Tuesday, May 16, 2006

Wrong Use of Devanagari in Hindi

हिन्दी में देवनागरी का ग़लत प्रयोग

देवनागरी लिपि की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह वैज्ञानिक आधार पर टिकी हुई है। लेकिन हिन्दी में हो रहे इसके ग़लत प्रयोग के चलते यह लिपि अपनी वैज्ञानिकता खोती जा रही है। इनमें से अधिकांश तथ्यों के बारे में मुझे भी कुछ वक़्त पहले तक पता नहीं था।

‘ऋ’ का दोषपूर्ण उच्चारण
ऐसा लगता है कि ‘ऋ’ की सही ध्वनि से अधिकांश लोग अपरिचित हैं। ‘ऋ’ न तो ‘रु’ है और न ही ‘रि’, जैसा कई लोग समझते हैं। दरअसल ‘ऋ’ का सही उच्चारण ‘र्’ (आधा ‘र’) होता है। जैसे कि ऋतु का उच्चारण होगा र्+तु (Rtu), न कि रितु (Ritu)। अगर आप अभी ऋ नहीं बोल पा रहे हैं, तो थोड़े-से अभ्यास से बोलने लगेंगे। ठीक इसी तरह हम लोग प्राय: ‘ृ’ भी सही नहीं बोलते हैं; जैसे कि कृष्ण में, तृष्णा में आदि। ‘ृ’ का उच्चारण ‘ऋ’ से ही जुड़ा हुआ है। उदाहरण के तौर पर कृष्ण बोलने का सही तरीक़ा है क्+र्+ष्ण (Krshna), न कि क्रिष्ण (Krishna)। अब आप लोगों को ‘क्र’ और ‘कृ’ में शंका हो सकती है। इसलिये समझें, क्र=क्+र (Kra) और कृ=क्+र् (Kr)। चकरा गए न, वाक़ई थोड़ा मुश्किल तो शरू-शुरू में मेरे लिए भी था।

‘श’ और ‘ष’ के उच्चारण में अन्तर
देवनागरी लिपि के हर अक्षर का उच्चारण अपने आप में अद्वितीय होता है। लेकिन लगभग ९९ फ़ीसदी लोग ‘श’ और ‘ष’ का उच्चारण एक-सा ही करते हैं और उसमें फ़र्क नहीं जानते हैं। दरअसल ‘श’ और ‘ष’ में फ़र्क सिर्फ़ इतना है कि ‘ष’ का उच्चारण प्रबल होता है, जबकि ‘श’ का उच्चारण अपेक्षाकृत कम प्रबल होता है। स, श और ष तीनों एक ही ध्वनि के क्रमश: प्रबल रूप हैं। हाँलाकि पढ़ कर इसे समझना काफ़ी कठिन है, इसलिये उदाहरण देना ज़रूरी हो जाता है। ‘ष’ का उच्चारण तो वही होता है, जो हम लोग आम तौर पर ‘श’ और ‘ष’ दोनों के लिए ही करते हैं, जैसे ‘शुक्ला जी’ का उच्चारण आजकल ‘षुक्ला जी’ किया जाता है। लेकिन ‘श’ का सही उच्चारण जानने के लिए वर्तमान भाजपा अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह के उच्चारण पर ग़ौर करें। राजनाथ सिंह आम तौर पर इन दोनों ही वर्णों का वह उच्चारण करते हैं, जो असल में ‘श’ का सही उच्चारण होता है।

ङ, ञ और ण आदि के प्रयोग का अभाव
हिन्दी वर्णमाला में व्यञ्जनों की क़तारों के ये ङ, ञ और ण आदि अक्षर बिल्कुल बेकार नहीं हैं। ज़्यादा क्या समझाऊँ, यह उदाहरण देखिए – अगर हमें देवनागरी में Congress लिखना है, तो हम आम तौर पर कांग्रेस लिख कर काम चला लेते हैं। लेकिन Congress में ‘क’ के बाद जो ‘ऑ’ चाहिए, वह हमें बिन्दु लगाने से नहीं मिल पाता है। यहाँ काम आता है ‘ङ’ का। कॉङ्ग्रेस लिखने पर हमें इसमें ‘ऑ’ की ध्वनि भी मिलेगी और ‘अं’ (अनुस्वार) भी मिल जाता है। इसलिए उच्चारण की दृष्टि से देवनागरी का ‘कॉङ्ग्रेस’ रोमन Congress के अधिक निकट होगा, न कि ‘कांग्रेस’।

