Sunday, December 31, 2006

Mirza Ghalib's Home Disappeared

मिर्ज़ा ग़ालिब का घर हुआ ग़ायब

Mirza Ghalib's Home Kalan Mahalमहान उर्दू शायर मिर्ज़ा ग़ालिब आगरा में पैदा हुए थे। हाल में सारे देश में उनका जन्मदिन मनाया गया। अगर आप आगरा में किसी से पूछें कि मिर्ज़ा ग़ालिब कहाँ पैदा हुए थे, तो शायद ही कोई आपको बता पाएगा। दरअसल सारा दोष पुरातत्व विभाग का है, जिसने ग़ालिब के जन्म-स्थल को बचाने की कोई कोशिश नहीं की।

शहर के इतिहासकार और वयोवृद्ध बताते हैं कि कालां महल इलाक़े में एक बड़ी हवेली हुआ करती थी, जहाँ सन् १७९७ में ग़ालिब का जन्म हुआ था। लेकिन कालां महल इलाक़े में कोई भी उस जगह के बारे में पक्के तौर पर नहीं कह सकता, जहाँ मियाँ ग़ालिब का जन्म हुआ था। हालाँकि एक इमारत है, जो ग़ालिब की हवेली की ली गई एक बहुत पुरानी तस्वीर से मिलती-जुलती है। बचपन में मुंशी शिव नारायण को ग़ालिब द्वारा लिखे गए एक पत्र से उनकी हवेली के बारे में जानकारी मिलती है, जिसमें उन्होंने अपने घर के बारे में काफ़ी कुछ लिखा है। उन्हीं को लिखे एक अन्य ख़त में उन्होंने आर्थिक तंगी के चलते पैतृक सम्पत्ति छोड़ने की इच्छा का भी उल्लेख किया है। उन्होंने अपनी सम्पत्ति १८५७ के गदर के आस-पास सेठ लक्ष्मीचंद को बेच दी थी।

अब एक स्कूल ट्रस्ट उस सम्पत्ति का मालिक है, लेकिन ट्रस्ट प्रबंधन के मुताबिक़ उस सम्पत्ति का ग़ालिब से कुछ लेना-देना नहीं है। पुराने रिकॉर्ड के मुताबिक़ वहाँ जो ख़ूबसूरत बग़ीचा था, वह कब का ग़ायब हो चुका है और अब वहाँ एक बड़ा सा पानी का टेंक है। इमारत के वर्तमान मालिक के हिसाब से ग़ालिब का उस भवन से कोई सम्बन्ध नहीं है। हालाँकि तथ्य कुछ और ही बयान करते हैं। १९५७ में ग़ालिब की सालगिरह के मौक़े पर मशहूर उर्दू शायद मैकश अकबराबादी की एक तस्वीर है, जो प्रधानाचार्य के वर्तमान दफ़्तर के ठीक सामने ली गई है।

ग़ालिब से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम १९६० तक बाक़ायदा वहीं आयोजित किए जाते रहे हैं। ट्रस्ट द्वारा बड़े पैमाने पर की गई तोड़-फोड़ और निर्माण के चलते अब भवन काफ़ी बदल चुका है। विख्यात शायर फिराक़ गोरखपुरी और अभिनेता फ़ारुक़ शेख़, जिन्होंने ग़ालिब पर एक फ़िल्म का निर्माण किया था, भी इस इमारत को देखने आए थे। ऐतिहासिक तथ्य पुख़्ता तौर पर इशारा करते हैं कि वही भवन मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्मस्थल है, जहाँ आज एक गर्ल्स इंटर कॉलेज चल रहा है। हालाँकि इस बारे में अभी और शोध की ज़रूरत है कि क्या वही इमारत ग़ालिब की पुश्तैनी हवेली है।

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सम्बन्धित आलेख:
१. Why are girls scared of visiting Elephant tower?

Monday, December 25, 2006

I am Blessed

हम धन्य हैं

आज क्रिसमस है। नीरज भाई ने अपने गूगल टॉक में टांक रखा है – “धन्य हैं वे लोग, जो पंक्ति में अन्तिम खड़े होने का साहस करते हैं।” इसे पढ़ते ही हम फूल कर कुप्पा हो गए, क्योंकि आजतक हम अपने आप को बहुत ही ‘अधन्य’ टाइप का समझ रहे थे। हमें पता ही नहीं था कि हम इतने धन्य हैं। हम पाठशाला में हमेशा प्रार्थना के लिए खड़ी पंक्ति में देर से आने की वजह से सबसे पीछे लगते थे। इतना ही नहीं, हम तो डबल धन्य हैं। क्योंकि गप्पें लड़ाने के लिए हम कक्षा में बैठते भी सबसे पीछे ही थे।

इस बाबत नीरज भाई से वार्तालाप हुआ, तो हमारी धन्यता की और बहुतेरी वजहें उभर कर सामने आईं। हालाँकि कुछ आगे वाले नासमझ बच्चे और शिक्षक कहते थे कि पीछे वाले शोर मचाते हैं। हाँ, बात तो सच ही थी। लेकिन पीछे वाले इतने धन्य थे, तो अपना अहोभाव प्रकट करने के लिए हर्षध्वनि करना तो स्वाभाविक है। परीक्षा में पिछड़ने के कारण हमारी वजह से ही दूसरे लोगों को आगे (प्रथम, द्वितीय वगैरह) गिनाए जाने का सुख प्राप्त होता था।

बातों-बातों में फिर हम ईसा के आध्यात्मिक स्तर पर आरोहण करने लगे। खुद तो धन्य थे ही, दूसरों को भी धन्य बनाने लगे। हमारे साथ फ़्लैशबैक में चलिए, जब हम स्कूल में हुआ करते थे। हमने याद करना शुरू किया, कक्षा में पीछे बैठे हम कह रहे हैं – “धन्य है मास्टर जी... आपकी गरिमामयी उपस्थिति से हम पीछे वाले अपने भाग्य को धन्य मानते हैं।” फिर मास्टर जी अपनी धन्यता प्रदर्शित करने के लिए सोंटे से प्रसाद वितरित कर रहे हैं। प्रसाद पाते ही सभी धन्य लड़कों का अहोभाव चित्र-विचित्र आवाज़ों के ज़रिए मुँह से प्रकट हो रहा है। प्रसाद पाकर हमको लगता कि सारे जग में प्रभु ईशू के अलावा हमें ढंग से कोई और न समझ सका। अब मास्टर जी की उपस्थिति के बारे में हमारे विचार थोड़े बदले और इस तरह हो गए – “मास्टर जी, जब आप कक्षा में नहीं आ पाते, तब हम आपकी उपस्थिति से भी ज़्यादा गरिमामयी अनुपस्थिति से अधिक धन्य अनुभव करते हैं।” यह सुनकर हमारे सहपाठी ने जोड़ा – “और आपकी अनुपस्थिति में खूब सारे काग़ज़ के हवाई जहाज़ उड़ा कर अपनी धन्यता को अभिव्यक्त करते हैं।” आगे बैठे हुए बालकों को हम चमकाते हैं, धमकाते हैं – “स्सालों!!! खुद पढ़कर आते नहीं हो... तभी मास्टर जी हमको उठाते हैं जवाब के लिए।”

अर्रर्रर्र.... ये क्या, हम अपनी ‘धन्यता’ की यादों में खोए थे और आपने टोक दिया। पूछ रहे हो कि वो पुरानी बात है, अब काहे अपने को धन्य कहते हो? हम अभी भी धन्य हैं, बाइबल इसका प्रमाण है – “धन्य हैं वे जो ग़रीब हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज उनके लिए है।” हम तो हमेशा से ही ठन-ठन गोपाल हैं और अभी भी वही हालत बरकरार है। इसलिए हमारी ‘धन्यता’ एकदम सातत्य में, कॉन्टिन्यूटी में है। ख़ैर, आखिर में वह बात जो न ईसा ने कही और न ही जॉन, मैथ्यू वगैरह को सूझी। चूँकि हम ईसा के स्तर पर आरोहण कर रहे हैं, सो कहे देते हैं – “धन्य हैं वो जो ब्लॉगिंग में समय नष्ट कर रहे हैं, धन्य हैं वो जो ब्लॉग पर लिखी जाने वाली कविताएँ पढ़ सकते हैं, धन्य हैं वो जो सोचते हैं कि उनका लिखा भी पढ़ा जाता है, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं के लिए है।” :-)

क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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Tuesday, December 19, 2006

Free Download Bollywood Hindi Songs & Music

Great Bollywood Actor & Singer Kishore KumarI’ve recently developed the taste for old classical and filmy Hindi music and songs. Old songs are usually more melodious and heart-touching. But the problem is that there’s no music library for old songs around, so I thought to google it and found really some very interesting websites. This is the best website to free download hindi songs - Hindi Songs. I’m a great fan of Kishore Kumar. And if you’re his torrid fan too, visit this website dedicated to this great personality. You’ll find almost all the songs of Kishore da here. Indian Screen has a huge collection of old songs. Even I got some very old songs dating back to the 1930’s, isn’t it amazing? These people have put a lot of hard work to collect and digitalize old songs. Do visit Indian Screen; if you are an ardent fan of old songs like me.

Cool Toad is another great site, where you’ll get most of the new and old songs. But first registration is required in order to access the vast database of this website. Here you’ll get all kind of music – pop, rock, punk, hip hop, jazz, country, hindi, english… everything you can think of. So don’t forget to add Cool Toad in your list of favorites. Enjoy.

हाल में मुझे पुराने हिन्दी गाने सुनने का नया-नया शौक़ पैदा हुआ है। अमूमन पुराने गाने ज़्यादा मधुर और हृदय-स्पर्शी लगते हैं। लेकिन दिक़्क़त यह है कि यहाँ आस-पास कोई ऐसी दुकान नहीं है, जहाँ पुराने गानों की कैसट या सीडी ख़रीदा जा सके। तो मैंने इस बारे में गूगलाने की सोची और वाक़ई कई बेहतरीन वेबसाइट्स मिलीं, जहाँ से पुराने गाने मुफ़्त में डाउनलोड किए जा सकते हैं। हिन्दी गाने मुफ़्त में डाउनलोड करने के लिए मेरे हिसाब से सबसे बढ़िया वेबसाइट है - हिन्दी सॉङ्ग्स।  मैं किशोर कुमार का बड़ा प्रशंसक हूँ। अगर आपका नाम भी उनके प्रशंसकों की फ़ेहरिस्त में शुमार करता है, तो इस महान व्यक्तित्व को समर्पित इस वेबसाइट को देखिए। यहाँ पर आप किशोर दा के सारे गाने पाएंगे।

इसके अलावा इण्डियन स्क्रीन पर भी पुराने गानों का बड़ा संग्रह है। यहाँ तक कि १९३० के ज़माने के भी कुछ बहुत पुराने हिन्दी गाने यहाँ से डाउनलोड किए जा सकते हैं। है न कमाल? वाक़ई इन लोगों ने पुराने गानों को खोजने और उनके डिजिटलीकरण के लिए बहुत मेहनत की है। आप भी अगर मेरी तरह पुराने गानों के शौक़ीन हैं, तो इंडियन स्क्रीन देखना मत भूलिए।

कूल टोड भी एक और बढ़िया वेबसाइट है, जहाँ आपको ज़्यादातर नए-पुराने गाने मिल जाएंगे। लेकिन इस वेबसाइट के विशाल डाटाबेस को खंगालने के लिए पहले आपको इस पर रजिस्ट्रेशन करना पड़ेगा। यहाँ आपको हर तरीक़े का संगीत मिलेगा - पॉप, रॉक, पंक, हिप हॉप, जैज़, कण्ट्री, हिन्दी, अंग्रेज़ी... वो सब कुछ जिसके बारे में आप सोच सकते हैं। तो कूल टोड को भी अपनी पसन्दीदा साइट्स की सूची में जोड़ लीजिए। इन वेबसाइटों से गाने डाउनलोड कीजिए और एक बार फिर पुराने ज़माने में खो जाइए।

सम्बन्धित आलेख :
१. Record Streaming Music and Songs

Friday, December 15, 2006

Yoga & Tantra in World of Consumerism

उपभोक्तावाद के दौर में योग और तंत्र

उपभोक्तावाद की गति अजीब है। यह हर उस चीज़ को, जिसमें बिकने की सम्भावना है, उपभोक्ता के मुताबिक़ ढाल कर पेश करता है। और अगर किसी चीज़ में बिकने की सम्भावना नहीं है तो उसे तोड़-मरोड़ कर इस तरह बना दिया जाता है, ताकि लोगों को ललचाकर उसे बेचा जा सके।

योग और तन्त्र के साथ भी यही विडम्बना है कि दोनों ही उपभोक्तावाद में जकड़ गए हैं। यानि कि मूलत: जहाँ दोनों आत्मज्ञान की विधियाँ हैं और इसलिए इन्हें बेचना मुमकिन नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञान की कोई उपयोगितावादी क़ीमत नहीं है, इन्हें बाज़ार के हिसाब से पुनर्परिभाषित कर दिया गया है। जहाँ योग को स्वस्थ रहने के एक साधन के तौर पर पेश किया जाता है, वहीं तन्त्र ‘सेक्रेड सेक्स’ मतलब कि ‘पवित्र संभोग’ का पर्याय बन कर रह गया है।

जिस तरह उपभोक्तावादी बाज़ार पर अमेरिका का कब्ज़ा है, उसी तरह इंटरनेट पर भी अमेरिका ही छाया हुआ है। यह हम हिन्दुस्तानियों के लिए निहायत शर्म की बात है कि योग और तन्त्र पर बनी ज़्यादातर वेबसाइट्स भी अमरीकी हैं। इंटरनेट पर ‘योग’ खोजने पर आसनों के अलावा कुछ क़ायदे की जानकारी मुश्किल से मिलती है, मानो आसन ही योग हों। हाँ, स्वामी रामदेव के उदय के साथ प्राणायाम को भी इसमें जोड़ा जा सकता है। वहीं तन्त्र की हालत और भी ख़राब है। वामाचार तन्त्र का बहुत ही छोटा भाग है और उस पर भी वामाचार की हज़ारों व्याख्याएँ हैं। लेकिन तन्त्र के नाम पर सिर्फ़ sacred sex ही देखने को मिलता है। तिस पर भी दु:ख की बात यह है कि हम भारतीय भी योग और तन्त्र की इस नई व्याख्या को आँख मूंद कर स्वीकार कर चुके हैं। तो हम कह सकते हैं कि न योग में और न ही तंत्र में कोई शक्ति है, शक्ति का केन्द्र तो उपभोक्तावाद ही है।

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Wednesday, December 13, 2006

दलितों का सराहनीय क़दम

आज बीबीसी हिन्दी पर यह ख़बर पढ़ी – दलितों ने मांगा पूजा का अधिकार। आज़ादी को मिले साठ वर्ष होने को हैं, लेकिन लोगों की संकीर्ण सोच ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेती है। यह आश्चर्यजनक है और साथ में बेहद दु:खद भी, कि आज भी दलितों को मन्दिरों में प्रवेश करने से रोका जाता है। इसे विसंगति ही कहा जाएगा कि समाज में भेद-भाव अभी भी व्याप्त है और हम विकसित राष्ट्र बनने का सपना देख रहे हैं।

लेकिन यह घटना दलितों की सकारात्मक सोच को दर्शाती है। दलितों ने भारी तादाद में जाकर उस मन्दिर में पूजा-अर्चना की और अपनी आत्मशक्ति का परिचय दिया। यह घटना पूरे देश के दलितों के लिए पथ-प्रदर्शन का काम कर सकती है। दलितों के अधिकारों का हनन किए जाने पर मतान्तरण करके भागना उपाय नहीं है, बल्कि डटे रहना और अपना हक़ प्राप्त करना श्रेयस्कर है। क्योंकि विशुद्ध हिन्दूधर्म सभी की समानता की घोषणा करता है। भेद-भाव करने वाले लोग वस्तुत: हिन्दू कहलाने के अधिकारी ही नहीं हैं। दलितों का यह काम समानता की स्थापना का, विशुद्ध हिन्दुत्व की स्थापना का कार्य है। घर गन्दा होने पर उसे छोड़ा नहीं जाता, बल्कि उसकी सफ़ाई की जाती है। डट कर इस वि‍कृति को दूर करने का यत्न कर रहे भीलवाड़ा के दलित निश्चय ही आदर्श स्थापित कर रहे हैं और तारीफ़ के हक़दार हैं।

Monday, December 11, 2006

सागर भाई को हँसाना है

आजकल कविराज चिट्ठा मण्डल में लोगों को पकड़-पकड़ कर सागर जी को हँसवाने का काम करा रहे हैं। हम यूँ ही निर्द्वन्द्व भाव से चिट्ठा जगत् में विचरण कर रहे थे, इतने में कविराज ने पकड़ लिया और बोले – “अब तुम्हारी बारी है। कुछ भी करो, लेकिन सागर भाई को हँसाओ।” हमने बहुत मान-मनुहार की कि हमें बख़्श दो, जाने दो, लेकिन कविराज थे कि टस-से-मस नहीं हुए। हालाँकि हम भी मूर्ख हैं जो कविराज से अनुनय-विनय कर रहे थे। क्योंकि इंसान कवि बन ही तब पाता है जब उसमें दूसरे को पकड़ कर रखने का (दुर्)गुण विकसित हो गया हो, दूसरा चाहे कितना ही गिड़गिड़ाए लेकिन कवि उसे कविता झिलाए बिना नहीं छोड़ता है। पहले तो हमारे मन मैं आया कि कहें – किसी बेचारे को अपनी ख़तरनाक कविताएँ ज़बरदस्ती पढ़ा-पढ़ा कर इतना टॉर्चर ही काहे करते हो, कि बाद में हँसाने के लिए ज़मीन-आसमान एक करने पड़ें। लेकिन अपनी अघोषित सज्जनता दिखलाने के लिए हमने ऐसा कुछ कहने से गुरेज़ किया।

