Thursday, June 15, 2006

अनुगूंज २० : नेतागिरी, राजनीति और नेता

हमारे मुहल्ले में बच्चों की तादाद कुछ ज़्यादा ही है। जब भी बाहर निकलता हूँ तो गिल्ली-डण्डा, कंचे वगैरह खेलते हुए नज़र आ जाते हैं। अभी कल-परसों की ही बात है, हम निकले तो देखा कि दो बच्चे आपस में झगड़ रहे थे। साइकिल का पहिया तो एक ही था और दोनों ही उसे अपनी-अपनी फंटियों से दौड़ाना चाहते थे। झगड़े में हाथापाई से पहले वाला चरण होता है गाली-गलौच का, सो दोनों एक-दूसरे को गरिया रहे थे। पहला बच्चा : तू कुत्ता, कमीना @#$%^&*। दूसरा बच्चा : तू विधायक, सांसद, नेता। बस इतना सुनना था कि पहले बच्चे का चहरा ग़ुस्से से तमतमा गया, उसकी मुट्ठियाँ बंध गईं, दाँत भिंच गए और दोनों गुत्थमगुत्था हो गए। ‘नेता’ शब्द गाली होता है, यह तो हम एक अरसे से जानते थे; लेकिन विधायक और सांसद जैसे शब्द भी गाली के अन्तर्गत आ चुके हैं, बच्चों के ज़रिए यह जानकर हमारी जी.के. में भी कुछ इज़ाफ़ा हुआ। ख़ैर, हमने उन्हें अलग करने की कोशिश नहीं की, अब अगर किसी को ‘नेता’ कहा है तो उसके दो-चार घूंसे-झापड़ खाने के लिए भी तैयार रहना ही चाहिए।

ये आईआईटी के लड़के भी हमारे मुहल्ले के बच्चों से कोई ख़ास अक़्लमन्द नहीं है। अभी हाल ही में सुना कि कुछ आईआईटी के छोरों ने एक दल बनाया है – परित्राण। इनका कहना है कि ये देश का परित्राण करेंगे, राजनीति में उतर कर कीचड़ साफ़ करेंगे वगैरह वगैरह। बड़े आए कीचड़ साफ़ करने वाले, यही कीचड़ तो राजनीति का आकर्षण है। इस कीचड़ का रूप-रस, मादक गन्ध, सुरूर ही तो राजनीति की जान है। अब कल के इन लौंडे-लपाड़ों को कौन समझाए कि नेतागिरी करना कोई हल्का-पतला काम नहीं है। इसका पूरा शास्त्र होता है। इतने गुर, इतनी तिकड़में, इतने पैंतरे; इन्हें सीखना और काम में लाना किसी आम आदमी के बस की बात नहीं है। ये समझते हैं कि e = mc2 पढ़ लेने से, दो-चार रॉकेट और उपग्रह बना लेने से ही नेतागिरी में भी महारथ हासिल की जा सकती है। हम पूछते हैं कि क्या 24 x 7 झूठ बोल सकते हो, बड़े नेताओं के तलवे चाट सकते हो, चुनाव के समय लोगों की लल्लो-चप्पो कर सकते हो, घोटाले कर सकते हो, गाय-भैंसों तक का चारा खा सकते हो? ऐसे गुणी लोग लाखों में कुछ ही होते हैं जो ये सब काम कर सकते हैं, नेता बन सकते हैं; हम कहते हैं कि आईआईटी के पढ़े-लिखे मूरख अपने भीतर इन गुणों का चौथाई भी विकसित नहीं कर सकते।

सो भैया, हम कहते हैं कि नेतागिरी और राजनीति नेताओं को ही करने दो। तरुण भाई, हम लोगों को काहे इस पचड़े में फँसा रहे हो। हम लोग तो वही करेंगे, जो सालों-साल करते आ रहे हैं। मतलब पाँच-दस सालों में जब कभी वोट डाल आएंगे और घर में बैठ कर हर ग़लत काम का ठीकरा इन नेताओं के सर पर फोड़ेंगे। कभी-कभी आप जैसे किसी फ़िक्रमन्द के कहने से ब्लॉग पर भी इस विषय पर चील-बिलौए बना देंगे। हम हिन्दुस्तानियों का यह पुराना रिवाज़ है – बातें ज़्यादा काम कम, अब ख़्वामख़्वाह काहे बदलें भला।

3 comments:

  1. "ये समझते हैं कि e = mc2 पढ़ लेने से, दो-चार रॉकेट और उपग्रह बना लेने से ही नेतागिरी में भी महारथ हासिल की जा सकती है।"

    हर भारतीय आप जैसे नहीं होता है मेरे भाई. कुछ लोग इस देश से प्यार भी करते हैं.

    अगर इन लोगों ने अपनी पार्टी बनाई है तो उन्हें हतोत्साहित करने की जगह उनका उत्साहवर्धन करना चाहिये.

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  2. "ये समझते हैं कि e = mc2 पढ़ लेने से, दो-चार रॉकेट और उपग्रह बना लेने से ही नेतागिरी में भी महारथ हासिल की जा सकती है।"

    हर भारतीय आप जैसे नहीं होता है मेरे भाई. कुछ लोग इस देश से प्यार भी करते हैं.

    अगर इन लोगों ने अपनी पार्टी बनाई है तो उन्हें हतोत्साहित करने की जगह उनका उत्साहवर्धन करना चाहिये.

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  3. Bishwa8:23 AM

    बहुत अच्छा लगा । कुछ लोग तो अपने देशको प्यार करते है मगर कौन हे ये कुछ लोग ? अपने आपमे बदलना ज़रुरी है

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