संयुक्ताक्षरों का ग़लत उच्चारण
आम तौर पर ज़्यादातर लोग क्ष, द्य और ज्ञ आदि संयुक्ताक्षरों को ग़लत तरीक़े से बोलते हैं। ख़ासकर ‘ज्ञ’ को हमेशा ही त्रुटिपूर्ण बोला जाता है। इसे समझने का सबसे आसान तरीक़ा है, संधि की मदद से इनकी सही ध्वनि की पहचान। जैसे क्ष = क् + ष, द्य = द् + य और ज्ञ = ज् + ञ। ‘ज्ञ’ का विशुद्ध उच्चारण स्वामी रामदेव के मुंह से सुना जा सकता है।

अन्तिम अक्षर का हलन्त के बिना ही हलन्तमय उच्चारण
हिन्दी में हम ज़्यादातर शब्द के आख़िरी अक्षर का और कभी-कभी बीच के अक्षरों का उच्चारण हलन्त के साथ करते हैं, जबकि हलन्त लगाते ही नहीं हैं। जैसे ख़ुद ‘हलन्त’ शब्द को ही ले लीजिए, हिन्दी में प्राय: लिखते हैं ‘हलन्त’ जबकि देवनागरी के ठीक प्रयोग के हिसाब से होना चाहिए ‘हलन्त्’। ख़ास तौर पर हिन्दी सीख रहे विदेशियों को यह समस्या बड़ी परेशान करती है कि अक्षर का पूरा उच्चारण कहाँ होता है और आधा कहाँ? किसी हिन्दी सीखने वाले फ़ोरम पर (नाम याद नहीं) इस विषय पर काफ़ी लम्बा थ्रेड देखा जा सकता है।

नुक़्तों के समुचित प्रयोग का अभाव
अभी कुछ दिनों पहले तक ही मुझे नुक़्तों का उच्चारण ढंग से नहीं आता था, नया-नया सीखा है। आजकल अधिकांश लोग ‘फ’ और ‘फ़’ में, ‘ज’ और ‘ज़’ में, ‘क’ और ‘क़’ में, ‘ग’ और ‘ग़’ में, ‘ख’ और ‘ख़’ में अन्तर नहीं जानते हैं। साथ ही दोनों तरह के उच्चारणों के लिए एक ही नुक़्तारहित अक्षर का प्रयोग किया जाने लगा है, जो देवनागरी की वैज्ञानिक-प्रणाली के ख़िलाफ़ है। लेकिन सबसे ज़्यादा समस्या तब खड़ी होती है, जब लोग संस्कृत, पाली और प्राकृत आदि से आए शब्दों का उच्चारण नुक़्ते के साथ करते हैं। जैसे फल को फ़ल और फिर को फ़िर कहना व लिखना सरासर ग़लत है। अब हालत तो ऐसी हो गई है कि फूल, फल वाला मूल ‘फ’ तो लुप्त होने की कग़ार पर है और ‘फ़’ ने उसका स्थान ले लिया है। नुक़्तों का सही उच्चारण जानने के लिए कभी विख्यात गीतकार जावेद अख़्तर को ध्यान से सुनिए, अन्तर स्पष्ट हो जाएगा।