ख़ैर, जिस तरह पाकिस्तान अपने मिसाइल कार्यक्रम के लिए हमेशा चीन की सूरत ताकता है, ठीक उसी तरह हम इस काम को पूरा करने के लिए दूसरे चिट्ठाकारों की मदद लेने की कोशिश करने लगे। हमने सोचा कि पहले महाचिट्ठाकार जीतू भाई को पकड़ा जाए। उन्हें तो झक मार कर मदद करनी ही पड़ेगी, क्योंकि उन पर हमारे सौ रूपए जो उधार हैं। सो सबसे पहले उन्हें पकड़ा, लेकिन जीतू भाई का मूड ज़रा ऑफ़ था। हम तुरन्त समझ गए, हो-न-हो जीतू-नामधारी छद्म ब्लॉगर की कहीं ताज़ी टिप्पणी हो चुकी है। तो हमने सहानुभूति के दो शब्द कहे, जीतू भाई से राम-राम की और निकल लिए। वैसे हम बता दें, अगर किसी भी पोस्ट पर ‘जीतू’ नाम से दो टिप्पणियाँ नज़र आएँ, तो समझो कि नीचे वाली टिप्पणी में लिखा होगा – यह ऊपर वाली टिप्पणी हमने नहीं की है।

फिर हमने सोचा कि केवल आलोक जी ही हमारी मदद कर सकते हैं, क्योंकि आदि काल से वो लोगों की कम्प्यूटर पर हिन्दी लिखने में मदद करते आ रहे हैं। स्वभाव से ही मदद-प्रिय हैं, तो हमारा काम ज़रूर बनवा देंगे। पहले हमने उनकी थोड़ी मक्खनबाज़ी की, तारीफ़ की – आप तो हिन्दी ब्लॉग जगत् के पितामह हैं वगैरह, वगैरह। सुनकर आलोक जी गदगद हो गए और हमें लगा कि हमारा काम बन गया। वे बोले – “वत्स, हम खुश हुए। लाओ तुम्हारी यह पोस्ट हम लिख देते हैं। जाओ, अब कल आना।” हमारी ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही न रहा। हम अगले दिन पहुँचे और पोस्ट मांगी। उन्होंने विजिटिंग कार्ड के आकार का काग़ज़ एक टुकड़ा हमारी तरफ़ सरका दिया, उस पर लिखा था – “सागर भाई को हँसाना है... हा हा हा।” हमें लगा कि आलोक जी से ज़रूर कौन्हूँ भूल हो गई है और हम बोले – आपसे समझने में कुछ ग़ल्ती हो गई है, हमें सागर जी को तार नहीं भेजना है। हमें तो पूरी ब्लॉग पोस्ट लिखनी है। सुनकर आलोक भाई हँसे और हमें सदमा देने के लिए बोले – “बच्चा, ये पूरी पोस्ट ही है।” इत्ते में पीछे बैकग्राउण्ड सांग बजने लगा – मैं रोऊँ या हँसू, करूँ मैं क्या करूँ। हमने उन्हें प्रणाम किया और निकल लिए उस ‘वेद मंत्र’ वाली पर्ची को हाथ में लेकर।

“जो हुआ सो हुआ, फ़ुरसतिया जी सदा सहाय” – मन में ये शब्द न जाने कहाँ से गूंजे और दिल को बहुत तसल्ली दे गए। फ़ुरसतिया जी ने भी सहायता का वचन दिया और अगले दिन आने को कहा। हम दिल में हर्ष और भय मिश्रित भाव लेकर लौट आए। हर्ष इसलिए कि महान व्यंग्यकार हमारी मदद करेंगे तो सागर भाई का हँसना पक्का है, लेकिन भय इसलिए कि आलोक भाई ने भी इसी तरह अगले दिन बुला कर खर्रा पकड़ा दिया था। जैसे सुख का विलोम दु:ख होता है, आसमान का पाताल होता है, वैसे ही ‘आलोक’ का विलोम ‘अनूप’ होता है – ये बात हमें नई-नई पता लगी। अगले दिन पहुँचे तो अनूप जी ने हज़ार पन्नों की एक पांडुलिपी निकाल कर दे दी, बोले – “तुम्हारे लिए कल ये लिख दी थी, बस टाइप कर लेना।” हमें फिर लगा कि हो-न-हो, अनूप जी हमारी बात समझ नहीं पाए हैं। हमने कहा – “शायद आपको कुछ ग़लतफ़हमी हो गई है। हमने उपन्यास के लिए नहीं कहा था। हमें तो एक छोटी-सी ब्लॉग पोस्ट लिखनी है।” वे बोले – “ये तुम्हारे ब्लॉग के लिए ही है। अब नाटक मत करो और इसे चुपचाप ले जाओ। हमारे ब्लॉग के हिसाब से यह बहुत छोटी पोस्ट बनेगी।” बात तो ठीक ही लगी, फ़ुरसतिया जी की ब्लॉग पोस्ट का आकार तो इससे बहुत बड़ा होता है। सो हम पांडुलिपी ले तो आए, लेकिन टाइप करने की हिम्मत नहीं जुटा सके।

थक-हार कर हम आखिरकार समीर लाल जी के पास पहुँचे। कहा कि ‘अब तो बस आप ही उबारिए, कोई कुण्डलिया रच संकट से हमें तारिए’। किसी नौसीखिए कवि की तरह की गई हमारी इस ऊट-पटांग तुकबंदी से समीर जी प्रसन्न हो गए और हमें संकट से उबारने का वचन दे बाद में फिर बुलाया। बाद में पहुँचने पर यह रचना हमारे हाथ में थमा दी -

सागर भाई को हँसाना है, काम नहीं है आसान
विफल हुए ये करते-करते, बहुत से लोग महान
बहुत से लोग महान, हार समाए काल के गाल
उनमें जीत सका बस एक, नाम है समीर लाल
कहे ‘समीर’ तुममें नैक सी भी अक़ल हो अगर
छोड़ो ये सब काम, क्या कभी हँसा भी है सागर?

हमने कहा कि आपकी कविता तो बढ़िया है, लेकिन ये तो आपके ही नाम से है। हमारा इसमें क्या है, लिखना था तो हमारे नाम से लिखते न। इस पर समीर जी ने अफ़सोस जताया – “अपने नाम से पचास कुण्डलिया प्रतिदिन की दर से लिखते-लिखते आदत पड़ गई है बीच में नाम घुसाने की। अब यही ले जाओ।” तो हम वही लेते आए उनके पास से।

इसके बाद तो हमसे एक बहुत बड़ी ग़लती हो गई कि हम अमित भाई के पास पहुँच गए। अमित भाई से मदद के लिए कहा तो न जाने किस बात पर नाराज़ हो गए। उनका रंग लाल हो गया, सर पर दो सींग निकल आए, नाक और कान से धूआँ निकलने लगा और वे ज़ोर-ज़ारे से उछलने लगे। ग़ुस्से में बोले – “मुझे सब ख़बर है कि तुम कई ब्लॉगरों को परेशान करके आ रहे हो। अब मैं तुम्हें और ब्लॉगर्स को परेशान नहीं करने दूंगा। वैसे भी तुम हमेशा ग़लत कैटेगरी में थ्रेड चालू करते हो। तुम्हारा यह बेहूदा थ्रेड यहीं बन्द किया जाता है।” हम वहाँ से उल्टे पांव दौड़ आए और अपनी जान बचाई।

हम जाना तो और भी बहुत-से दूसरे चिट्ठाकारों के पास चाहते थे, लेकिन अब हमारा थ्रेड ही अमित भाई ने बंद कर दिया है तो क्या करें। सो अब हमें ही कुछ करना पड़ेगा। जहाँ तक हमें याद पड़ता है, हमें ब्लॉग पर इंटरनेट से चुराए हुए सुन्दरियों के फोटुओं को चिपकाने के अलावा बाक़ी कुछ नहीं आता है। सो फ़ोटू चिपकाए देते हैं, देखकर सागर भाई को हँसी आए, रोना आए या दिल में कुछ और ही ख़्याल आए... ये खुद उनकी ज़िम्मेदारी है। यहाँ पर देख लीजिए।

Sunday, December 10, 2006

आओ मूर्तियाँ तोड़ें

यूँ तो हम, बनवारी, भीखू और पुत्तन लंगोटिया यार हैं। लेकिन जैसा कि अक़्सर लंगोटिया यारों में होता है, कभी-कभी हममें भी जूतम पैजार की नौबत आ जाती है। सो एक दिन भिखू भड़क गया कि तुम लोग हमको ख़्वामख़्वाह ही ताने मारते रहते हो और हम आसाराम बापू के प्रवचन में बैठी जनता की नाईं बिना चूँ-चपड़ किए तुम्हारी बक़वास सुनते रहते हैं। हम भी ब्रजवासी हैं, कन्हैया हज़ार के उपर शिशुपाल की गाली नहीं सुन सके तो हम तुम्हारे ताने काहे सुनें? अब तो तुम लोगों को भुगतना ही पड़ेगा।

सो वह डंडा उठाए के हमारे मुहल्ले में पहुँचा और बनवारी के घर के सामने लगी उसके के दादाजी की मूर्ति पर पिल पड़ा – दादाजी रईस ज़मींदार थे, सो मूर्ति-उर्ति लगवाने का पैसा रहा होगा। वैसे तो हमें भीखू की अक़्ल पर हमेशा से शक था, लेकिन यह बात तो बिल्कुल ही समझ में नहीं आ रही थी कि भीखू के भेजे में मूर्ति तोड़ने का इतना सॉलिड आइडिया कैसे आया। पता किया तो मालूम पड़ा कि मंथरा के आधुनिक संस्करण ख़बरिया चैनलों को देखने से उसे अम्बेडकर-मूर्ति प्रकरण वाली बात पता चली थी, वहीं से ये आइडिया उड़ाया था।

ख़ैर, बनवारी भी भीखू की इस हरक़त से भड़क गया। उसके मुहल्ले में गया लेकिन भीखू के दादाजी की मूर्ति कहीं ढूंढे नहीं मिली, काहे से कि उसके दादाजी तो ग़रीब किसान थे – खाने को ढंग से नहीं मिला जिन्दगी भर, ससुरी मूर्ति कहाँ से लगवाते। सो उसने भीखू के घर में टंगी उसके दादाजी की फूलचढ़ी इकलौती तस्वीर पर ही अपने हाथ आज़माए – अब पाँच-सात लौंडे-लपाड़े इकट्ठे करके ले गया था, कुछ-न-कुछ तो आखिर तोड़ के आना ही था। लेकिन जब यह बात भीखू की बिरादरी वालों का मालूम पड़ी, तो बड़ा बवेला मच गया। सभा हुई, सभा में शिरकत कर भीखू को एक नई ही बात मालुम पड़ी – भीखू के दादा की तस्वीर तोड़ना दरअसल भीखू से नि‍जी रंजिश की वजह से नहीं है, बल्कि ये सवर्णों का दलितों पर अत्याचार है जो पिछले हज़ारों सालों से चल रहा है।

भीखू भी मन-ही-मन ख़ुश हो गया, सोचा – अभी तक तो मैं नाहक ही परेशान था कि मेरी तोड़फोड़, गुण्डागर्दी की वजह से ये सब हुआ; लेकिन ये तो सवर्णों के हज़ारों सालों के अत्याचारों का फल है... मेरी भला क्या ग़लती इसमें! सो बदला लेने जाते अपने ‘समाज’ वालों के साथ हो लिया। सबके साथ मिलकर भीखू ने अबकी तथाकथित सवर्णों की खूब मूर्तियाँ तोड़ीं, थोड़ा-बहुत बस-कार वगैरह जलाने को भी ऐन्जॉय किया। अब भला सवर्ण कैसे पीछे रहते, बैठक हुई – इन लोगों की ये हिम्मत... इनकी जात ही ऐसी है, हमने ज़्यादा ही छूट दे दी है लेकिन अब औकाद याद दिलानी होगी। सुन कर बनवारी को भी तसल्ली हुई, सोचा कि ख़्वामख़्वाह आत्मग्लानि पाल रहा था कि मेरी वजह से ये सब हो रहा है। सो बनवारी भी नाश्ता करने से पहले लोगों के साथ जा कर एक-आध ट्रेन जला आया, दूसरी जाति वालों की कई सारी मूर्तियाँ तोड़ आया।

लगभग एक हफ़्ते बाद भीखू और बनवारी, दोनों का ही ग़ुस्सा ठण्डा पड़ गया था। सो हम चारों दोस्त हलवाई के यहाँ भल्ले खाते-खाते गप्पें मार रहे थे। इतने में पुत्तन बोला – "तुम लोगों को कोई काम ढंग से नहीं करना आता। अभी तक मेरे मुहल्ले में एक मूर्ति सही-सलामत खड़ी है। जब बाक़ी की 19 तोड़ीं, तो वो एक क्यों छोड़ दी।" अपना केमिस्ट्री ज्ञान झाड़ता हुआ आगे बोला – "इसीलिए तुम दोनों तो ChuSO4 हो, यानि कि चूतियम सल्फ़ेट।" अब पुत्तन को ऐसी ही केमिस्ट्री आएगी, हम आपको उसके नक़लचीपने के बारे में पहले ही बतला चुके हैं। पढ़ेगा नहीं तो यही होगा न। हालाँकि भीखू और बनवारी ने अपनी ग़लती स्वीकार की और वादा किया कि कल जाकर उस मूर्ति को भी तोड़ आएंगे।

अगले दिन मूर्ति तोड़ने के बाद दोनों जब अपने-अपने घर पहुँचे, तो उनके नाम एक ख़त आया हुआ था। ख़त ‘तालीबान लड़ाका भर्ती परिषद’ से आया था। ख़त में लिखा था – "जितने बुत आप लोगों ने तोड़े, उतने तो हम तालिबान वाले यहाँ अफ़ग़ानिस्तान में भी नहीं तोड़ सके। आप लोगों ने अपने पूरे-के-पूरे शहर को हमारे सपनों के अफ़ग़ानिस्तान के मुक़ाबले का बना दिया है – जहाँ देखो टूटे बुत, जलती गाडियाँ, शोर-शराबा, ख़ून-खराबा... वाह !! वाह!! आप जैसे क़ाबिल और होनहार लोगों की हमें सख़्त ज़रूरत है। आप लोगों को आपकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ तन्ख़्वाह दी जाएगी, साथ में कई पर्क्स भी मिलेंगे। कृपया जितनी जल्दी हो सकें, हमें ज्वाइन करें।" नीचे मुल्ला उमर के दस्तख़त थे। पहले दोनों को नौकरी के लाले थे, अब तो उनकी डिमाण्ड है। तालीबान के अलावा कई राजनैतिक दल वाले भी ऑफ़र दे रहे हैं। आजकल बेचारे दोनों उधेड़-बुन में लगे हैं, किसे ज्वाइन करें - जाएँ तो जाएँ कहाँ?

Sunday, November 26, 2006

Gandhi Gita Golvalkar : My Reply

गांधी गीता गोलवलकर : मेरा उत्तर

आज अफ़लातून जी का यह लेख पढ़ा। उत्तर के रूप में पहले तो अफ़लातून जी से मैं यह कहना चाहूँगा कि मैंने कहीं भी महात्मा गांधी की हत्या को सही नहीं ठहराया है। न ही मैं संघ की हिन्दुत्व की अवधारणा से सहमत हूँ। मैंने अपने इन दो लेखों – “ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी” और “हिन्दू दृष्टिकोण से गांधीगिरी” में केवल गांधीवाद की समालोचना करने का यत्न किया है।

हाँ, तो मैं कह रहा था कि मैं किसी भी बात को आँख मूंद कर स्वीकार नहीं करता... चाहे वो गांधी हों या फिर गोलवलकर। जहाँ तक गांधी जी की गीता की व्याख्या का सवाल है, स्पष्ट ही वह पक्षपातपूर्ण है। यानि कि उनके पसंद के सिद्धान्तों के पक्ष में झुकी हुई है। गीता के बारे में गांधी जी जो कहते हैं, उसे मानने से बेहतर क्या यह नहीं है कि खुद ही गीता पढ़ ली जाए? क्या आप यह नकार सकते हैं कि गीता में अर्जुन युद्ध से इन्कार कर रहा था और श्रीकृष्ण ने शत-शत युक्तियों द्वारा समझाकर उसे युद्ध के लिए प्रेरित किया। अब खुद समझ में न आए तो किसी बच्चे से भी पूछा जा सकता है, कि युद्ध करना अहिंसा कहलाएगा या हिंसा। यहाँ गोलवलकर या गांधी की बात मानने की ज़रूरत नहीं है, ज़रूरत है अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करने की।

जो इंसान जिस सिद्धान्त के प्रति दुराग्रही है, उसे गीता में वही सिद्धान्त नज़र आएगा। क्योंकि गीता पूर्ण है, उसमें अहिंसा के साथ हिंसा की भी स्वीकृति है। गीता में निषेध के लिए जगह नहीं है। मैंने कहीं सुना है कि एक बार जाड़े की सुबह थी और चारों तरफ़ घना कोहरा छाया हुआ था। एक सुनसान जगह पर एक ठूंठ लगा हुआ था। उस रोज़ सुबह-सुबह वहाँ से एक वियोगी प्रेमी गुज़रा, ठूंठ में उसे अपनी प्रेयसी नज़र आई। कुछ वक़्त बाद वहीं से एक चोर गुज़रा, उसे ठूंठ में कोतवाल नज़र आया। फिर थोड़ी देर बाद एक भक्त गुज़रा, उसे ठूंठ में भगवान की प्रतिमा दिखाई दी। उस ठूंठ में तो जबकि कुछ भी नहीं था – न प्रेयसी, न कोतवाल और न ही कोई प्रतिमा; लेकिन जिसके मन में जो था, उसने वही देखा। गीता में तो सभी कुछ स्वीकृत है – हिंसा, अहिंसा, सत्य, असत्य सभी। उसमें तो अपनी इच्छित चीज़ देखना बहुत ही सरल काम है। गांधी जी ने भी वही किया। उनका दुराग्रह अहिंसा के प्रति था, इसलिए गीता में उन्हें अहिंसा ही नज़र आई – इसमें कुछ ख़ास आश्चर्य नहीं है। गीता ठीक-ठीक वही समझ सकता है, जो किसी भी तरह के दुराग्रह से मुक्त हो।

दूसरी बात अफ़लातून जी ने कही कि गांधी जी के अनुसार हमें क़ानून हाथ में नहीं लेना चाहिए। ठीक है, लेकिन अंग्रेज़ों के समय में भी क़ानून था जिसे खुद गांधी जी ने कई बार तोड़ा। इसका एक अच्छा उदाहरण है नमक क़ानून। जिसे गांधी जी ने पूरे प्रचार और हो-हल्ले के साथ तोड़ा। उन्होंने अपने इस काम को सत्याग्रह कहा, लेकिन जब भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियों ने भी देश की आज़ादी के लिए क़ानून की अवज्ञा की तो उसे गांधी जी ने ग़लत ठहराया और उसका पूरी शक्ति से तिरस्कार किया। वे चाहते तो कुछ क्रान्तिकारियों की फाँसी रुकवाने की कोशिश कर सकते थे, लेकिन गांधी और उनका गांधीवाद तो अहिंसावादी है... उन हिंसा करने वालों को क्यों बचाया जाए। हिंसा करने वालों (आप और हम आजकल जिन्हें क्रान्तिकारी कहते हैं) को फाँसी पर लटकने देना ही गांधीवादी अहिंसा है? यानि कि जो गांधी जी की इच्छा हो, वही सही है और बाक़ी ग़लत। और अब गांधीजी के अंधभक्त भी वही करते हैं, तो इसमें कुछ नया नहीं है।

एक और बात अफ़लातून जी कहते हैं – “मारने का प्रश्न खडा होने के पहले हम इस बात का अचूक निर्नय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है?” मुझे नहीं लगता कि यह बात गांधीजी ने कही होगी। लेकिन अगर उन्होंने कही है, तो उनसे बड़ा भ्रमित इंसान कौन हो सकता है? क्या स्पष्ट तौर पर अंग्रेज़ आततायी नहीं थे? क्या अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए दूसरों पर अत्याचार करना आततायी होने की निशानी नहीं है? कौरवों ने तो बस पाण्डवों को उनके राज्य से बेदखल किया था। महाभारत में कहीं ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि कौरवों ने आम जनता पर अत्याचार किए हों। लेकिन केवल पाँच लोगों पर अत्याचार करने वाले को भी श्रीकृष्ण ने आततायी कहा और अर्जुन से कहा – “उठ खड़ा हो और युद्ध में इन आततायियों का संहार कर।” फिर अंग्रेज़ तो तीस कोटि जनता पर अत्याचार कर रहे थे, उनके बारे में वे फ़ैसला न कर सके? कैसी विडम्बना है। और जिन्होंने अचूक निर्णय किया – चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह आदि – उन्हें गांधी जी ने ही हिंसक आततायियों की संज्ञा दी। क्या अहिंसा है... वाह रे गांधीवाद!!!

