Tuesday, December 20, 2005

आँख के बदले आँख

मुझे लगता है कि दुनिया अभी भी मध्‍य-युग से ज़्यादा आगे नहीं बढ़ पायी है। हालही में एक ख़बर देखी कि सउदी अरब की अदालत में एक भारतीय की आँख फोड़ने की सजा सुनाई गयी। दरअसल, हुआ यूं कि मूल रूप से केरल का निवासी नौशाद सउदी अरब में एक पेट्रोल पम्प पर काम करता था और गलती से उसके हाथों एक व्‍यक्ति की आँख फूट गयी। बस, तुरन्त ही मध्‍य-युगीन जंगली कानून जिसे लोग ‘शरीयत’ के नाम से भी जानते हैं, हरकत में आ गया और बेचारे नौशाद की भी आँख फोड़ने की सज़ा सुनायी गयी। हाँलाकि भारत सरकार और नौशाद के परिवार ने सउदी अरब से दया की अपील की है; लेकिन अभी तो बस इतना ही कहा जा सकता है कि नौशाद का सिर्फ़ ‘अल्लाह’ ही मालिक है, जो उसे बचा सकता है। शरीयत में आँख फोड़ने, हाथ काटने और पत्‍थर मार-मार कर जान से मारने जैसी कई सज़ाओं का प्रावधान है।

वैसे, इस घटना से एक विचार मेरे मस्तिष्क में उद्भूत हो र‍हा है। वो यह कि अगर भारत में मुसलमानों के लिये शरयी कानून लागू कर दिया जाए, तो भारत के सारे मुसलमान पन्‍थान्‍तरण कर हिन्‍दू बन जाएँगे।

Sunday, December 11, 2005

Movie Review : Apaharan


फ़िल्म समीक्षा : अपहरण

गंगाजल के बाद निर्देशक प्रकाश झा एक बार फिर दर्शकों की उम्मीदों पर खरे उतरे हैं। झा का कसा हुआ निर्देशन और अजय देवगन, नाना पाटेकर का मंझा हुआ अभिनय इस फ़िल्म की जान हैं। हाँलाकि फ़िल्म अन्तिम क्षणों में कुछ नाटकीय मोड़ ले लेती है, लेकिन फिर भी यह फ़िल्म आपको पूरे ढाई घण्टे तक बान्धे रखती है।

कहानी केन्द्रित है बिहार में व्यापक रूप से फल-फूल रहे अपहरण उद्योगपर। राजनीति में पूरी तरह हो चुके अपराधीकरण को दर्शाने में भी यह फ़िल्म सफल रही है। अपहरण उद्योगमें इस्तेमाल की जानी वाली शब्दावली शुरूआत में दर्शकों में हास्य भी पैदा करती है। जैसे – ‘माल में कोई डिफेक्ट नहीं होना चाहिएका मतलब है अपहृत व्यक्ति के शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं होना चाहिए वगैरह। साथ ही यह भी दिखाया गया है कि किसी संगठित उद्योग की ही तरह अपहरण के इस धन्धे में भी किस तरह माल के ट्रांसपोर्टसे लेकर खाने-पीने तक हर एक छोटी चीज़ का भी हिसाब-किताब रखा जाता है।

कथानक बुना गया है अजय शास्त्री (अजय देवगन) और विधायक तबरेज़ आलम (नाना पाटेकर) के आस-पास। अजय शास्त्री एक साधारण छात्र है, जो पुलिस में भर्ती होने के लिये जी तोड़ मेहनत करता है, लेकिन फिर भी घूसखोरी और आरक्षण के चलते अपने इस प्रयास में विफल रहता है। रिश्वत मांगे जाने पर कहीं से जैसे-तैसे ५ लाख रू. लाकर देता है, लेकिन अपने आदर्शवादी पिता के चलते नौकरी पाने से वंचित रह जाता है, पैसे जाते हैं सो अलग। और उन पैसों को चुकाने के लिये विवश हो कर उसे भी अपहरण की इस घिनौने कीचड़ में उतरना पड़ता है। फिर वह इस दलदल में फँसता ही चला जाता है और विधायक तबरेज़ आलम उसका इस्तेमाल आपराधिक कामों और अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिये करता है। फिल्म बिहार के बदहाल हालात, भ्रष्ट प्राशासनिक तन्त्र और राजनितिज्ञ-अपराधी गठजोड़ को उजागर करती है। कुल मिलाकर यह फिल्म देखने लायक बन पड़ी है।

