Monday, May 22, 2006

आरक्षण पर मेरी मीमांसा

मण्डल के दौर के बाद आरक्षण एक बार फिर सुर्ख़ियों में है। देश में हर जगह कोई आरक्षण के समर्थन में तो कोई आरक्षण के विरोध में धरने-प्रदर्शन कर रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या आरक्षण से ‘दलित-उत्थान’ हो सकता है?

क्या दूसरी ग़लती से पहली ग़लती को सुधारा जा सकता है?

माना कि सवर्णों ने अतीत में दलितों पर बहुत अत्याचार किए थे। ये सब दुष्कृत्य इसलिए किए गए क्योंकि कुछ लोग विशेषाधिकार चाहते थे, वे दूसरों की तुलना में ख़ास सुविधाएँ पाना चाहते थे। यही वजह है कि उन्हानें आम जनता पर तरह-तरह की रोक लगा कर (जैसे वेदों के अध्ययन पर पाबन्दी आदि) अपनी ताक़त और विशेषाधिकार की अनैतिक इच्छाओं को पूरा किया।

लेकिन जो काम पहले उच्च जातियों के कुछ लोगों ने किया, यानी कि उन्होंने जन साधारण की अपेक्षा विशेष अधिकार प्राप्त किए; ठीक वही काम फिर से हो रहा है, लेकिन इस बार इसे उल्टी दिशा में किया जा रहा है। अब ख़ास अधिकार दिए जा रहे हैं उन जातियों को, जिन्हें पहले दबाया गया था। जहाँ होना यह चाहिए था कि ‘समता-मूलक समाज’ के लिए सभी जातियों को समान अधिकार और समान अवसर दिए जाने चाहिए थे, एक बार फिर उसी पुरानी भूल को दुहराया गया और कुछ जातियों से विशेषाधिकारों को छीन कर अन्य जातियों को दे दिए गए।

आरक्षण का परिणाम

पुराना रोग जस-का-तस रहा, बस उसका उद्गम बदल गया। विशेषाधिकार भले ही सवर्णों के पास से दलितों के पास पहुँच गया, लेकिन समाज की देह तो व्याधिग्रस्त ही रही। इस समस्या को दूर करने के लिए इसकी यथार्थ मीमांसा तो नहीं की गई, बल्कि आरक्षण का विषबुझा तीर और व्याधिग्रस्त देह में मार दिया गया।

आरक्षण का वही फल हुआ जो कि सीधे तौर पर होना ही था, यानि की जातियों के बीच द्वेष और संघर्ष में इज़ाफ़ा। पहले से ही हज़ार सालों की विदेशी ग़ुलामी से जर्जर हुआ समाज और ज़्यादा क्षत-विक्षत होने की कग़ार पर पहुँच गया है। हालांकि ऐसा नहीं है कि आरक्षण से कुछ लाभ ही न हुआ हो, लेकिन अपेक्षाकृत रूप से नुक़सान कहीं ज़्यादा हुआ है। आरक्षण अपने वर्तमान स्वरूप में ‘पिछड़े वर्ग’ को आगे बढ़ाने का सबसे अशक्त और विध्वंसपूर्ण माध्यम है।

आरक्षण की असली वजह

आरक्षण का वास्तविक कारण है राजनेताओं की क़ुर्सी पर चिपके रहने की लालसा, न कि दलितों का उत्थान करना। राजनेता अपने निहित स्वार्थों को साधने के लिए दलितों का प्रयोग एक वोट बैंक की तरह करना चाहते हैं और अतीत में वे ऐसा करते भी रहे हैं। दरअसल राजनेता दलितों की प्रगति चाहते ही नहीं है; क्योंकि ऐसा होने पर उनका मज़बूत वोट बैंक, जो उनके लिए सत्ता की चाबी है, उनके हाथों से खिसक जाएगा। इसलिए उन्होंने एक ऐसा रास्ता निकाला है, जिससे समाज को बाँट कर दलित वोट बैंक का इस्तेमाल ख़ुद के पक्ष में किया जा सके। ‘आरक्षण’ से बेहतर विकल्पों पर ध्यान न देने का मुख्यत: यही कारण है।

क्या राजनेता आरक्षण को कभी हटाना चाहेंगे?

