Thursday, June 29, 2006

सांस्कृतिक चेतना का पतन

हालही में मैं दिल्ली गया था। घूमने-फिरने के मक़सद से वहाँ मैं एक मॉल में गया। घुसते ही ऐसा जान पड़ा मानो मैं भारत में नहीं, बल्कि अमेरिका या ब्रिटेन में हूँ। पूरे मॉल में मुझे कहीं भी देवनागरी अक्षर लिखे नहीं दिखाई दिए। सब कुछ अंग्रेज़ी में ही लिखा था। इतना ही होता तो भी कोई बात नहीं थी, लेकिन ग़ौर किया तो पाया कि कई लोग आपस में भी अंग्रेज़ी में बातचीत कर रहे हैं।

भाषा तो संस्कृति की वाहक मात्र है। क्या यह स्थिति हमारे सांस्कृतिक पतन को नहीं दिखलाती है? संस्कृति जिन घटकों से मिलकर बनती है, वे सभी धीरे-धीरे हमारे द्वारा परित्यक्त होते जा रहे हैं और मुझे ऐसा लगता है कि हम नक़ल की संस्कृति को स्वेच्छा से ढो रहे हैं।

संस्कृति की विशिष्टताओं की रक्षा करते हुए उसे विकसित करने की बात तो दूर रही, हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर सहेज भी नहीं पा रहे हैं। हमें अपनी संस्कृति के उपादानों का इस्तेमाल लज्जास्पद लगता है। आज गाँवों में भी ज़्यादातर लोग शर्ट-पेण्ट पहने दिखाई देंगे। भारतीय वेश-भूषा अपने ही देश में विलुप्त होने की कग़ार पर है। जहाँ एक ओर ज़्यादातर देशों के राजपरिधान भारतीय वस्त्रों से प्रेरित हैं और भारतीय परिधानों की ही तरह उनमें क्रमवार पटलियाँ गिराने की कोशिश होती है, वहीं हिन्दुस्तानियों को ये कपड़े पहनने में शर्म महसूस होती है।

हालाँकि संगीत में मेरी कोई ख़ास गति नहीं है, लेकिन रुचि ज़रूर है। इसलिए कुछ एक संगीतज्ञों से मिलना-जुलना भी है। उनमें से एक से संगीत पर मेरी चर्चा हो रही थी। उन्होंने बताया कि पिछले ५०० वर्षों से भारतीय संगीत में कोई ख़ास विकास नहीं हुआ है। ५०० साल पहले वह जैसा था, आज भी कमोबेश वैसे-का-वैसा ही है। भारतीय संगीत की उन्नति ठप है, क्योंकि अपने ही संगीत में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है।

बौद्ध काल में भारतीय शिल्पकला ने जिन ऊँचाईयों को छूआ था, वहाँ पहुँचना तो लगभग नामुमकिन है। लेकिन हमारा शिल्प इस समय बिल्कुल भाव-शून्य और बेढंगा है। यूरोपीय शिल्प की नक़ल करने के चक्कर में न घर के रहे न घाट के। ये पतन के चिह्न हर जगह मौजूद हैं, जहाँ नज़र उठाइए वहीं दिख जाते हैं। यहाँ तक कि हमारा साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। सभी इस बात से भली-भांति वाकिफ़ हैं कि हिन्दी साहित्य की कितनी दुर्दशा है। हिन्दी साहित्य अंग्रेज़ी बेस्टसेलर्स के पैरों तले दब कर चीत्कार कर रहा है, लेकिन शायद ही कोई सुनने वाला है। इसे पढ़ने वाले भी दिनों-दिन घटते जा रहे हैं। प्रेमचन्द भले ही कुछ लोग पढ़ लें, लेकिन वे भी समकालीन साहित्य से अनजान हैं। इतना ही नहीं, हिन्दी साहित्य और रोना-धोना लगभग एक ही चीज़ हो गए हैं। शायद ऐसा होना कुछ हद तक स्वाभाविक भी है, यह हज़ार सालों की ग़लामी का प्रतिफल है। नाटक और दार्शनिक काव्य आदि अनेक विधाओं के मामले में तो हिन्दी साहित्य रेगिस्तान की तरह है। हिन्दी साहित्यिक परिदृश्य में किसी भी दूसरी यूरोपीय भाषा के मुक़ाबले बहुत कम विविधता है। वैज्ञानिक साहित्य को तो छोड़ ही दीजिए, भारतीय भाषाओं में इसका नामोनिशान भी मुश्किल से मिलता है।

