Tuesday, July 04, 2006

ये अहिन्दू मन्दिर

भारत श्रद्धा का देश कहलाता है। शायद यही कारण है कि पूरा भारत मन्दिरों से पटा पड़ा है। कन्नड़ अभिनेत्री जयमाला के मन्दिर में प्रवेश सम्बन्धी ताज़ातरीन बयान के बाद तो हड़कम्प ही मच गया है। जयमाला ने अपने बयान में कहा था कि केरल के सबरीमाला मन्दिर में उन्होंने भगवान अयप्पा की मूर्ति को स्पर्श किया था। ग़ौरतलब है कि इस मन्दिर में नारियों का प्रवेश वर्जित है। इसी तरह के एक अन्य घटनाक्रम में दक्षिण भारतीय अदाकारा मीरा जैस्मिन ने राजराजेश्वर मन्दिर में भगवान का पूजन किया और चढ़ावा चढ़ाया, तो उनके ईसाई होने के कारण बवाल खड़ा हो गया। इसकी वजह यह है कि राजराजेश्वर मन्दिर में ग़ैर-हिन्दुओं का प्रवेश निषिद्ध है।

इन घटनाओं के बाद जो प्रश्न सबसे पहले दिमाग़ में आता है, वह यह है कि क्या ऐसे मन्दिर हिन्दू धर्म के अन्तर्गत आते हैं? क्या इतनी संकीर्णता और कट्टरता के लिए हिन्दू धर्म में कोई जगह है? क्या यह बहुकथित उक्ति हिन्दू धर्म के ही किसी शास्त्र की नहीं है –

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता।
यत्रास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला क्रिया:।।

जिस धर्म के सर्वोच्च शास्त्र वेदों के कई सूक्त महिला ऋषियों की देन हैं, जिस धर्म में नारी को शक्ति का रूप समझा जाता है; क्या उस धर्म में ऐसा होना सम्भव है? क़तई नहीं। श्वेताश्वतर उपनिषद् में कहा गया है –

त्वं स्त्री पुमानसि त्वं कुमार उत वा कुमारी।

अर्थात् वही एक ब्रह्म स्त्री और युवक-युवती सभी में है। तो फिर ऐसे मन्दिर ज़रूर अहिन्दू मन्दिर हैं या फिर उन लोगों के हाथों में हैं जो हिन्दू नहीं हैं। ऐसे संकीर्ण विचार ‘हिन्दू’ शब्द के अन्तर्गत पैदा ही नहीं हो सकते। भले ही कोई जाति से ब्राह्मण हो, जनेऊ धारण करता हो, चौबीस घण्टे माला फेरता रहता हो; लेकिन अगर उसका हृदय हिन्दू धर्म की मूल भावना के अनुरूप विस्तीर्ण नहीं है, तो उसे हिन्दू कहलाने का कोई हक़ नहीं है।

इसी तरह ग़ैर-हिन्दुओं का प्रवेश मन्दिर में वर्जित करना सनातन धर्म को इस्लाम और ईसाईयत के स्तर पर खींच लाना है। श्रुति में कहा गया है –

सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन।
ईश्वास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यांजगत्।

अर्थात् सभी साक्षात् ब्रह्म हैं, उसके अलावा और कुछ भी नहीं है। जगत् में सभी ईश्वर का रूप हैं। अगर वेद की ये उक्तियाँ‍ सहीं हैं, तो फिर मुसलमान, ईसाई, यहूदी और अन्य किसी भी मत को मानने वाला भी भगवान का ही रूप है और इसीलिए उसे भी भगवान के मन्दिर में जाने की इजाज़त होनी चाहिए। शिवमहिम्नस्तोत्र के अनुसार –

रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषाम्।
नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव।।

– "जैसे विभिन्न नदियाँ भिन्न-भिन्न स्रोतों से निकलकर समुद्र में मिल जाती हैं, उसी प्रकार हे प्रभो! भिन्न-भिन्न रुचि के अनुसार विभिन्न टेढ़े-मेढ़े या सीधे रास्ते से जाने वाले लोग अन्त में तुझमें ही आकर मिलते हैं।" यह श्लोक स्पष्ट तौर पर कहता है कि सभी मार्गों से जाने वाले लोग, चाहे इस्लाम, ईसाईयत या और कोई भी मार्ग हो, आख़िर में उसी एक मंज़िल पर पहुँचते हैं।

अगर हिन्दू धर्म में यह सब है, तो निश्चय ही मन्दिरों में जो कुछ हो रहा है वह अहिन्दू कृत्य है। इसलिए सबरीमाला और राजराजेश्वर जैसे मन्दिरों के पुरोहित निश्चय ही हिन्दू कहलाने के लायक नहीं हैं और न ही ऐसे मन्दिर हिन्दू मन्दिर कहलाने योग्य है। हिन्दुओं को इन मन्दिरों के हिन्दू विरोधी आचरण की तीव्र निन्दा करनी चाहिए और हिन्दू धर्म की मूल भावना के पुनरुत्थान की कोशिश में तेज़ी लानी चाहिए।

13 comments:

