Saturday, July 22, 2006

नहीं हैं आसां नक़लची होना भी

अभी कुछ ही दिनों पहले हमारी परीक्षाएँ ख़त्म हुईं हैं। वैसे तो हमारा मानना है कि इम्तेहान होने ही नहीं चाहिए, लेकिन अगर होते भी हैं तो ये पास-फ़ेल का रट्टा इसमें नहीं होना चाहिए। क्योंकि इसकी वजह से विद्यार्थियों को बहुत टेंशन हो जाती है। हालाँकि यही टेंशन छात्र-छात्राओं को जी-तोड़ मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है।

कई लोग ऐसा सोचते हैं कि कुछ विद्यार्थी मेहनत करते हैं और कुछ नहीं भी करते, तभी तो फ़ेल हो जाते हैं। लेकिन बहुत-सी और धारणाओं की ही तरह यह धारणा भी बिल्कुल ग़लत है। हर एक मेहनत करता है, लेकिन फ़र्क़ यह है कि कुछ पढ़ने में महनत करते हैं और कुछ खर्रे-पर्चियाँ बनाने में। दोनों ही रात-रात भर जाग कर काम करते रहते हैं।

लेकिन असलियत ये है कि खर्रे बनाने में ज़्यादा महनत लगती है और पढ़ाई करने में कम। हमारा एक सहपाठी है, नाम है पुत्तन। बेचारा साल भर कुछ ख़ास पढ़ नहीं पाया; उसके हिसाब से इसमें सारा-का-सारा दोष अध्यापकों, माँ-बाप, पड़ोसियों, परिस्थितियों और भगवान का है। हमें भी उसकी बात जँचती है, इन सब का दोष न होता तो भला कैसे दिन भर पास वाले गर्ल्स कॉलेज के गेट पर खड़ा रह पाता? ख़ैर, इम्तिहान से एक दिन पहले हमारे पास आया और विषय, किताब और उसकी कुंजी का नाम पता करके चला गया। रात को उसका फ़ोन आया – कुछ सवालों को पढ़ कर सुनाया और पूछने लगा, किस चैप्टर में मिलेंगे। हमने बता दिया, लेकिन साथ ही ऐसा लगा कि हमसे चुन-चुन के कुछ सवाल ही क्यों पूछ रहा है? हो-न-हो ज़रूर पर्चा आउट करा लिया है, जो कि ऐसे न पढ़ने वाले जुगाड़ी छात्र अक़्सर कराने की कोशिश करते हैं। ख़ैर, बात आई-गई हो गई।

अगले दिन परीक्षा में वो हमसे तीन-चार बेंच आगे बैठा था और दनादन नक़ल किए जा रहा था। परीक्षा के दौरान कमरे में उड़न दस्ता आया – और ख़ास बात यह है कि ये लोग भी देखते ही पहचान जाते हैं कि कौन नक़लती है, केवल शक़्ल देख कर ही। मानो पहुँचे हुए संत हों और चेहरा देख कर ही आगत-अनागत सब समझ जाते हों। तो उनमें से एक खूंसठ-सा दिखने वाला मास्टर पुत्तन की ओर बढ़ा, उसे अपनी ओर बढ़ते हुए देख कर पुत्तन के होश फ़ाख्ता हो गए। लेकिन पुत्तन भी मंझा हुआ खिलाड़ी था, ऐंवईं नहीं था, खेला-खाया था। जल्दी से पर्चिर्यों को गुड़ी-मुड़ी करके एक छोटी गोली बनाई और खा गया और इस तरह बच भी गया। हालाँकि इसके बाद वह एक भी सवाल हल नहीं कर पाया और कापी पर बस चील-बिलौए बनाता रहा। अब बताइए कि यह काम ज़्यादा मुश्किल है या फिर पढ़ाई करके उत्तीर्ण होना।