बिन्दु और चन्द्रबिन्दु में अन्तर
जब हम ‘अंगूर’ कहते हैं, तो वास्तव में उच्चारण ‘अङ्गूर’ का करते हैं। इसका मतलब है कि बिन्दु लगाने पर उस व्यंजन की पंक्ति के अन्तिम अक्षर (ङ, ञ, ण आदि) का उच्चारण करते हैं। जबकि चन्द्रबिन्दु लगाने पर ऐसा नहीं होता है। इसे समझना क़तई कठिन नहीं है। ‘अँ’ को बोलने की कोशिश करें, यही चन्द्रबिन्दु का उच्चारण होता है। जबकि बिन्दु का उच्चारण वर्णमाला के स्वरों (अ, आ, इ, ई ...) के ‘अं’ की भांति किया जाता है। हाँलाकि आजकल चन्द्रबिन्दु का चलन कम हो गया है, लेकिन बिन्दु और चन्द्रबिन्दु बड़ा फ़र्क पैदा कर सकते हैं। जैसे कि ‘हंस’ मतलब मानसरोवर वाला हंस पक्षी और ‘हँस’ मतलब हँसना।

बोलने और‍ लिखने में अन्तर
अब हिन्दी बोलने और उसे देवनागरी का उपयोग कर लिखने में काफ़ी अन्तर आ चुका है, जो देवनागरी को रोमन की तरह उच्चारण की भिन्नताओं की तरफ़ ले जा रहा है। जैसे – ‘महल’ को प्राय: ‘मैहल’ कहना, ‘कहना’ को ‘कैहना’ उच्चारित करना देवनागरी को आगे जा कर अवैज्ञानिक बना देगा।

25 comments:

RC Mishra said...

ज्ञान वर्धक जानकारी के लिये धन्यवाद,
कृपया 'लिपी' के स्थान पर 'लिपि' का प्रयोग करें

उन्मुक्त said...

धन्यवाद, कई चीजे पता चली|

क्षितिज said...

दुर्भाग्यवश यह हालात सिर्फ़ हिन्दी और देवनागरी तक ही सीमित नहीं है। मैं ऐसे बहुत कम लोगों को जानता हूं जो कि किसी भी भाषा, जिसे वे बोलचाल में प्रयोग करते हैं, की बारीकियों को समझते हों। चाहे वे बारीकियां व्याकरण से संबंधित हो या उच्चारण से। सही जानकारी या तो सिर्फ़ भाषाविदों या फिर भाषा सीख रहे विद्यार्थियों को होती है। हालांकि मेरा अनुभव यह है कि किसी नई भाषा को सीखते समय अपनी मातृभाषा के बारे में बहुत सी बाते समझ में आ जाती हैं।

Udan Tashtari said...

बात तो सही है.

समीर

आशीष said...

बहुत बहुत धन्यवाद ऐसी ज्ञानवर्धक जानकारी के लिये.
'श' और 'ष' के अंतर के लिये मेरा नाम 'आशीष' एक अच्छा उदाहरण है।

Pankaj Bengani said...

अमूल्य जानकारी दी प्रतिक. पर मै हिन्दी को इतनी कठीन बनाए रखने के पक्ष मे नही हुँ. जब हमे ही असुविधा होती है तो जो विदेशी हिन्दी सिख रहे हैं, उनकी हालत तो और भी खराब होगी. हिन्दी मे इतना तामझाम नही होना चाहिए. तीन स, श और ष भी ना होकर एक ही होना चाहिए. और भी जितनी सरल हो सके उतना अच्छा है.

Kumar Chetan said...

bhai mere besharmi se bhare chithe par teeka tippni ke liye dil se dhanyawad. ya aise kahen.
main aapka hriday se dhanyawaad karta hoon. aur sach me aap ke chithe ne to ankhen khol di. kripya mera marg darshan karen, main sirf roman lip ka prayog kar paata hoon, mere paas windows 2000 pro hai aur devnaagri lipi padh sakta hoon, par tankan kaise karun is ka gyan nahi, kripya thodi sahayata karen
fir se dhanyawaad aur shukriya aur thanks

Sagar Chand Nahar said...