भाषा उन कुछ आख़िरी सांस्कृतिक सूत्रों में से है, जो अभी तक जीवन्त हैं। लेकिन यह सूत्र भी धीरे-धीरे हमारे हाथों से निकलता जा रहा है। हिन्दी को समृद्ध करना न केवल हिन्दी-प्रेम के लिए ज़रूरी है, बल्कि मृतप्राय संस्कृति में फिर से प्राण फूँकने का यह सबसे सरल रास्ता है। हर राष्ट्र का एक व्यक्तित्व होता है, जो उसकी संस्कृति के माध्यम से व्यक्त होता है। संसार का इतिहास यह बताता है कि केवल वही राष्ट्र ऊपर उठ सके, जिनका सांस्कृतिक व्यक्तित्व अपनी विशिष्टताओं को सहेजे रहा और इसी के साथ उन्होनें पूरे‍ विश्व की सांस्कृतिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त किया। यूरोप में अगर देखें तो प्राचीन यूनान और रोम इसके उदाहरण हैं। बाद में वही यूनानी संस्कृति पूरे यूरोप में पुनर्जागरण (रेनेसां) का मूल रही। उसने यूरोपीय कला, साहित्य और चिन्तन को प्राचीन यूनानी भावों के आधुनिक रंग में रंग दिया। यह एक विचित्र लेकिन प्राणदायी ‘आधुनिक प्राचीनता’ थी।

यहाँ भारत में भी इसी तत्व की ज़रूरत है। प्राचीन उच्च भावों को आधुनिकता के अनुकूल बनाकर फिर ग्रहण करने की आवश्यकता है। राष्ट्र के तौर पर अपना व्यक्तित्व सहेजने की ज़रूरत है। अगर एक राष्ट्र के तौर पर हम अपनी अस्मिता को बरक़रार रखना चाहते हैं तो सांस्कृतिक चेतना का जागरण अपरिहार्य है। संस्कृति और जीवन के सभी पक्षों को फिर से भारतीय भावों की तेजस्विता से अनुप्राणित करना होगा। भाषा को समृद्ध करना पहला और सबसे ज़रूरी काम है। हिन्दी का प्रचार-प्रसार और इसमें ज़्यादा-से-ज़्यादा विविध सामग्री का सर्जन आवश्यक है। लेकिन सबसे पहले हमें अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मान और गर्व का भाव दीप्त करना होगा। सांस्कृतिक निष्ठा ज़रूरी है। हिन्दी के माध्यम से ही भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण सम्भव है।

Wednesday, June 21, 2006

आख़िरकार पूरा पढ़ ही लिया...

बहुत दिनों बाद इतनी फ़ुरसत और हिम्मत जुटा पाया..... और आख़िरकार फ़ुरसतिया जी का कुतुबमीनार की तरह लम्बा सा एक लेख पूरा पढ़ ही लिया। वैसे, मैंने हमेशा कोशिश की कि मैं शुक्ला जी की हर प्रविष्टि पूरी पढूं, लेकिन बीच में धीरज हमेशा साथ छोड़ जाता था। अब ये मत पूछिएगा कि भला ये धीरज कौन है? कोई भी हो मेरी बला से, लेकिन इस बार मैं धीरज को थामे रहा और पूरा लेख बांच लिया।

ग़ज़ब का लेखन है फ़ुरसतिया जी का। बिल्कुल रिकी पॉण्टिंग के खेल की तरह लगातार उम्दा लेखन करते रहते हैं। अगर कोई लगातार इतने धांसू व्यंग्य लिखता रहे, तो समझना चाहिए कि उसके जीन्स में (पहनने वाली नहीं, शरीर के अन्दर सूक्ष्म गोल घूमती सीढियों की तरह संरचना – अरे यार ‘गुणसूत्र’) कहीं-न-कहीं हास्य और व्यंग्य लेखन का भी डीएनए मौजूद है। ख़ैर, यह तो वैज्ञानिक ही बता सकते हैं फ़ुरसतिया जी का परीक्षण कर के। वैसे, मैं इतनी तारीफ़ इसलिए और कर रहा हूँ क्योंकि शुक्ला जी का हथियारों से भी वास्ता है (नहीं मालूम तो परिचय पढ़ें जा कर) और शायद चलाना भी जानते ही होंगे। ख़्वामख़्वाह नाराज़ हो गए तो और कलेस जान से।