अरे... दो ख़ास चीज़ों के बारे में तो बताना भूल ही गया, जो आपको इस फिल्म में मिलेंगी। बिपाशा बसु, वो भी पूरे कपड़ों में और आज-कल की हिन्दी पिक्चरों के लिये ज़रूरी एक खामखां का आइटम नम्बर।

इसे पढ़ने के बाद अगर थोड़ा और वक्त बर्बाद करना चाहते हैं, तो फिल्म की वेब साइट और ब्लॉग भी देख सकते हैं।

Monday, December 05, 2005

Ideal of Art

कला का आदर्श

यूनानी कला का रहस्‍य है प्रकृति के सूक्ष्‍मतम ब्‍योरों तक का अनुकरण करना, पर भारतीय कला का रहस्‍य है आदर्श की अभिव्‍यक्ति करना। यूनानी चित्रकार की सारी शक्ति कदाचित् मांस के एक टुकड़े को चित्रित करने में ही व्‍यय हो जाती है, और वह उसमें इतना सफल होता है कि यदि कुत्ता उसे देख ले, तो उसे सचमुच का मांस समझकर खाने दौड़ आये। किन्‍तु इस प्रकार की प्रकृति के अनुकरण में क्‍या गौरव है? कुत्ते के सामने यथार्थ मांस का एक टुकड़ा की क्‍यों न डाल दिया जाय?

दूसरी ओर, आदर्श को – अतीन्द्रिय अवस्‍था को – अभिव्‍यक्त करने की भारतीय प्रवृत्ति भद्दे और कुरूप बिम्‍बों के चित्रण में विकृत हो गयी है। वास्‍तविक कला की उपमा लिली से दी जा सकती है, जो कि पृथ्‍वी से उत्पन्‍न होती है, उसीसे अपना खाद्य ग्रहण करती है, उसके संस्‍पर्श में रहती है, किन्‍तु फिर भी उससे ऊपर ही उठी रहती है। इसी प्रकार कला को भी प्रकृति के सम्‍पर्क में होना चाहिए – क्‍योंकि यह सम्‍पर्क न रहने पर कला का अध:पतन हो जाता है – पर साथ ही कला का प्रकृति से ऊंचा उठा रहना भी आवश्‍यक है।

कला सौन्‍दर्य की अभिव्‍यक्ति है। प्रत्‍येक वस्‍तु कलापूर्ण होनी चाहिए।

वास्‍तु और साधारण ईमारत में अन्‍तर यह है कि प्रथम एक भाव व्‍यक्त करता है, जब कि दूसरी आर्थिक सिद्धान्‍तों पर निर्मित एक ईमारत मात्र है। जड़ पदार्थ का महत्व भावों को व्‍यक्त कर सकने की उसकी क्षमता पर ही निर्भर है।

हमारे भगवान् श्री रामकृष्‍ण देव में कला-शक्ति का बड़ा उच्‍च विकास हुआ था, और वे कहा करते थे कि बिना इस शक्ति के कोई भी व्‍यक्ति यथार्थ आध्‍यात्मिक नहीं हो स‍कता।

कला में ध्‍यान प्रधान वस्‍तु पर केन्द्रित होना चाहिए। नाटक सब कलाओं में कठिनतम है। उसमें दो चीज़ों को सन्‍तुष्ट करना पड़ता है – पहले, कान; दूसरे, आँखें। दृश्‍य का चित्रण करने में, यदि एक ही चीज़ का अंकन हो जाय, तो काफ़ी है; परन्‍तु अनेक विषयों का चित्रांकन करके भी केन्द्रिय रस अक्षुण्‍ण रख पाना बहुत कठिन है। दूसरी मुश्किल चीज़ है मंच-व्‍यवस्‍था; यानी विविध वस्‍तुओं को इस तरह विन्‍यस्‍त करना कि केन्द्रिय रस अक्षुण्‍ण बना रहे।