पुत्तन की ये हरकत देख कर हम अचम्भित रह गए। लेकिन ये तो कुछ भी नहीं है, नक़लचियों ने न जाने कितने नए-नए तरीक़े इजाद कर रखे हैं। एक लड़का हमारे पास ही बैठता था और शक़्ल से निहायत ही भोला-भाला शरीफ़ बांका गबरू नौजवान दिखाई देता था। हालाँकि गबरू नौजवान तो था, लेकिन हमारे बाक़ी सोचे गए विशेषण सब-के-सब ग़लत साबित हुए। वो बॉल-पेन के अन्दर खर्रे घुसा के लाता था। हमने सुना है कि आज़ादी से पहले पूर्वी बंगाल में ऐसा बेहतरीन मलमल का कपड़ा बनता था, कि एक माचिस की डिब्बी में से पूरी-की-पूरी मलमल की साड़ी निकल आती थी। पहले हमें इस बात पर यक़ीन नहीं होता था। लेकिन जब उस लड़के के पेन के अन्दर से दस्ते के दस्ते काग़ज़ निकलते देखे, तो उन पुरानी सुनी-सुनाई बातों पर भी यक़ीन हो गया। किसी ने हमें बताया कि मुंह में मोमिया दबाकर उसके अन्दर नक़ल कैसे छिपाई जाए, तो कोई छुपाने के इस गुह्य कार्य के लिए अपने अधोवस्त्रों का इस्तेमाल करने की सलाह देता मिला। ऐसी मौलिक सोच पढ़ने-लिखने वालों में नहीं होती है। नक़लची जिस शिद्दत से नई-नई नक़ल की विधियाँ खोजते रहते हैं, उसका मुक़ाबला तो वैज्ञानिक भी नहीं कर सकते हैं।

और दूसरे सभी क्षेत्रों की तरह नक़ल में भी वही मात खाते हैं, वही पिटते हैं, वही पकड़े चाते हैं; जो या तो पुराने तरीक़ों पर ही अटकें हों, रुढिवादी परंपरागत ढ़र्रे पर पुराने तरीक़ों से नक़ल कर रहे हों। या फिर नौसीखिए, जिनमें नक़ल के तजुर्बे की अभी काफ़ी कमी है। अब मेरे ही कमरे में एक पकड़ा गया। वो मूर्ख था और इसीलिए पकड़ा भी जाना चाहिए था। नक़ल का वही एजओल्ड तरीक़ा, वह मूढ़ अपने जूतों में खर्रे छिपा कर लाया था। इसी तरह एक मूरख अपनी बाहों पर कुछ फ़ॉर्मूले लिख कर लाया था और पकड़ा गया। बाद में पुत्तन से इस बाबत बात हुई, उसका मानना है ऐसे लोगों का पकड़ा जाना नक़ल की कला के विकास के लिए निहायत ज़रूरी है। ये सब बच के निकल गए तो नक़ल के नए तरीक़ो की खोज को गहरा धक्का लगेगा। इस दौरान बहुत-से नौसीखिए भी देखने को मिले, जो सामने टीचर को देखकर घबरा जाते हैं और उनका चेहरा देखकर ही टीचर की समझ में आ जाता है कि छोकरा नक़ल कर रहा है। ऐसे लोगों का तो एक ही इलाज है – अभ्यास। जैसे-जैसे ये लोग इम्तिहान देते जाएंगे, अपने आप ही पक्के घड़े हो जाएंगे।

फिर अगर कोई बार-बार टॉइलेट जा रहा हो, तो समझना चाहिए कि वह पक्का नक़लची है। इम्तेहान के वक़्त बड़े-से-बड़ा पुस्तकालय भी टॉयलेट से रश्क़ खाता है। वहाँ किताबों की किताबें, पर्चियों की पर्चियाँ, नोट्स के नोट्स – सभी कुछ बहुतायत में पाए जा सकते हैं। वो तो हमारे पुराने कुसंस्कार थे कि हम वहाँ किसी भी चीज़ को उठा नहीं पाए, अगर कोई होशियार होता तो काग़ज़ो को उठा बाइंड करवा कर बेचता और चार-पाँच हज़ार तो आराम से कमा ही सकता था।

जब पूरी कक्षा में नक़ल धड़ल्ले से चल रही हो, तो हमारे जैसे लोग सबसे बेचारों की श्रेणी में आते हैं। हाल में ऐसा ही वाक़या हुआ, जिसके बाद हमें अपनी नालायकी पर बहुत ग़ुस्सा आया। हुआ यूं कि हमें एक प्रश्न नहीं आ रहा था और हमारे नक़लची पड़ोसी को खर्रा देव की कृपा से वो सवाल आता था। वैसे तो हमारी आँखें सिक्स-बाई-सिक्स हैं, लेकिन नक़ल के नाम से इतनी घबराहट होती है कि दिखना बन्द हो जाता है। उसने अपनी कापी थोड़ी-सी हमारी ओर सरकाई और पन्ना ऐसे पकड़ा कि उसका काम भी दनादन चलता रहे और हमारी नैया भी पार हो जाए। लेकिन नहीं, घबराहट के मारे हमें कुछ दिखता ही नहीं था कि अल्फ़ा बना है या बीटा, डिफ़्रेंशिएट किया है या इंटीग्रेट। दरअसल यह बचपन के कुसंस्कारों का ही दुष्परिणाम है। बचपन में हमारे कस्बे में एक नोटबुक बिकती थी, जिसके पीछे पट्ठे पर लिखा रहता था –