फ़ुरसतिया जी और जीतू भाई वगैरह जितने भी कनपुरिया हैं हिन्दी ब्लॉग मण्डल में, मैं सबके सामने हमेशा नतमस्तक रहता हूँ। मैं ही क्या हर कोई ऐसे ही सिर झुकाता है। लेकिन इनके गुणों के कारण नहीं, हालाँकि गुण भी बहुतेरे हैं; बल्कि कनपुरिया होने के कारण। मेरे एक गप्पी पड़ोसी कहा करते थे – किंग कोबरा का डंसा एक बार को बच भी सकता है, लेकिन कनपुरिया का काटा पानी भी नहीं मांगता। तब से यह बात गाँठ बांध ली।

आपको दूर से ही पता चला जाएगा कि फ़लाँ इंसान कनपुरिया है। एक बार मैं एक ढाबे में खाना खा रहा था, तभी एक सज्जन आकर बगल वाली मेज़ पर बैठ गए। पहले तो मैंने कुछ ख़ास ग़ौर नहीं किया, लेकिन जब उसने गन्दी सी शक़्ल वाले एक बैरे से कहा – तुम तो बिल्कुल हीरो लगते हो, ज़रा ‘बंढिया’ कपड़े पहन लो तो बिल्कुल शाहरुख़ ख़ान की तरह लगोगे। तुरन्त मैं समझ गया कि हो-न-हो, यह इंसान कनपुरिया ही है। कुछ देर बातचीत करने पर पता चला कि मैं बिल्कुल सही था। पूरे हिन्दुस्तान में यूपी वाले सबसे चतुर होते हैं, लेकिन उनमें भी कनपुरिया को महाचतुर, चतुर सुजान जानो।

ख़ैर, यह तो विषयान्तर हो गया। वैसे, ‘मौसम बड़ा बेईमान है...’ पढ़ कर बड़ा क्षोभ हुआ, मन को बहुत तक़लीफ़ हुई। पता चला कि ताकने के मामले में हम जैसे नए बच्चों का कम्प्टीशन फ़ुरसतिया जी जैसे कुशल और अनुभवी लोगों से है। अब भला ऐसे खेले-खाए लोगों के होते हमारी दाल कहाँ गलेगी? पिताजी सच ही कहते हैं कि आज-कल कम्प्टीशन का ज़माना है। हर फ़ील्ड में ही ये मरा ‘कम्प्टीशन’ हमारे आड़े आ जाता है; चाहे पढ़ाई करने जाओ, खेलने-कूदने जाओ या फिर ताकने ही क्यों न जाओ – कहीं भी हमारी बात नहीं बनती। हमसे ज़्यादा अनुभवी लोग पहले ही क़तार में लगे होते हैं। आईआईएम वाले भी वर्क ऐक्स्पीरियंस वालों को प्राथमिकता देते हैं और ‘आधुनिक डाकू’ भी शायद ऐक्स्पीरियंस वालों को ही पहले तवज्जो देते हैं।

जहाँ तक रही बात उनके डाकू स्टाइल में रहने की, तो हर नवयुवक स्वभाव से ही ‘मुक्त अर्थव्यवस्था’ का समर्थक होता है और इन डाकुओं को भी ऐसा ही देखना चाहता है। लेकिन शहरों में आम तौर पर ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ का दीदार होता है। गाँवों, क़स्बों और छोटे शहरों में तो हालत यह है कि केवल पूरी तरह ‘वामपन्थी अर्थव्यवस्था’ ही नज़र आती है। यह शोध का विषय है कि सभी युवक अपने जीवन के शुरूआती दिनों में इस तरह की ‘मुक्त अर्थव्यवस्था’ के समर्थक होते हैं, लेकिन वे वृद्ध होने तक पाला बदल कर ‘वामपंथी अर्थव्यवस्था’ के पैरोकार कैसे बन जाते हैं? डाकू फ़ैशन की वजह बताते हुए फ़ुर्सतिया जी कहते हैं –

वैसे देखा जाय तो सारा मामले की जड़ में ग्लोबल वार्मिंग है। दुनिया गरमा रही है। तापमान बढ़ता जा रहा है। मोटर वाहन देश की जनसंख्या की तरह बढ़ रहे हैं। आदमी की बनाई सड़क पर चलने के लिये आदमी की जगह कार्बुरेटर से निकला धुँआ लटका हुआ सा है। बिजली गायब है लेकिन जगह-जगह जनरेटर धड़धड़ा रहे हैं। इस सब से गर्मी बढ़ रही है।