अफ़लातून जी बार-बार संघ को बीच में लेकर आए हैं, लेकिन मालूम नहीं क्यों? हालाँकि मैं संघ की विचारधारा से असहमत हूँ, लेकिन इतना ज़रूर मानता हूँ कि संघ वाले दोगले नहीं है। वे उन तथाकथित गांधीवादियों की तरह नहीं हैं, जिनकी कथनी और करनी में महाभेद है।

सवाल यह है कि कुछ लोग पिछले पचास वर्षों में गांधीवाद की विफलता के बावजूद उससे क्यों चिपके रहना चाहते हैं? वे यह क्यों नहीं समझते हैं कि गांधीवाद बहुत ही संकुचित दायरे में ही प्रयोग किया जा सकता है? लेकिन मेरे ख़्याल से अंधभक्ति और दुराग्रह उन्हें सोचने नहीं देता, निष्पक्ष विचार नहीं करने देता है। इस पर मुझे एक चुटकुला याद आता है - “एक लड़का था जो अभी-अभी १२वीं में उत्तीर्ण होकर कॉलेज में आया था। उसके सभी दोस्त कार से कॉलेज जाते थे, लेकिन वह बेचारा पैदल ही कॉलेज जाता था। उसके दिल में केवल एक ही उम्मीद थी कि पिताजी उसकी बेचारगी को देखें और उसे भी एक कार दिलवा दें। लेकिन उसे अपनी ये आशा धूमिल होती नज़र आयी, पितीजी इस ओर कभी ध्यान ही नहीं देते ‍थे। सो वह एक ‍‍‍दिन अपने ‍पिताजी के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। पिताजी बोले - अरे ओ नालायक! घर की दीवार से लगा हुआ तो तेरा कॉलेज है वहाँ भी कार से जाना चाहता है, भगवान ने ये दो पैर किस लिए दिए हैं? – आखिर पिताजी भी यूँ‍ही करोड़पति नहीं बन गये थे, कंजूसी में पीएचडी की थी और पाई-पाई को निचोड़ना अच्छी तरह से जानते थे, उन्हें उम्मीद थी कि बेटा भी यही गुण सीखेगा लेकिन हो उल्टा रहा था – बेटा बोला, दो पैर किस लिए दिये हैं? आपने बिल्कुल ठीक सवाल पूछा। एक पैर दिया है एक्सिलरेटर पर रखने ‍के लिए और दूसरा पैर दिया है ब्रेक पर रखने के लिए।” हर कोई चीज़ों को अपने-अपने नज़रिए से देखता है। इस देश में समस्याएँ बहुत जटिल हैं, लेकिन गांधीवादी उन्हें अपने चश्मे से देखते हैं और संघ वाले अपने चश्मे से। इन समस्याओं को सुलझाने के लिए अलग-अलग 'वाद' के चश्मे उतार फेंकने होंगे और निष्पक्ष व तटस्थ रूप से देखना पड़ेगा। लेकिन लोगों को इतनी साधारण सी बात समझ में नहीं आती है कि गीता का दर्शन अत्यन्त व्यापक है और उसकी तुलना में गांधीवाद बहुत ही छोटा और सीमित।

आख़िरी बात, अफ़लातून जी को मुझे और पंकज जैसे लोगों को देखकर कनपुरिया अन्दाज़ में कुछ बातें याद आई हैं। मुझे विवेकशून्य गांधीवादियों को देखकर कठोपनिषद का यह मंत्र याद आता है –
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥
यानि कि “खुद अविद्या में डूबे हुए हैं और बावजूद इसके स्वयं को पण्डित समझते हैं। और अन्धे के द्वारा मार्ग दिखाए जाने वाले अन्धे की तरह ये लोग और इनके अनुयायी, दोनों ही गड्ढे में गिरते हैं।”

सम्बन्धित आलेख :
१. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी
२. हिन्दू दृष्टिकोण से गांधीगिरी

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Saturday, November 25, 2006

Firefox has a Password Flaw

mozilla firefoxन्यूजफ़ैक्टर डॉट कॉम की इस ख़बर के मुताबिक़ फ़ायरफ़ॉक्स २ के "पासवर्ड मैनेजर" में कुछ समस्या है, जिसका बेजा फ़ायदा उठाकर हैकर आपके यूज़रनेम और पासवर्ड को हथिया सकते हैं। मोज़िला फ़ाउण्डेशन ने भी इस ख़ामी की बात को स्वीकारा है। यहाँ पर "bug #360 493" नाम के इस बग पर काफ़ी चर्चा चल रही है। न्यूज़फ़ैक्टर के अनुसार यही समस्या इंटरनेट ऐक्सप्लोरर को भी प्रभावित कर सकती है।

हालाँकि इस समस्या के हल के लिए न तो मोज़िला ने और न ही माइक्रोसॉफ्ट ने अभी तक कोई पैच जारी किया है। लेकिन ब्राउज़र की autosave features को बन्द करके इससे बचा जा सकता है। मोज़िला ने संकेत दिए हैं कि इस समस्या का समाधान फ़ायरफ़ॉक्स संस्करण २.०.०.१ या २.०.०.२ में किया जाएगा।

Monday, November 20, 2006

Gandhigiri from Hindu Point of View

हिन्दू दृष्टिकोण से गांधीगिरी

गांधीगिरी पर अपने पिछले लेख में मैंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी का विश्लेषण करने की कोशिश की थी। साथ ही अन्त में यह भी कहा था कि मैं गांधीगिरी का विश्लेषण विभिन्न आयामों से करने का यत्न करूंगा। हालाँकि व्यस्तता के चलते मैं काफ़ी समय तक इस विषय पर कुछ लिख नहीं सका। अब अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए हिन्दू दृष्टिकोण से गांधीगिरी का विश्लेषण करने की कोशिश करता हूँ।

हिन्दुत्व के दृष्टिकोण से गांधीगिरी का विश्लेषण और भी ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि पहली नज़र में गांधीवाद हिन्दु धर्म पर आधारित नज़र आता है। गांधी जी भी दावा करते हैं कि उनके सिद्धान्त गीता पर पूरी तरह आश्रित हैं। निर्विवाद रूप से गीता आध्यात्मिक साहित्य के महानतम रत्नों में से एक है और हिन्दू धर्म का आधार ग्रंथ है। यह हर दृष्टि से पूर्ण है, यानि कि इसमें जहाँ संन्यासियों के लिए मुक्ति का मार्ग निर्देशित किया गया है; तो वहीं दूसरी ओर गृहस्थों के लिए भी अपरोक्षानुभूति पाने का द्वार दिखलाया गया है। इसलिए स्वभावत: जहाँ एक ओर गीता अहिंसा की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ़ हिंसा को भी परिस्थिवश ज़रूरी मानती है। लेकिन गांधी जी ने गीता से केवल अहिंसा का सिद्धान्त लेकर बाक़ी सब कुछ नकारने की चेष्टा की है।

गीता की तरफ़ दृष्टिपात करने से साफ़ देखा जा सकता है कि गीता हर हालत में अहिंसा का प्रतिपादन नहीं करती है। अर्जुद तो ख़ुद अहिंसा की बात कर रहा था। वह कह रहा था कि युद्ध व्यर्थ है और हिंसा पाप है। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उसे युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। जिसने भी गीता पढ़ी है, उसके सामने यह बात स्पष्ट है। लेकिन इस तर्क से बचने के लिए महात्मा गांधी कहते हैं कि महाभारत का युद्ध ऐतिहासिक नहीं, वरन एक आध्यात्मिक घटना है। महाभारत में मनुष्य के भीरत सदवृत्तियों और बुरी वृत्तियों के बीच युद्ध को आलंकारिक तौर पर दर्शाया गया है। यदि ऐसा भी मान लिया जाए, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि गीता में हिंसा का निषेध किया गया है। जहाँ सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अहिंसा कारगर न हो, वहाँ हिंसा जायज़ है।

दरअसल गांधी जी का अहिंसा का सिद्धान्त वह नहीं है, जो हिन्दू धर्म द्वारा प्रतिपादित है। बल्कि यह सिद्धान्त ईसाईयत से उधार लिया गया है। जिन्होंने ‘मेरे सत्य के प्रयोग’ पढ़ी है, वे जानते होंगे कि गांधी जी ईसाईयत से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने इंग्लैण्ड में ईसाईयत अपनाने की इच्छा भी ज़ाहिर की थी और बाइबल का विशेष अध्ययन किया था। साथ ही उनका पालन-पोषण जैन रीति-रिवाज़ों में हुआ था। हिन्दू धर्म में अहिंसा का सिद्धान्त लचीला है, यानि कि अपरिहार्य कारणों से हिंसा करना ग़लत नहीं माना गया है। मनु-स्मृति में कहा गया है कि यदि ब्राह्मण भी आपको शारीरिक हानि पहुँचाने की मंशा से आए, तो उसकी हत्या करना पाप नहीं है। अकर्मण्यता इस उधार के अहिंसा-सिद्धान्त का सहज फल है। और इस तरह प्रकारान्त से गांधीवाद अकर्मण्यता को भी बढ़ावा देता है, जिसमें हमारा देश विगत दो सहस्राब्दियों से जकड़ा हुआ है। इस विषय पर स्वामी विवेकानन्द के वचन उद्धृत करना अनुकूल रहेगा:

विधि की विडम्बना देखो। योरोपवासियों के देवता ईसा मसीह ने सिखाया ‘किसी से बैर मत करो, जो तुम्हें गाली दें उन्हें आशीर्वाद दो, यदि कोई तुम्हारे बाएँ गाल पर थप्पड़ मारे तो उसकी ओर दाहिना गाल भी कर दो, सब कामकाजों को त्याग कर परलोक की तैयारी करो क्योंकि संसार का अन्त निकट है।’ इसके विपरीत हमारे भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं, “सदैव महान उत्साह से कर्म करो, अपने शुत्रुओं का‍ विनाश कर संसार का भोग करो।” लेकिन अन्त में जो कुछ कृष्ण या ईसा मसीह चाहते थे, उसका बिल्कुल उल्टा हो गया।

योरोपवासियों ने ईसा मसीह के शब्दों को गम्भीरतापूर्वक नहीं लिया। सदैव कार्यशील स्वभाव अपनाकर अत्यन्त प्रचण्ड रजोगुण से सम्पन्न होकर वे बड़े उत्साह और युवकोचित उत्सुकता के साथ विश्व के विभिन्न देशों के सुख और विलासों को बटोर रहे हैं और मन भर कर उन्हें भोग रहे हैं। और हम! हम एक कोने में बैठे, अपने सब साज-सामान के साथ, दिन-रात मृत्यु का ही आह्वान कर रहे हैं और गा रहे हैं –
नलिनिदलगतजल‍मतितरलं
तद्वज्जीवनमतियचपलम्।
अर्थात्, “कमलपत्र पर पड़ी हुई जल की बूंदें जितनी चंचल और अस्थिर हैं उतना ही यह मानव-जीवन क्षीण और चलायमान है।” इस सबका परिणाम हुआ है कि मृत्युराज यम के भय से हमारी धमनियों का रक्त ठण्डा पड़ जाता है तथा सम्पूर्ण शरीर काँपने लगता है। और ओफ़! यम ने भी हमारे शब्दों को सच मान लिया है और शायद इसीलिए महामारी आदि संसार भर के रोग हमारे देश में भेज दिए हैं।

अब कहो! गीता का उपदेश किसने सुना? यूरोपियनों ने। और ईसा की इच्छानुसार कौन आचरण कर रहे हैं? भगवान कृष्ण के वंशज। ईसा ने ग्रीस और रोम को चौपट किया। किन्तु कुछ ही समय पश्चात् सौभाग्य से योरोपवासी प्रोटेस्टेंट हो गए। उन्होंने ईसा के उन वचनों का, जिनका प्रतिनिधित्व पोप की सत्ता द्वारा होता है, परित्याग कर दिया और संतोष की सांस ली। लेकिन हम अन्जाने में उन उपदेशों से चिपके हुए हैं।

भारत में एक बार फिर रजोगुण उद्दीप्त हो रहा है और हम लोग पुन: कर्म करने को उद्यत हो रहे हैं। यही कर्माकांक्षा हिन्दू धर्म और गीता का मूल है। ऐसे में गांधीगिरी के ये उपदेश हमें फिर अकर्मण्यता में ढकेल देंगे, जिससे निकलने का हम प्रयत्न कर रहे हैं। हालाँकि गांधीवाद बिल्कुल ही बेकार हो, ऐसा नहीं है। लेकिन उसका दायरा बहुत सीमित है और व्यापक तौर पर उसका प्रयोग करना ठीक उसी तरह मूर्खतापूर्ण होगा, जिस तरह सब्ज़ी काटने के चाकू का इस्तेमाल युद्धक्षेत्र में करना। हिन्दू धर्म के गीता में प्रतिपादित सिद्धान्त हर देश-काल में कार्य रूप में परिणत किए जा सकते हैं और गांधीगिरी की तरह सीमित नहीं है।

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Friday, November 17, 2006

इस देश की मिट्टी में कुछ जादू है

hollywood star Angelina Jolie, wife of star brad pittवाक़ई हमारे देश की मिट्टी में जादू है। अक़्सर लोग कहते हैं कि भारतीय विदेशों में तो सभ्यता का आचरण करते हैं, लेकिन अपने देश में वापिस आते ही नियम-क़ायदों को धता बताने लगते हैं। लेकिन ये एंजलिना के बॉडीगार्ड्स तो अमरीकन हैं भई और अमेरिका में इन्होंने ऐसी कोई बदतमीज़ी की हो, कभी सुना नहीं। अगर भारत में आकर ऐसी हरकतें कर रहे हैं, तो इसमें उनका कोई दोष नहीं है। ये तो इस देश की मिट्टी का ही जादू है, जो सब पर चलता है - क्या हिन्दुस्तानी, क्या अमरीकी। हम लोगों की ग़ुलामी की आदत है कि जाने का नाम ही नहीं लेती। गोरी चमड़ी के हाथों पिटने का, गाली खाने का पुराना शौक़ जान पड़ता है। तिस पर हमारी सरकार भी गर्वान्वित होकर उन्हें भोज पर आमंत्रित करती है। वाह भई, वाह...

