Thursday, June 29, 2006

सांस्कृतिक चेतना का पतन

हालही में मैं दिल्ली गया था। घूमने-फिरने के मक़सद से वहाँ मैं एक मॉल में गया। घुसते ही ऐसा जान पड़ा मानो मैं भारत में नहीं, बल्कि अमेरिका या ब्रिटेन में हूँ। पूरे मॉल में मुझे कहीं भी देवनागरी अक्षर लिखे नहीं दिखाई दिए। सब कुछ अंग्रेज़ी में ही लिखा था। इतना ही होता तो भी कोई बात नहीं थी, लेकिन ग़ौर किया तो पाया कि कई लोग आपस में भी अंग्रेज़ी में बातचीत कर रहे हैं।

भाषा तो संस्कृति की वाहक मात्र है। क्या यह स्थिति हमारे सांस्कृतिक पतन को नहीं दिखलाती है? संस्कृति जिन घटकों से मिलकर बनती है, वे सभी धीरे-धीरे हमारे द्वारा परित्यक्त होते जा रहे हैं और मुझे ऐसा लगता है कि हम नक़ल की संस्कृति को स्वेच्छा से ढो रहे हैं।

संस्कृति की विशिष्टताओं की रक्षा करते हुए उसे विकसित करने की बात तो दूर रही, हम अपनी सांस्कृतिक धरोहर सहेज भी नहीं पा रहे हैं। हमें अपनी संस्कृति के उपादानों का इस्तेमाल लज्जास्पद लगता है। आज गाँवों में भी ज़्यादातर लोग शर्ट-पेण्ट पहने दिखाई देंगे। भारतीय वेश-भूषा अपने ही देश में विलुप्त होने की कग़ार पर है। जहाँ एक ओर ज़्यादातर देशों के राजपरिधान भारतीय वस्त्रों से प्रेरित हैं और भारतीय परिधानों की ही तरह उनमें क्रमवार पटलियाँ गिराने की कोशिश होती है, वहीं हिन्दुस्तानियों को ये कपड़े पहनने में शर्म महसूस होती है।

हालाँकि संगीत में मेरी कोई ख़ास गति नहीं है, लेकिन रुचि ज़रूर है। इसलिए कुछ एक संगीतज्ञों से मिलना-जुलना भी है। उनमें से एक से संगीत पर मेरी चर्चा हो रही थी। उन्होंने बताया कि पिछले ५०० वर्षों से भारतीय संगीत में कोई ख़ास विकास नहीं हुआ है। ५०० साल पहले वह जैसा था, आज भी कमोबेश वैसे-का-वैसा ही है। भारतीय संगीत की उन्नति ठप है, क्योंकि अपने ही संगीत में हमारी कोई दिलचस्पी नहीं है।

बौद्ध काल में भारतीय शिल्पकला ने जिन ऊँचाईयों को छूआ था, वहाँ पहुँचना तो लगभग नामुमकिन है। लेकिन हमारा शिल्प इस समय बिल्कुल भाव-शून्य और बेढंगा है। यूरोपीय शिल्प की नक़ल करने के चक्कर में न घर के रहे न घाट के। ये पतन के चिह्न हर जगह मौजूद हैं, जहाँ नज़र उठाइए वहीं दिख जाते हैं। यहाँ तक कि हमारा साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। सभी इस बात से भली-भांति वाकिफ़ हैं कि हिन्दी साहित्य की कितनी दुर्दशा है। हिन्दी साहित्य अंग्रेज़ी बेस्टसेलर्स के पैरों तले दब कर चीत्कार कर रहा है, लेकिन शायद ही कोई सुनने वाला है। इसे पढ़ने वाले भी दिनों-दिन घटते जा रहे हैं। प्रेमचन्द भले ही कुछ लोग पढ़ लें, लेकिन वे भी समकालीन साहित्य से अनजान हैं। इतना ही नहीं, हिन्दी साहित्य और रोना-धोना लगभग एक ही चीज़ हो गए हैं। शायद ऐसा होना कुछ हद तक स्वाभाविक भी है, यह हज़ार सालों की ग़लामी का प्रतिफल है। नाटक और दार्शनिक काव्य आदि अनेक विधाओं के मामले में तो हिन्दी साहित्य रेगिस्तान की तरह है। हिन्दी साहित्यिक परिदृश्य में किसी भी दूसरी यूरोपीय भाषा के मुक़ाबले बहुत कम विविधता है। वैज्ञानिक साहित्य को तो छोड़ ही दीजिए, भारतीय भाषाओं में इसका नामोनिशान भी मुश्किल से मिलता है।