नक़ल हमेशा होती है, बराबरी कभी नहीं
सुन्दर लेखन का सपना, सपना ब्रांड कापियाँ हमेशा ख़रीदें

लगता है इसकी पहली पंक्ति का बहुत गहरा दुष्प्रभाव हमारे मन पर पड़ा। हालाँकि दूसरी पंक्ति का कोई ख़ास असर नहीं हुआ, क्योंकि हम दूसरे ब्रांड की कापियाँ भी बदस्तूर ख़रीदते रहे। ऐसे लोगों के बारे में यानी कि हम जैसे लोगों के बारे में हमने जब पुत्तन से जानना चाहा कि क्या हो सकता है ऐसों का, तो उसने ज्ञानी की तरह मुखमुद्रा बना कर कहा – ऐसे निकम्मे, नालायक और पढ़ाकू उल्लुओं का कुछ नहीं हो सकता, इन्हें नक़ल के दीन-धरम का अधिकार नहीं है। बस, हम मायूस हो गए कि बंदा कहता तो सही ही है। हमारे मुंह से बस इतना ही निकला – आसां नहीं है नक़लची होना भी।

Thursday, July 20, 2006

सन्नाटे को चीरती सनसनी

आजकल अपराध आधारित कार्यक्रमों की मानो बाड़ सी आई हुई है। हर चैनल पर इस तरह के एकाधिक कार्यक्रम चल रहे हैं। ख़ास बात यह है कि इन कार्यक्रमों की टीआरपी भी काफ़ी ऊँची है, जो यह दिखलाती है कि दर्शकों को ऐसे कार्यक्रम काफ़ी भा रहे हैं। इसी विषय पर एक ऑनलाइन सर्वेक्षण किया जा रहा है। उम्मीद है कि आप सभी कुछ वक़्त निकाल कर अपनी अमूल्य राय ज़रूर देंगे। यह सर्वेक्षण मूलत: हिन्दी में है। देखें यह सर्वेक्षण -

Crime Poll

Wednesday, July 05, 2006

“करिए छिमा”

हाल में मैंने प्रसिद्ध लेखिका शिवानी जी का कहानी-संग्रह ‘करिए छिमा’ पढ़ा। शिवानी जी के लेखन से यह मेरा पहला परिचय था। इस संग्रह में छ: कहानियाँ हैं और सभी कहानियाँ बेहद मार्मिक हैं।

एक बार किताब खोलकर पढ़ना शुरू किया तो पाँच कहानियाँ पढ़ डालीं। छठी कहानी भी पढ़ने की इच्छा थी, लेकिन चाह कर भी मैं पढ़ न सका। क्योंकि एक को छोड़कर सभी कहानियाँ दु:खान्त हैं और शिवानी जी की शैली सीधे हृदय पर असर करती है। उन्होंने अपनी इन कहानियों में स्त्री की व्यथा और सामाजिक बन्धनों को बेहद संजीदगी से उकेरा है। पाठक स्त्री पात्रों के कष्टों से अपना तादात्म्य महसूस करता है और उसका हृदय इन पात्रों की व्यथा-कथाओं में डूब जाता है। नारी के मनोभावों के विस्तृत आयामों का ऐसा गम्भीर चित्रण मैंने आज तक और कहीं नहीं पढ़ा।

पढ़ते-पढ़ते मैं इतना भावुक हो गया, कि अपने आँसुओं को टपकने से सम्हालना पड़ा। इससे पहले मैं अपने आप को काफ़ी कठोर और भावुकता के प्रति एक हद तक असम्वेदनशील भी समझता था, लेकिन मुझे क्या मालूम था कि शिवानी जी की क़लम का जादू सभी चट्टानें तोड़ कर अन्दर की तरलता आँखों तक ला देता है।

शिवानी जी की सभी कहानियों में उनकी पृष्टभूमि की छाप साफ़ तौर पर झलकती है। लेखक जब अपने अनुभवों के कैनवस पर कल्पना के रंग चढ़ाता है, तभी उसकी कृति दूसरे के मनोभावों को भी रंगने में सक्षम होती है। उनकी हर कहानी उत्तरांचल की सुगन्ध से सुवासित लगी और पात्र भी वहीं की संस्कृति के क़रीब नज़र आए। शायद कल्पना और ज़मीन से जुड़े अनुभवों का अद्भुत सम्मिश्रण ही उनकी कृतियों को इतना जीवन्त बनाता है।