Monday, November 06, 2006

Gandhigiri in Historical Context

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी

‘लगे रहो मुन्ना भाई’ वाक़ई कमाल की फ़िल्म है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि सिद्धान्त को जब तक व्यावहारिक स्तर पर इस्तेमाल न किया जा सके, तब तक सिद्धान्त व्यर्थ हैं। इस फ़िल्म ने सैद्धान्तिक गांधीवाद को व्याव‍हारिक गांधीगिरी बना कर एक नया आयाम दिया है। यह फिल्म आम जनता में गांधी के सिद्धान्तों के प्रति कौतुहल जगाने में क़ामयाब रही है।

सार संक्षेप (जो पूरा पढ़ना चाहते हैं, वे इसे छोड़ दें)

‘लगे रहो मुन्ना भाई’ वाक़ई कमाल की फ़िल्म है। इसलिए, क्योंकि सिद्धान्त को जब तक व्यावहारिक स्तर पर इस्तेमाल न किया जा सके, तब तक सिद्धान्त व्यर्थ हैं। इस फ़िल्म ने सैद्धान्तिक गांधीवाद को व्याव‍हारिक गांधीगिरी बना कर एक नया आयाम दिया है। गांधीगिरी या गांधीवाद या इसे चाहे जो भी नाम दें – गांधी की खोज नहीं है। पिछले दो हज़ार सालों से यह हमारी जीवन-शैली का अंग है। इनका मूल हैं बौद्ध और जैन सुधार, जो बाद में गांधीवाद के रूप में परिणत हुए हैं।

लेकिन ग़ौर करने लायक बात यह भी है कि जबसे हमने इन सिद्धान्तों को पकड़ा है, हमारा पतन हुआ है। कईयों ने हमें ग़ुलाम बनाया – नादिरशाह, तैमूर, चंगेज़ ख़ान, मुग़ल, अंग्रेज़ – यह सूची बुहत लम्बी है।

लोग प्राय: कहते हैं और इस पर गौरव करते हैं कि दूसरे देश तो ख़त्म हो गए, लेकिन हमारा देश कभी मरा नहीं। लेकिन स्वाभिमानी इंसान ग़ुलामी और मृत्यु के बीच हमेशा मृत्यु का वरण करता है। जो बात व्यक्तियों पर लागू होती है, वही बात राष्ट्रों पर भी लागू होती है। हम आज भी खड़े हैं अपनी ऐतिहासिक मूर्खताओं के जीवन्त उदाहरण के तौर पर, और विडम्बना यह है कि हमें इस बात पर गर्व है।

अहिंसा निश्चय ही श्रेष्ठ है, लेकिन विकृत अहिंसा को ही हम आजतक अहिंसा समझते रहे हैं। अहिंसा हर दिशा में होती है, बाहर भी और भीतर भी। हमने बाहर अहिंसा की चेष्टा की और अपने ऊपर ही हिंसा की। दूसरे के अन्याय सहना और प्रतिकार न करना अपने ऊपर हिंसा करना है। इसीलिए हमें गांधीगिरी बहुत पसंद आती है, क्योंकि यह दो हज़ार वर्षों के अकर्मण्य राष्ट्रीय जीवन के अनुकूल है।

हर मुल्क में क्रान्तिकारियों ने राजशाही के तख़्ते पलटे हैं, क्योंकि इन मुल्कों में क्रान्ति जनसाधारण में फैल चुकी थी। लेकिन यहाँ क्रान्ति कभी फैल ही न सकी, आम जनता का क्रान्ति से कोई सरोकार नहीं था। जनता में था तो बस प्रमाद और आज भी इसमें ख़ास कमी नहीं आई है। भारत उस काल में सोने की चिड़िया कहलाता था जब हममें संघर्ष की, लड़ने की शक्ति थी। गांधीगिरी का दुष्परिणाम यही है कि यह सिद्धान्त उन पुराने सड़े-गले मूल्यों को पुन: प्रतिष्ठित कर रहा है, जो हमारी ग़ुलामी के कारण स्वरूप हैं।


लेकिन सोचने लायक बात यह है कि क्या गांधीगिरी देश को सही दिशा में ले जाने का काम कर सकती है? क्या गांधीगिरी आज के युग में भी सार्थक है? क्या समाज गांधीगिरी को आत्मसात करने में सक्षम है और क्या ऐसा करने से समाज का कुछ भला होगा? इन बातों को समझने के लिए गांधीगिरी को व्यापक तौर पर देखने की आवश्यकता है, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इसका विश्लेषण किए जाने की ज़रूरत है। क्योंकि गांधीगिरी का सवाल केवल एक फ़िल्म से ही नहीं जुड़ा है, न ही गांधी नामक किसी व्यक्ति-विशेष से – यह जुड़ा है हमारे इतिहास से, हमारे वर्तमान हालात की वजहों से।

गांधीगिरी या गांधीवाद या इसे चाहे जो भी नाम दें – गांधी की खोज नहीं है। पिछले दो हज़ार सालों से यह हमारी जीवन-धारा है, हमारी जीवन-शैली का अंग है। हालाँकि गांधी जी को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने इसे कारगर ढंग से अंग्रेज़ों के खिलाफ़ इस्तेमाल किया। गांधीवाद का मतलब सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह आदि सिद्धान्तों की गांधी जी की व्याख्या से है। और यह सैद्धांतिक व्याख्या पिछले दो हज़ार सालों में विकसित हुए हैं, और हमारे अन्त:करण का एक अंग बन गए हैं। इनका मूल हैं बौद्ध और जैन सुधार, जो बाद में गांधीवाद के रूप में परिणत हुए हैं।

लेकिन ग़ौर करने लायक बात यह भी है कि जबसे हमने इन सिद्धान्तों को पकड़ा है, हमारा पतन हुआ है, हम गिरते चले गए हैं और अपनी हालत उस कीड़े की तरह बना ली है, जिसे चाहे जो भी पैरों तले कुचल सकता है। हर ऐरा-ग़ैरा, जो भी यहाँ से गुज़रा उसने हमें पीटा और हम दो सहस्राब्दियों से लगातार यूं ही पिटते चले आ रहे हैं। नादिरशाह, तैमूर, चंगेज़ ख़ान, मुग़ल, अंग्रेज़ – यह सूची बुहत लम्बी है। दुनिया में हमारे अलावा और कोई भी दूसरी जाति नहीं है, जो हज़ार साल ग़ुलाम रही हो। हमारी कई पुश्तें ग़ुलामी में ही बीत गईं हैं। ऐसा लगता है कि हमारे राष्ट्रीय जीवन का उद्देश्य ग़ुलाम होना ही रहा हो।

लोग प्राय: कहते हैं और इस पर गौरव करते हैं कि हमारा देश कभी मरा नहीं, हम अमर हैं – यूनान, रोमां, मिस्र सब मिट गए जहाँ से, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। लेकिन यह गौरव की नहीं, सबसे बड़ी शर्म की बात है। हमारे देश में यह बेहूदगी बहुत प्रचलित है – जिस बात पर हमें शर्मिन्दा होना चाहिए, उसे लेकर हम गौरवान्वित हैं। लेकिन हम हैं कि हमें लज्जा नहीं आती, हमने उसे तिरोहित कर दिया है। आप सबने चन्द्रशेखर आज़ाद के बारे में सुना होगा। जब अंग्रेज़ों से उस वीर क्रान्तिकारी को चारों ओर से घेर लिया और उसके निकलने का कोई उपाय नहीं शेष रहा, तो उसने अपनी कनपटी पर पिस्तौल रख कर स्वयं को गोली मार ली – वह शहीद हो गया, अमर हो गया। इसे कहते हैं अमर होना। स्वाभिमानी इंसान ग़ुलामी और मृत्यु के बीच हमेशा मृत्यु का वरण करता है। इसकी तुलना एक जेब कतरे से करो, पुलिस उसे पकड़ लेती है, गाली देती है, डंडे मारती है, जेल में ठूंस देती है – वह जीवित रहता है, क्योंकि उसमें कोई स्वाभिमान नहीं। उसमें स्वाभिमान नहीं हो सकता है, क्योंकि उसने जो काम किया है, उससे कभी स्वाभिमान नहीं पैदा हुआ करता है। जो बात व्यक्तियों पर लागू होती है, वही बात राष्ट्रों पर भी लागू होती है। जो राष्ट्र स्वाभिमानी थे वे सब मिट गए और अपनी गौरव गाथाएँ छोड़ गए; यूनान, रोम, मिस्र – सब स्वाभिमानी थे। हम आज भी खड़े हैं अपनी ऐतिहासिक मूर्खताओं के जीवन्त उदाहरण के तौर पर, और हमें इस पर गर्व है। हमारी हालत उस जेब कतरे से कुछ बेहतर नहीं है।

लेकिन इसकी वजह क्या है? अहिंसा निश्चय ही श्रेष्ठ है, लेकिन विकृत अहिंसा को ही हम आजतक अहिंसा समझते रहे हैं। जैन और बौद्ध सुधार 500 सालों के भीतर ही विकृत हो गए, सारी जाति अकर्मण्य और आलसी बन गई, मठप्रेमी बन गई, संन्यासप्रेमी बन गई, भगोड़ी बन गई। और आजतक हममें कोई ख़ास सुधार नहीं आया है। अहिंसा हर दिशा में होती है, बाहर भी और भीतर भी। हमने बाहर अहिंसा की चेष्टा की और अपने ऊपर ही हिंसा की। दूसरे के अन्याय सहना और प्रतिकार न करना कोई बहुत श्रेष्ठ बात नहीं है, यह अपने ऊपर हिंसा करना है। इसमें दूसरे का कोई दोष नहीं है। जो धर्म कहता है कि अत्याचार करने वाला दोषी है, वह ग़लत है। हिंसा अत्याचार करना नहीं बल्कि अत्याचार सहना है। हाँ, दूसरे पर अत्याचार भी हिंसा है, लेकिन बाहरी हिंसा है, छोटी हिंसा है। लेकिन खुद अत्याचार सहना भीतरी हिंसा है, अपने ऊपर हिंसा है, बड़ी हिंसा है। इसीलिए हमें गांधीगिरी बहुत पसंद आती है, क्योंकि यह हमारे पिछले दो हज़ार वर्षों के राष्ट्रीय जीवन के अनुकूल है। हमारे अकर्मण्य स्वभाव के अनुकूल है, हमारे आलस्य के अनुकूल है, हमारी ग़ुलाम मानसिकता के अनुकूल है।

एक बात पर और ध्यान दो, हर मुल्क में क्रान्तिकारियों ने राजशाही के तख़्ते पलटे – फ्रांस में, इंग्लैंड में, अमरीका में, हर जगह। ऐसा क्यों कर हो सका? क्योंकि इन मुल्कों में मुट्ठीभर क्रान्तिकारी न थे, क्रान्ति जनसाधारण में फैल चुकी थी, हर देशवासी क्रान्तिकारी था। लेकिन यहाँ क्रान्ति कभी फैल ही न सकी, दो-एक भगत सिंह हुए, दो-एक चन्द्रशेखर आज़ाद हुए, लेकिन आम जनता का उनसे कभी कोई सरोकार नहीं था। क्योंकि यहाँ जनता में संघर्ष की क्षमता नहीं थी, संघर्ष के लिए आवश्यक रजोगुण नहीं था। हमारी जनता में था तो बस प्रमाद, तमोगुण की पराकाष्ठा, हताशा – और आज भी इसमें कुछ ख़ास कमी नहीं आई है। इसलिए गांधी जी को इस देश में बहुत अनुयायी मिले, सारा देश गांधी जी का अनुयायी हो गया। लेकिन गांधी अगर अमेरिका में पैदा होते तो कोई बड़े राजनेता न होते, उनका कोई अनुयायी न होता। क्योंकि वहाँ की जनता का ख़ून सूखा नहीं है, मस्तिष्क दुर्बल नहीं है, उनमें संघर्ष करने की क्षमता है।

अपने देश के इतिहास को देखो तब भी यही पाओगे; जब तक हम विकृत अहिंसा, तथाकथित वैराग्य, संसार की असत्यता जैसे मूढ़ सिद्धान्तों से दूर थे तभी तक हमने प्रगति की। भारत उस काल में सोने की चिड़िया कहलाता था जब हममें संघर्ष की, लड़ने की शक्ति थी। वैदिक संहिताओं को उठाकर देखो, प्राचीन आर्य एक संघर्षप्रिय जाति थे। गांधीगिरी का दुष्परिणाम यही है कि यह सिद्धान्त उन पुराने सड़े-गले मूल्यों को पुन: प्रतिष्ठित कर रहा है, जो हमारी ग़ुलामी के कारण स्वरूप हैं। भारत एक बार फिर अपने पैरों पर खड़ा होने लगा है, लड़ने को तैयार है, संघर्ष के लिए सचेष्ट है। ऐसे में गांधीगिरी अगर प्रभावी होती है तो हम फिर उसी कूँए में गिर जाएंगे, जिसमें पिछले हज़ार वर्षों से पड़े हुए थे।

यह विषय बहुत लम्बा है। इस पर और चिन्तन किए जाने की ज़रूरत है। इसलिए आज की बात को अगली में पोस्ट में आगे बढ़ाऊँगा। आशा है आप केवल प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी न देकर क्रियात्मक टिप्पणी देंगे।

Saturday, October 28, 2006

A Future with Hindi in Roman Script

रोमन लिपि के साथ हिन्दी का भविष्य

An example of Hindi written in Roman scriptकल अनुराग भाई ने रीडिफ़ के इस लेख की कड़ी दी – अ फ़्यूचर विद हिन्दी इन इंग्लिश स्क्रिप्ट। लेखक ने सम्भावना जताई है कि आने वाले समय में रोमन लिपि के ज़रिए हिन्दी को लिखा-पढ़ा जाएगा। लेखक के हिसाब से आज, जबकि हिन्दी एसएमएस और ई-मेल वगैरह रोमन में भेजे जा रहे हैं, तो ऐसे में हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं के लिए रोमन लिपि का प्रयोग बेहतर साबित होगा।

लेकिन मेरे ख़्याल से यह होना हाल-फ़िलहाल नामुमकिन ही है। क्योंकि हिन्दी के लिए देवनागरी इस वक़्त काफ़ी प्रचलित है। जो लोग नागरी में हिन्दी पढ़ने को लेकर सहज हैं, उनके मुक़ाबले आसानी से रोमन में एसएमएस और ई-मेल करने और पढ़ सकने वाले लोगों की तादाद काफ़ी कम है। इसके अलावा इनमें से भी ज़्यादातर लोग इसलिए रोमन का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि या तो उनके मोबाइल और कम्प्यूटरों में देवनागरी में लिखने की सुविधा नहीं है या फिर उन्हें इसके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है। रोमन में ई-मेल वगैरह लिखने वाले लोग खुद रोमन में पढ़ने की अपेक्षा देवनागरी में लिखा पढ़ने में ज़्यादा सहज हैं। इसका मतलब यह है कि रोमन का इस्तेमाल मजबूरी के कारण ज़्यादा होता है, बजाय कि अपनी पसंद से करने के।

लेखक ने यह भी तर्क दिया है कि जो चीज़ प्रचलित जो जाती है, उसे बदलना काफ़ी मुश्किल होता है। और जब कि रोमन का QWERT कुंजी-पटल प्रचलन में आ चुका है, इसलिए इसकी जगह देवनागरी के की-बोर्ड को बढ़ावा देना सम्भव नहीं होगा। हालाँकि इस तर्क में काफ़ी-कुछ सच्चाई है और कम्प्यूटर पर नागरी के प्रसार में विभिन्न की-बोर्ड ले-आउट की समस्या काफ़ी जटिल है, लेकिन फिर भी यह तर्क पूरी तरह ठीक नहीं है। क्योंकि अगर यह बात बिल्कुल सही है कि प्रचलित चीज़ को बदलना बहुत ज़्यादा मुश्किल होता है, तो फिर जबकि देवनागरी प्रचलन में है, इसे बदलना और हिन्दी को रोमन में लिखना ख़ासा मुश्किल काम साबित होगा। इसके अलावा तकनीक के विकास के साथ-साथ कम्प्यूटर पर हिन्दी आदि भारतीय भाषाओं में काम करना आसान होता जा रहा है। ऐसे में पहिए को फिर पीछे की ओर घुमा कर रोमन का प्रयोग चालू करना कितना सही होगा। मेरे ख़्याल से कुछ वर्षों में कम्प्यूटर पर हिन्दी को पढ़ना-लिखना उतना ही आसान होगा, जितना आज अंग्रेज़ी को पढ़ना-लिखना है। ग़ौरतलब है कि मनीष भाई अपने ब्लॉग 'एक शाम मेरे नाम' को मूलत: रोमन में ही लिखते थे और अभी भी उनके ब्लॉग का रोमन संस्करण काफ़ी पढ़ा जाता है। इस मुद्दे पर आप लोगों की क्या राय है?

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Friday, October 27, 2006

PM Likes Lage Raho Munna Bhai

Arshad Varsi and Sanjay Dutt in Lage Raho Munna Bhaiआजकल चारों ओर 'लगे रहो मुन्ना भाई' और 'गांधीगिरी' की ही चर्चा है। शायद ही इससे कोई अछूता बच पाया हो। 'लगे रहो मुन्ना भाई' के प्रशंसकों की सूची काफ़ी लम्बी ही नहीं, बल्कि 'ऊँची' भी है। 'ऊँची' बोले तो कई हाई प्रोफ़ाइल लोगों को भी यह फ़िल्म बहुत पसन्द आई है, और इसमें हमारे प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह भी शामिल हैं।

हाल में प्रधानमंत्री ने अपने व्यस्त कार्यक्रम में से वक़्त निकाल कर पूरे परिवार के साथ इस फिल्म का लुत्फ़ उठाया और इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। अपने आवास पर हुई विशेष स्क्रीनिंग के बाद प्रधानमंत्री ने कहा - ''यह फ़िल्म बापू के सत्य और मानवता के संदेश को दर्शाती है।'' प्रधानमंत्री के साथ प्रधानमंत्री-कार्यालय के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने भी फ़िल्म को देखा और सराहा। कुछ दिनों पहले अपनी दक्षिण अफ़्रीका यात्रा के दौरान भी प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 'लगे रहो मुन्ना भाई' की काफ़ी तारीफ़ की थी।

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Thursday, October 26, 2006

किसके सर फोड़ा जाए हार का ठीकरा

Indian Captain Rahul Dravid and coach Greg Chappellअपने सिर पर इस ठीकरे को फुड़वाने के दो प्रबल दावेदार हैं - ग्रेग चैपल और राहुल द्रविड़। दोनों ही भारत की हार को पक्का करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं। वेस्टइण्डीज़ जैसी फिसड्डी टीम पर भी जीत हासिल करना इनके लिए नामुमकिन साबित हो रहा है। वेस्टइण्डीज़ से हुए आख़िरी छ: मुक़ाबलों में से पाँच में भारत को हार का मुँह देखना पड़ा है। सवाल यह है कि गुरू ग्रेग अपने मूर्खतापूर्ण प्रयोगों को कब बन्द करेंगे। ये अजीबो-ग़रीब प्रयोग न केवल बार-बार भारत की हार का कारण बन रहे हैं, बल्कि खिलाड़ियों का मनोबल भी मटिया-मेट कर रहे हैं। फिर भी ग्रेग चैपल का कहना है कि वो इन प्रयोगों का जारी रखेंगे। अब तो भगवान ही मालिक है भारतीय क्रिकेट टीम का।

लेकिन इसके ज़िम्मेदार सिर्फ़ ग्रेग चैपल ही नहीं हैं, बल्कि राहुल द्रविड़ की भी इसमें भूमिका है। राहुल द्रविड़ भले ही एक अच्छे बल्लेबाज़ हों, लेकिन कप्तान के तौर पर वे विफल साबित हो रहे हैं। कप्तान में जो आक्रामकता और जोश चाहिए, वह राहुल द्रविड़ से नदारद है। कल फ़ील्डिंग के लिए आते वक़्त ही उनके चेहरे पर निराशा का भाव साफ़ देखा जा सकता था। कप्तान को पूरे दल में उत्साह और जोश फूँकने के लिए पहले इन गुणों से खुद लबरेज़ होना चाहिए; लेकिन जब द्रविड़ खुद ही हताश नज़र आते हैं तो टीम का क्या हाल होता होगा, आप खुद ही अन्दाज़ा लगा सकते हैं।

इसके अलावा अब हमें भारतीय टीम को हारते हुए देखने की आदत डाल लेनी चाहिए। क्योंकि जब तक योग्यता और प्रदर्शन पर राजनीति हावी रहेगी, तब तक जीत दूर ही रहेगी। टीम प्रबन्धन न जाने क्यों सहवाग को उसी तरह चिपकाए हुए है, जिस तरह बन्दरिया अपने बच्चे को खुद से हमेशा चिपकाए रहती है। सहवाग का टीम में होना केवल क्रिकेट में फैली राजनीति को ही दर्शाता है, जबकि कई क़ाबिल लोग बाहर ही बैठे रह जाते हैं। पिछले तीस मैचों में सहवाग का रन औसत गांगुली से भी कम है, तो फिर ये दोहरा मापदण्ड नहीं तो और क्या है?

