Monday, May 22, 2006

आरक्षण पर मेरी मीमांसा

मण्डल के दौर के बाद आरक्षण एक बार फिर सुर्ख़ियों में है। देश में हर जगह कोई आरक्षण के समर्थन में तो कोई आरक्षण के विरोध में धरने-प्रदर्शन कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आरक्षण से ‘दलित-उत्थान’ हो सकता है?

क्या दूसरी ग़लती से पहली ग़लती को सुधारा जा सकता है?

माना कि सवर्णों ने अतीत में दलितों पर बहुत अत्याचार किए थे। ये सब दुष्कृत्य इसलिए किए गए क्योंकि कुछ लोग विशेषाधिकार चाहते थे, वे दूसरों की तुलना में ख़ास सुविधाएँ पाना चाहते थे। यही वजह है कि उन्हानें आम जनता पर तरह-तरह की रोक लगा कर (जैसे वेदों के अध्ययन पर पाबन्दी आदि) अपनी ताक़त और विशेषाधिकार की अनैतिक इच्छाओं को पूरा किया।

लेकिन जो काम पहले उच्च जातियों के कुछ लोगों ने किया, यानी कि उन्होंने जन साधारण की अपेक्षा विशेष अधिकार प्राप्त किए; ठीक वही काम फिर से हो रहा है, लेकिन इस बार इसे उल्टी दिशा में किया जा रहा है। अब ख़ास अधिकार दिए जा रहे हैं उन जातियों को, जिन्हें पहले दबाया गया था। जहाँ होना यह चाहिए था कि ‘समता-मूलक समाज’ के लिए सभी जातियों को समान अधिकार और समान अवसर दिए जाने चाहिए थे, एक बार फिर उसी पुरानी भूल को दुहराया गया और कुछ जातियों से विशेषाधिकारों को छीन कर अन्य जातियों को दे दिए गए।

आरक्षण का परिणाम

पुराना रोग जस-का-तस रहा, बस उसका उद्गम बदल गया। विशेषाधिकार भले ही सवर्णों के पास से दलितों के पास पहुँच गया, लेकिन समाज की देह तो व्याधिग्रस्त ही रही। इस समस्या को दूर करने के लिए इसकी यथार्थ मीमांसा तो नहीं की गई, बल्कि आरक्षण का विषबुझा तीर और व्याधिग्रस्त देह में मार दिया गया।

आरक्षण का वही फल हुआ जो कि सीधे तौर पर होना ही था, यानि की जातियों के बीच द्वेष और संघर्ष में इज़ाफ़ा। पहले से ही हज़ार सालों की विदेशी ग़ुलामी से जर्जर हुआ समाज और ज़्यादा क्षत-विक्षत होने की कग़ार पर पहुँच गया है। हालांकि ऐसा नहीं है कि आरक्षण से कुछ लाभ ही न हुआ हो, लेकिन अपेक्षाकृत रूप से नुक़सान कहीं ज़्यादा हुआ है। आरक्षण अपने वर्तमान स्वरूप में ‘पिछड़े वर्ग’ को आगे बढ़ाने का सबसे अशक्त और विध्वंसपूर्ण माध्यम है।

आरक्षण की असली वजह

आरक्षण का वास्तविक कारण है राजनेताओं की क़ुर्सी पर चिपके रहने की लालसा, न कि दलितों का उत्थान करना। राजनेता अपने निहित स्वार्थों को साधने के लिए दलितों का प्रयोग एक वोट बैंक की तरह करना चाहते हैं और अतीत में वे ऐसा करते भी रहे हैं। दरअसल राजनेता दलितों की प्रगति चाहते ही नहीं है; क्योंकि ऐसा होने पर उनका मज़बूत वोट बैंक, जो उनके लिए सत्ता की चाबी है, उनके हाथों से खिसक जाएगा। इसलिए उन्होंने एक ऐसा रास्ता निकाला है, जिससे समाज को बाँट कर दलित वोट बैंक का इस्तेमाल ख़ुद के पक्ष में किया जा सके। ‘आरक्षण’ से बेहतर विकल्पों पर ध्यान न देने का मुख्यत: यही कारण है।

क्या राजनेता आरक्षण को कभी हटाना चाहेंगे?

संविधान में आरक्षण का प्रावधान सिर्फ़ दस सालों के लिए था, लेकिन यह आज तक क्यों बरक़रार है? क्या आज से दस सालों के बाद भी राजनेता इसे ख़त्म करना चाहेंगे? क़तई नहीं, क्योंकि आरक्षण समाप्त होते ही आधे से ज़्यादा राजनीतिक दलों का भी अन्त हो जाएगा। जितने भी दल जातिवाद की राजनीति कर रहे हैं, उनके अस्तित्व का मूल ही वर्ण संघर्ष है। वर्गों के बीच यदि संघर्ष ख़त्म हो जाए, तो इन दलों का आधार भी ध्वस्त हो जाएगा। महज़ सत्ता-लोलुपता के चलते ये दल जानबूझ कर आरक्षण और प्रकारान्त से जातीय संघर्ष को बढ़ावा दे रहे हैं। इसलिए राजनेता हर सम्भव कोशिश कर आरक्षण को दीर्घतम समय तक लागू रखना चाहेंगे।

सवर्णों को क्या करना चाहिए?