Tuesday, July 04, 2006

ये अहिन्दू मन्दिर

भारत श्रद्धा का देश कहलाता है। शायद यही कारण है कि पूरा भारत मन्दिरों से पटा पड़ा है। कन्नड़ अभिनेत्री जयमाला के मन्दिर में प्रवेश सम्बन्धी ताज़ातरीन बयान के बाद तो हड़कम्प ही मच गया है। जयमाला ने अपने बयान में कहा था कि केरल के सबरीमाला मन्दिर में उन्होंने भगवान अयप्पा की मूर्ति को स्पर्श किया था। ग़ौरतलब है कि इस मन्दिर में नारियों का प्रवेश वर्जित है। इसी तरह के एक अन्य घटनाक्रम में दक्षिण भारतीय अदाकारा मीरा जैस्मिन ने राजराजेश्वर मन्दिर में भगवान का पूजन किया और चढ़ावा चढ़ाया, तो उनके ईसाई होने के कारण बवाल खड़ा हो गया। इसकी वजह यह है कि राजराजेश्वर मन्दिर में ग़ैर-हिन्दुओं का प्रवेश निषिद्ध है।

इन घटनाओं के बाद जो प्रश्न सबसे पहले दिमाग़ में आता है, वह यह है कि क्या ऐसे मन्दिर हिन्दू धर्म के अन्तर्गत आते हैं? क्या इतनी संकीर्णता और कट्टरता के लिए हिन्दू धर्म में कोई जगह है? क्या यह बहुकथित उक्ति हिन्दू धर्म के ही किसी शास्त्र की नहीं है –

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।
यत्रास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला क्रिया:।।

जिस धर्म के सर्वोच्च शास्त्र वेदों के कई सूक्त महिला ऋषियों की देन हैं, जिस धर्म में नारी को शक्ति का रूप समझा जाता है; क्या उस धर्म में ऐसा होना सम्भव है? क़तई नहीं। श्वेताश्वतर उपनिषद् में कहा गया है –

त्वं स्त्री पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी।

अर्थात् वही एक ब्रह्म स्त्री और युवक-युवती सभी में है। तो फिर ऐसे मन्दिर ज़रूर अहिन्दू मन्दिर हैं या फिर उन लोगों के हाथों में हैं जो हिन्दू नहीं हैं। ऐसे संकीर्ण विचार ‘हिन्दू’ शब्द के अन्तर्गत पैदा ही नहीं हो सकते। भले ही कोई जाति से ब्राह्मण हो, जनेऊ धारण करता हो, चौबीस घण्टे माला फेरता रहता हो; लेकिन अगर उसका हृदय हिन्दू धर्म की मूल भावना के अनुरूप विस्तीर्ण नहीं है, तो उसे हिन्दू कहलाने का कोई हक़ नहीं है।

इसी तरह ग़ैर-हिन्दुओं का प्रवेश मन्दिर में वर्जित करना सनातन धर्म को इस्लाम और ईसाईयत के स्तर पर खींच लाना है। श्रुति में कहा गया है –

सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।
ईश्वास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यांजगत्।

अर्थात् सभी साक्षात् ब्रह्म हैं, उसके अलावा और कुछ भी नहीं है। जगत् में सभी ईश्वर का रूप हैं। अगर वेद की ये उक्तियाँ‍ सहीं हैं, तो फिर मुसलमान, ईसाई, यहूदी और अन्य किसी भी मत को मानने वाला भी भगवान का ही रूप है और इसीलिए उसे भी भगवान के मन्दिर में जाने की इजाज़त होनी चाहिए। शिवमहिम्नस्तोत्र के अनुसार –

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।।

– "जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े या सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिलते हैं।" यह श्लोक स्पष्ट तौर पर कहता है कि सभी मार्गों से जाने वाले लोग, चाहे इस्लाम, ईसाईयत या और कोई भी मार्ग हो, आख़िर में उसी एक मंज़िल पर पहुँचते हैं।

अगर हिन्दू धर्म में यह सब है, तो निश्चय ही मन्दिरों में जो कुछ हो रहा है वह अहिन्दू कृत्य है। इसलिए सबरीमाला और राजराजेश्वर जैसे मन्दिरों के पुरोहित निश्चय ही हिन्दू कहलाने के लायक नहीं हैं और न ही ऐसे मन्दिर हिन्दू मन्दिर कहलाने योग्य है। हिन्दुओं को इन मन्दिरों के हिन्दू विरोधी आचरण की तीव्र निन्दा करनी चाहिए और हिन्दू धर्म की मूल भावना के पुनरुत्थान की कोशिश में तेज़ी लानी चाहिए।
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