बात तो बिल्कुल सही है। प्रदूषण फैलाकर हम इन्सानों को शर्म आए न आए, लेकिन भगवान को बड़ी ग्लानि का अहसास होता है – किसी और को नहीं तो कम-से-कम भगवान शिव को तो बहुत शर्मिंन्दगी होती है। इस बार तो बेचारे शर्मसार हो कर पिघल गए

गर्मी से बचने का तो बस एक ही उपाय है कि पंखे-कूलर या एसी के सामने बैठे रहा जाए और ये सब तब चलेंगे, जब बिजली देवी प्रसन्न होंगी। ऐसी निष्ठुर देवी और कोई नहीं है; कितने भी यज्ञ-याग, पूजा-अर्चना करो कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता। जैसा फ़ुरसतिया जी ने बताया, केवल कटिया देव के सहारे ही बिजली देवी की कृपा प्राप्त की जा सकती है। हमारे मुहल्ले मैं कोई और कुछ जानता हो या न जानता हो, कटिया डालने ज़रूर जानता है। किसी को भी मुहल्ले में तब तक इज़्ज़त से नहीं देखा जाता, जब तक कटिया डालने में महारत हासिल न हो। लेकिन यहाँ भी मेरी कहानी ख़राब है। एक दिन कटिया डालने की कोशिश की, तो पैर फिसल गया और मैं ऊपर से सीधे नीचे जा गिरा। तब से कटिया डालने की सोचता भी नहीं हूँ।

Monday, June 19, 2006

शर्म से पिघले भोले बाबा

आजकल यह ख़बर सुर्ख़ियों में है कि इस बार अमरनाथ का शिवलिंग असली नहीं हैं, बल्कि उसे बाहर से बर्फ़ लाकर बनाया गया है। देर से हुए हिमपात की वजह से शिव लिंग नहीं बन सका और मौसम में हो रहे बदलाव को देख कर ऐसा लगता है कि आगे के वर्षों में यह समस्या और बढ़ेगी। तीर्थ-यात्रियों में भी इस कारण काफ़ी आक्रोश है और अधिकारियों ने लीपापोती की कोशिशें शुरू कर दी हैं।

आख़िरकार भगवान भोलेनाथ भी शर्म से पिघल गए। भोल बाबा की बनाई इस ख़ूबसूरत दुनिया को बर्बाद करने में कोई कसर इन्सानों ने नहीं छोड़ी। अन्धाधुंध पेड़ काटे और जंगलों को धरती से साफ़ कर दिया। हर तरह का प्रदूषण फैला कर पृथ्वी के तापमान में भी भारी वृद्धि की। क्लोरोफ़्लोरो वर्ग के कार्बन का अत्यधिक इस्तेमाल कर ओज़ोन में छेद कर दिया और ग्लोबल वॉर्मिंग का मार्ग प्रशस्त किया। अपनी बनाई सर्वश्रेष्ठ कृति मानव के इन कारनामों से अन्तत: भगवान शिव को इतनी ग्लानि का अनुभव हुआ कि वे शर्मसार हो कर पिघल गए (हालाँकि कुछ लोग कहते हैं‍ कि जमे ही नहीं)। लोग ‘हर-हर बम-बम’ चिल्लाते हुए अमरनाथ की गुफा तक साल-दर-साल जाते रहते हैं, लेकिन पर्यावरण-सन्तुलन और प्रकृति के बारे में कभी नहीं सोचते। कैसी विडम्बना है?

Sunday, June 18, 2006

पुरुष बली नहीं होत है, समय होत बलवान

पुरुष बली नहीं होत है, समय होत बलवान।
भीलन हर लीनी गोपिका, वही अर्जुन वही बाण।।

यह छंद उस वक़्त के हालात बयान करता है, जब कृष्ण के बैकुण्ठ गमन के बाद अर्जुन गोपियों को द्वारिका से हस्तिनापुर ले जा रहे थे। रास्ते में भील आक्रमण कर महिलाओं को हर ले गए और कृष्ण के अवसान से शोकाकुल अर्जुन अपनी सारी शक्ति लगा कर भी उन्हें नहीं रोक सके।