इस समय जब कि आरक्षण-विरोध की आग पूरे देश में धधक रही है, ऐसे में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। सबसे ज़रूरी है कि सवर्ण अपनी मध्ययुगीन मानसिकता को दफ़्न करके दलितों की भावनाओं को समझने का यत्न करें। सवर्णों को यह अनुभव करना होगा कि दलित भी हमारे ही अंग हैं, वे हमारा ही मांस, मेद, अस्थि और मज्जा हैं। उनकी ही कमर्ण्यता और अथक परिश्रम शताब्दियों तक राष्ट्र को अन्न-वस्त्र देती रही हैं। हज़ार सालों तक सवर्णों ने उन्हीं की योग्यता का लाभ लिया और उन्हें ही ‘दलित’ बना दिया।

इसलिए अब कुछ उत्तरदायित्व सवर्णों को भी लेना होगा। राजनेताओं द्वारा समाज को तोड़ने की कोशिशों पर पानी फेरने के लिए कुछ बलिदान करना होगा और इसलिए आरक्षण को भी स्वीकार करना होगा? आरक्षण का विरोध दलितों को यह ग़लत सन्देश दे रहा है कि यह सवर्णों द्वारा दलितों के विकास का विरोध है, हालांकि सवर्णों की यह मंशा नहीं है। अत: इस विरोध को बन्द करके दलितों के उत्थान का प्राणपण से प्रयत्न करना होगा। भले ही ऐसा करना पहले-पहल अव्यावहारिक लगे, लेकिन इसके अलावा अब कोई उपाय नहीं है। भले ही यह सवर्णों को ज़हर पीने की तरह लगे, लेकिन विष का घूंट पीकर भी अपने ही भाईयों के उत्थान का मार्ग प्रशस्त करना होगा। साथ ही आरक्षण के विकल्पों पर काम करने की ज़रूरत है, ताकि शोषित तबका स्वयं कहे कि आरक्षण की कोई आवश्यकता नहीं है।

आरक्षण का विकल्प

आरक्षण का विकल्प है – शिक्षा। सभी को बिना उसकी जाति पूछे श्रेष्ठतम आरम्भिक शिक्षा दी जानी चाहिए। हर व्यक्ति को इतना मज़बूत बनाना होगा, ताकि उसे आरक्षण की बैसाखियों की ज़रूरत ही न रहे। साथ ही यह शिक्षा ऐसी हो, जो केवल भौतिक न होकर जीवन के सभी आयामों को पोषित करे। अगर शिक्षा के स्वरूप को लेकर मैं अपना अभिप्राय व्यक्त करूंगा तो एक और प्रविष्टि बन जाएगी, जोकि अभी वांछित नहीं है। इसलिए संक्षेप में, शिक्षा के द्वारा ही आरक्षण को जड़ से मिटाया जा सकता है। इस दिशा में अभी काफ़ी काम करने की ज़रूरत है।

Saturday, May 20, 2006

आदर्शवादिता का दौरा

कुछ समय पहले मैंने काफ़ी जद्दोजहद के बाद ‘लर्निंग लाइसेंस’ बनवा लिया था, लेकिन अब उसकी छ: महीने की मियाद भी ख़त्म होने को आ गयी थी। मरता क्या न करता, इसलिए ‘पर्मानेंट ड्राइविंग लाइसेंस’ बनवाने के लिए मैं एक बार फिर आरटीओ दफ़्तर पहुँचा। हालांकि यह बात मुझे अच्छी तरह मालूम थी, कि बिना ‘चाय-पानी’ मेरा काम होना मुश्किल ही नहीं बल्कि नामुमकिन है; लेकिन फिर भी मैंने सोचा कि कोशिश करने में क्या हर्ज़ है। सो पहले एक लम्बा-चौड़ा फ़ॉर्म लेकर उसे भरा, अपनी ढ़ेर सारी तस्वीरें उस पर जगह-जगह चिपकाईं, साथ में ‘बर्थ प्रूफ़’ वगैरह कम-से-कम आधा किलो काग़ज़-पत्तर साथ में लगाए और इस पुलिन्दे को लेकर ‘बाबू’ के पास पहुँच गया। अच्छा, इन सरकारी बाबुओं से भयंकर प्राणी आपको पूरी दुनिया में और कहीं नहीं मिलेंगे। अगर इन्सान को बाबू और डायनोसोर के बीच में खड़ा कर दिया जाए और कहा जाए कि इनमें से एक की तरफ़ जाना है, तो अक़्लमंदी इसी में है कि डायनोसोर की ओर जाया जाए। लेकिन इस बाबत तजुर्बे की कमी थी, इसलिए मैं बाबू के पास चला गया।