ज्ञान वर्धक जानकारी के लिये धन्यवाद,
पंकज भाई,
"स", "श", और "ष" की बजाय एक ही स लिखा जाये तो मेरे नाम का उच्चारण कैसे करेंगे, सागर, शागर या "षागर". एक ही शब्द को अलग अलग तरीके से लिखा जाय यही ठीक है, सोचिये अगर आपके नाम में बेंगानी की बजाय बेंघानी लिखा जाय तो कैसा अजीब लगेगा।
कुछ समय पहले आपके अहमदाबाद के ही अजय दयाल जी देसाई ने हिन्दी और गुजराती में सुधार के लिये कुछ सुझाव दिये आपको याद होंगे, कितने हास्यास्पद और अजीब थे। मसलन "उपयोगी" शब्द को लिखने के लिये अ के नीचे उ कि मात्रा लगा कर लिखना आदि, मैने उनके जालस्थल की कड़ी मेरे चिठ्ठे में भी दी थी। एक बार फ़िर से देखिये।
http://sagarnahar.blogspot.com/2006/03/blog-post_28.html#links

namaste said...

अच्छी जानकारी है, प्रतीक जी.
और थैंक्स कहूँगा कि आपके इस लेख से आजकल की हिंदी के बारे में मुझे कुछ जानने को मिल गया.

वैसे लेख में दो बातें मेरी समझ में साफ़ नहीं आ रही हैं.
1.‘ज्ञ’ का विशुद्ध उच्चारण
क्या इसका मतलब है कि "gya" नहीं, "jna" की तरह बोलना?
2.‘कहना’ को ‘कैहना’ उच्चारित करना
क्या "ऐह" उच्चारण का मतलब कि "अह(ah)" को "ऍह(eh)" की तरह बोलना? या "ऍह" से फिर बदलकर "ऐह"(æh)?

(अगर कहीं ग़लतफ़हमी कर रहा हूँ तो क्षमा करें.)

रजनीश मंगला said...

प्रतीक, हिन्दी उच्चारण के बारे में ऐसी विस्तृत जानकारी के लिए धन्यवाद। लेकिन इतने से बात अच्छी तरह समझ नहीं आती कि उसे प्रेक्टीकल रूप दिया जा सके। मैं एक सुझाव दूँगा। क्यों न इन उच्चारणों को बोल कर एक एमपीथ्री में रेकार्ड करके डाला जाए, एक ट्युटोरियल की तरह? का बोलत हो?

हेमन्त कुमार said...

प्रतीक जी, अमूल्य जानकारी के लिये बहुत-बहुत धन्यवाद| बिल्कुल सही बताया आप ने|
हमारी हिन्दी भाषा का क्या भविष्य है| कभी हिन्दी भाषा हमारी मात् भाषा मानी जाती थी| लेकिन आज कल लोग जैसे भूल गये हैं कि हिन्दी भी कोई भाषा है|

अगर ऎसे ही चलता रहा तो कुछ साल बाद हिन्दी भाषा का अस्तितव ही नहीं रहेगा|

Jagdish Bhatia said...

उच्चारण का अन्तर स्थानिय बोलियों के असर के कारण भी होता है जैसे पँजाब, राजस्थान और गुजरात में पानी को पाणी बोला जाता है।

SHUAIB said...

प्रतीक भाई दिल करता है मैं आपको उस्ताद जी कह कर बुलाऊँ और बहुत बहुत धन्यवाद ऐसी ज्ञानवर्धक जानकारी के लिये। ये लेख आप ने खास तौर पर मुझ जैसों के लिए ही लिखा है और रजनीश मंगला भाई ने ठीक कहा, हिन्दी में ऐसे बहुत सारे शब्द हैं जिनहें मैं न तो लिख सकता न बोल सकता हूं। क्रिपया आगे भी इसी विशे पर लिखते रहें। एक बार फिर धन्यवाद आपका।

Pratik said...