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Wednesday, October 25, 2006

Movie Review : DON - The Chase Begins Again (2006)

फ़िल्म समीक्षा : डॉन - द चेस बिगिन्स अगेन (२००६)

DON - The Chase Begins Again (2006)इस समीक्षा की शुरूआत एक प्रश्न से करते हैं – फ़रहान अख़्तर को डाइरेक्टर किसने बनाया? वह व्यक्ति जो भी रहा हो, मेरा मानना है‍ कि सारा-का-सारा दोष उसी का है। फिल्म का पहला हाफ़ असली ‘डॉन’ की फ़्रेम-टू-फ़्रेम यानि कि हूबहू नक़ल है और वहीं तक आप इस ‘डॉन’ को भी झेल सकते हैं। लेकिन दूसरे हाफ़ में जहाँ से फ़रहान अख़्तर और उनके सिपहसालारों ने अपनी बुद्धि का प्रयोग करना चालू किया है, फिल्म वहीं से अनझेलेबल हो गयी है।

डॉन में काम करना शाहरुख़ के लिए भी आसान काम नहीं था, क्योंकि ऐसा करने पर अमिताभ बच्चन से तुलना होना लाज़मी था। लेकिन फिर भी शाहरुख़ ख़ान ने इस चुनौती को स्वीकार कर साहस का परिचय तो दिया ही है। और ये भी ज़ाहिर सी बात है फिल्म में अगर शाहरुख़ की तुलना अमिताभ से की जाए, तो वे कहीं टिकते नहीं है। डॉन की भूमिका में अमिताभ बच्चन ने गंभीर चेहरे और बॉडी लेंग्वेज से जो अपने चारों ओर जो ऑरा खड़ा किया था, शाहरुख़ उसे पैदा करने के लिए बहुत जूझते दिखाई दिए हैं। हालाँकि एक हद तक वे इसमें सफल साबित हुए हैं, लेकिन वे वह बात न ला सके जो अमिताभ ने डॉन के व्यक्तित्व में उकेरी थी। हालाँकि शाहरुख़ ख़ान से इससे ज़्यादा उम्मीद भी नहीं थी। उन्होंने अपने सीमित दायरे में रहकर भी ठीक काम किया है। अगर अमिताभ की छवि को दिमाग़ से निकाल कर फ़िल्म को देखा जाए, तो शाहरुख़ ने भी किरदार के साथ न्याय किया है।

लेकिन अगर बात केवल शाहरुख़ ख़ान की ही होती, तो ठीक था। फ़िल्म में फ़रहान अख़्तर ने भी कुछ काम किया है। और ऐसा काम किया है कि फ़िल्म को वाहियात बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। फ़िल्म की कहानी से तो आप सभी वाकिफ़ हैं ही। लेकिन अच्छी ख़ासी पटकथा को किस तरह बकवास बनाया जाए, कोई फ़रहान अख़्तर से इसे बखूबी सीख सकता है। कहानी में जो तथाकथित ट्विस्ट दिया गया है, उसे में यहाँ नहीं बताऊंगा। क्योंकि हो सकता है कि कई लोग वाक़ई यह देखना चाहते हों कि एक अच्छी पिक्चर का कचूमर कैसे निकाला जाता है। लेकिन अगर मेरी मानें, तो सिनेमा हॉल में जाकर पैसे बर्बाद करने से बेहतर होगा कि कुछ और करें।

अन्य फिल्म समीक्षाएँ :
१. खोसला का घोंसला
२. ओंकारा
३. गोलमाल
४. अपहरण

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Monday, October 23, 2006

HindiBlogs.com नए रूप में

HindiBlogs.com को देखने और क़ीमती सुझावों के लिए हिन्दी ब्लॉग मण्डल का हार्दिक धन्यवाद। आपके सहयोग से प्रेरित होकर "हिन्दीब्लॉग्स डॉट कॉम" आपके सामने एक बार फिर हाज़िर है नई ख़ूबियों और सुविधाओं के साथ। भारतीय पाठकों को ध्यान में रखकर पिछले दिनों इसमें कई बदलाव किए गए हैं। उम्मीद है कि ये बदलाव आपको पसंद आएंगे और आपकी अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे। कुछ नए बदलाव इस तरह हैं -
  • लगभग सभी सक्रिय हिन्दी चिट्ठों का संचयन
  • तेज़ रफ़्तार - हर 15 मिनट में चिट्ठा जगत् की नई प्रविष्टियों का एग्रीगेशन
  • एजेक्स (AJAX) आधारित डिज़ाइन
  • कई नए ब्लॉग स्रोतों का समन्वय जैसे -
  • बॉलीवुड की ताज़ातरीन ख़बरें, गपशप, फिल्म समीक्षाएँ और भी बहुत कुछ
  • क्रिकेट की दुनिया की नई हलचल, लाइव स्कोर कार्ड और समाचार
  • शेयर बाज़ार का उतार-चढ़ाव
  • ज्योतिष और राशिफल, एवं अन्य बहुत कुछ

आपके सुझावों का इन्तज़ार रहेगा। अगर आपका चिट्ठा अभी तक यहाँ प्रदर्शित नहीं हो रहा है, तो कृपया मुझे इस ई-पते पर सूचित करें -

तो देर किस बात की, देखिए HindiBlogs.com और खो जाइए चिट्ठों के संसार में।

Saturday, October 21, 2006

मासिक राशिफल - अक्‍टूबर 2006

(Monthly Forecast for October 2006)
चंद्र राशि आधारित

मेष राशि
(चू, चे, चो, ला, ली, ले, लू, ले, लो, आ)
माह का प्रथम पक्ष आर्थिक तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से कष्टप्रद साबित हो सकता है। नौकरी परिवर्तन का योग है। व्यापार व रचनात्मक क्षेत्रों से जुड़े हुए व्यक्तियों को सहकर्मियों के असहयोग के चलते तनाव का सामना करना पड़ सकता है। धन प्राप्ति के लिए कानूनी पचड़े में पड़ने की सम्भावना है। विपरीत लिंग के मित्रों से सावधान रहें अन्यथा नुकसान हो सकता है। पारिवारिक एवं व्यावसायिक दायित्वों के कारण दवाब महसूस करेंगे। आध्यात्मिक गुरू की प्राप्ति हो सकती है। विदेश में शिक्षा अथवा प्रवास के क्षेत्र में प्रगति होने की सम्भावना है। पारीवारिक तनाव चरम पर पहुँच सकता है। सेक्स संबधी बिमारियों से सावधान रहने की आवश्यकता है।

वृष राशि
(इ, वी, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
भौतिक व आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में विकास का योग है। आत्मविकास से साथ-साथ आर्थिक विकास की भी सम्भावना है। कृषि, पषुपालन, डेरी उद्योग इत्यादि क्षेत्रों से जुड़े व्यक्तियों के लिए माह रोज़गार के नये अवसर लेकर आएगा। नौकरीपेशा लोग उच्चाधिकारियों के असहयोग के चलते तनावग्रस्त हो सकते हैं। अस्वस्थता के कारण व्यय संभावित है। कोलेस्ट्रॉल व ब्लडप्रेशर की अधिकता गंभीर बीमारी का रुप ले सकती है। कामकाजी महिलाओं के लिए वर्तमान समय श्रेष्ठ है, यश व सम्मान में वृध्दि होने की सम्भावना है। माह के मध्य में कुंटुंब में धार्मिक व शुभ कार्यों का आयोजन संभव है।

मिथुन राशि
(का, की, कू, घ, घा, के, को, ह)
इस माह आय की अपेक्षा व्यय में वृध्दि होने की सम्भावना है, लेकिन सहकर्मियों के सहयोग से मान-सम्मान बढ़ सकता है। माह के मघ्य में आपको आर्थिक कारणों से चिंतित रहना पड़ सकता है। पारिवारिक व सामाजिक कार्यो की अधिकता हो सकती है। किसी बहुमूल्य वस्तु की चोरी होने की भी सम्भावना है। प्रियजनों से व्यर्थ विरोधाभास होने की सम्भावना है। आवश्यकता से अधिक कार्य करने के कारण आप अस्वस्थ भी हो सकते हैं। वाहन चालन में सावधानी अपेक्षित है। अविवाहितों की जीवनसाथी की तलाश समाप्त हो सकती है। प्रेम संबंधों को नया आयाम प्राप्त होगा। महिलाएं पारिवारिक तनाव महसूस कर सकती हैं। दाम्पत्य सुख की दृष्टि से यह माह आंशिक फलदायी रहेगा।

कर्क राशि
(ही, हू, हे, हो, ड, डे, डू, डो)
सम्पूर्ण माह आर्थिक तंगी का सामना करना पडेग़ा। व्यय पर नियन्त्रण करने की ज़रूरत है। सहकर्मियों के कारण परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। व्यावसायिक भागीदार की वजह से किसी नई मुसीबत में पड़ेंगे। नए कानूनी विवाद में उलझेंगे। अकाउण्ट्स, वित्त व बैंकिग से संबधित युवाओं को उच्च शिक्षा एवं विदेश गमन का मौका मिलेगा। महिलाएं मददगार साबित हो सकती हैं। कोई बुरा समाचार सुनने को मिल सकता है। अचानक ही स्वयं को प्रेम में पाएंगे। जीवन साथी से हर तरह का सहयोग मिलेगा। मदिरा एवं धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त ही खतरनाक साबित हो सकते हैं, अत: सावधान रहें।

सिंह राशि
(मा, मी, मु, मे, मो, टा, टी, टु, टे)
वित्तीय दृष्टि से माह का पूवार्ध उत्तम व उत्तरार्ध सामान्य है। शेयर बाज़ार व अन्य किसी भी तरह की सट्टेबाजी से नुकसान होने की सम्भावना है। व्यवसाय परिवर्तन का विचार अपने दिमाग से निकाल दें। सकारात्मक प्रयासों से वांछित ऋण की प्राप्ति हो सकती है। इस माह बड़े व्यय को टालना अच्छा साबित होगा। अपने पुत्र के कॅरियर व स्वास्थ्य को लेकर परेशानी सम्भव है। लेखन व पत्रकारिता आदि से जुड़े लोगों के लिए अच्छा समय है। वैवाहिक संबंधों में तनाव उत्पन्न हो सकता है। कानूनी पचड़ों से बचें अन्यथा नुकसान होगा। स्वास्थ्य के प्रति विशेष सावधानी अपेक्षित है।

कन्या राशि
(टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो)
इस माह आय में वृध्दि होने की सम्भावना है। ऋण प्राप्ति में विलम्ब हो सकता है। लम्बे समय से अटका हुआ धन मिलने की सम्भावना है। किसी सामाजिक संस्था में कोई उच्च पद प्राप्त होने की सम्भावना है। वाहन खरीदने का योग है। नौकरी के कारण कुछ परेशान रहेंगे। माह के अन्तिम सप्ताह में पेट एवं जोड़ों की बीमारी तंग कर सकती हैं। परीक्षा परिणाम सकारात्मक होंगे। सीए, सीएस, एमबीए कर रहे युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिल सकते हैं। घर में किसी नए महमान के आने का समाचार मिल सकता है। किन्ही कारणों से परिजनों से दूर रहने की परिस्थिति बनेगी।

तुला राशि
(रा, री, रु, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
वित्तीय दृष्टि से माह का पूवार्ध उत्तम व उत्तरार्ध सामान्य है। शेयर बाज़ार व अन्य किसी भी तरह की सट्टेबाजी से नुकसान होने की सम्भावना है। व्यवसाय परिवर्तन का विचार अपने दिमाग से निकाल दें। सकारात्मक प्रयासों से वांछित ऋण की प्राप्ति हो सकती है। इस माह बड़े व्यय को टालना अच्छा साबित होगा। पारिवारिक सदस्यों में वृध्दि होगी। अपने पुत्र के कॅरियर व स्वास्थ्य को लेकर परेशानी सम्भव है। लेखन व पत्रकारिता आदि से जुड़े लोगों के लिए अच्छा समय है। वैवाहिक संबंधों में तनाव उत्पन्न हो सकता है। परिजनों के साथ सम्बन्धों में मिठास आएगी। कानूनी पचड़ों से बचें अन्यथा नुकसान होगा।

वृश्चिक राशि
(तो, ना, नी, नू, ने, नो, यी, यू)
आर्थिक दृष्टि से समय उत्तम है। यद्यपि आय में वृध्दि होगी, किन्तु व्यय भी साथ-साथ बढ़ेगा। फैशन, फिल्म, गायन आदि कला से जुड़े लोगों के लिए समय विशेष उत्तम है। लम्बे समय से चले आ रहे मुकदमे का निर्णय अन्तत: आपके पक्ष में आ सकता है। किसी भी प्रकार के अनैतिक एवं असामाजिक कार्यों से दूर रहें, अन्यथा विशेष परेशानी में पड़ सकते हैं। स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने की ज़रुरत है। इस माह मांस व मदिरा आदि अभक्ष्य पदार्थों के इस्तेमाल से बचने का यत्न करें। कामकाजी महिलाओं के लिए यह समय विशेष उत्तम है। यश व सम्मान में वृध्दि होगी एवं सहकर्मियों से सहयोग प्राप्त होगा।

धनु राशि
(ये, यो, भा, भी, भू, ध, प, फ, ढ, भे)
वित्तीय तौर पर यह समय सकारात्मक है, किन्तु किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पूर्व परिवार के बड़े-बुजुर्गों की राय लेना न भूलें। नवीन स्रोतों से धन की प्राप्ति होगी। नौकरीपेषा व्यक्तियों को पदोन्नति मिलेगी तथा व्यापारियों को बड़े पैमाने पर सौदे मिलेंगे। आध्यात्मिक जीवन की ओर झुकाव बढ़ेगा। पितृ पक्ष से रिश्तों में खटास आ सकती है। साथ ही माता को स्वास्थ्य संबधी परेशानियां भी संभावित हैं। किसी अतिथि के अचानक आने की सम्भावना है। सूचना तकनीकी और कम्प्यूटर क्षेत्र से जुड़े लोगों के विदेश जाने की सम्भावना है। कामकाजी महिलाओं को महत्वपूर्ण सफलताएं मिलेंगी परन्तु उन्हें बोलने से ज्यादा करने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

मकर राशि
(भो, जा, जी, जू, जे, जो, खा, खी, खू, खे, खो, गा, गी)
अक्टूबर माह में भाग्य आपके अनूकूल रहेगा। वित्तीय दृष्टिकोण से भी लाभ की स्थिति में रहेंगे। प्रषासन व वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग प्राप्त होगा। फैशन डिजाइनिंग, वास्तुशास्त्र, ज्वेलरी डिजाइनिंग जैसे क्षेत्रों से जुड़े युवाओं के लिए माह रोजगार के नये अवसर लेकर आएगा। प्रबन्धन, अकाउन्ट्स व विज्ञान से जुड़े लोग अत्यन्त सावधान रहें, अन्यथा उन्हें अपना रोज़गार खोना पड़ सकता है। प्रेम संबध प्रगाढ़ होंगे। परिवार समेत छोटी दूरी की यात्राएं हो सकती हैं। कामकाजी महिलाओं को पदोन्नति व आर्थिक लाभ मिलने की सम्भावना है। घर में उत्साह एवं खरीददारी का माहौल रहेगा।

कुंभ राशि
(गू, गे, गो, सा, सू, से, सो, दा)
यह माह आय की अपेक्षा व्यय में अधिकता लेकर आएगा। उच्चाधिकारियों की मदद से बड़ी सफलता अर्जित करेंगे। रचनात्मकता को नवीन आयाम प्राप्त होगा। आय के नए एवं अपारम्परिक स्रोत मिलेंगे जोकि दीर्घकालिक लाभ के साबित होंगे। व्यवयास में नए भागीदार भी मिल सकते हैं। विशेषकर माह के पूवार्ध में किसी भी प्रकार के निवेश से संबन्धित निर्णय न लें। रक्त से जुड़े रोग के होन की सम्भावना है। डॉक्टर से सलाह लेने में ज़रा भी देर न करें। महिलाओं के लिए उत्तम समय है, परिवार में समरसता बढ़ेगी एवं सदस्यों से हर प्रकार का सहयोग मिलेगा। देशाटन का भी योग बन रहा है।

मीन राशि
(दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, चि)
आर्थिक दृष्टि से माह का पूवार्ध उत्तम एवं उत्तरार्ध सामान्य है। सामाजिक प्रतिष्ठा में वृध्दि होगी, साथ ही व्यवसाय में भी सफलता प्राप्त होने का योग है। हाईटैक, आईटी एवं कम्प्यूटर से जुड़े लोंगों की विदेश जाने की चाह पूर्ण होगी। जुए, सट्टे या शेयर आदि अनिष्चित क्षेत्रों में क्षमता से ज्यादा निवेश परेशानी का कारण बन सकता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग ले रहे विद्यार्थियों को सफलता मिलने की सम्भावना है। विवाह को लेकर जल्दबाजी न करें। खोया हुआ प्यार वापस मिलेगा, परन्तु जल्दबाजी हानिकारक साबित होगी। रिश्तों में मधुरता आएगी। गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य संबधी सावधानी बरतने की आवश्‍यकता है।

ग्रह स्थिति
सूर्य 17 अक्टूबर से तुला में,
मंगल 14 से तुला में,
बुध 24 से वृश्चिक में,
गुरू 27 से वृश्चिक में,
शुक्र 19 से तुला में,
शनि कर्क में,
राहु 13 से कुम्भ में,
केतु 13 से सिंह में।

(source: http://www.AstroSage.com)

Tuesday, October 17, 2006

Rawalpindi Express Got Derailed

पटरी से उतरी रावलपिण्डी ऐक्सप्रेस

Pakistany Cricket Star Shoaib Akhtarये पाकिस्तान वाले भी कमाल के लोग हैं। खुद ही अपनी रावलपिंडी ऐक्सप्रेस को धकिया के पटरियों से उतार दिया। इतना ही नहीं, दुनिया के सामने रावलपिण्डी ऐक्सप्रेस की तेज़ी का राज़ भी खोल दिया कि काहे से ये सरपट भागी जा रही थी दनादन। यहाँ हम अपने पठान को दूध-घी खिला-पिला रहे थे, सुबह-सांझ बदाम घिस के देते थे; फिर भी क्या मजाल कि लड़का १२० के ऊपर फेंक दे और वहाँ उनने धाँय-फाँय मचा रखी थी। ससुरी बड़ी टेंशन थी, लेकिन अब दिल को नैक तसल्ली हुई। काहे कि यहाँ हमारा दूध-घी वगैरह कुछ बर्बाद ज़रूर हुआ, लेकिन वहाँ वो महँगा प्रोटीन पाउडर खिला रहे थे ससुरों को। फिर भी वो तेज़ नहीं फेंकेगा, तो क्या हमारी छिरिया तेज़ फेंकेगी... हैं...? ख़ैर, उनने रावलपिण्डी ऐक्सप्रेस के साथ जो किया सो किया, लेकिन सुपरफ़ास्ट के साथ में पैसेंजर को भी हिल्ले लगा दिया। ये कहाँ का इंसाफ़ है भई?

