अभी हालही में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग ने मांग उठायी है कि रामचरित मानस से 'ढोल गंवार शूद्र पशु नारी ...' वाला दोहा हटा देना चाहिये। अब सवाल ये उठता है कि क्योंकर हटा देना चाहिये भई? भला क्या दिक्कत है आपको? वैसे इसपर उनका कहना है कि इससे दलितों की भावनाएं आहत होती हैं।
पहली बात तो यह है कि इससे अल्पसंख्यक आयोग को क्या लेना-देना। दलित कोई अलग से अल्पसंख्यक तो हैं नहीं, मुसलमानों और ईसाइयों की तरह। वे हिन्दुओं का ही हिस्सा हैं, इसलिये वे बहुसंख्यक हिन्दुओं में से हैं न कि अल्पसंख्यकों में से। दूसरी बात यह कि रामचरित मानस में यह बात कही गयी है 'समुद्र' के द्वारा, जो श्री राम को लंका जाने देने में बाधा पैदा कर रहा था और मार्ग नहीं दे रहा था। जब भगवान राम ने समुद्र को एक ज़ोरदार हुड़की पिलाई, तब जाकर उसका दिमाग ठिकाने पर आया और वह मान गया। अब अगर रावण ब्राह्मणों की निन्दा करे तो क्या ब्राह्मणों का बुरा मानना चाहिए। नहीं, क्योंकि है ही वह एक नकारात्मक किरदार। वैसे ही अगर समुद्र जैसा मूढ़ पात्र किसी में मीन-मेख निकाले, तो इसमें बुरा मानने जैसी क्या बात है।
तीसरी बात यह कि यदि राष्ट्रीय बहुसंख्यक आयोग जैसा कुछ होता; तो शायद वह यह मांग उठा सकता था कि आधी से ज़्यादा क़ुरआन को बदला जाए, जिसमें विधर्मियों को मारने और जेहाद जैसी बातें कही गयी हैं। इससे मुल्क़ के 70 करोड़ से ज़्यादा बहुसंख्यकों की भावना आहत होती है। लेकिन चूंकि ऐसा कोई आयोग नहीं है, इसलिये अल्पसंख्यक आयोग को फिलहाल कोई चिन्ता नहीं है और वह ऐसे बेकार सवाल उठा रहा है।
4 comments:
बिल्कुल सही, और चौथी बात यह कि रामचरितमानस हिन्दुत्व के कई धार्मिक ग्रन्थों में से एक है, न उस से कम न उस से ज़्यादा। यह कोई संविधान तो है नहीं जिसे बदलना या अपडेट करना ज़रूरी है। इसे कानून की तरह देखा जाना ग़लत है। इस में कुछ बातें सही भी हो सकती हैं कुछ बातें ग़लत भी। और यही बात हर धर्म की किताबों पर लागू होती है, जिन में लिखी बातें किसी समय, किसी स्थान, किसी विचारधारा, किसी समाज के लिए सही थीं। समस्या तब होती है जब कोई अपने धर्म को विभिन्न समाज, विभिन्न समय, विभिन्न स्थान पर बलपूर्वक लागू करता है, और यही सारी दुनिया के फसादों की जड़ है। जो कोई यह कहता है कि मेरा धर्म ही सर्वश्रेष्ठ है और अधर्मियों को "उबारना" या मारना ही मेरा धर्म है उसे ही बदलने की आवश्यकता है।
कुछ लोगो को चर्चा मे बने रहने की बिमारी होती है.इन को छपास का रोग होता है. इनका मानसीक संतुलन ठिक नही होता. ऐसे ही लोग ऐसी उल-जलुल मांगे उठाते रहते है. ये कभी ताज पर अपना हक बताते है. कभी सिंध को राष्ट्रगान से निकालने की बात करते है. ये ही लोग कथा सम्राट प्रेमंचंद को "दलित विरोधी" बना देते हैं.
मुझे इन लोगो पर तरस आता है और प्रसार माध्यमो पर गुस्सा जो इन लोगो को बेवजह प्रचार देते हैं
आशिष
भिया ऐसी बात मत करो । कोई साम्प्रदायिक कह देगा । और दूसरी बात ये कि जब दुनिया में कुरान है तो अन्य पुस्तकों की क्या जरूरत है ?
बहुत सही कहते हो आप. हम हिंदु मुसलमानोंकी राजनिती को समझ नही पा रहे है. मुसलमान राजनिती लगातार एकही बात दोहराती है. दारुल ए इस्लाम! इस्लामी शासकोंद्वारा शासीत मुल्क! हम हिंदु यह आशा पे जी रहे है की एक दिन मुसलमान हमे भाई जैसे समझेंगे ऒर हम शांती से जियेंगे! यह कभी नही होगा. कुराण एक सच्चे मुसलमान को हर कफ़ीर के विरुद्ध युद्ध करने की चेतना देता है! यह हमारे सुरक्षा के लिये खतरा है!
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