Thursday, May 04, 2006

हँसना मना है ....

एक पुरोहित पुल पर से गुज़र रहा था। तभी उसने एक आदमी को पुल के बिल्कुल किनारे खड़ा देखा, वह पुल से कूदने ही वाला था।
पुरोहित दौड़ा और चिल्लाया, ‘‘रुको... ऐसा मत करो।’’
उसने पूछा, ‘‘क्यों?’’
‘‘क्योंकि इस दुनिया में ज़िन्दा रहने के बहुत से कारण हैं।’’
‘‘जैसे?’’
‘‘क्या तुम धार्मिक हो?’’
उसने कहा, ‘‘हाँ।’’ पुरोहित ने फिर कहा, ‘‘मैं भी धार्मिक हूँ। तुम हिन्दू हो या मुसलमान?’’
‘‘हिन्दू’’ ‘‘मैं भी, अच्छा तो तुम द्वैतवादी हो या अद्वैतवादी?’’
‘‘द्वैतवादी’’ ‘‘वाह... मैं भी, तुम साकार में विश्वास करते हो या निराकार में?’’
‘‘साकार में’’ ‘‘मैं भी, तुम शैव हो या वैष्णव?’’
‘‘वैष्णव’’ ‘‘मैं भी, तुम बल्लभाचार्य के सम्प्रदाय के हो या निम्बार्क सम्प्रदाय के?’’
‘‘बल्लभाचार्य’’ ‘‘मैं भी, बल्लभ संप्रदाय में तुम प्रथम शाखा में आस्था रखते हो या द्वितीय शाखा में’’
‘‘प्रथम शाखा में’’ ‘‘मैं भी, प्रथम शाखा के आधुनिक गुरूओं में शील प्रभुपाद को मानते हो या स्वामी निखिलानन्द को’’
‘‘शील प्रभुपाद को’’ ‘‘मैं भी, तुम गुरूमंत्र के रूप में ‘नमो भगवते वासुदेवाय’ का जाप करते हो या ‘नारायणं नमस्कृत्य मन:....’ को जपते हो?’’
‘‘नारायणं नमस्कृत्य मन:.... का जप करता हूँ’’
‘‘क्या... ‘नारायणं नमस्कृत्य मन:’ का! तू मूढ़ पशु, तुझे जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।’’ और पुरोहित ने उसे पुल से धक्का दे दिया।

8 comments:

Sagar Chand Nahar said...

भाई मुस्कराने की छूट तो हे ना ...? :)

Laxmi N. Gupta said...

अच्छा लिखा है, प्रतीक जी। आज कल ऐसे ही न्याय से धर्मिक उग्रवादियों (fanatics) ने तय किया है कि जो उन्हीं की सोच का न हो उसे जीने का अधिकार नहीं है।

अनूप भार्गव said...

बहुत अच्छे प्रतीक जी ।
गुलज़ार साह्ब की एक त्रिवेणी याद आ रही है

आओ जबानें बाँट ले अपनी अपनी हम
न तुम सुनोगे बात , न हम को कुछ समझना है

दो अनपढों को कितनी मुहब्बत है अपने अदब से ..

namaste said...

हे, जो बचाने वाला था उसे अचानक क्या हो गया.
वैसे, शैव-वैष्णव से आगे तो मुझे पता नहीं था कि उतने छोटे-छोटे अंतर भी होते (या कभी हो सकते) हैं.

प्रतीक भाई, आप कभी "हँसना ज़रूरी है" भी लिखेंगे तो हम रिलीज़ का इंतज़ार करेंगे.

Pratik said...

सागर जी,
मुस्कराने की ही नहीं बल्कि हँसने की भी पूरी छूट है, लेकिन कुछ चिन्तन के साथ।

गुप्त जी,
आपने बिल्कुल सही पहचाना। यह धर्मान्धता उग्रवादियों में ही नहीं, बल्कि कई दफ़ा आम आदमियों में भी देखने को मिलती है। हाँ, उग्रवादियों की अपेक्षा धर्मान्धता की तीव्रता ऐसे लोगों में ज़रूर कुछ कमी होती है।

अनूप जी,
जान कर बहुत अच्छा लगा कि आपको यह प्रविष्टि पसन्द आयी है। गुलज़ार साहब की की इन पंक्तियों का बहुत ही समीचीन उल्लेख किया है।

मत्सु जी,
सम्प्रदायों में न जाने और कितने छोटे-छोटे अन्तर होते हैं। लेकिन न जाने क्यों लोग इन छोटे अन्तरों को अपने मन में इतना बड़ा बना लेते हैं।

रजनीश मंगला said...

प्रतीक, बहुत मज़ा आया पढ़कर

ई-छाया said...

अच्छा लिखा है प्रतीक भाई

Naresh said...

बहुत अच्छा लिखा है आपने प्रतीक भाई।

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