भाषा उन कुछ आख़िरी सांस्कृतिक सूत्रों में से है, जो अभी तक जीवन्त हैं। लेकिन यह सूत्र भी धीरे-धीरे हमारे हाथों से निकलता जा रहा है। हिन्दी को समृद्ध करना न केवल हिन्दी-प्रेम के लिए ज़रूरी है, बल्कि मृतप्राय संस्कृति में फिर से प्राण फूँकने का यह सबसे सरल रास्ता है। हर राष्ट्र का एक व्यक्तित्व होता है, जो उसकी संस्कृति के माध्यम से व्यक्त होता है। संसार का इतिहास यह बताता है कि केवल वही राष्ट्र ऊपर उठ सके, जिनका सांस्कृतिक व्यक्तित्व अपनी विशिष्टताओं को सहेजे रहा और इसी के साथ उन्होनें पूरे‍ विश्व की सांस्कृतिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त किया। यूरोप में अगर देखें तो प्राचीन यूनान और रोम इसके उदाहरण हैं। बाद में वही यूनानी संस्कृति पूरे यूरोप में पुनर्जागरण (रेनेसां) का मूल रही। उसने यूरोपीय कला, साहित्य और चिन्तन को प्राचीन यूनानी भावों के आधुनिक रंग में रंग दिया। यह एक विचित्र लेकिन प्राणदायी ‘आधुनिक प्राचीनता’ थी।

यहाँ भारत में भी इसी तत्व की ज़रूरत है। प्राचीन उच्च भावों को आधुनिकता के अनुकूल बनाकर फिर ग्रहण करने की आवश्यकता है। राष्ट्र के तौर पर अपना व्यक्तित्व सहेजने की ज़रूरत है। अगर एक राष्ट्र के तौर पर हम अपनी अस्मिता को बरक़रार रखना चाहते हैं तो सांस्कृतिक चेतना का जागरण अपरिहार्य है। संस्कृति और जीवन के सभी पक्षों को फिर से भारतीय भावों की तेजस्विता से अनुप्राणित करना होगा। भाषा को समृद्ध करना पहला और सबसे ज़रूरी काम है। हिन्दी का प्रचार-प्रसार और इसमें ज़्यादा-से-ज़्यादा विविध सामग्री का सर्जन आवश्यक है। लेकिन सबसे पहले हमें अपनी भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मान और गर्व का भाव दीप्त करना होगा। सांस्कृतिक निष्ठा ज़रूरी है। हिन्दी के माध्यम से ही भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण सम्भव है।

4 comments:

  1. भाषा और संस्कृति के प्रति सम्मान और गर्व का भाव दीप्त करना होगा।सही है।

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  2. भारत बदल रहा है प्रतीक जी. जिस बंबइया फ़िल्मों को हम गाहे-बगाहे कोसते रहते हैं, हिंदी का पताका असल में वो ही फहरा रहे हैं. दूसरे नंबर पर रखे जा सकते हैं समाचार चैनल और एफ़एम रेडियो वाले, भले ही ज़्यादातर समय वो कचरा परोसते हों.

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  3. बात कहीं से भी चले, आखिरकार बाज़ार और लाभ पर पहुँच कर रुक जाती है. शोपिंग माल में वे लोग सब कुछ विदेशी ही बेचते हैं या फिर ऐसा कि विदेशी लगे, वहाँ हिंदी में लिखने से उसकी कीमत कम हो जायेगी. पर अगर खरीदने वालों को समझ न आये तो दूसरी भाषा में भी लिखना पड़ता. अपनी भाषा में गर्व नहीं शर्म महसूस होती है, अधिकतर भारत को, और पढ़ा लिखा भारत तो अँग्रेजी को ही पहली भारतीय भाषा मानता है.

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  4. आपको जानकर खुशी होगी हमारे यहाँ कई शोपींग मोल में सुचनाएं, दिशा सुचक वगेरे गुजराती में रहते हैं.

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