अब आप पूछेंगे कि मुझे यह छन्द भला अचानक क्यों कर याद आया? वैसे तो मुझे अक़्सर कुछ-न-कुछ ऐसा याद आता रहता है, जिसका चल रहे घटनाक्रम से कुछ लेना-देना नहीं होता। लेकिन इस छन्द के याद आने की एक ख़ास वजह है। समय जब भी मुझे पटखनी देता है, तो मुझे यह छंद याद आ जाता है।

दरअसल हुआ यूं कि अन्तर्जाल पर विचरण करते हुए मैं शास्त्री नित्यगोपाल कटारे के चिट्ठे पर पहुँच गया। पढ़ने पर मालूम चला कि नित्यगोपाल जी संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित हैं; तो मैंने टिप्पणी कर दी कि मैं भी बचपन से ही संस्कृत सीखना चाहता था, लेकिन कभी ऐसा सुयोग नहीं हो सका। कुछ दिनों बाद नित्यगोपाल जी से मेरी मुलाक़ात गूगल टॉक पर हुई और उन्होंने बड़े सुन्दर तरीक़े से संस्कृत के महत्व पर प्रकाश डाला और साथ ही बताया कि संस्कृत सिखाने के लिए वे हर रविवार सांय ७ से ७:३० तक ऑनलाइन संस्कृत संगोष्ठी भी आयोजित करते हैं। मैंने ख़ुद ही उसमें शामिल होने की इच्छा जतायी, तो उन्होंने भी हामी भर दी।

लेकिन वो दिन था और आज का दिन है, मैं कभी भी रविवार को ७ से ७:३० के दौरान कम्प्यूटर ही नहीं चला पाया। पहले तो बीच में मेरी परीक्षाएँ आ टपकीं, फिर दो-एक रविवार मुझे शहर से बाहर जाना पड़ा और लगता है कि विद्युत विभाग को भी मेरा संस्कृत सीखना नागवार गुज़रा और उन्होंने ७ से ८ का इलेक्ट्रिसिटी कट लगा दिया। उसके बाद जब भी नित्यगोपाल जी मुझे ऑनलाइन मिले; मैंने हमेशा बताया कि इस बार फ़लाँ-फ़लाँ दिक़्क़त पेश आई थी, लेकिन अगली बार मैं संगोष्ठी में अपनी उपस्थिति ज़रूर दर्ज करवाऊँगा। लेकिन ऐसा कभी हो न सका और अब तो यह हालत है कि नित्यगोपाल जी को मैसेंजर पर अवतरित होता देख कर ही मुझे away होना पड़ता है, आख़िर क्या उत्तर दूँ कि इस बार मैं क्यों हाज़िर नहीं हुआ? पहले तो बड़ी-बड़ी बातें सोचीं और कहीं थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, संस्कृत सीख कर रहूँगा। लेकिन अब इस बात पर विश्वास हो गया है – पुरुष बली नहीं होत है, समय होत बलवान (ख़ासकर ७ से ७:३० के बीच का समय)।

अब तो बस नित्यगोपाल जी के संस्कृत ग्रुप का सदस्य बन गया हूँ और उनके आओ संस्कृत सीखें ब्लॉग पर जा कर देवभाषा के कुछ पाठ पढ़ लेता हूँ। उम्मीद है कि भगवान मेरे हृदय से निकली गुहार सुनेंगे (वैसे, बेहतर है कि बिजली विभाग वाले इसे सुनें) और यह पावर कट शीघ्र की ख़त्म हो जाएगा।

Saturday, June 17, 2006

Indian Comics : Chacha Chaudhary & Sabu

भारतीय कॉमिक्स : चाचा चौधरी और साबू

विजय भाई के ब्लॉग पर उनके पुस्तकों के प्यार के बारे में पढ़ा। मेरा और शायद इस हिन्दी ब्लॉग मण्डल के ज़्यादातर लोगों का भी यही हाल है, सभी पढ़ने-लिखने के बेहद शौक़ीन जान पड़ते हैं। विजय भाई ने कॉमिक्स का उल्लेख किया है। बचपन में मैं भी बेहद चाव से कॉमिक्स पढ़ा करता था। कॉमिक्स पढ़ने में ऐसा रस आता था, मानो उससे बढ़कर दुनिया में और कोई सुख हो ही नहीं।