पुराना-सा सफ़ारी सूट, एक-आध किलो तैल लगा कर चपटे-चपटे कंग़ी किए हुए बाल, होठों के एक किनारे से पान की टपकती हुई पीक, सामने मेज़ पर रखा चमड़े का चौकोर झोला – ‘देखने में तो क़तई ख़तरनाक नहीं है, उल्टे बेचारा-सा और लग रहा है। लोग नाहक ही बदनाम करते हैं।’, मैंने मन-ही-मन सोचा और अपने काग़ज़ मेज़ पर आगे सरका दिए। उसने मुझे घूर कर ऐसे देखा मानो मैंने उसके रंग में भंग डाल दिया हो और वो मुझे हड्डियों समेत कच्चा चबा जाएगा, हालांकि वह खाली बैठा हुआ केवल चाय की चुस्कियाँ ले रहा था। फिर उसने बड़े ही अनमने ढंग से फ़ॉर्म उलट-पलट के देखा।

‘‘तुम्हाए कागज पूरे नहीं हैं।’’
‘‘क्यों, क्या कमी है?’’
‘‘ऐडारेस वेरिफिकसन कहाँ है?’’
‘‘ये क्या होता है?’’
‘‘अरे, घर-वर कहाँ है, कौन जाने? कछु तो चइए।’’
‘‘पहले लगा चुका हूँ ‘लर्निंग’ के वक़्त।’’
‘‘पहले खाना खाया था, आगे से फिर कभी नहीं खावेगा?’’
‘‘अच्छा, अभी लाता हूँ।’’
‘‘जे फारम उठा ले जाओ मेज पै से।’’
‘‘ठीक है।’’

अब मुझे मालूम पड़ा कि लोग नाहक ही नहीं कहते, ‘बाबू’ है ही कोई ख़तरनाक प्रजाति। फिर मैं जेठ की भरी दोपहर में १०-१२ किमी वापस अपने घर गया और ज़रूरी काग़ज़ ले कर आया। रास्ते में मैं सोच रहा था – चलो, ये तो आगरा है और सब पास-पास है। महानगरों में बाबुओं के चंगुल में फँसने पर क्या होता होगा?

कहते हैं न कि ‘जब किस्मत महरबान, तो गधा पहलवान’, लेकिन इसका उल्टा भी उतना ही सच है। यानि कि जब किस्मत ख़राब हो तो पहलवान भी गधा बन जाता है। और मेरी हालत भी कुछ वैसी ही होने वाली थी। मैं जब ज़रूरी काग़ज़ात लेकर वहाँ फिर से पहुँचा, तो ‘बाबू’ अपनी क़ुर्सी के अन्तर्ध्यान हो चुके थे। ‘अब काम कल होगा’, चपरासी ने बताया। लेकिन तभी वहाँ खड़े किसी सज्जन ने बताया कि ‘छिपी टोले’ में एक कैम्प लगा है, जहाँ लाइसेंस बनाए जा रहे हैं। मैं भी ढूंढता-ढांढता छिपी टोले पहुँच गया नि:शुल्क कैम्प में। अन्तर्ध्यान हुए ‘बाबू’ एक बार फिर दिखाई दिए, यहाँ वे ही लाइसेंस बना रहे थे।

आवेदकों की क़तार को देख कर मेरे पसीने छूट गए, कम-से-कम एक-आध किलोमीटर लम्बी तो रही ही होगी। या फिर यूँ कह लीजिए कि यह तो दिख रहा था कि शुरू कहाँ से हो रही है; लेकिन ख़त्म कहाँ हो रही है, कुछ कहा नहीं जा सकता था। लेकिन भारत में समझदार हर काम जुगाड़ से करते हैं, ‘चाय-पानी’ देकर लाइसेंस तुरन्त पाया जा सकता था। काफ़ी लोग अपनी समझदारी का परिचय भी दे रहे थे। एक बार को मैंने भी सोचा कि ४०० रु. दे कर पिण्ड छुड़ाया जाए, लेकिन अचानक मुझे ‘आदर्शवादिता का दौरा’ पड़ा। यह दौरा दमे और मिर्गी के दौरे से भी ज़्यादा ख़तरनाक होता है और अगर जल्दी ही इसका इलाज न कराया जाए, तो आगे चल कर प्राणघातक भी सिद्ध हो सकता है। आदर्शवादिता के दौरे के चलते मैं शाम तक क़तार में खड़ा रहा, लेकिन लगता है कि आज ही मेरे ऊपर साढ़े साती शुरू हुई थी। जैसे ही मेरी बारी आने को थी, बाबू ने अपना ताम-झाम समेटते हुए घोषणा की कि कैम्प ख़त्म हो गया है और कल बेलन गंज में कैम्प लगेगा।