हमें तो लगता है कि आईसीसी की इस नई नीति के नाम पर पीसीबी के माई-बाप अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। जो भी उनकी आँख की किरकिरी था, उसे दूध में से मक्खी की तरह निकालने का कोई-न-कोई बहाना तो चाहिए ही था। सो ये मौक़ा खूब हाथ लगा और उनने क्या सुपरफ़ास्ट क्या पैसेंजर, जिसे मन आया उसे पंक्चर कर दिया सा‍इकिल की नाईं। साइकिल तो फिर भी जल्दी ही चलने लायक हो जाती है, लेकिन ऐक्सप्रेस को तो दो साल के लिए लूप लाइन पर टिका दिया। हमें जान पड़ता है कि दो साल तो बस एक बहाना है, मक़सद तो इस सुपरफ़ास्ट को हमेशा के लिए म्यूजियम में लगाना है। यानि कि पीसीबी का मक़सद है – रावलपिंडी ऐक्सप्रेस के करियर का अन्त तुरन्त।

अब पूछो कि हम इत्ता सब काहे सोच-विचार रहे हैं। तो वो इसलिए चचे, क्योंकि हम ख़ुश भी हैं और ग़मगीन भी। ख़ुश इसलिए कि पहले से टूटी-फूटी पाकिस्तान की टीम इससे और खचाड़ा हो गई और दु:खी इससे कि हम देखना चाहते थे कि चैम्पियन्स ट्रॉफ़ी में ‘रावलपिण्डी ऐक्सप्रेस’ ‘मुम्बई जंक्शन’ पर टिक पाती है या नहीं? ख़ैर, शोएब के लिए एक गाना श्रद्धांजलि के तौर पर – दिल के अरमाँ आँसुओं में बह गए... हमारी आवाज़ फटे बाँस जैसी है, जिसकी ठीक-ठाक हो वो हमारी तरफ़ से शोएब के लिए गा देना ज़रा। और आख़िर में जाते-जाते शोएब को एक नेक सलाह – कुछ दिन पहले तुम्हें बॉलीवुड के जिन प्रोड्यूसर महाशय ने अपनी फिल्म में विलेन का रोल देना चाहा था और तुमने नखरे दिखा कर मना कर दिया था, अब उड़के सीधे उनके चरणों में गिर जैयो और पैर पकड़ कर माफ़ी मांग लियो भाई। आख़िर राशन-पानी का सवाल है।

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Monday, October 16, 2006

Ye World Hai Na World...

ये वर्ल्ड है न वर्ल्ड...

ये वर्ल्ड है न वर्ल्ड, इसमें दो टाइप के लोग होते हैं – पहले, जो कहते हैं कि अफ़ज़ल को फांसी दो और दूसरे वो जो कहते हैं कि फांसी मत दो। तो भैया, पहले टाइप में तो लगभग सारा इण्डिया आता है, लेकिन दूसरे टाइप में ग़ुलाम नबी आज़ाद, फ़ारुख अब्दुल्लाह समेत कश्मीर के कई राजनेता और वामपन्थी आते हैं। लेकिन एक तीसरा टाइप भी है – जैसे मेल और फ़ीमेल के अलावा ‘हाय-हाय’ की तीसरी कैटेगरी होती है, उसी तरह पहले कहे गए दो टाइपों के अलावा इस मामले में भी ‘हाय-हाय’ वाला एक तीसरा ही टाइप भी है और इस टाइप मैं कांग्रेस आती है। जिसे यह नहीं मालूम कि उसका ... क्या है। अरे भैया, क्या सोचने लगे? हम कह रहे हैं कि उसे यह नहीं मालूम कि उसका ‘स्टेण्ड’ क्या है?

आप लोगों ने पंचतंत्र नहीं पढ़ी ढंग से, उसमें एक कहानी है। चलिए हम ही बताए देते हैं। तो हुआ यूँ कि एक बार प्राचीन इन्द्रप्रस्थ यानि की वर्तमान दिल्ली में गिरगिटों और कांग्रेसियों के बीच रंग बदलने का बड़ा भारी कम्पटीशन हुआ। गिरगिटों ने जीतने के लिए जान लड़ा दी, लेकिन अन्तत: वही हुआ जो विधि को मंज़ूर था। मतलब कि कांग्रेसियों ने बाज़ी मार ली और तब से आज तक कोई भी रंग बदलने में कांग्रेसियों का मुक़ाबला नहीं कर सका है। लेकिन ये कांग्रेसी गिरगिटों से एक नहीं बल्कि कई क़दम आगे हैं। गिरगिट केवल रंग बदलना जानता है, लेकिन कांग्रेसी रंग के साथ-साथ सुर बदलना भी जानते हैं – कश्मीर में कोई सुर और दिल्ली में कुछ और। हालाँकि दूसरे दलों के राजनेताओं ने भी कांग्रेसियों से इस गुण को ग्रहण किया है, लेकिन ‘ऑरिजिनल इज़ ऑलवेज़ ऑरिजिनल’। ब्लॉगर बीटा आने के बाद से जिस तरह ब्लॉग की फ़ीड पता लगाना मुश्किल हो गया है, ठीक उसी तरह राजनेताओं की जात भी समझो। हाँ, थोड़ा-सा ग़ौर करने पर दोनों पता पड़ जाते हैं। सत्ता में इनकी जात कुछ और होती है, विपक्ष में कुछ और। अब फ़ारूख़ अब्दुल्लाह साहब को ही ले लीजिए; अभी कल ही एक कार्यक्रम में तैश में चीख रहे थे – ‘अगर सज़ा माफ़ नहीं हुई तो कश्मीर जल उठेगा। आपको (टीवी कार्यक्रम में उपस्थित उन्य सज्जनों को) कुछ बोलने का हक़ नहीं है, कश्मीर वाले ही वहाँ के हालात समझ सकते हैं।’ वाह भई, वाह... कश्मीर पहले ‘शिवपालगंज’ तो था ही, सब वहाँ जाने से घबराते थे। लेकिन अब ऐसा लगता है कि कश्मीर के बारे में बोलने से भी घबराने लगेंगे।

अब बात करते हैं सर्वप्रिय वामपन्थियों की। वैसे, इतना तो मानना पड़ेगा कि ये वामपन्थी बहुत ही सिद्धान्तवादी लोग होते हैं। चाहे कुछ हो जाए, बुश और लादेन में दोस्ती हो जाए, सपा और कांग्रेस यूपी में फिर गठबंधन कर लें, मोदी और लालू ट्रेन के एक ही डिब्बे में बैठकर भारत की परिक्रमा करें, दुनिया इधर की उधर हो जाए – ये वामपंथी अपने सिद्धान्त नहीं छोड़ते। अब आप ही देखिए कि आज़ादी से पहले बोस को तोजो का कुत्ता कहना, भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध करना वगैरह वगैरह इनकी सिद्धान्त-निष्ठा के अनगिनत उदाहरण हैं। लेकिन सिद्धान्तनिष्ठा हो तो ऐसी, आज़ादी के बाद भी अपने सिद्धान्तों पर बदस्तूर चलते रहे और आज भी उनपर क़ायम हैं। आज भी अपनी विचारधारा पर चलते हुए अफ़ज़ल की फांसी माफ़ करने का समर्थन कर रहे हैं। हमको तो यह लगता है भैया, कि अगर वामपंथियों की केन्द्र में सरकार होती तो कश्मीर को चमकती लाल पन्नी में रैप कर और उसपर ‘टू पाकिस्तान विथ लव – वामपन्थीज़’ की चिप्पी चिपका कर उसे पाकिस्तान को भेंट कर देते।

लेकिन ये वर्ल्ड है वर्ल्ड, यहाँ हमेशा दो तरह के लोग होते हैं – एक वामपंथी हैं तो दूसरे राष्ट्रवादी भी हैं। इसलिए कुछ बचा-खुचा कश्मीर अभी तक हिन्दुस्तान में है। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी तीसरे तरह के लोग भी वर्ल्ड में पाए गए हैं – मानवाधिकारवादी। जिस तरह पतंगे वगैरह सिर्फ़ बरसात में ही नज़र आते हैं, ठीक उसी तरह ये लोग भी केवल तभी दिखाई देते हैं जब किसी आतंकवादी को सज़ा हो रही हो। सेना और पुलिस वाले मरें तो मरें अपनी बला से, लेकिन मानवाधिकार वालों के कानों पर जू तक नहीं रेंगती है। ये लोग आजकल यह कहते सुने जा सकते हैं कि केपिटल पनिशमेंट की सज़ा मानव-अधिकारों के ख़िलाफ़ है। तो साहब, हमारा इन लोगों से कोई विरोध नहीं है। बस इतनी गुज़ारिश है कि इन लोगों पर ‘मानवाधिकार’ शब्द कुछ जँचता नहीं है, इसलिए इसे बदलकर ‘आतंकवादी-अधिकार संगठन’ किया जाना चाहिए। ‘आतंकवादी-अधिकार संगठन’ – अहा! सुनने में कितना अच्छा लग रहा है, कर्णप्रिय, मधुर, बिल्कुल लता मंगेशकर की आवाज़ की तरह। हमारी बस इत्ती सी गुज़ारिश है, मान लो मानवाधिकार वाले भाईयों और उनकी बहनों।

आप लोग कह सकते हो कि सबको गरिया रहे हो तो सरकार को काहे बख़्श दिया भला? तो भैया, हम रिक्स नहीं लेंगे। लेकिन दिक़्क़त ये है कि सरकार को नालायक़ कहना कुछ सुहाता नहीं है, कोई नया लफ़्ज़ सुझाइए अब। सरकार के लिए ‘नालायक़’ शब्द तो अब cliché हो गया है। लगना चाहिए कि कहने वाला कुछ गहरे सोच-विचार के बाद गरिया रहा है। वैसे भी मनमोहन-मुशर्रफ़ तो हीरा-मोती बैल हैं। कुछ भी कर लें, आख़िर में अपने मालिक बुश के पास पहुँच जाते हैं। कहानी में डीविएशन बस इतना है कि यहाँ ये दोनों बैल आपस में ही जूतम-पैजार करके मामला सुल्टाने के लिए मालिक के पास जाते हैं। हालाँकि पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सुबूत लेकर मनमोहन जी दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन होता-जाता कुछ नहीं है... वही ढाक के तीन पात। और कुछ हो भी गया, मान लो कि पाकिस्तान ने दाऊद वगैरह किसी को भारत को सौंप दिया, तो यहाँ ख़्वामख़्वाह सज़ा माफ़ी के लिए बवंडर होगा और ख़बरिया चैनल वाले उसे 24x7 दिखलाने लगेंगे और हम अफ़ज़ल के बाद टीवी पर फिर वही सब टॉर्चर नहीं झेल सकते एक बार फिर।

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Friday, October 13, 2006

शेयर मार्केट में गफला

आज शुक्रवार के दिन शेयर बाजार नें अपने उच्‍चतम बिन्‍दु को छू लिया। इस सबका आज रिलीज हुई फिल्‍म गफला से तो कोई लेना देना नहीं ;-) ?

Wednesday, October 04, 2006

HindiBlogs.com Announcement

मित्रों,

नए कलेवर के साथ हिन्दीब्लॉग्स डॉट कॉम आपके सामने फिर उपस्थित है। इस बार यह बहुत-सी नई सुविधाओं और ख़ूबियों से सुसज्जित है। अब आपको सभी चिट्ठों के नाम याद रखने की कोई ज़रूरत नहीं है, सिर्फ़ ब्राउज़र में www.hindiblogs.com डालिए और खो जाइए हिन्दी चिट्ठों के तेज़ी से बढ़ रहे संसार में।

नए हिन्दीब्लॉग्स डॉट कॉम की विशेषताएँ -
  • हर आधे घण्टे में हिन्दी चिट्ठा जगत् से ताज़ी प्रविष्टियों की जानकारी
  • नया कलेवर और बेहतर रंग-रूप
  • सिर्फ़ हिन्दी चिट्ठों पर फ़ोकस
  • पहले से बेहतर और तीव्र प्रस्तुतीकरण
  • कई कमियों में सुधार

Sunday, October 01, 2006

Santhara : My Viewpoint

संथारा पर मेरे विचार

आजकल संथारा को लेकर काफ़ी विवाद चल रहा है। कई लोग इसे ग़लत मानते हैं, तो कईयों का कहना है कि यह एक धार्मिक परम्परा है और इसमें किसी भी तरह की दखलंदाज़ी नहीं होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत जैसे देश में इस तरह की बहस का कोई औचित्य है? जहाँ हर रोज़ कई लोग भुखमरी का शिकार हो रहे हैं। जिस मुल्क़ के 24 फ़ीसदी लोगों को दो जून की रोटी भी नहीं नसीब होती है, वहाँ अगर दो-चार लोग खुद ही अन्न-जल त्याग रहे हैं तो इससे क्या फ़र्क पड़ता है? हज़ारों की तादाद में लोग बिना खाए मरते हैं तो कोई कैमरा-माइकधारी प्राणी वहाँ झाँकने भी नहीं जाता, लेकिन दो-एक बूढ़े लोग संथारा लेते हैं तो हायतौबा मच जाती है।

कोई अपनी इच्छा से बीमारी और बुढ़ापे के चलते मरना चाहता है तो मरने दो, लेकिन जो जीवित रहना चाहते हैं कम-से-कम उन्हें तो अन्न मुहैया कराओ। संथारा पर शोर-गुल बहुत है, लेकिन देश की निराहारा चतुर्थांश आबादी पर कोई आवाज़ तक नहीं। वाह रे महान देश, वाह रे महान अदालतें और वाह रे इस महान देश का महान मीडिया...

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Wednesday, September 27, 2006

Free Download Hindi E-books & Literature

अगर आप पढ़ने-लिखने के शौक़ीन हैं, तो यह वेब साइट आपके ही लिए है। "डिजिटल लाइब्रेरी ऑफ़ इण्डिया" नामक इस साइट पर हिन्दी के अलावा गुजराती, मराठी, तमिल आदि भारतीय भाषाओं और अंग्रेज़ी, अरबी, फ़्रेंच आदि विदेशी ज़ुबानों में काफ़ी सारी ई-पुस्तकें उपलब्ध हैं। हालाँकि सबसे बड़ी दिक़्क़त यह है कि सारी किताबें ग्राफ़िक्स के रूप में हैं, न कि यूनीकोड में। यहाँ लगभग सभी विषयों पर किताबें मौजूद हैं। सरकार का यह प्रयास निश्चय ही सराहनीय है। देखिए यह जालस्थल -

Digital Library of India

हिन्दी में किताबें ढूंढने के लिए 'लेंग्वेज़' के सामने बने ड्रॉपडाउन बॉक्स में हिन्दी को चुनें और फिर सर्च का बटन दबाएँ।

सम्बन्धित आलेख -
1. Online Hindi Literature
2. Famous Hindi Literary Magazine “Hans” on Internet

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Sunday, September 24, 2006

Movie Review : Khosla Ka Ghosla

To read the review in English, please click here.

फ़िल्म समीक्षा : खोसला का घोंसला

वाह! क्या फ़िल्म है... एकदम ज़बरदस्त। देखकर मज़ा आ गया। हालाँकि इसमें कोई बड़ा नाम नहीं है, लेकिन फिर भी पिक्चर धांसू बन पड़ी है। शुरुआत में मैं इस फ़िल्म के बारे में ज़रा शंकित था, क्योंकि रिलीज़ होने से पहले इसका ज़्यादा प्रचार वगैरह नहीं किया गया था। लेकिन फ़िल्म का ट्रीटमेंट ज़बरदस्त है। जिस तरह निर्देशद ने एक गम्भीर विषय को हास्यपूर्ण बनाकर कथानक में पिरोया है, उससे यह फ़िल्म बहुत मज़ेदार हो गई है।

अनुपम खैर ने खोसला का क़िरदार बहुत ही शानदार तरीक़े से निभाया है। यह कहानी है एक मध्यवर्गीय आदमी के एक सपने की - अपना घर बनवाने का सपना और साथ ही उस रोड़े की, जो उसके इस सपने और उसके बीच आकर अटक जाता है। बोमन ईरानी ने नाटकीयता से भरे अपने नकारात्मक क़िरदार को बख़ूबी पेश कर फ़िल्म में जान फूँक दी है। मेरे हिसाब से यह उनका अब तक का सर्वश्रेष्ठ अभिनय है। खुराना (बोमन) खोसला (अनुपम खैर) की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेता है और लौटाने के एवज़ में पन्द्रह लाख रु. मांगता है। खोसला और उसके बेटों की ज़मीन वापस पाने की पुरज़ोर कोशिश कई हास्यास्पद परिस्थितियाँ पैदा करती हैं, जिन्हें देखकर आप हँसे बिना नहीं रह सकते।

इस फ़िल्म को देखते समय हर मध्यवर्गीय इंसान इससे जुड़ाव महसूस करेगा। सभी अभिनेताओं ने बढ़िया अदाकारी की है। अगर आप कुछ अलग और मज़ेदार देखना चाहते हैं, तो इस पिक्चर को ज़रूर देखें। फ़िल्म में हँसी पैदा करने की कोई नक़ली या कृत्रिम कोशिश नहीं की गई है, बल्कि परिस्थितियों का हास्यपूर्ण चित्रांकन इस फ़िल्म को एक बेहतरीन कॉमेडी बनाता है। मैं इस फ़िल्म को दस में से पूरे दस दूंगा।

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Thursday, September 21, 2006

Is Bangladesh The Next Pakistan?

