Wednesday, June 21, 2006

आख़िरकार पूरा पढ़ ही लिया...

बहुत दिनों बाद इतनी फ़ुरसत और हिम्मत जुटा पाया..... और आख़िरकार फ़ुरसतिया जी का कुतुबमीनार की तरह लम्बा सा एक लेख पूरा पढ़ ही लिया। वैसे, मैंने हमेशा कोशिश की कि मैं शुक्ला जी की हर प्रविष्टि पूरी पढूं, लेकिन बीच में धीरज हमेशा साथ छोड़ जाता था। अब ये मत पूछिएगा कि भला ये धीरज कौन है? कोई भी हो मेरी बला से, लेकिन इस बार मैं धीरज को थामे रहा और पूरा लेख बांच लिया।

ग़ज़ब का लेखन है फ़ुरसतिया जी का। बिल्कुल रिकी पॉण्टिंग के खेल की तरह लगातार उम्दा लेखन करते रहते हैं। अगर कोई लगातार इतने धांसू व्यंग्य लिखता रहे, तो समझना चाहिए कि उसके जीन्स में (पहनने वाली नहीं, शरीर के अन्दर सूक्ष्म गोल घूमती सीढियों की तरह संरचना – अरे यार ‘गुणसूत्र’) कहीं-न-कहीं हास्य और व्यंग्य लेखन का भी डीएनए मौजूद है। ख़ैर, यह तो वैज्ञानिक ही बता सकते हैं फ़ुरसतिया जी का परीक्षण कर के। वैसे, मैं इतनी तारीफ़ इसलिए और कर रहा हूँ क्योंकि शुक्ला जी का हथियारों से भी वास्ता है (नहीं मालूम तो परिचय पढ़ें जा कर) और शायद चलाना भी जानते ही होंगे। ख़्वामख़्वाह नाराज़ हो गए तो और कलेस जान से।

फ़ुरसतिया जी और जीतू भाई वगैरह जितने भी कनपुरिया हैं हिन्दी ब्लॉग मण्डल में, मैं सबके सामने हमेशा नतमस्तक रहता हूँ। मैं ही क्या हर कोई ऐसे ही सिर झुकाता है। लेकिन इनके गुणों के कारण नहीं, हालाँकि गुण भी बहुतेरे हैं; बल्कि कनपुरिया होने के कारण। मेरे एक गप्पी पड़ोसी कहा करते थे – किंग कोबरा का डंसा एक बार को बच भी सकता है, लेकिन कनपुरिया का काटा पानी भी नहीं मांगता। तब से यह बात गाँठ बांध ली।

आपको दूर से ही पता चला जाएगा कि फ़लाँ इंसान कनपुरिया है। एक बार मैं एक ढाबे में खाना खा रहा था, तभी एक सज्जन आकर बगल वाली मेज़ पर बैठ गए। पहले तो मैंने कुछ ख़ास ग़ौर नहीं किया, लेकिन जब उसने गन्दी सी शक़्ल वाले एक बैरे से कहा – तुम तो बिल्कुल हीरो लगते हो, ज़रा ‘बंढिया’ कपड़े पहन लो तो बिल्कुल शाहरुख़ ख़ान की तरह लगोगे। तुरन्त मैं समझ गया कि हो-न-हो, यह इंसान कनपुरिया ही है। कुछ देर बातचीत करने पर पता चला कि मैं बिल्कुल सही था। पूरे हिन्दुस्तान में यूपी वाले सबसे चतुर होते हैं, लेकिन उनमें भी कनपुरिया को महाचतुर, चतुर सुजान जानो।

ख़ैर, यह तो विषयान्तर हो गया। वैसे, ‘मौसम बड़ा बेईमान है...’ पढ़ कर बड़ा क्षोभ हुआ, मन को बहुत तक़लीफ़ हुई। पता चला कि ताकने के मामले में हम जैसे नए बच्चों का कम्प्टीशन फ़ुरसतिया जी जैसे कुशल और अनुभवी लोगों से है। अब भला ऐसे खेले-खाए लोगों के होते हमारी दाल कहाँ गलेगी? पिताजी सच ही कहते हैं कि आज-कल कम्प्टीशन का ज़माना है। हर फ़ील्ड में ही ये मरा ‘कम्प्टीशन’ हमारे आड़े आ जाता है; चाहे पढ़ाई करने जाओ, खेलने-कूदने जाओ या फिर ताकने ही क्यों न जाओ – कहीं भी हमारी बात नहीं बनती। हमसे ज़्यादा अनुभवी लोग पहले ही क़तार में लगे होते हैं। आईआईएम वाले भी वर्क ऐक्स्पीरियंस वालों को प्राथमिकता देते हैं और ‘आधुनिक डाकू’ भी शायद ऐक्स्पीरियंस वालों को ही पहले तवज्जो देते हैं।