चिलचिलाती धूप में खड़े-खड़े मेरी हालत खस्ता हो चुकी थी और चित्र-विचित्र प्रकार की वे सारी गालियाँ जो मैंने अपनी ज़िन्दगी में कभी भी, कहीं भी सुनी थीं; न चाहते हुए भी मेरे मन में आ रही थीं। मन-ही-मन बुदबुदाता हुआ मैं अपने घर की ओर चला; इस उम्मीद के साथ कि कल चाहे जो कुछ हो जाए, मैं ड्राइविंग लाइसेंसे बनवा के रहूंगा। अब, देखते हैं कि कल क्या होता है? भगवान से प्रार्थना है कि कल ‘आदर्शवादिता के दौरे’ से वो मेरी रक्षा करे।

Tuesday, May 16, 2006

Wrong Use of Devanagari in Hindi

हिन्दी में देवनागरी का ग़लत प्रयोग

देवनागरी लिपि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह वैज्ञानिक आधार पर टिकी हुई है। लेकिन हिन्दी में हो रहे इसके ग़लत प्रयोग के चलते यह लिपि अपनी वैज्ञानिकता खोती जा रही है। इनमें से अधिकांश तथ्यों के बारे में मुझे भी कुछ वक़्त पहले तक पता नहीं था।

‘ऋ’ का दोषपूर्ण उच्चारण
ऐसा लगता है कि ‘ऋ’ की सही ध्वनि से अधिकांश लोग अपरिचित हैं। ‘ऋ’ न तो ‘रु’ है और न ही ‘रि’, जैसा कई लोग समझते हैं। दरअसल ‘ऋ’ का सही उच्चारण ‘र्’ (आधा ‘र’) होता है। जैसे कि ऋतु का उच्चारण होगा र्+तु (Rtu), न कि रितु (Ritu)। अगर आप अभी ऋ नहीं बोल पा रहे हैं, तो थोड़े-से अभ्यास से बोलने लगेंगे। ठीक इसी तरह हम लोग प्राय: ‘ृ’ भी सही नहीं बोलते हैं; जैसे कि कृष्ण में, तृष्णा में आदि। ‘ृ’ का उच्चारण ‘ऋ’ से ही जुड़ा हुआ है। उदाहरण के तौर पर कृष्ण बोलने का सही तरीक़ा है क्+र्+ष्ण (Krshna), न कि क्रिष्ण (Krishna)। अब आप लोगों को ‘क्र’ और ‘कृ’ में शंका हो सकती है। इसलिये समझें, क्र=क्+र (Kra) और कृ=क्+र् (Kr)। चकरा गए न, वाक़ई थोड़ा मुश्किल तो शरू-शुरू में मेरे लिए भी था।

‘श’ और ‘ष’ के उच्चारण में अन्तर
देवनागरी लिपि के हर अक्षर का उच्चारण अपने आप में अद्वितीय होता है। लेकिन लगभग ९९ फ़ीसदी लोग ‘श’ और ‘ष’ का उच्चारण एक-सा ही करते हैं और उसमें फ़र्क नहीं जानते हैं। दरअसल ‘श’ और ‘ष’ में फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि ‘ष’ का उच्चारण प्रबल होता है, जबकि ‘श’ का उच्चारण अपेक्षाकृत कम प्रबल होता है। स, श और ष तीनों एक ही ध्वनि के क्रमश: प्रबल रूप हैं। हाँलाकि पढ़ कर इसे समझना काफ़ी कठिन है, इसलिये उदाहरण देना ज़रूरी हो जाता है। ‘ष’ का उच्चारण तो वही होता है, जो हम लोग आम तौर पर ‘श’ और ‘ष’ दोनों के लिए ही करते हैं, जैसे ‘शुक्ला जी’ का उच्चारण आजकल ‘षुक्ला जी’ किया जाता है। लेकिन ‘श’ का सही उच्चारण जानने के लिए वर्तमान भाजपा अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह के उच्चारण पर ग़ौर करें। राजनाथ सिंह आम तौर पर इन दोनों ही वर्णों का वह उच्चारण करते हैं, जो असल में ‘श’ का सही उच्चारण होता है।

ङ, ञ और ण आदि के प्रयोग का अभाव
हिन्दी वर्णमाला में व्यञ्जनों की क़तारों के ये ङ, ञ और ण आदि अक्षर बिल्कुल बेकार नहीं हैं। ज़्यादा क्या समझाऊँ, यह उदाहरण देखिए – अगर हमें देवनागरी में Congress लिखना है, तो हम आम तौर पर कांग्रेस लिख कर काम चला लेते हैं। लेकिन Congress में ‘क’ के बाद जो ‘ऑ’ चाहिए, वह हमें बिन्दु लगाने से नहीं मिल पाता है। यहाँ काम आता है ‘ङ’ का। कॉङ्ग्रेस लिखने पर हमें इसमें ‘ऑ’ की ध्वनि भी मिलेगी और ‘अं’ (अनुस्वार) भी मिल जाता है। इसलिए उच्चारण की दृष्टि से देवनागरी का ‘कॉङ्ग्रेस’ रोमन Congress के अधिक निकट होगा, न कि ‘कांग्रेस’।