मिश्र जी,
वर्तनी की ग़लती इंगित करने के लिए शक्रिया।

उन्मुक्त जी,
आपको यह लेख उपयोगी लगा, यह जानकर ख़ुशी हुई।

क्षितिज जी,
आपने सही कहा कि बहुत कम लोग ही भाषा की बा‍रीकियों को समझते हैं। यहाँ तक कि मैं भी इन तथ्यों से हालही में अवगत हुआ हूँ।

समीर लाल जी,
आपको मेरी बात सही लगी, इसके लिए धन्यवाद।

आशीष भाई,
आपने तो तथ्यों को तुरन्त आत्मसात कर एक अच्छा उदाहरण भी दे दिया। :-)

पंकज भाई,
आपके प्रश्न का उत्तर तो मुझसे पहले सागर चन्द जी ने ही दे‍ दिया।

कुमार चेतन जी,
मुझे धन्यवाद, शुक्रिया और थैंक्स कहने के लिए आपका आभारी हूँ। हाँलाकि मैं इस लायक नहीं हूँ। मैंने आपके समस्या का जवाब आपको ई-मेल कर दिया है, कृपया देखें। उम्मीद है शीघ्र ही आपका हिन्दी ब्लॉग भी हम सभी को पढ़ने को मिलेगा।

सागर चन्द जी,
पंकज भाई के सवाल का बिल्कुल दुरुस्त जवाब दिया है आपने।

मत्सु जी,
जल्द ही मैं आपको ई-मेल भेज कर आपकी शंकाओं का समाधान करने की कोशिश करता हूँ।

रजनीश भाई,
सही कह रहे हो, पढ़ कर सही उच्चारण आसानी समझ में नहीं आता है। मुझे आपका विचार पसन्द आया, एमपीथ्री में सही उच्चारण रिकॉर्ड करने से लोग अपेक्षाकृत आसानी से समझ सकेंगे।

शुऐब भाई,
मुझे उस्ताद न कहो, अभी तो मैं ख़ुद सीख रहा हूँ। वैसे भी यह लेख मैंने इसलिये लिखा, ताकि जो मैंने सीखा है उसे संरक्षित कर सकूं और दूसरों को भी बता सकूं। आपको लेख अच्छा लगा, यह जानकर बेहद ख़ुशी हुई।

Pratik said...

हेमन्त भाई,
जब आपके और मेरे जैसे लोग हिन्दी में ब्लॉग लिखने लगें हैं और इस विषय पर चिन्तन कर रहे हैं, तो अब ज़्यादा चिन्तित होने की ज़रूरत नहीं है।

जगदीश जी,
आपकी बात बिल्कुल सही है। लेकिन मेरे कहने का मतलब सिर्फ़ इतना है कि जो बोला जाता है, वही लिखा जाना चाहिए। अगर 'पाणी' बोला जा रहा है तो वही लिखना भी चाहिए, न कि कुछ और।

Anonymous said...

Excellent. I don't have Hindi keyboard with me so excuse me for writing in English.

Anonymous said...

प्रतीक जी,

आप का यह लेख मुझे बहुत पसंद आया। देवनागरी के उपयोग में जितनी ग़लतियाँ आपने बताई हैं, इस सभी के बारे में मैं भी काफ़ी लोगों को बताता रहता हूँ। सबसे ज़्यादा ग़ुस्सा तो मुझे नुक्ता के दुरउपयोग पर आता है - जहाँ नुकता नहीं होनी चाहिए वहाँ लोग डाल देते हैं - जहाँ होनी चाहिए वहाँ तो बिल्कुल नहीं डालते और क, ख, ग के नीचे नुक्ता आ सकता है - यह बात तो बहुत लोग जानते ही नहीं है - न यह जानते हैं कि इन अक्षरों का सही उच्चारण क्या है। आप का लेख बहुत अच्छा है।

Hindi Blogger said...

भाई माफ़ करना, देर से प्रतिक्रिया दे रहा हूँ. बहुत ही बढ़िया विषय चुना और क्या ख़ूब लिखा. धन्यवाद ज्ञानवर्द्धन के लिए.

Raag said...

बेहतरीन लेख। मैं स्वयं को हिन्दी भाषा में अत्यदिक निपुण समझता था। अब सत्य का सामना हुआ।

Hariraam said...

http://cmwiki.sarai.net/index.php/SpellCheck
पर एक मुक्त स्रोत हिन्दी वर्तनी शोधक सॉफ्टवेयर के विकास हेतु प्रयास चल रहा है। यहाँ अपने सुझाव दें।
मैंने कुछ सुझाव
http://cmwiki.sarai.net/index.php/AspellPansari
पर दिए हैं। कृपया पढ़ें और अपने विचार व्यक्त करें।

जोगलिखी संजय पटेल की said...