कॉमिक्स की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि बच्चों में पढ़ने के प्रति गहरा रुझान पैदा हो जाता है, जो बाद में दूसरी बौद्धिक पुस्तकों के अध्ययन के लिए भी प्रेरित करता है। एक दूसरी ख़ास बात यह है कि आम तौर पर कॉमिक्स में प्रयोग की जाने वाली हिन्दी काफ़ी अच्छी और स्तरीय होती है, जो पढ़ने वाले के लिए आगे चल कर नींव का काम करती है।

आइए, कुछ बातें करते हैं कॉमिक्स के बारे में। शायद ही ऐसा कोई हो, जिसने चाचा चौधरी और साबू के किस्से न पढ़े हों। चाचा चौधरी की कॉमिक्स कुछ अजीब ही होती हैं। मैंने आज तक चाचा चौधरी की किसी भी कॉमिक्स में चाचा जी को कोई बुद्धिमत्तापूर्ण काम करते नहीं देखा, सब कुछ बस संयोग से अपने आप ही हो जाता है। लेकिन फिर भी अन्त में नीचे लिख दिया जाता है – चाचा चौधरी का दिमाग़ कम्यूटर से भी तेज़ चलता है। साबू भी अपने आप में कमाल का पात्र है। एक तो साबू का क़द कुछ तय नहीं है, परिस्थितियों के मुताबिक साबू की लम्बाई घटती-बढ़ती रहती है। हालाँकि इतनी बात तो पक्की है कि आम आदमी के मुक़ाबले साबू का क़द काफ़ी ज़्यादा है। साबू की जो बात मुझे बचपन में काफ़ी चकित करती थी; वह यह कि साबू को जब ग़ुस्सा आता है, तो आखिर ज्यूपिटर (बृहस्पति) पर ज्वालामुखी क्यों फटता है। लेकिन चाचा चौधरी की कॉमिक्स पढ़ना अपने आप में एक मज़ेदार अनुभव है। दिमाग़ लगाने की कोई आवश्कता नहीं होती, बस मज़े से पढ़े जाओ और चाचा चौधरी के कारनामों का आनन्द लेते रहो। यही बात बच्चों को इतनी भाती है और चाचा चौधरी को भारतीय कॉमिक्स का सबसे लोकप्रिय पात्र बनाती है। चाचा चौधरी की कुछ कॉमिक्स विशाल पटेल की वेबसाइट पर पढ़ी जा सकतीं हैं।

चाचा चौधरी के कुछ पक्के दुश्मन भी थे, उनमें राका और गोबर सिंह ही ख़ास हैं। इनमें गोबर सिंह तो हमेशा बिना कुछ लोहा लिए ही पिट जाता था, लेकिन राका काफ़ी ख़तरनाक था। उसने संजीवनी पी ली थी और वह अमर हो गया था। इसलिए चाचा चौधरी साबू की मदद से उसे कभी समुद्र में, तो कभी उत्तरी ध्रुव पर फिंकवा देते थे। लेकिन राका बार-बार तबाही मचाने लौट आता था; अभी भी यह क्रम जारी है कि नहीं, इससे में अन्जान हूँ। शायद अभी तक यही चल रहा हो। कभी-कभी चाचा जी का एक जुड़वा भाई भी कहीं से आ टपकता था, नाम था ‘छज्जू चौधरी’। एक बार उसे मंगल ग्रह वाले पकड़ के ले गए थे, मालूम नहीं पृथ्वी पर वापस छोड़ कर गए या नहीं?

जिन्होंने चाचा चौधरी और साबू की कॉमिक्स कभी पढ़ी होंगी, वे इस बात से वाकिफ़ होंगे कि शरुआत में कार्टूनिस्ट प्राण का परिचय भी छपा रहता है। उसमें उल्लेख है कि कार्टूनिस्ट प्राण को इन्दिरा गांधी द्वारा ‘ठिठोली पुरुस्कार’ से नवाज़ा गया था। मैं अक़्सर सोचता था कि क्या यह पुरस्कार किसी और को भी कभी दिया गया है? अगर आपको पता हो, तो कृपया ज़रूर बताएँ। डायमण्ड कॉमिक्स में चाचा जी के अलावा कार्टूनिस्ट प्राण के कुछ दूसरे पात्रों की भी कॉमिक्स आती है; जैसे कि बिल्लू, पिंकी, श्रीमती जी, रमन और दाबू वगैरह। लेकिन मुझे बाक़ी के ये पात्र कुछ ख़ास पसन्द नहीं थे, मैं प्राय: चाचा चौधरी की ही कॉमिक्स पढ़ा करता था।