जहाँ तक रही बात उनके डाकू स्टाइल में रहने की, तो हर नवयुवक स्वभाव से ही ‘मुक्त अर्थव्यवस्था’ का समर्थक होता है और इन डाकुओं को भी ऐसा ही देखना चाहता है। लेकिन शहरों में आम तौर पर ‘मिश्रित अर्थव्यवस्था’ का दीदार होता है। गाँवों, क़स्बों और छोटे शहरों में तो हालत यह है कि केवल पूरी तरह ‘वामपन्थी अर्थव्यवस्था’ ही नज़र आती है। यह शोध का विषय है कि सभी युवक अपने जीवन के शुरूआती दिनों में इस तरह की ‘मुक्त अर्थव्यवस्था’ के समर्थक होते हैं, लेकिन वे वृद्ध होने तक पाला बदल कर ‘वामपंथी अर्थव्यवस्था’ के पैरोकार कैसे बन जाते हैं? डाकू फ़ैशन की वजह बताते हुए फ़ुर्सतिया जी कहते हैं –

वैसे देखा जाय तो सारा मामले की जड़ में ग्लोबल वार्मिंग है। दुनिया गरमा रही है। तापमान बढ़ता जा रहा है। मोटर वाहन देश की जनसंख्या की तरह बढ़ रहे हैं। आदमी की बनाई सड़क पर चलने के लिये आदमी की जगह कार्बुरेटर से निकला धुँआ लटका हुआ सा है। बिजली गायब है लेकिन जगह-जगह जनरेटर धड़धड़ा रहे हैं। इस सब से गर्मी बढ़ रही है।

बात तो बिल्कुल सही है। प्रदूषण फैलाकर हम इन्सानों को शर्म आए न आए, लेकिन भगवान को बड़ी ग्लानि का अहसास होता है – किसी और को नहीं तो कम-से-कम भगवान शिव को तो बहुत शर्मिंन्दगी होती है। इस बार तो बेचारे शर्मसार हो कर पिघल गए

गर्मी से बचने का तो बस एक ही उपाय है कि पंखे-कूलर या एसी के सामने बैठे रहा जाए और ये सब तब चलेंगे, जब बिजली देवी प्रसन्न होंगी। ऐसी निष्ठुर देवी और कोई नहीं है; कितने भी यज्ञ-याग, पूजा-अर्चना करो कोई फ़र्क़ ही नहीं पड़ता। जैसा फ़ुरसतिया जी ने बताया, केवल कटिया देव के सहारे ही बिजली देवी की कृपा प्राप्त की जा सकती है। हमारे मुहल्ले मैं कोई और कुछ जानता हो या न जानता हो, कटिया डालने ज़रूर जानता है। किसी को भी मुहल्ले में तब तक इज़्ज़त से नहीं देखा जाता, जब तक कटिया डालने में महारत हासिल न हो। लेकिन यहाँ भी मेरी कहानी ख़राब है। एक दिन कटिया डालने की कोशिश की, तो पैर फिसल गया और मैं ऊपर से सीधे नीचे जा गिरा। तब से कटिया डालने की सोचता भी नहीं हूँ।

7 comments:

  1. बाई द वे, यह कटिया डालने का जिक्र कहां से आया ? फिर ट्रांसफार्मर फुक गया क्‍या ?

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  2. हम पढ़ते हुये मुस्करा रहे हैं। बढ़िया मौज लिये हो। हमारे लेख लम्बे हो जाते हैं इसका बोध तो तब होता है जब पोस्ट कर दिया जाता है। वैसे हमने लेख लम्बे होने का कारण कभी निरंतर के 'पूछिये फुरसतिया से' में बताया था। बाकिया मौज लेने में नाराजगी का कोई स्कोप नहीं रहता है। कनपुरिया से जब भी मौज ली जायेगी वह खुश होगा यह सोचकर
    कि ये एक आइटम तैयार हो रहा है जिससे आगे मौज ली जा सकती है। प्रमाण के लिये
    देखो हमारे जीतू हैं जिनसे जब हम मौज लेते हैं,वे चहकने लगते हैं। तारीफ जो तुम्हारे चिट्ठे में हमारे लेखन की हो गयी,अगर वो सही में है,तो हम लजाने का नाटक करते हुये शुक्रिया अदा करते हैं। लेख पढ़ते समय आसपास घड़ी मत रखा करो तो पूरे लेख पढ़ जाओगे। लम्बे चिट्ठे होने का कारण फिर से लिख रहा हूँ:-