क्या बांग्लादेश अगला पाकिस्तान है?

आज के अख़बार में ख़बर है कि बनारस विस्फोट और 7/11 के मुम्बई धमाकों में शामिल लश्कर-ए-तैयबा आतंकवादी अस्लम कश्मीरी ने भागकर बांग्लादेश में शरण ली है। इससे पहले भी बांग्लादेश की ज़मीन से भारत-विरोधी गतिविधियों को अंजाम दिया जाता रहा है। साथ ही बांग्लादेश से लगातार हो रही घुसपैठ पूर्वोत्तर में गम्भीर समस्या का रूप ले चुकी है।

लेकिन भारत सरकार हमेशा की तरह ख़ामोशी से यह सब देख रही है और बांग्लादेश से निपटने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाया जा रहा है। जब हम बांग्लादेश से निपट सकते हैं, तो कोई उचित कार्यवाही नहीं कर रहे हैं। अगर बाद में बांग्लादेश भी पाकिस्तान की तरह परमाणु क्षमता प्राप्त कर लेता है तो फिर हम हाथ मलते रह जाएंगे और अपने घावों को बैठे सहलाते रहेंगे। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या बांग्लादेश आने वाले कल का पाकिस्तान है? और अगर इसका उत्तर हाँ है, तो इसके लिए अभी क्या किया जाना चाहिए?

Wednesday, August 09, 2006

Thanda Matlab...?

ठण्डा मतलब...?

जब यह पहेलीनुमा सवाल हमने अपने दो दोस्तों से किया, तो एक ने कहा ‘कोकाकोला’ और दूसरे ने कहा ‘टॉयलेट क्लीनर’। यह तो हम जानते थे कि अपना भीखू ऐश्वर्या का पंखा है, इसलिए कोकाकोला कह रहा है। लेकिन बाबा रामदेव के कपालभाति की हवा नाक के ज़रिए पेट से होते हुए बनवारी के भेजे में घुस चुकी है, इससे हम वाकिफ़ नहीं थे।

ख़ैर, हमने बनवारी का पक्ष लेते हुए भीखू को समझाना चाह – इसमें कीटनाशक होते हैं, इसलिए पेप्सी-कोला नहीं पीनी चाहिए। बनवारी भी बोला, ‘टॉयलेट’ में डालने से टॉयलेट बिल्कुल साफ़ हो जाती है। इसपर भीखू ने अपना अकाट्य कुतर्कपूर्ण ज्ञान झाड़ा – ‘ठण्डा पीना बहुत ज़रूरी है। सबसे पहले तो इसकी ख़ास वजह यह है कि ऐश्वर्या और आमिर, करीना और शाहरुख़ सब-के-सब ठण्डा पीने को कहते हैं। प्रियंका चौपड़ा कहती हैं कि चूंकि वे पेप्सी को एंडोर्स करती हैं, इसलिए पेप्सी तो पीनी ही चाहिए। अगर ठण्डा पीना बन्द कर दिया, तो इन सबके पेट पर लात पड़ेगी। इसका पाप किस पर पड़ेगा, बाबा रामदेव से पूछकर बताओ तो भला? दूसरा फ़ायदा यह है कि इसमें जो कीटनाशक है, उससे पेट में कीड़े नहीं पड़ते और ये बहुत सेहतमंद तो है ही, जैसा कि बनवारी ने कहा इससे टॉयलेट इकदम साफ़ होती है – पेट खुल जाता है ..... आहहहा।’ यह कहते-कहते उसने अपने पेट पर हाथ फेरा, पेट खुलने से प्राप्त सन्तुष्टि का भाव उसके चेहरे पर साफ़ झलक रहा था।

लेकिन हम भी बहुत अडियल किस्म के हैं, ऐसे कहाँ मानने वाले थे। सो हम बोले – ‘देखो भई, किसान इस देश का आधार ठीक उसी तरह हैं जिस तरह लट्टू का आधार उसकी नुक्क होती है। कोक-पेप्सी वाले भूमिगत जल का दोहन भारी मात्रा में कर किसानों को नुक़सान पहुँचा रहे हैं, जिससे बेचारे किसानों को खेती-बाड़ी छोड़नी पड़ रही है।’ इसपर भीखू बोला – भैया, पचास ख़बरिया चैनल दिन रात गला फाड़ चिल्लाचोट मचाते रहते हैं, किसी एक-आध को तो देख लिया करो। तुम्हें मालूम नहीं कि कृषि मंत्री शरद पवार ने क्या कहा है। उनने कहा है कि ‘‘खेती-बाड़ी में ज़रूरत से ज़्यादा लोग लगे हैं, इसीलिए कृषि का बुरा हाल है। जितने ज़्यादा किसान खेती-बाड़ी छोड़ कर दूसरे धंधे करेंगे, उतनी ही कृषि की उन्नति होगी। इसलिए पेप्सी-कोक पर पाबंदी की बात सोचना भी ग़लत है।’’ भीखू ने बोलना जारी रखा – सुना तुमने, तुममें ज़्यादा अक़ल है या देश के कृषि मंत्री में? तुमसे कबड्डी भी ढंग से नहीं खेली जाती, कबड्डी-कबडी... के बीच में ही साँस टूट जाती है और ये आदमी देश की खेती-बाड़ी और क्रिकेट, दोनों इक्किला सम्हाल रहा है। बूढ़ापे में भी साँस है कि टूटने का नाम ही नहीं ले रही है। अब बताओ किसकी बात में दम है? हम निरुत्तर थे और बनवारी तो पहले से ही अनासक्त सिद्ध की भांति हमारी इस चर्चा पर ग़ौर नहीं कर रहा था। उसका सारा ध्यान नुक्कड़ पर शून्य से प्रकट हो शून्य में ही विलीन हो रही अप्सराओं पर था।

ये देश और इसकी जनता कुछ ऐसी ही है। अब क्या करें हम इसमें? यहाँ स्वामी रामदेव पर शरद पवार हमेशा भारी साबित होते हैं। सो हम और बनवारी गरम दूध पीने आगरा के मशहूर हीरा हलवाई की दुकान की ओर चल दिए और भीखू खोखे वाले से एक और कोक लेकर भोग लगाने लगा।

Tuesday, August 08, 2006

Future of Islam in India

भारत में इस्लाम का भविष्य

मुम्बई बम विस्फोटों के बाद एक बार फिर यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या इसलाम ही आतंकवाद की जड़ में है? जनसाधारण में यह धारणा अब पक्की हो चुकी है कि भारत में चल रहे आतंकवाद की असली वजह इस्लाम ही है। वहीं कुछ इस्लामी विद्वानों का कहना है कि ऐसा कहना ग़लत है, इस्लाम अमन का मज़हब है। अगर क़ुरआन और शरीयत को देखें, तो यह पशोपेश अपने आप ही समाप्त हो जाता है। मैं किसी की आस्था को चोट नहीं पहुँचाना चाहता हूँ, लेकिन तथ्यों के आधार पर कहा जाए तो इस बात को कोई नहीं नकार सकता कि इस्लाम स्वभावत: कट्टर, आक्रामक और मध्ययुगीन है। क़ुरआन में विधर्मियों को जान से मारने का आदेश साफ़-साफ़ पढ़ा जा सकता है। इसी वजह से शुऐब जैसे पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी लोग इस्लाम से दूर हो रहे हैं।

ईसाईयत के बाद इस दुनिया में इस्लाम के अनुयायियों की संख्या सबसे ज़्यादा है। भारत में भी इस्लाम के अनुयायी भारी तादाद में रहते हैं। इनमें से ज़्यादातर ऐसे हैं, जिनका आतंकवाद से कोई सरोकार नहीं है और वे भी भारत को उसी तरह अपना देश मानते हैं, जिस तरह कि हिन्दू मानते हैं। इसलिए विश्व हिन्दू परिषद और बजरंगदल के ये कथन कि भारत में इस्लाम का ख़ात्मा किए जाने की ज़रूरत है, असम्भव ही नहीं बल्कि घातक भी हैं। इस्लाम के ख़ात्मे का मतलब होगा २० करोड़ इंसानों का ख़ात्मा, जो एक आमानुषिक कृत्य होगा। अगर भारत के सभी मुसलमानों के पन्थान्तरण की बात कही जाए, तो वह भी व्यावहारिक तौर पर असम्भव ही है।

भारत में इस्लाम की ऐसी दुविधापूर्ण स्थिति है, जिसके बारे में कहा जा सकता है कि न इसे उगला जा सकता है और न ही निगलना मुमकिन है। इस समस्या का बस एक ही समाधान नज़र आता है और वह है एक वैचारिक तौर पर आधुनिक और उदारवादी इस्लामी सम्प्रदाय का प्रसार। जो मध्ययुगीन और कट्टर विचारों से पूरी तरह मुक्त हो। जिस तरह यूरोप में कैथॉलिक कट्टरता से आज़ादी पाने के लिए प्रोटेस्टेंट पंथ का प्रचार किया गया था, ठीक उसी तरह की प्रक्रिया इस्लाम के लिए भी ज़रूरी है।

भारत में यह होना तो दुनिया के दूसरे हिस्सों की तुलना में ख़ासा आसान है। इसकी वजह है – भारतीय इस्लाम पर सूफ़ीवाद का गहरा प्रभाव और भारत में सूफ़ियों की लम्बी परम्परा का होना। सूफ़ीवाद और वेदान्त यानी कि तात्विक हिन्दू धर्म वैचारिक तौर पर एक कहे जा सकते हैं, दोनों में ज़रा भी फ़र्क़ नहीं है। अगर सूफ़ियों के कथनों पर ग़ौर किया जाए, तो उनकी अनुभूति हिन्दू सन्तों के से सैद्धान्तिक धरातल पर आ टिकती है। अगर ध्यान से देखा जाए, तो भारतीय इस्लाम अपने मूल स्वरूप में सूफ़ीवादी इस्लाम ही है। लेकिन कई ख़ासे आधुनिक ऐतिहासिक कारणों से यह अब अपना मूल चरित्र विस्मृ‍त कर चुका है। अगर भारत में इस्लाम को प्रगतिशील और उदारवादी होना है, तो इसके मूल सूफ़ीवादी चरित्र का पुनरुत्थान ज़रूरी है। इसके लिए न सिर्फ़ मुसलमानों को कोशिश करनी होगी, बल्कि हिन्दुओं को भी इसमें अपना पूरा सहयोग देना होगा। भारत में अगर इस्लाम फिर इस सूफ़ीवादी प्रभाव से सम्पन्न हो जाता है, तो बाक़ी की दुनिया के लिए यह एक सबक़ होगा और यह उदारवादी इस्लाम भारत से बाहर भी तेज़ी से फैल सकेगा।

आप लोगों की इस बारे में क्या राय है? क्या इस्लाम इस तरह उदारवादी और प्रगतिशील हो सकता है? या फिर इसका कोई और उपाय भी है?

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Saturday, August 05, 2006

Great Gama Pahalwan: The Indian Wrestler

The Great Gama Pahalwanआज मैं अपने एक दोस्त से यूँ ही गप्पें लड़ा रहा था। वह ख़ुद को बहुत बड़ा बॉडीबिल्डर समझता है। हाँलाकि कम तो मैं भी नहीं हूँ (आपने शायद जिम में मेरे शुरूआती तजुर्बे पढ़े होंगे), लेकिन वो मुझसे ख़ासा तगड़ा है। बातचीत के दौरान मैंने कहा - "मैंने कहीं पर पढ़ा है कि हम हिन्दुस्तानी पश्चिमी पहलवानों की तरह ताक़तवर और तगड़े नहीं हो सकते, हमारी नस्ल 'जेनेटिकली वीक' है।" इसपर उसने गामा पहलवान का क़िस्सा सुनाया, जिसे सुनकर मैं बहुत प्रभावित हुआ और सोचा कि गामा के बारे में कुछ गूगलाया जाए। गामा पहलवान उन लोगों में से है, जो ऐसे मूर्खतापूर्ण सिद्धांतों की हवा निकालने के लिए काफ़ी हैं। गामा पहलवान के बारे में कुछ तथ्य -

असली नाम: ग़ुलाम मोहम्मद क़द: 5'7" वज़न: 104.33 किग्रा जन्म: 1888

जब कभी लोग दुनिया के महानतम पहलवान कि चर्चा करेंगे, तो गामा पहलवान (Gama Pehalwan) और उसके परिवार का नाम उस सूची में सबसे ऊपर होगा। 1888 में अमृतसर, पंजाब में जन्मे गामा पहलवान के पिता का नाम अज़ीज़ था। गामा पहलवान और उनके भाई, इमाम, ऐसे पहलवान थे जिनसे सारे भारत के पहलवान घबराते थे।
The Great Gama Pehalwan is looking like God Hanuman
गामा ने सन् 1909 में रुस्तम-ए-हिन्द (Champion of India) का ख़िताब अपने नाम कर लिया और हिन्दुस्तान के सभी पहलवानों के सामने ख़ुद को हराने की चुनौती रखी। गामा से मुक़ाबले की शर्त यह थी कि चुनौती देने वाला पहलवान या तो रुस्तम-ए-हिन्द का ख़िताब जीत चुका हो, या फिर वो पहले गामा के छोटे भाई इमाम को हराए। इमाम ख़ुद ग़ज़ब का पहलवान था और उसे कोई भी हरा नहीं सका, वह अपनी पूरी ज़िन्दगी में सिर्फ़ एक बार हारा था।

हिन्दुस्तान के सभी पहलवानों पर जीत हासिल करने के बाद गामा, इमाम और आर.बी. बेंजामिन का भारतीय पहलवानों का दल (R. B. Benjamin's circus of Indian wrestlers) इस चुनौती के साथ पूरे यूरोप में घूमे कि जो भी पहलवान चाहे, वह आकर उनसे मुक़ाबला कर ले। इस दौरान गामा ने कई मशहूर पहलवानों को हराया जिनमें अमेरिका के "डॉक" बेंजामिन रोलर, फ़्रांस के मॉरिस डेरिआज़, स्विट्ज़रलॅण्ड के जॉहन लेम (यूरोप विजेता) और स्वीडन के जेस पीटर्सन (विश्व विजेता) शामिल थे। गामा का सबसे प्रसिद्ध मुक़ाबला था तत्कालीन विश्वविजेता पोलॅण्ड के स्टेनिस्लॉस बाइज़्को (Stanislaus Zbyszco) के साथ। गामा से घबराकर बाइज़्को पूरे मुक़ाबले में रक्षात्मक खेल खेलता रहा और हारते-हारते बचा, हालाँकि वह यह विवादित मुक़ाबला ड्रॉ करवाने में क़ामयाब रहा। रोलर के ख़िलाफ़ केवल 15 मिनट के मुक़ाबले में गामा ने "डॉक" को 13 बार चित कर दिया।

इसके बाद गामा ने बाक़ी दुनिया के सामने, जो विश्व विजेता होना चाहते थे, अपनी चुनौती पेश की; जिसमें जापान के जूडो चैम्पियन टारो मियाक (Taro Miyake), रूस के जॉर्जिस हैकेंशमिड (Georges Hackenschmidt) और अमेरिका के फ़्रेंक गोश (Frank Gotch) शामिल थे। लेकिन सभी ने गामा की चुनौती अस्वीकार कर रिंग में गामा के ख़िलाफ़ उतरने से इंकार कर दिया। इसके बाद गामा ने चुनौती रखी कि वह एक के बाद एक लगातार बीस पहलवानों से लड़ेगा और सभी को हराएगा, नहीं तो सभी को जीता हुआ क़रार देकर ख़ुद इनाम का सारा ख़र्च देगा - लेकिन इसके बावजूद कोई गामा का मुक़ाबला करने की हिम्मत नहीं जुटा सका।

इसके बाद गामा एक महानायक की तरह वापस भारत लौट आया और अगले 15 सालों तक कुश्ती लड़ता रहा। बाद में एक बार फिर वह पोलॅण्ड के स्टेनिस्लॉस बाइज़्को के ख़िलाफ़ मुक़ाबले में उतरा और यूरोप दौरे के दौरान हुए ड्रॉ मैच का बदला बाइज़्को को मात्र 21 सेकेण्ड में हरा कर लिया। अपने करियर में गामा ने 5,000 मुक़ाबले लड़े और कभी कोई मुक़ाबला नहीं हारा। विभाजन के बाद गामा पाकिस्तान चला गया और 1953 में पंजाब के इस शेर का देहांत हो गया। ग़ौरतलब है कि गामा अपने जीवन के आख़िरी सालों में फिर भारत लौटना चाहता था। आज भी गामा को सार्वकालिक महानतम पहलवानों में शुमार किया जाता है।

(सभी चित्र साभार : रेसलिंग म्यूज़ियम)

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Friday, August 04, 2006

Movie Review : Golmaal

फ़िल्म समीक्षा : गोलमाल

"गोलमाल" बोले तो फ़ुल टाइमपास फ़िल्म है बाबा। आपको यह फ़िल्म पसन्द आएगी, लेकिन एक शर्त है। वो ये कि देखते वक़्त अपनी लॉजिकात्मक बुद्धि न लगाएँ और दिमाग़ को कुछ देर के लिए ज़रा किनारे रख दें। और हाँ, इस पिक्चर के नाम से कंफ़्यूज़ होकर इसे अमोल पालेकर वाली पुरानी गोलमाल के स्तर की क्लास मूवी मत समझ लेना। उसके सामने तो ये कहीं भी नहीं ठहरती है।

