पसंख्‍यक तो हैं नहीं, मुसलमानों और ईसाइयों की तरह। वे हिन्‍दुओं का ही हिस्‍सा हैं, इसलिये वे बहुसंख्‍यक हिन्‍दुओं में से हैं न कि अल्‍पसंख्‍यकों में से। दूसरी बात यह कि रामचरित मानस में यह बात कही गयी है 'समुद्र' के द्वारा, जो श्री राम को लंका जाने देने में बाधा पैदा कर रहा था और मार्ग नहीं दे रहा था। जब भगवान राम ने समुद्र को एक ज़ोरदार हुड़की पिलाई, तब जाकर उसका दिमाग ठिकाने पर आया और वह मान गया। अब अगर रावण ब्राह्मणों की निन्‍दा करे तो क्‍या ब्राह्मणों का बुरा मानना चाहिए। नहीं, क्‍योंकि है ही वह एक नकारात्‍मक किरदार। वैसे ही अगर समुद्र जैसा मूढ़ पात्र किसी में मीन-मेख निकाले, तो इसमें बुरा मानने जैसी क्‍या बात है।

तीसरी बात यह कि यदि राष्‍ट्रीय बहुसंख्‍यक आयोग जैसा कुछ होता; तो शायद वह यह मांग उठा सकता था कि आधी से ज़्यादा क़ुरआन को बदला जाए, जिसमें विधर्मियों को मारने और ‍जेहाद जैसी बातें कही गयी हैं। इससे मुल्‍क़ के 70 करोड़ से ज़्यादा बहुसंख्‍यकों की भावना आहत होती है। लेकिन चूंकि ऐसा कोई आयोग नहीं है, इसलिये अल्‍पसंख्‍यक आयोग को फिलहाल कोई चिन्‍ता नहीं है और वह ऐसे बेकार सवाल उठा रहा है।
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