(साभार: विवेकानन्‍द साहित्‍य)

‘‘कुछ बतकही’’ के लेखक ‘‘धनञ्जय शर्मा’’ नहीं रहे

मेरे ख्‍याल से शायद यह बात आप लोगों को मालूम नहीं है। अभी-अभी जब मैंने यह चिट्ठा खोला तो उनके किसी परिचित ‘विवेक’ की निम्न टिप्‍पणी उनकी आखिरी प्रविष्टि पर पायी –

"आओ हम सब मिलकर इस धरती को स्वर्ग बनाएँ,
हम सब स्वर्गीय हो जाएँ ।"

यह थे धनन्जय के आखिरी ब्लॉग की शुरूआती शब्द. जैसे कि उन्हें पूर्वानुमान था.

मैं धनन्जय शर्मा से कभी नहीं मिला.

जब मैं लिनक्स के स्थानीयकरण में रूचि के चलते गूगल पर हिन्दी में कुछ खोज रहा था, तो उनके वेबपृष्ट "हिन्दी में लिनक्स, लिनक्स में हिन्दी" पर नज़र पड़ी.

तब मुझे पता चला की गुजरात के जामनगर में बैठे इस इन्सान ने अकेले ही, पूरे मैन्ड्रेक लिनक्स का हिन्दी अनुवाद कर डाला है.

अनुवादों को प्राप्त करने के सिलसिले में उनसे एक बार इमेल का अदान प्रदान भी हुआ. बस, उन्हें मैं इतना ही जानता हुँ.

खबर मिली की उनका आकस्मिक निधन हो गया है. उनके बारे में ज्यादा कुछ नहीं जानता, पर धनन्जय, आपके द्वारा किया परिश्रम और आपका योगदान बहुत सराहनीय है.

आपने भारत की जनता तक उनकी भाषा में एक मुक्त व मुफ्त सॉफ्टवेयर के विकास के लिये इतना परीश्रम किया. आपने अकेले ही समूचे मैन्ड्रेक वितरण का हिन्दी अनुवाद कर डाला. यह कोई आसान काम नहीं, निश्चय ही आपने अपने जीवन के कई बहुमूल्य पल इस पर लगाये.

क्या ये सब व्यर्थ जायेगा? क्या जिन भारतीयों के लिये आपने इतना परिश्रम किया वो आपको जानते भी हैं? क्या यह सब समय की धूल में मिट कर रह जायेगा. हम मध्यम वर्ग के भारतवासी अपने सनसनीखेज मीडिया द्वारा प्रस्तुत नकली नायकों में ही काफी मशगूल रहते हैं. हममें से बहुतों को अपनी भाषा और अपनी संस्कृति पर कोई खास गर्व भी नहीं. अगली पीढ़ी के बच्चे अब अंग्रेज़ी बोलना ही ज्यादा पसंद करते हैं, यहां तक की हिन्दी का प्रयोग "फ़ैशनेबल" नहीं समझा जाता.

अगर हमारी भाषायें आज से 100 साल बाद तक इन्टर्नेट और कम्प्यूटर के युग में भी जीवित रह गयीं, तो मुझे यकीन है कि इस ब्लॉग को कोई 100 साल बाद पड़ रहा होगा. और उस व्यक्ति को यह बताने की आव्श्यकता नहीं पड़ेगी की धनंजय शर्मा कौन था. उस समय तक लोग धनंजय शर्मा के हिन्दी में लिनक्स संचालन तंत्र के विकास के लिये किये गये महत्वपूर्ण योगदान से भलि भांति परिचित होंगे.

क्या ये सपना सच होगा?

Sunday, December 04, 2005

Timepass: My New Hindi Blog

टाइमपास: मेरा नया हिन्‍दी चिट्ठा

देखिए मेरा नया हिन्‍दी चिट्ठा और बताइये कि यह आपको कैसा लगा -

टाइमपास: समय नष्ट करने का एक श्रेष्ठ साधन
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