Thursday, June 15, 2006

अनुगूंज २० : नेतागिरी, राजनीति और नेता

हमारे मुहल्ले में बच्चों की तादाद कुछ ज़्यादा ही है। जब भी बाहर निकलता हूँ तो गिल्ली-डण्डा, कंचे वगैरह खेलते हुए नज़र आ जाते हैं। अभी कल-परसों की ही बात है, हम निकले तो देखा कि दो बच्चे आपस में झगड़ रहे थे। साइकिल का पहिया तो एक ही था और दोनों ही उसे अपनी-अपनी फंटियों से दौड़ाना चाहते थे। झगड़े में हाथापाई से पहले वाला चरण होता है गाली-गलौच का, सो दोनों एक-दूसरे को गरिया रहे थे। पहला बच्चा : तू कुत्ता, कमीना @#$%^&*। दूसरा बच्चा : तू विधायक, सांसद, नेता। बस इतना सुनना था कि पहले बच्चे का चहरा ग़ुस्से से तमतमा गया, उसकी मुट्ठियाँ बंध गईं, दाँत भिंच गए और दोनों गुत्थमगुत्था हो गए। ‘नेता’ शब्द गाली होता है, यह तो हम एक अरसे से जानते थे; लेकिन विधायक और सांसद जैसे शब्द भी गाली के अन्तर्गत आ चुके हैं, बच्चों के ज़रिए यह जानकर हमारी जी.के. में भी कुछ इज़ाफ़ा हुआ। ख़ैर, हमने उन्हें अलग करने की कोशिश नहीं की, अब अगर किसी को ‘नेता’ कहा है तो उसके दो-चार घूंसे-झापड़ खाने के लिए भी तैयार रहना ही चाहिए।

ये आईआईटी के लड़के भी हमारे मुहल्ले के बच्चों से कोई ख़ास अक़्लमन्द नहीं है। अभी हाल ही में सुना कि कुछ आईआईटी के छोरों ने एक दल बनाया है – परित्राण। इनका कहना है कि ये देश का परित्राण करेंगे, राजनीति में उतर कर कीचड़ साफ़ करेंगे वगैरह वगैरह। बड़े आए कीचड़ साफ़ करने वाले, यही कीचड़ तो राजनीति का आकर्षण है। इस कीचड़ का रूप-रस, मादक गन्ध, सुरूर ही तो राजनीति की जान है। अब कल के इन लौंडे-लपाड़ों को कौन समझाए कि नेतागिरी करना कोई हल्का-पतला काम नहीं है। इसका पूरा शास्त्र होता है। इतने गुर, इतनी तिकड़में, इतने पैंतरे; इन्हें सीखना और काम में लाना किसी आम आदमी के बस की बात नहीं है। ये समझते हैं कि e = mc2 पढ़ लेने से, दो-चार रॉकेट और उपग्रह बना लेने से ही नेतागिरी में भी महारथ हासिल की जा सकती है। हम पूछते हैं कि क्या 24 x 7 झूठ बोल सकते हो, बड़े नेताओं के तलवे चाट सकते हो, चुनाव के समय लोगों की लल्लो-चप्पो कर सकते हो, घोटाले कर सकते हो, गाय-भैंसों तक का चारा खा सकते हो? ऐसे गुणी लोग लाखों में कुछ ही होते हैं जो ये सब काम कर सकते हैं, नेता बन सकते हैं; हम कहते हैं कि आईआईटी के पढ़े-लिखे मूरख अपने भीतर इन गुणों का चौथाई भी विकसित नहीं कर सकते।

सो भैया, हम कहते हैं कि नेतागिरी और राजनीति नेताओं को ही करने दो। तरुण भाई, हम लोगों को काहे इस पचड़े में फँसा रहे हो। हम लोग तो वही करेंगे, जो सालों-साल करते आ रहे हैं। मतलब पाँच-दस सालों में जब कभी वोट डाल आएंगे और घर में बैठ कर हर ग़लत काम का ठीकरा इन नेताओं के सर पर फोड़ेंगे। कभी-कभी आप जैसे किसी फ़िक्रमन्द के कहने से ब्लॉग पर भी इस विषय पर चील-बिलौए बना देंगे। हम हिन्दुस्तानियों का यह पुराना रिवाज़ है – बातें ज़्यादा काम कम, अब ख़्वामख़्वाह काहे बदलें भला।
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