संयुक्ताक्षरों का ग़लत उच्चारण
आम तौर पर ज़्यादातर लोग क्ष, द्य और ज्ञ आदि संयुक्ताक्षरों को ग़लत तरीक़े से बोलते हैं। ख़ासकर ‘ज्ञ’ को हमेशा ही त्रुटिपूर्ण बोला जाता है। इसे समझने का सबसे आसान तरीक़ा है, संधि की मदद से इनकी सही ध्वनि की पहचान। जैसे क्ष = क् + ष, द्य = द् + य और ज्ञ = ज् + ञ। ‘ज्ञ’ का विशुद्ध उच्चारण स्वामी रामदेव के मुंह से सुना जा सकता है।

अन्तिम अक्षर का हलन्त के बिना ही हलन्तमय उच्चारण
हिन्दी में हम ज़्यादातर शब्द के आख़िरी अक्षर का और कभी-कभी बीच के अक्षरों का उच्चारण हलन्त के साथ करते हैं, जबकि हलन्त लगाते ही नहीं हैं। जैसे ख़ुद ‘हलन्त’ शब्द को ही ले लीजिए, हिन्दी में प्राय: लिखते हैं ‘हलन्त’ जबकि देवनागरी के ठीक प्रयोग के हिसाब से होना चाहिए ‘हलन्त्’। ख़ास तौर पर हिन्दी सीख रहे विदेशियों को यह समस्या बड़ी परेशान करती है कि अक्षर का पूरा उच्चारण कहाँ होता है और आधा कहाँ? किसी हिन्दी सीखने वाले फ़ोरम पर (नाम याद नहीं) इस विषय पर काफ़ी लम्बा थ्रेड देखा जा सकता है।

नुक़्तों के समुचित प्रयोग का अभाव
अभी कुछ दिनों पहले तक ही मुझे नुक़्तों का उच्चारण ढंग से नहीं आता था, नया-नया सीखा है। आजकल अधिकांश लोग ‘फ’ और ‘फ़’ में, ‘ज’ और ‘ज़’ में, ‘क’ और ‘क़’ में, ‘ग’ और ‘ग़’ में, ‘ख’ और ‘ख़’ में अन्तर नहीं जानते हैं। साथ ही दोनों तरह के उच्चारणों के लिए एक ही नुक़्तारहित अक्षर का प्रयोग किया जाने लगा है, जो देवनागरी की वैज्ञानिक-प्रणाली के ख़िलाफ़ है। लेकिन सबसे ज़्यादा समस्या तब खड़ी होती है, जब लोग संस्कृत, पाली और प्राकृत आदि से आए शब्दों का उच्चारण नुक़्ते के साथ करते हैं। जैसे फल को फ़ल और फिर को फ़िर कहना व लिखना सरासर ग़लत है। अब हालत तो ऐसी हो गई है कि फूल, फल वाला मूल ‘फ’ तो लुप्त होने की कग़ार पर है और ‘फ़’ ने उसका स्थान ले लिया है। नुक़्तों का सही उच्चारण जानने के लिए कभी विख्यात गीतकार जावेद अख़्तर को ध्यान से सुनिए, अन्तर स्पष्ट हो जाएगा।

बिन्दु और चन्द्रबिन्दु में अन्तर
जब हम ‘अंगूर’ कहते हैं, तो वास्तव में उच्चारण ‘अङ्गूर’ का करते हैं। इसका मतलब है कि बिन्दु लगाने पर उस व्यंजन की पंक्ति के अन्तिम अक्षर (ङ, ञ, ण आदि) का उच्चारण करते हैं। जबकि चन्द्रबिन्दु लगाने पर ऐसा नहीं होता है। इसे समझना क़तई कठिन नहीं है। ‘अँ’ को बोलने की कोशिश करें, यही चन्द्रबिन्दु का उच्चारण होता है। जबकि बिन्दु का उच्चारण वर्णमाला के स्वरों (अ, आ, इ, ई ...) के ‘अं’ की भांति किया जाता है। हाँलाकि आजकल चन्द्रबिन्दु का चलन कम हो गया है, लेकिन बिन्दु और चन्द्रबिन्दु बड़ा फ़र्क पैदा कर सकते हैं। जैसे कि ‘हंस’ मतलब मानसरोवर वाला हंस पक्षी और ‘हँस’ मतलब हँसना।

बोलने और‍ लिखने में अन्तर
अब हिन्दी बोलने और उसे देवनागरी का उपयोग कर लिखने में काफ़ी अन्तर आ चुका है, जो देवनागरी को रोमन की तरह उच्चारण की भिन्नताओं की तरफ़ ले जा रहा है। जैसे – ‘महल’ को प्राय: ‘मैहल’ कहना, ‘कहना’ को ‘कैहना’ उच्चारित करना देवनागरी को आगे जा कर अवैज्ञानिक बना देगा।