संविधान में आरक्षण का प्रावधान सिर्फ़ दस सालों के लिए था, लेकिन यह आज तक क्यों बरक़रार है? क्या आज से दस सालों के बाद भी राजनेता इसे ख़त्म करना चाहेंगे? क़तई नहीं, क्योंकि आरक्षण समाप्त होते ही आधे से ज़्यादा राजनीतिक दलों का भी अन्त हो जाएगा। जितने भी दल जातिवाद की राजनीति कर रहे हैं, उनके अस्तित्व का मूल ही वर्ण संघर्ष है। वर्गों के बीच यदि संघर्ष ख़त्म हो जाए, तो इन दलों का आधार भी ध्वस्त हो जाएगा। महज़ सत्ता-लोलुपता के चलते ये दल जानबूझ कर आरक्षण और प्रकारान्त से जातीय संघर्ष को बढ़ावा दे रहे हैं। इसलिए राजनेता हर सम्भव कोशिश कर आरक्षण को दीर्घतम समय तक लागू रखना चाहेंगे।

सवर्णों को क्या करना चाहिए?

इस समय जब कि आरक्षण-विरोध की आग पूरे देश में धधक रही है, ऐसे में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। सबसे ज़रूरी है कि सवर्ण अपनी मध्ययुगीन मानसिकता को दफ़्न करके दलितों की भावनाओं को समझने का यत्न करें। सवर्णों को यह अनुभव करना होगा कि दलित भी हमारे ही अंग हैं, वे हमारा ही मांस, मेद, अस्थि और मज्जा हैं। उनकी ही कमर्ण्यता और अथक परिश्रम शताब्दियों तक राष्ट्र को अन्न-वस्त्र देती रही हैं। हज़ार सालों तक सवर्णों ने उन्हीं की योग्यता का लाभ लिया और उन्हें ही ‘दलित’ बना दिया।

इसलिए अब कुछ उत्तरदायित्व सवर्णों को भी लेना होगा। राजनेताओं द्वारा समाज को तोड़ने की कोशिशों पर पानी फेरने के लिए कुछ बलिदान करना होगा और इसलिए आरक्षण को भी स्वीकार करना होगा? आरक्षण का विरोध दलितों को यह ग़लत सन्देश दे रहा है कि यह सवर्णों द्वारा दलितों के विकास का विरोध है, हालांकि सवर्णों की यह मंशा नहीं है। अत: इस विरोध को बन्द करके दलितों के उत्थान का प्राणपण से प्रयत्न करना होगा। भले ही ऐसा करना पहले-पहल अव्यावहारिक लगे, लेकिन इसके अलावा अब कोई उपाय नहीं है। भले ही यह सवर्णों को ज़हर पीने की तरह लगे, लेकिन विष का घूंट पीकर भी अपने ही भाईयों के उत्थान का मार्ग प्रशस्त करना होगा। साथ ही आरक्षण के विकल्पों पर काम करने की ज़रूरत है, ताकि शोषित तबका स्वयं कहे कि आरक्षण की कोई आवश्यकता नहीं है।

आरक्षण का विकल्प

आरक्षण का विकल्प है – शिक्षा। सभी को बिना उसकी जाति पूछे श्रेष्ठतम आरम्भिक शिक्षा दी जानी चाहिए। हर व्यक्ति को इतना मज़बूत बनाना होगा, ताकि उसे आरक्षण की बैसाखियों की ज़रूरत ही न रहे। साथ ही यह शिक्षा ऐसी हो, जो केवल भौतिक न होकर जीवन के सभी आयामों को पोषित करे। अगर शिक्षा के स्वरूप को लेकर मैं अपना अभिप्राय व्यक्त करूंगा तो एक और प्रविष्टि बन जाएगी, जोकि अभी वांछित नहीं है। इसलिए संक्षेप में, शिक्षा के द्वारा ही आरक्षण को जड़ से मिटाया जा सकता है। इस दिशा में अभी काफ़ी काम करने की ज़रूरत है।

12 comments:

Chandan said...
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रजनीश मंगला said...

बहुत अच्छे प्रतीक। तुम प्रतीक पांडे ही हो न। मैं कन्फ़ुजिया रहा हूँ।

Srijan Shilpi said...

जहाँ तक वर्ग संघर्ष की बात है, इस सदी में यह होना अवश्यंभावी है। राजनेता हमारे समाज के ही प्रतिनिधि होते हैं और राजनीति में वही मुद्दे हावी होते हैं जो समाज के लिए संवेदनशील होते हैं। आरक्षण के संदर्भ में मेरा मूल प्रश्न यह है कि आप संविधान के प्रावधानों को ईमानदारी से लागू किए जाने का विरोध कैसे कर सकते हैं।

Manish said...

अच्छा लगा प्रतीक कि तुमने भावनाओं को संतुलित रखते हुये इस समस्या के बारे में अपने विचार प्रकत किये हैं ।

Udan Tashtari said...

