पुरुष बली नहीं होत है, समय होत बलवान।
भीलन हर लीनी गोपिका, वही अर्जुन वही बाण।।
यह छंद उस वक़्त के हालात बयान करता है, जब कृष्ण के बैकुण्ठ गमन के बाद अर्जुन गोपियों को द्वारिका से हस्तिनापुर ले जा रहे थे। रास्ते में भील आक्रमण कर महिलाओं को हर ले गए और कृष्ण के अवसान से शोकाकुल अर्जुन अपनी सारी शक्ति लगा कर भी उन्हें नहीं रोक सके।
अब आप पूछेंगे कि मुझे यह छन्द भला अचानक क्यों कर याद आया? वैसे तो मुझे अक़्सर कुछ-न-कुछ ऐसा याद आता रहता है, जिसका चल रहे घटनाक्रम से कुछ लेना-देना नहीं होता। लेकिन इस छन्द के याद आने की एक ख़ास वजह है। समय जब भी मुझे पटखनी देता है, तो मुझे यह छंद याद आ जाता है।
दरअसल हुआ यूं कि अन्तर्जाल पर विचरण करते हुए मैं शास्त्री नित्यगोपाल कटारे के चिट्ठे पर पहुँच गया। पढ़ने पर मालूम चला कि नित्यगोपाल जी संस्कृत के प्रकाण्ड पण्डित हैं; तो मैंने टिप्पणी कर दी कि मैं भी बचपन से ही संस्कृत सीखना चाहता था, लेकिन कभी ऐसा सुयोग नहीं हो सका। कुछ दिनों बाद नित्यगोपाल जी से मेरी मुलाक़ात गूगल टॉक पर हुई और उन्होंने बड़े सुन्दर तरीक़े से संस्कृत के महत्व पर प्रकाश डाला और साथ ही बताया कि संस्कृत सिखाने के लिए वे हर रविवार सांय ७ से ७:३० तक ऑनलाइन संस्कृत संगोष्ठी भी आयोजित करते हैं। मैंने ख़ुद ही उसमें शामिल होने की इच्छा जतायी, तो उन्होंने भी हामी भर दी।
लेकिन वो दिन था और आज का दिन है, मैं कभी भी रविवार को ७ से ७:३० के दौरान कम्प्यूटर ही नहीं चला पाया। पहले तो बीच में मेरी परीक्षाएँ आ टपकीं, फिर दो-एक रविवार मुझे शहर से बाहर जाना पड़ा और लगता है कि विद्युत विभाग को भी मेरा संस्कृत सीखना नागवार गुज़रा और उन्होंने ७ से ८ का इलेक्ट्रिसिटी कट लगा दिया। उसके बाद जब भी नित्यगोपाल जी मुझे ऑनलाइन मिले; मैंने हमेशा बताया कि इस बार फ़लाँ-फ़लाँ दिक़्क़त पेश आई थी, लेकिन अगली बार मैं संगोष्ठी में अपनी उपस्थिति ज़रूर दर्ज करवाऊँगा। लेकिन ऐसा कभी हो न सका और अब तो यह हालत है कि नित्यगोपाल जी को मैसेंजर पर अवतरित होता देख कर ही मुझे away होना पड़ता है, आख़िर क्या उत्तर दूँ कि इस बार मैं क्यों हाज़िर नहीं हुआ? पहले तो बड़ी-बड़ी बातें सोचीं और कहीं थी कि चाहे कुछ भी हो जाए, संस्कृत सीख कर रहूँगा। लेकिन अब इस बात पर विश्वास हो गया है – पुरुष बली नहीं होत है, समय होत बलवान (ख़ासकर ७ से ७:३० के बीच का समय)।
अब तो बस नित्यगोपाल जी के संस्कृत ग्रुप का सदस्य बन गया हूँ और उनके आओ संस्कृत सीखें ब्लॉग पर जा कर देवभाषा के कुछ पाठ पढ़ लेता हूँ। उम्मीद है कि भगवान मेरे हृदय से निकली गुहार सुनेंगे (वैसे, बेहतर है कि बिजली विभाग वाले इसे सुनें) और यह पावर कट शीघ्र की ख़त्म हो जाएगा।
3 comments:
श्रीराम शर्मा आचार्य कहते है-असफलता यह बताती है कि सफलता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं किया गया है।
बहाने मत बनाइए, इनवर्टर लगवाइए. 180 एम्पीयर अवर की बैटरी, 750 वाट का इनवर्टर आपको 6-8 घंटे पीसी चला सकने की क्षमता देगा.
हमारी सारी जिंदगी इनवर्टरे के भरोसे तो चल रही है. बिजली विभाग के भरोसे तो बस ...
प्रतीक जी,
जहाँ चाह वहाँ राह, लगे रहिये, हार न मानिये, सफलता आपके कदम चूमेगी एक दिन।
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