Saturday, May 06, 2006

Send Free SMS: Software and Services for India

नि:शुल्क एसएमएस सॉफ़्टवेयर और सेवाएँ

इंटरनेट पर जितनी भी मुफ़्त एसएमएस सेवाएँ उपलब्ध हैं; उनमें से ज़्यादातर या तो रजिस्टर करने के बाद सबसे पहले आपका क्रेडिट कार्ड नम्बर मांगती हैं, या फिर उनसे एसएमएस भेजा तो जा सकता है लेकिन पहुँचता कहीं भी नहीं है। नीचे लिखी दोनों एसएमएस सेवाएँ इन कमियों से मुक्त हैं।

अगर आप भारत या विदेश में मुफ़्त एसएमएस भेजना चाहते हैं, तो इसके लिये ‘चिक्का’ नाम का यह सॉफ़्टवेयर काफ़ी उपयोगी साबित हो सकता है। इण्डिया टाइम्स डॉट कॉम द्वारा निर्मित ‘चिक्का’ किसी मैसेंजर की ही तरह दिखता है, जहाँ आप अपने मित्रों के मोबाइल नम्बरों की सूची बना सकते हैं। हाँलाकि इसमें यह दिक़्क़त है कि किसी नम्बर पर कुछ एसएमएस भेजने के बाद जब तक उस नम्बर से कम-से-कम किसी एक एसएमएस का ‘रिप्लाई’ नहीं आता, तब तक आप इस सॉफ़्टवेयर के ज़रिये उसे और एसएमएस नहीं भेज सकते।

दूसरी कारगर और मुफ़्त एसएमएस सेवा है – अतरो चतरो डॉट कॉम पर दी गयी मुफ़्त एसएमएस सेवा; जिससे भारत में कहीं भी मुफ़्त एसएमएस भेजा जा सकता है, लेकिन दिन में सिर्फ़ एक ही बार। अगर आप लोगों को किसी अन्य नि:शुल्क और कारगर एसएमएस सेवा के बारे में जानकारी हो, तो कृपया ज़रूर बताएँ।

Friday, May 05, 2006

मिस पप्पी

आजकल विज्ञापन-जगत् में जितनी मौलिकता और सृजनात्मकता देखने को मिल रही है, उतनी शायद ही और कहीं देखने को मिलती है। ऐसा जान पड़ता है कि हिन्दी सिनेमा तो हॉलीवुड की नक़ल करके ही चल रहा है, मौलिक काम का तो अकाल पड़ा हुआ है। हाँलाकि ‘इक़बाल’ और ‘पेज-थ्री’ सरीख़ी कुछ फ़िल्में हैं, लेकिन ये देश के ज़्यादातर शहरों में लगती ही नहीं हैं। महानगरों के कुछ मल्टीप्लेक्स ही इन्हें दिखाते हैं।

लेकिन इस मामले में विज्ञापन की दुनिया काफ़ी प्रगति कर रही है। ख़ास तौर पर जिन विज्ञापनों में भारतीय परिवेश और संगीत का इस्तेमाल किया गया है, वे बहुत ही जीवन्त बन पड़े हैं; जैसे फ़ेवीकॉल, मिण्टॉल फ़्रेश और क्लोरोमिण्ट आदि के विज्ञापन। अब क्लोरोमिंट का नया विज्ञापन ही लीजिए। पिछले विज्ञापन के ‘पान वाले’ से लेकर नये विज्ञापन की ‘मिस पप्पी’ तक सब समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि यह मत पूछो – लोग क्लोरोमिण्ट क्यों खाते हैं? बस खाए जाओ, पर यह जानने की कोशिश मत करो कि क्लोरोमिंट आख़िर क्यों खाएँ? साथ ही नये विज्ञापन में ठुमरी का प्रयोग इसमें जान फूँक देता है। देखें नया विज्ञापन –



पप्पी दर्पण के सामने खड़ी होकर खुद को निहारते हुए गाती है – ‘रूप की धनी हूँ मैं।’ पप्पी के‍ पिताजी ....





जो ईमारत के नीचे उसका इन्तज़ार कर रहे हैं, आवाज़ देते हैं – ‘पप्पी बेटा!’ उन्हें अनसुना करके पप्पी आगे गाती है – ‘प्रेम कली बनी हूँ मैं।’





नीचे खड़े उसकी माँ और दादी उसे पुकारते हैं। पप्पी कहती है – ‘इन्हें क्या पता, मेरे तो घर-घर पोस्टर लगेंगे।’





लिफ़्ट में अन्दर जाकर फिर गाना शुरू करती है – ‘सैंया मोरे गप्पी, देते नाहीं पप्पी...’, इतने में नीचे पड़ा क्लोरोमिण्ट का रैपर देख पप्पी कहती है....