इस कहानी के केन्द्र में हैं चार चौंघड़ - गोपाल (अजय देवगन), महादेव (अर्शद वार्सी), लकी (तुषार कपूर) और लक्ष्मन (शर्मन जोशी)। ये सब निहायत ही आवारा किस्म के हैं और खाओ-पीओ-ऐश करो टाइप के बन्दे हैं। इनकी हरकतों की वजह से कॉलेज से इनका बोरिया-बिस्तर उठाकर बाहर फेंक दिया जाता है। फिर ये रहने-खाने की जुगाड़ में एक बूढ़े दम्पत्ति के बंगले में घुस जाते हैं। इस दंपत्ति का पोता पहले ही मर चुका है, इसलिए लक्ष्मण इनका पोता बन कर रहता है और चारों में से सिर्फ़ गोपाल ही बोलता है ताकि उन्हें चारों के होने की भनक न लगे। बाक़ी के तीनों ख़ामोश रहते हैं और ये परिस्थितियाँ कॉमेडी पैदा करती हैं।

ओंकारा की ही तरह इस फ़िल्म में भी अजय देवगन का बहुत कमज़ोर अभिनय है। लगता है आजकल अजय कुछ महनत-मशक्कत के मूड में नहीं हैं। अर्शद अब कॉमेडी में रम गए लगते हैं और बाक़ियों का काम भी ठीक है। कुल मिला के पिक्चर कम-से-कम एक बार देखने लायक बन पड़ी है। चाहो तो गोलमाल की वेब साइट भी देख लो।

Thursday, August 03, 2006

Film Review : Omkara

फ़िल्म समीक्षा : ओंकारा

यह बात अब मुझे बिल्कुल सही मालुम होती है कि इंदौर "इन्द्र की नगरी" है, क्योंकि जब से मैं इंदौर आया हूँ, यहाँ बारिश हो रही है। पिछ्ले दस दिनों से कभी तेज़ बारिश होती है तो कभी फुहार पड़ने लगती है, लेकिन बारिश पूरी तरह बन्द नहीं होती। इतने दिनों तक घर पर पड़े-पड़े मैं बुरी तरह ऊब गया और सोचा कि क्यों न चल के कोई धाँसू-सी फ़िल्म ही देख ली जाए, सो ओंकारा देखने पीवीआर पहुँच गया।

मक़बूल देखने के बाद और पीवीआर का 150 रू. का टिकट लेने के बाद मुझे भी औरों की ही तरह विशाल भारद्वाज से बहुत उम्मीदें थीं। लेकिन ओंकारा किसी भी एंगल से मक़बूल की तरह सॉलिड नहीं है। तो भाई लोग, अगर ओंकारा देखने की इच्छा हो तो इसकी तुलना मक़बूल से क़तई मत करना। इसका मतलब यह नहीं है कि ओंकारा बिल्कुल ही बक़वास है, लेकिन इतना ज़रूर है कि मक़बूल की टक्कर की नहीं है।

अब इस पिक्चर की कहानी क्या बताऊँ, कभी-न-कभी स्कूल के दौरान तो "ऑथेलो" पढ़ी ही होगी। लेकिन अगर आप भी मेरी कैटेगरी में लटके हुए हो, तो यहाँ पढ़ लो। "केसू फिरंगी" यानी कि विवेक ओबरॉय का उम्मीद के मुताबिक़ बहुत ही ढ़ीला अभिनय देखने को मिला। लेकिन जिसकी उम्मीद नहीं थी वह था केन्द्रिय किरदार "ओंकारा" = अजय देवगन का पिटी-पिटाई लीक पर वही पुराना मोनोटोनस-सा, एकरस-सा अभिनय। ऐसा लगता है कि अजय देवगन ने इस किरदार के लिए कोई ख़ास मेहनत नहीं की है। इस फ़िल्म में अपनी (?) "बिल्लो" उर्फ़ बिपाशा बसु चने के खेत में गन्ने कि तरह नज़र आई हैं, मतलब कि बिलकुल आउट ऑफ़ प्लेस। जिस तरह का माहौल पिक्चर में दिखाया गया है, उसमें बिपाशा ज़रा भी फ़िट नहीं होतीं हैं।

लेकिन सैफ़ अली खान ने "लंगड़ा त्यागी" के पात्र में अपनी ज़ोरदार अदाकारी से जान फूँक दी है। यूँ कह लीजिए कि सैफ़ ने ही पूरी फ़िल्म को अपने कन्धों पर ढ़ोया है। ये जानकर ख़ुशी हुई कि आख़िर सैफ़ अभिनय करना सीख ही गए। सैफ़ के अलावा कोंकणा सेन शर्मा भी दूध में पानी की तरह लगी हैं यानी की यूपी के ग्रामीण परिवेश में पूरी तरह घुली-मिली नज़र आई हैं।

लेकिन एक बात जो कि बिल्कुल भी मेरी समझ में नही आई, वो थी यूपी की लोकेशन्स पर फ़िल्म के किरदारों द्वारा हरियाणवी बोली का इस्तेमाल। यूपी में हरियाणवी कहाँ बोलते हैं भई? इससे पहले भी मुझे "बंटी और बबली" में ऐसा ही लोच्चा लगा था। लखनऊ का बंटी पूरी फ़िल्म में इलाहाबादी बोली बोलता दिखाया गया था। अजीब था... नहीं? बचपन में अपने गाँव में "आल्हा" सुना था - "आल्हा-ऊदल बड़े लड़ैया, उनकी मार सही न जाए" - ऐसा कुछ था। ओंकारा का यह गाना उससे बहुत प्रभावित लगा - "धम-धम धड़म धड़ैया रे, सबसे बड़े लड़ैया रे... ओंकारा"। अगर बॉस नहीं देख रहा है, तो ये भी देख लो - ओंकारा की वेब साइट

Wednesday, August 02, 2006

Record Streaming Music and Songs

रिकॉर्ड करें स्ट्रीमिंग संगीत और गाने

बहुत दिनों से मैं एक गाना खोज रहा था। गाने का मुखड़ा था - "जा नहीं सकता है दिल, उनका ख़याल आया हुआ।" नूरजहाँ का यह गाना आज़ादी से पहले की "विलेज गर्ल" (Village Girl) नाम की एक बहुत पुरानी फ़िल्म से है। मैनें अंतर्जाल पर इस गाने को बहुत ढूंढा, लेकिन डाउनलोड करने के लिए यह गाना कहीं भी नहीं मिला। फिर मैनें चिट्ठा-जगत् के संगीत विशेषज्ञ रजनीश भाई को ई-मेल कर मदद की गुहार लगाई, लेकिन उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए।

हालाँकि यह गाना राग डॉट कॉम पर मिल गया और ऑनलाइन सुना जा सकता था। लेकिन अब समस्या यह थी कि ऑफ़लाइन होने पर इसे नहीं सुना जा सकता था और न ही अपनी प्ले-लिस्ट में जोड़ा जा सकता था। फिर मैंने जुगत लगाकर स्ट्रीमिंग संगीत या गाना रिकॉर्ड करने का उपाय भी आख़िरकार खोज ही निकाला। आप भी देखिए, अगर कोई ऑनलाइन स्ट्रीमिंग गाना रिकॉर्ड करना है तो इस आसान उपाय का इस्तेमाल किया जा सकता है।

सबसे पहले कोई भी रिकॉर्डिंग सॉफ़्टवेयर (जैसे कि ऑडसिटी वगैरह) खोलें और सोर्स (Source) में "मोनो मिक्सर" या "स्टीरिओ मिक्सर" (Mono mixer or Stereo mixer) चुनें। फिर इंटरनेट पर किसी भी साइट से मनचाहा ऑनलाइन गाना शुरू करें और रिकॉर्डिंग सॉफ़्टवेयर में रिकॉर्ड के बटन पर क्लिक करें। बस, आपका काम ख़त्म हुआ। अब आप आराम से बैठकर गाने के ख़त्म होने का इंतज़ार करें और गाना समाप्त होने पर रिकॉर्डिंग को भी बंद कर दें। आपका पसंदीदा गाना रिकॉर्ड होने पर अब फ़ाइल मेन्यू में जाकर उसे एमपी3 फ़ॉर्मेट में सेव कर दें।

अगर इतना पढ़ने के बाद भी कोई दिक़्क़त पेश आ रही है, तो बेहिचक पूछें। वैसे, आजकल मैं इन्दौर में हूँ। वरना अपने उस पसन्दीदा गाने को अपलोड कर उसकी कड़ी ज़रूर देता, जिसके चक्कर में यह सब सीखना पड़ा।

Saturday, July 22, 2006

नहीं हैं आसां नक़लची होना भी

अभी कुछ ही दिनों पहले हमारी परीक्षाएँ ख़त्म हुईं हैं। वैसे तो हमारा मानना है कि इम्तेहान होने ही नहीं चाहिए, लेकिन अगर होते भी हैं तो ये पास-फ़ेल का रट्टा इसमें नहीं होना चाहिए। क्योंकि इसकी वजह से विद्यार्थियों को बहुत टेंशन हो जाती है। हालाँकि यही टेंशन छात्र-छात्राओं को जी-तोड़ मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है।

कई लोग ऐसा सोचते हैं कि कुछ विद्यार्थी मेहनत करते हैं और कुछ नहीं भी करते, तभी तो फ़ेल हो जाते हैं। लेकिन बहुत-सी और धारणाओं की ही तरह यह धारणा भी बिल्कुल ग़लत है। हर एक मेहनत करता है, लेकिन फ़र्क़ यह है कि कुछ पढ़ने में महनत करते हैं और कुछ खर्रे-पर्चियाँ बनाने में। दोनों ही रात-रात भर जाग कर काम करते रहते हैं।

लेकिन असलियत ये है कि खर्रे बनाने में ज़्यादा महनत लगती है और पढ़ाई करने में कम। हमारा एक सहपाठी है, नाम है पुत्तन। बेचारा साल भर कुछ ख़ास पढ़ नहीं पाया; उसके हिसाब से इसमें सारा-का-सारा दोष अध्यापकों, माँ-बाप, पड़ोसियों, परिस्थितियों और भगवान का है। हमें भी उसकी बात जँचती है, इन सब का दोष न होता तो भला कैसे दिन भर पास वाले गर्ल्स कॉलेज के गेट पर खड़ा रह पाता? ख़ैर, इम्तिहान से एक दिन पहले हमारे पास आया और विषय, किताब और उसकी कुंजी का नाम पता करके चला गया। रात को उसका फ़ोन आया – कुछ सवालों को पढ़ कर सुनाया और पूछने लगा, किस चैप्टर में मिलेंगे। हमने बता दिया, लेकिन साथ ही ऐसा लगा कि हमसे चुन-चुन के कुछ सवाल ही क्यों पूछ रहा है? हो-न-हो ज़रूर पर्चा आउट करा लिया है, जो कि ऐसे न पढ़ने वाले जुगाड़ी छात्र अक़्सर कराने की कोशिश करते हैं। ख़ैर, बात आई-गई हो गई।

अगले दिन परीक्षा में वो हमसे तीन-चार बेंच आगे बैठा था और दनादन नक़ल किए जा रहा था। परीक्षा के दौरान कमरे में उड़न दस्ता आया – और ख़ास बात यह है कि ये लोग भी देखते ही पहचान जाते हैं कि कौन नक़लती है, केवल शक़्ल देख कर ही। मानो पहुँचे हुए संत हों और चेहरा देख कर ही आगत-अनागत सब समझ जाते हों। तो उनमें से एक खूंसठ-सा दिखने वाला मास्टर पुत्तन की ओर बढ़ा, उसे अपनी ओर बढ़ते हुए देख कर पुत्तन के होश फ़ाख्ता हो गए। लेकिन पुत्तन भी मंझा हुआ खिलाड़ी था, ऐंवईं नहीं था, खेला-खाया था। जल्दी से पर्चिर्यों को गुड़ी-मुड़ी करके एक छोटी गोली बनाई और खा गया और इस तरह बच भी गया। हालाँकि इसके बाद वह एक भी सवाल हल नहीं कर पाया और कापी पर बस चील-बिलौए बनाता रहा। अब बताइए कि यह काम ज़्यादा मुश्किल है या फिर पढ़ाई करके उत्तीर्ण होना।

पुत्तन की ये हरकत देख कर हम अचम्भित रह गए। लेकिन ये तो कुछ भी नहीं है, नक़लचियों ने न जाने कितने नए-नए तरीक़े इजाद कर रखे हैं। एक लड़का हमारे पास ही बैठता था और शक़्ल से निहायत ही भोला-भाला शरीफ़ बांका गबरू नौजवान दिखाई देता था। हालाँकि गबरू नौजवान तो था, लेकिन हमारे बाक़ी सोचे गए विशेषण सब-के-सब ग़लत साबित हुए। वो बॉल-पेन के अन्दर खर्रे घुसा के लाता था। हमने सुना है कि आज़ादी से पहले पूर्वी बंगाल में ऐसा बेहतरीन मलमल का कपड़ा बनता था, कि एक माचिस की डिब्बी में से पूरी-की-पूरी मलमल की साड़ी निकल आती थी। पहले हमें इस बात पर यक़ीन नहीं होता था। लेकिन जब उस लड़के के पेन के अन्दर से दस्ते के दस्ते काग़ज़ निकलते देखे, तो उन पुरानी सुनी-सुनाई बातों पर भी यक़ीन हो गया। किसी ने हमें बताया कि मुंह में मोमिया दबाकर उसके अन्दर नक़ल कैसे छिपाई जाए, तो कोई छुपाने के इस गुह्य कार्य के लिए अपने अधोवस्त्रों का इस्तेमाल करने की सलाह देता मिला। ऐसी मौलिक सोच पढ़ने-लिखने वालों में नहीं होती है। नक़लची जिस शिद्दत से नई-नई नक़ल की विधियाँ खोजते रहते हैं, उसका मुक़ाबला तो वैज्ञानिक भी नहीं कर सकते हैं।

और दूसरे सभी क्षेत्रों की तरह नक़ल में भी वही मात खाते हैं, वही पिटते हैं, वही पकड़े चाते हैं; जो या तो पुराने तरीक़ों पर ही अटकें हों, रुढिवादी परंपरागत ढ़र्रे पर पुराने तरीक़ों से नक़ल कर रहे हों। या फिर नौसीखिए, जिनमें नक़ल के तजुर्बे की अभी काफ़ी कमी है। अब मेरे ही कमरे में एक पकड़ा गया। वो मूर्ख था और इसीलिए पकड़ा भी जाना चाहिए था। नक़ल का वही एजओल्ड तरीक़ा, वह मूढ़ अपने जूतों में खर्रे छिपा कर लाया था। इसी तरह एक मूरख अपनी बाहों पर कुछ फ़ॉर्मूले लिख कर लाया था और पकड़ा गया। बाद में पुत्तन से इस बाबत बात हुई, उसका मानना है ऐसे लोगों का पकड़ा जाना नक़ल की कला के विकास के लिए निहायत ज़रूरी है। ये सब बच के निकल गए तो नक़ल के नए तरीक़ो की खोज को गहरा धक्का लगेगा। इस दौरान बहुत-से नौसीखिए भी देखने को मिले, जो सामने टीचर को देखकर घबरा जाते हैं और उनका चेहरा देखकर ही टीचर की समझ में आ जाता है कि छोकरा नक़ल कर रहा है। ऐसे लोगों का तो एक ही इलाज है – अभ्यास। जैसे-जैसे ये लोग इम्तिहान देते जाएंगे, अपने आप ही पक्के घड़े हो जाएंगे।

फिर अगर कोई बार-बार टॉइलेट जा रहा हो, तो समझना चाहिए कि वह पक्का नक़लची है। इम्तेहान के वक़्त बड़े-से-बड़ा पुस्तकालय भी टॉयलेट से रश्क़ खाता है। वहाँ किताबों की किताबें, पर्चियों की पर्चियाँ, नोट्स के नोट्स – सभी कुछ बहुतायत में पाए जा सकते हैं। वो तो हमारे पुराने कुसंस्कार थे कि हम वहाँ किसी भी चीज़ को उठा नहीं पाए, अगर कोई होशियार होता तो काग़ज़ो को उठा बाइंड करवा कर बेचता और चार-पाँच हज़ार तो आराम से कमा ही सकता था।

जब पूरी कक्षा में नक़ल धड़ल्ले से चल रही हो, तो हमारे जैसे लोग सबसे बेचारों की श्रेणी में आते हैं। हाल में ऐसा ही वाक़या हुआ, जिसके बाद हमें अपनी नालायकी पर बहुत ग़ुस्सा आया। हुआ यूं कि हमें एक प्रश्न नहीं आ रहा था और हमारे नक़लची पड़ोसी को खर्रा देव की कृपा से वो सवाल आता था। वैसे तो हमारी आँखें सिक्स-बाई-सिक्स हैं, लेकिन नक़ल के नाम से इतनी घबराहट होती है कि दिखना बन्द हो जाता है। उसने अपनी कापी थोड़ी-सी हमारी ओर सरकाई और पन्ना ऐसे पकड़ा कि उसका काम भी दनादन चलता रहे और हमारी नैया भी पार हो जाए। लेकिन नहीं, घबराहट के मारे हमें कुछ दिखता ही नहीं था कि अल्फ़ा बना है या बीटा, डिफ़्रेंशिएट किया है या इंटीग्रेट। दरअसल यह बचपन के कुसंस्कारों का ही दुष्परिणाम है। बचपन में हमारे कस्बे में एक नोटबुक बिकती थी, जिसके पीछे पट्ठे पर लिखा रहता था –

नक़ल हमेशा होती है, बराबरी कभी नहीं
सुन्दर लेखन का सपना, सपना ब्रांड कापियाँ हमेशा ख़रीदें

लगता है इसकी पहली पंक्ति का बहुत गहरा दुष्प्रभाव हमारे मन पर पड़ा। हालाँकि दूसरी पंक्ति का कोई ख़ास असर नहीं हुआ, क्योंकि हम दूसरे ब्रांड की कापियाँ भी बदस्तूर ख़रीदते रहे। ऐसे लोगों के बारे में यानी कि हम जैसे लोगों के बारे में हमने जब पुत्तन से जानना चाहा कि क्या हो सकता है ऐसों का, तो उसने ज्ञानी की तरह मुखमुद्रा बना कर कहा – ऐसे निकम्मे, नालायक और पढ़ाकू उल्लुओं का कुछ नहीं हो सकता, इन्हें नक़ल के दीन-धरम का अधिकार नहीं है। बस, हम मायूस हो गए कि बंदा कहता तो सही ही है। हमारे मुंह से बस इतना ही निकला – आसां नहीं है नक़लची होना भी।
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