गंभीर विषय पर बडा सधा हुआ विचार प्रदर्शन, बधाई.

ई-छाया said...

वाह प्रतीक,
बहुत अच्छा लिखा है, मेरा शुभाषीश।

युगल मेहरा said...

बहुत अच्छे विचार प्रकट किये गये हैं।
((उनकी ही कमर्ण्यता और अथक परिश्रम शताब्दियों तक राष्ट्र को अन्न-वस्त्र देती रही हैं। हज़ार सालों तक सवर्णों ने उन्हीं की योग्यता का लाभ लिया और उन्हें ही ‘दलित’ बना दिया।))
सवर्णों को क्या करना चाहिये, अत्यंत सुन्दर लिखा है।

Lallan Singh alias Prashant said...

प्रतीक भाई, बहुत अच्छा लिखा है आपने। और आपके उर्दू ब्लाग से तो मैं और भी ज़्यादा प्रभावित हुआ। फोड़ दिया है प्राजी आपने।

वस्तविकता यह है कि अपना अलग हिन्दी ब्लाग बनाने के लिये आपके कमेन्ट ने मुझे काफ़ी प्रेरित किया, वह, जो आप मेरे ब्लाग पर लिख कर आये थे।

मिलते हैं ब्रेक के बाद्।

Abhishek said...

हृदय की गहराईयों से निकले यह वचन निश्चय ही पाठक को मोहित कर पाने मे सक्षम हैं। लिखते रहिये ।
--
अभिषेक त्रिपाठी
www.theplanetcalls.com

electronicmedia said...

Hello, I am bhavya,an electronic media journalist, currently working wih Janmat.Actually I want to meet you.I was trying from last two years to get the CSDS fellowship.Unfortunately I am not well deserved.From last one year I am in media analysis, specially electronic.Hope you contact me soon.

Bhavya
9811150743
www.electronicmedia.blogsource.com

Pratik said...

चन्दन जी, आरक्षण पर मेरे विचारों से सहमति व्यक्त करने के लिए धन्यवाद।

रजनीश भाई, काहे कन्फ़्यूजिया रहे हो। कभी-कभी हम भी अक़ल का इस्तेमाल कर लेते हैं। :-)

सृजन शिल्पी जी, वर्ग संघर्ष को मैं अवश्यंभावी नहीं मानता हूँ। मेरा मानना है कि अगर विवेकसम्मत उपाय किए जाएँ, तो इससे बचा जा सकता है। ऐसा होना भी चाहिए, क्योंकि संघर्ष इस समाज को और भी तोड़ देगा। जहाँ तक संवैधानिक प्रावधानों की बात है, ऐसा नहीं कहा जा सकता कि वे बिल्कुल सही हैं। सत्तालोलुप राजनेता समय-समय पर अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए संविधान में संशोधन करते रहे हैं, याद कीजिए शाहबानो का मुद्दा और उस वक़्त क्या किया गया।

मनीष भाई, मेरे ख़्यालात को पसंद करने और उनसे रज़ामन्दी जताने के लिए बहुत-बहुत शुक्रिया।

समीर जी, मेरी तुच्छ कोशिश की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।

ई-शैडो जी, उत्साहवर्धन के लिए आपका बहुत आभारी हूँ।

युगल भाई, हाँलाकि आरक्षण को लेकर आपके और मेरे विचार काफ़ी भिन्न हैं। लेकिन फिर भी आपने मेरे विचारों की तारीफ़ कर वैचारिक सहिष्णुता का परिचय दिया है। धन्यवाद।

लल्लन जी, मेरे चिट्ठे देखने के लिए शुक्रिया। उम्मीद है आप अपना चिट्ठा भी जल्दी ही शुरू करेंगे।

अभिषेक भाई, आपकी टिप्पणी और उससे भी ज़्यादा टिप्पणी में इस्तेमाल की गयी साहित्यिक भाषा ने मुझे बहुत प्रभावित किया। टिप्पणी और मेरे चिट्ठे की कड़ी देने के लिए धन्यवाद।

भव्य जी, मेरा चिट्ठा देखने के लिए शुक्रिया। जल्दी ही आपसे सम्पर्क करूंगा।

Neeraj said...

कई दिन हो गए.. आगे क्या.. कुछ आगे भी लिखो. यूं ब्लॉग पर बासी भोजन परोसोगे क्या. आपका परिचय और कार्यक्षेत्र के बारे में विस्तार से मैं कैसे जान सकता हूं, कृपया बताएं.

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