‘लोग क्लोरोमिण्ट क्यों खाते हैं’ उसी पल लिफ़्ट में सब अजीबो-ग़रीब होने लगता है। लिफ़्ट की दोनों तरफ़ की दीवारें तेज़ी से पास आने लगती हैं और पप्पी उनके बीच दब जाती है। और जब लिफ़्ट का दरवाज़ा खुलता है...



तो वह एक पतले पोस्टर की तरह बन कर बाहर निकलती है। पप्पी की हालत देख कर पिताजी कहते हैं – ‘नाक कटवा दी’ और पप्पी का पोस्टर दीवार पर चिपका कर वहाँ से निकल लेते हैं। आख़िरकार विज्ञापन ख़त्म होता है इस पंक्ति के साथ – ‘दुबारा मत पूछना।’

Thursday, May 04, 2006

हँसना मना है ....

एक पुरोहित पुल पर से गुज़र रहा था। तभी उसने एक आदमी को पुल के बिल्कुल किनारे खड़ा देखा, वह पुल से कूदने ही वाला था।
पुरोहित दौड़ा और चिल्लाया, ‘‘रुको... ऐसा मत करो।’’
उसने पूछा, ‘‘क्यों?’’
‘‘क्योंकि इस दुनिया में ज़िन्दा रहने के बहुत से कारण हैं।’’
‘‘जैसे?’’
‘‘क्या तुम धार्मिक हो?’’
उसने कहा, ‘‘हाँ।’’ पुरोहित ने फिर कहा, ‘‘मैं भी धार्मिक हूँ। तुम हिन्दू हो या मुसलमान?’’
‘‘हिन्दू’’ ‘‘मैं भी, अच्छा तो तुम द्वैतवादी हो या अद्वैतवादी?’’
‘‘द्वैतवादी’’ ‘‘वाह... मैं भी, तुम साकार में विश्वास करते हो या निराकार में?’’
‘‘साकार में’’ ‘‘मैं भी, तुम शैव हो या वैष्णव?’’
‘‘वैष्णव’’ ‘‘मैं भी, तुम बल्लभाचार्य के सम्प्रदाय के हो या निम्बार्क सम्प्रदाय के?’’
‘‘बल्लभाचार्य’’ ‘‘मैं भी, बल्लभ संप्रदाय में तुम प्रथम शाखा में आस्था रखते हो या द्वितीय शाखा में’’
‘‘प्रथम शाखा में’’ ‘‘मैं भी, प्रथम शाखा के आधुनिक गुरूओं में शील प्रभुपाद को मानते हो या स्वामी निखिलानन्द को’’
‘‘शील प्रभुपाद को’’ ‘‘मैं भी, तुम गुरूमंत्र के रूप में ‘नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करते हो या ‘नारायणं नमस्कृत्य मन:....’ को जपते हो?’’
‘‘नारायणं नमस्कृत्य मन:.... का जप करता हूँ’’
‘‘क्या... ‘नारायणं नमस्कृत्य मन:’ का! तू मूढ़ पशु, तुझे जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।’’ और पुरोहित ने उसे पुल से धक्का दे दिया।

Wednesday, May 03, 2006

सबका अपना-अपना ‘स्‍टाइल’ है

आजकल टेलीविज़न पर मेरा पसन्‍दीदा कार्यक्रम है – द ग्रेट इण्डियन लाफ़्टर चैम्पियन्‍स। सास-बहू के रोने-धोने से दूर इस कार्यक्रम को देख आप दिल खोल कर हँस सकते हैं। इसमें कोई-न-कोई हर बार अलग-अलग अभिनेताओं की नक़ल करके ज़रूर दिखाता है। मेरे हिसाब से ऐसा इसलिये किया जा सकता है, क्‍योंकि हर अदाकार का अपना-अपना अन्‍दाज़ होता है।

जिस तरह हर अभिनेता की अपनी-अपनी स्‍टाइल होती है, ठीक उसी तरह हर दार्शनिक और आध्‍यात्मिक नेता का भी अपना ही ख़ास अन्‍दाज़-ए-बयां होता है। चाहे आप उनसे कोई भी प्रश्न क्‍यों न पूछिए, वे घूम-फिर कर अपने उसी एक केन्‍द्र पर आ जाते हैं।

कोई भी अजीबो-ग़रीब सवाल लीजिए, जैसे कि मान लीजिए प्रश्न है – हमें खर्राटे क्‍यों आते हैं और इससे छुटकारा पाने का क्‍या उपाय है? इस सीधे से सवाल का जवाब दार्शनिक घुमा-फिरा कर अपनी ही शैली में कैसे देते हैं, देखिए।