सबसे बडी़ बात है अपनी ज़ुबान के लिये सतर्कता रखना.क्या लिख रहे हैं..क्या बोल रहे हैं.उर्दू बोलने का चलन बढ़ता जा रहा है ..भाई सबसे पहले मातृ-भाषा को तो समझ लें...गजल बोलते हैं...तो ग़ज़ल का मज़ा कैसे आएगा.मातृ-भाषा और मात्र भाषा फ़र्क भी तो अभी तक नहीं जान पाए हम. और किसी भाई ने प्रतिक्रिया में ठीक लिखा है के बोलने में अपने अंचल का असर तो दिखता ही है.मेरे शहर इन्दौर में आम आदमी ऐसा बोलता नज़र आता है..मुलाहिज़ा फ़रमाएं:

मे (मै) भोपाल जाराउ (जा रहा हूँ )मेने (मैने) पेसे (पैसे) रख लिये हे (है) आपने (आप) चाँय (चाय)पीकर के (पी कर ) जाना.मेने (मैने) आपसे किया (कहा) था कि अगले (पिछले)साल मे (मै)आपसे मिला था.आपने कहा था कि काम अभी पेंण्डिग हेगा (है)

तो आपने बहुत अच्छा किया कि इस विषय को छेड़ा.संभव है हमारी -आपकी कोशिशों से कुछ अच्छे परिणाम सामने आएं.ब्लाँग्स भी ख़ूब लिखे जा रहे हैं इन दिनो तो एक सुझाव अपने देवाशीष जी या रवि रतलामी जी से यह भी है कि किसी एक भाषा जानकार को यह ज़िम्मेदारी देना चाहिये कि वह विभिन्न ब्लाँग्स पर ऩज़र रखे और और बाक़ायदा किसी एक ब्लाँग पर एक स्तंभ में ग़लतियों को रेखांकित किया जाए ..इसमें किसी को बुरा भी नहीं मानना चाहिये .इससे ही भाषा में सुधार की पहल होगी.चिठ्ठाकारों को चाहिये कि वे [यदि ख़र्च वहन कर सकते हों तो]अपने संकलन में श्री अरविंद कुमार का समांतर कोश और उ.प्र.साहित्य अकादमी का उर्दू-हिन्दी शब्द कोश [क़ीमत रू.100/-]ज़रूर रखें.ध्यान रहे कि हिन्दी का स्पैल-चेक आने अभी काफ़ी वक़्त लग सकता है और ख़ाकसार का मशवरा यह है कि स्पैल-चेक आ जाने की बाद भी शब्द-कोश का उपयोग भाषा प्रेमियों के लिये अनिवार्य है.

sooham said...

Loved it.

I was complaining about this deterioration for half a century,
(ten years less), you took the bull by the horns...superb.

By now all channels are using the hard intonations of Urdu words wrongly like "Jalil" for "Zalil"
"Khatra" for "Khh(hard)atra",
Katra for Qatra.

How do you correct the TV channels, which are surrogate teachers!

nk

suyash.suprabh said...

हिंदी वर्तनी की गलतियों के बारे में इतनी अच्छी जानकारी देकर आपने हिंदी लिखने वाले अनेक लोगों की शंकाओं का समाधान किया है।

क्या आप मुझे निम्नलिखित शब्दों के प्रयोग से संबंधित जानकारी प्रदान करेंगे?

1. हालाँकि, हाँलाकि
2. अंतर्राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय

पवन said...

धन्यवाद जानकारी के लिए।
र को तो व्यञ्जन और स्वर का मिश्रत रुप माना जाता है लेकिन व्यञ्जन की श्रेणी में रखा जाता है, ये तो ठी है। ऋ भी शुद्ध स्वर नहीं लेकिन इसे तो स्वरों में शामिल किया गया हैं, फिर इसका उच्चारण र् कैसा होगा?

Dr. Chetan Bhandari said...

Sarahniya hai.....

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