    जाते जाते जितेन्द्र का एक और सवाल, आपके चिट्ठे इतने लम्बे क्यों होते है?
    चिट्ठों के साइज का अभी मानकीकरण नहीं हुआ, इसलिये लंबे-छोटे की परिभाषा अस्पष्ट है।फुरसतिया जब लिखते हैं तो लगभग हमेशा इस भ्रम का शिकार हो जाते हैं कि वे बहुत अच्छा लिखते हैं तथा लोगों को बहुत अच्छा लगता है उनका लेखन। फिर सोचते हैं कि लोगों को अच्छी लगने वाली चीज देने में कंजूसी क्यों की जाए भला। वैसे भी चिट्ठों के साइज का अभी मानकीकरण नहीं हुआ, इसलिये लंबे-छोटे की परिभाषा अस्पष्ट है। वैसे बहुत छोटी पोस्ट देखकर फुरसतिया को मुन्नाभाई एमबीबीएस का डायलाग याद आता है जिसमें हॉस्टल के कमरे को देखकर सर्किट कहता है, "भाई! ये कमरा तो शुरु होते ही खतम हो गया।" छोटी पोस्ट लिखने में संकोच का कारण शायद यह भी है कि फुरसतिया अपने ब्लॉग को बांस मानने में हिचकते हैं। बांस की कहानी संक्षेप में कुछ यूँ है‍:
    एक ट्रक के पीछे बहुत से कुत्ते हांफते हुये भाग रहे थे। किसी ने एक कुत्ते से पूछा, "तुम कहां जा रहे हो?" कुत्ता हांफते हुये बोला, "मेरे आगे वाले से पूछो। जहां वह जा रहा है, वहीं मैं भी जा रहा हूं"। आगे वाले ने भी यही जवाब दिया। जब सबसे आगे वाले से पूछा गया तो वह हांफते हुये बोला, "यह तो नहीं पता हम कहां जा रहे हैं। बस इस ट्रक के पीछे लगे हैं। ट्रक में लदे हैं बांस। यह ट्रक जहां तक जायेगा हम वहां तक जायेंगे। जहां ट्रक रुकेगा, बांस उतारे जायेंगे, फिर गाड़े जायेंगे। जहां बांस गड़ेंगे हम

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  4. जवाब में मुख्य बात छूट गयी थी लिहाजा फिर से पढ़ ली जाये:-

    जाते जाते जितेन्द्र का एक और सवाल, आपके चिट्ठे इतने लम्बे क्यों होते है?

    चिट्ठों के साइज का अभी मानकीकरण नहीं हुआ, इसलिये लंबे-छोटे की परिभाषा अस्पष्ट है।फुरसतिया जब लिखते हैं तो लगभग हमेशा इस भ्रम का शिकार हो जाते हैं कि वे बहुत अच्छा लिखते हैं तथा लोगों को बहुत अच्छा लगता है उनका लेखन। फिर सोचते हैं कि लोगों को अच्छी लगने वाली चीज देने में कंजूसी क्यों की जाए भला। वैसे भी चिट्ठों के साइज का अभी मानकीकरण नहीं हुआ, इसलिये लंबे-छोटे की परिभाषा अस्पष्ट है। वैसे बहुत छोटी पोस्ट देखकर फुरसतिया को मुन्नाभाई एमबीबीएस का डायलाग याद आता है जिसमें हॉस्टल के कमरे को देखकर सर्किट कहता है, "भाई! ये कमरा तो शुरु होते ही खतम हो गया।" छोटी पोस्ट लिखने में संकोच का कारण शायद यह भी है कि फुरसतिया अपने ब्लॉग को बांस मानने में हिचकते हैं। बांस की कहानी संक्षेप में कुछ यूँ है‍:
    एक ट्रक के पीछे बहुत से कुत्ते हांफते हुये भाग रहे थे। किसी ने एक कुत्ते से पूछा, "तुम कहां जा रहे हो?" कुत्ता हांफते हुये बोला, "मेरे आगे वाले से पूछो। जहां वह जा रहा है, वहीं मैं भी जा रहा हूं"। आगे वाले ने भी यही जवाब दिया। जब सबसे आगे वाले से पूछा गया तो वह हांफते हुये बोला, "यह तो नहीं पता हम कहां जा रहे हैं। बस इस ट्रक के पीछे लगे हैं। ट्रक में लदे हैं बांस। यह ट्रक जहां तक जायेगा हम वहां तक जायेंगे। जहां ट्रक रुकेगा, बांस उतारे जायेंगे, फिर गाड़े जायेंगे। जहां बांस गड़ेंगे हम वहीं मूत के भाग आयेंगे।

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  5. यार लम्बा चौडा आलेख तो मै भी नही पढ सकता... देखो ना.. यह वाला भी पुरा नही पढ पाया. :-)

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  6. भई वाह । होनहार व्यक्ति की पहचान पालने में ही होती है । अनूप जी के लेख उनके अनुभवी होने के कारण कटार की धार है वही आपके लेख ताज़ी मन्द ठन्डी हवा का झोंका । दोनों की अपनी अलग जगह है दोनों ही हम ब्लोगरज़ के लिए ज़रूरी ।

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  7. जहाँ तक गर्मी की बात है, सबको इस बात का एहसास है कि ग्लोबल वार्मिंग का असर है, मगर इस दिशा में न्यूनतम कार्य हो रहा है। हमें स्थानीय स्तर पर खुद ही इस दिशा में आगे बढ़ना होगा। चक्कर ये है कि स्थिति हाथ से निकल चुकी है और हमें बची खुची पृथ्वी को बचाना ही होगा।

    अनुराग
    http://hindi-mishranurag.blogspot.com/2006/05/blog-post.html

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