आचार्य श्री रजनीश के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। अगर यही प्रश्न आप ५ बार उनसे पूछेंगे, तो आपके दिमाग को चकरा देने वाले ५ भिन्‍न-भिन्‍न जवाब आपको मिलेंगे। वैसे, पहली बार सवाल किया है; तो निश्चित जानिये कि आपको बिल्‍कुल उल्‍टा उत्तर मिलेगा।
ओशो (Osho) – यह सवाल ही ग़लत है कि खर्राटों से छुटकारा कैसे पाया जाए। खर्राटे ही मनुष्‍य को परमचेतना से, सत्‍य से जोड़ते हैं। इसीलिये खर्राटे आते हैं, क्‍योंकि बिना चेतना के तादात्‍म्‍य के मनुष्‍य जीवित नहीं रह सकता। जागते समय हम मस्तिष्क और हृदय, इन दोनों चक्रों में ही रहते हैं; खर्राटा वह परम ध्‍वनि है, जो सोते समय गले में स्थित विशुद्धि चक्र से पैदा होकर नाक से होते हुए आज्ञाचक्र तक जाती है। इसीलिये तुम निद्रा के बाद गहन शान्ति का, परम आनन्‍द का अनुभव करते हो। अगर जाग्रत रहते हुए भी परम आनन्‍द चाहते हो, तो जागते हुए भी खर्राटे लेने का अभ्‍यास करो।

अब अगर किसी सवाल का उत्तर स्वामी विवेकानंद देंगे, तो बीच में ही आत्मा और उसकी महिमा ज़रूर घुस आएगी।
स्वामी विवेकानन्‍द (Swami Vivekananda) – हमने अपना नित्‍य मुक्त स्‍वभाव विस्‍मृत कर दिया है और स्वयं को देह मान बैठे हैं। इसलिये देह के विकारों को खुद के विकार समझते हैं। खर्राटे हमें नहीं आते, अपितु देह को आते हैं। हम नित्‍य तृप्त, अनन्त, सर्वशक्तिमान और पूर्ण आत्‍मा हैं – निरन्‍तर इसी भाव का चिन्‍तन करते रहो। आत्‍मसंस्‍थ हो और तुम जान जाओगे कि सिर्फ़ आत्‍मा का ही अस्तित्‍व है, देह का नहीं। अत: खर्राटे भी कल्‍पना मात्र है। वस्‍तुत: यही खर्राटों से छुटकारा है।

हाँलाकि रमण महर्षि से आपको अपने प्रश्न का उत्तर तो नहीं मिलेगा, लेकिन वो आपको सोचने के काम पर ज़रूर लगा देंगे।
रमण महर्षि (Raman Maharshi) – जानने का प्रयत्न करो खर्राटे किसे आते हैं? क्‍या खर्राटे तुम्‍हें ही आ रहे हैं या तुम्‍हारी सत्ता इस शरीर के परे भी है। यह ज्ञात हो जाना कि वास्तव में खर्राटे किसे आते हैं, इससे मुक्ति पाने का उपाय है।

जे कृष्णमूर्ति का एक ही सुर है – विचारों से किसी दिक्कत का समाधान नहीं होता। हर सवाल का जवाब ‘सोचने की शिक्षा’ से होते हुए अन्त में इसी सुर पर खत्‍म होगा।
जे कृष्णमूर्ति (J Krishnamurti) – हमें बचपन से यही शिक्षा मिली है, कि क्‍या सोचा जाए। लेकिन यह कभी भी नहीं सिखाया गया कि कैसे सोचा जाए। तुम किसी विशेषज्ञ से, मुझसे या अन्‍य किसी से इसका उत्तर जानना चाहते हो; लेकिन खुद चिन्‍तन नहीं करते। लगातार सतर्क रूप से अपने मस्तिष्क का अवलोकन करते रहो। तुम्‍हारे मस्तिष्क की गतिविधियाँ धीरे-धीरे खत्‍म होती जाएंगी और साथ ही तुम्‍हारी खर्राटों की और अन्‍य सारी समस्‍याएँ भी समाप्त हो जाएंगी।

वैसे तो सभी ईसाई प्रचारकों का यही अन्‍दाज़ होता है, लेकिन डॉ नॉर्मन विंसेंट पेल ने इस स्‍टाइल को ख़ासा लोकप्रिय बना दिया है।
नॉर्मन विंसेंट पेल (Norman Vincent Pale) – सकारात्‍मक सोच से सभी मुश्किलों पर विजय पायी जा सकती है। सकारात्‍मक भाव से अपनी आँखों में अश्रु भरकर प्रभु यीशू से प्रार्थना करो। वह तुम्‍हारी प्रार्थना ज़रूर सुनेगा और तुम्‍हारी समस्‍या को हल कर देगा। प्रभु के वचन दोहराते रहो – ‘‘यीशू और उनके शिष्‍य ‘पर्वत पर उपदेश’ के बाद शान्ति से सो गये।’’ (मैथ्‍यू 12/13) बाइबल के इस कथन को दोहराने से तुम्‍हें भी निद्रा में वही शान्ति प्राप्त होगी।
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