Wednesday, November 23, 2005

आखिर लग ही गया लालू का खेल


लगता है अब मवेशियों के अच्‍छे दिन आने वाले हैं। गाय-भैसों और भेड़-बकरियों के लिये अब भरपूर चारा उपलब्‍ध होगा। ‘बिहारी’ शब्द के दिन भी सुधरने वाले हैं, शायद यह शब्‍द अपना पुराना गौरव फिर प्राप्‍त करेगा और एक गाली के तौर पर इसका इस्‍तेमाल बन्‍द हो जाएगा। लेकिन बिहार के उद्योग जगत को गहरा धक्का लगा है और उससे जुड़े लोगों के लिये यह सबसे बुरी ख़बरों में से एक है। चकराइये मत, इस समय बिहार के एकमात्र उद्योग – अपहरण उद्योग के बारे में ही मैं यह बात कह रहा हूँ; दूसरे उद्योग-धन्‍धे बिहार में बचे ही कहाँ हैं।

वैसे, लालू यादव उन नेताओं में से हैं; जिन्‍होने जनता पर ही नहीं, बल्कि दूसरे नेताओं पर भी गहरा असर डाला है। अब प्रधानमन्‍त्री डॉ. मनमोहन सिंह को ही ले लीजिए। हाँलाकि डॉ. मनमोहन सिंह का पुराना रिकार्ड दिखाता है कि वे ख़ासे बुद्धिमान हैं, लेकिन इस चुनाव के दौरान उन्‍हें भी लालू की लंगोट छू गयी और वो बेचारे भी जाने क्‍या-क्‍या बोलने लगे। उन्‍होने एक चुनावी रैली में लालू को ‘विकास पुरूष’ की संज्ञा से नवाज़ा; लेकिन इस बात को सुनकर आप लोगों की तरह बिहारी पेट पकड़ कर नहीं हँस पाये, क्‍योंकि उस सभा में बमुश्किल 50-100 लोग ही जुटे थे। वहीं जब कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी ने ‘विकास के लिये’ लालू को वोट देने का आह्वान किया, तो मुझे न जाने ऐसा क्‍यों लगा कि उनका आई क्‍यू परीक्षण किया जाना चाहिए। शायद हमारे देश से सोनिया जी ही जॉर्ज बुश से लोहा लेना चाहती हैं।

1 comment:

  1. देखने वाली बात यह होगी कि नितीश कुमार किस तरह राज्य की बिगडी हुई व्यवस्था को पटरी पर लाते हैं

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