  1. हम अक्सर हिन्दू धर्म के पतन का रोना रोते हैं, हिन्दूओं के साथ अन्याय की बातें करते है ऐसे में यह समाचार पढ़ कर दुख होता है।
    इसी जिद की वजह से आज पारसी धर्म समाप्त होने की कगार पर है, क्यों कि उनकी अगियारी में किसी गैर पारसी को जाने की इजाजत नहीं होती,अगर कोई पारसी लड़की या लड़का किसी गैर पारसी से विवाह कर लेता है तो उसे पारसी समुदाय से निष्कासित किया जाता है।
    इसाई धर्म जिस वजह से फ़ल फ़ूल रहा है उस का सबसे बड़ा कारण भी यही है कि वे हर धर्म के लोगों को इसाई बनाने को तैयार रहते हैं, उन्हें अपनी चर्च में जाने से कोई रोक नहीं है।

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  2. मुझे याद आता है कि इंदिरा जी को पुरी के मंदिर मे प्रवेश देने से इंकार कर दिया गया था. इसी तरह सोनिया गांधी भी राजीवजी के साथ पशुपतिनाथ मंदिर नहीं जा सकीं थीं. मेरे गांव में हरिजनों को प्रवेश के लिए आंदोलन करना पड़ा था. अब प्रतीक जी ने घटनाएं हमारे सामने रखीं है तो मेरा विचार है कि किसी भी मंदिर में प्रवेश की मनाही नहीं होनी चाहिए. इससे तो हिन्दू धर्म में लोगों की आस्था बढ़ेगी. हमें जातीय और लैंगिक भेदभाव से ऊपर उठना होगा. ग़ैरहिन्दुओं को भी अपने धार्मिक संस्थानों में प्रवेश देना चाहिए.. सर्वे भवन्तु सुखिन:

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  3. c/क़तई/कतई

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  4. कितना अच्छा होता कि हम अपने मन्दिरों में आने वाले हरेक व्यक्ति का सम्मान के साथ स्वागत करते | मन्दिर हमारे संस्कार केन्द्र होते | मन्दिर हिन्दू समाज को एक कर उसका पथ प्रदर्शन करते | मन्दिरों के चारो तरफ स्वच्छता और हरियाली का माहौल होता | मन्दिर पर्यटकों को अपनी ओर बरबस खींच लेते | मन्दिर में बदनाम पन्डे-पुजारियों के बजाय विद्वान और पूज्य महापुरुषॉं का आसन होता | किसी भी प्रकार के ढोंग को हिन्दू धर्म की मूल भावना के विरुद्ध समझा जाता | सबका एक महान ध्येय होता : " सारे विश्व को आर्य बनायेंगे " |

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  5. संकिर्णता के लिए हिन्दुधर्म में कोई स्थान नहीं हैं. नारी को अस्पर्श्य मानने वाले धर्मात्मा शायद पुरूष की कोख से जन्म लेते होंगे.

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  6. अब इनकी बातों पर मैं किया टिप्पणी लिखूँ? आजीब लोग अजीब भातें, महान देश के लोगों की महान बातें

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  7. is terah ke dharmik isthalon se to woh majaar acchhe jehan sab log ja sakte hain, hinduon ke kuch mandir aise hain, masjid me bhi shayad mahilayen nahi ja sakti, ek charch shayad sabke liye khula hai aur shayad gurudwara bhi?

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  8. desh ke zyadatatar maindiron main mahila aur purush dono ja sakte hain , to phir agar ek mandir aisa hai jisme mahilayen nahin ja sakti to itni hai-tauba kyun.agar purano ke waqt se aisa ho raha hai to shyaad iske peeche bhi koi karan hoga,kyunki jin mahilaon ko roka gaya hai woh 15-50 yani ki child bearing ya reproductive age ki hai,i know one such temple in MP jahan par mahilayen nahin ja sakti kyunki aisa kaha jata hai ki ise unke childbearing par asra padta hai,shayad aisa kuch,afterall dahej bhi isilye banaya gaya tha taki ladkiyon ko unki paitrik sampati ka haq diya jasake ,jo directly nahin diya jata,woh to hum logo ne us pratha ko kuparath bana diya.

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  9. Anonymous10:46 PM

    are gadho

    Mandi ab koi samajik jagah nahi rahi. Uska bhi commercialisation ho gaya hai. Jiska mandir uska rule. Unko agar kisiko mandir mein nahi aane dena to hum kya kar sakte hai? Kya hum bangladeshi ko BHARATVARSH mein aane kei anumati de sakte hai?

    Agar wah niji sampatti hai to unko apne kayde banane ka sampoorna adhikaar hai. Agar nahi to phir sabhi dharmik sthano ko saarvajani ghoshit kiya jaana chahiye.

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  10. हिन्‍दुत्‍व अथवा हिन्‍दू धर्म

    हिन्‍दुत्‍व एक जीवन पद्धति अथवा जीवन दर्शन है जो धर्म, अर्थ, काम, मोक्षको परम लक्ष्‍य मानकर व्‍यक्ति या समाज को नैतिक, भौतिक, मानसि‍क, एवं आध्‍यात्मिक उन्‍नति के अवसर प्रदान करता है।आज हम जिस संस्‍कृति को हिन्‍दू संस्‍कृति के रूप में जानते हैं और जिसे भारतीय या भारतीय मूल के लोग सनातन धर्म या शाश्‍वत नियम कहते हैं वह उस मजहब से बड़ा सिद्धान्‍त है जिसे पश्चिम के लोग समझते हैं।

    अधिक के लिए विश्व हिन्दू समाज Best Site on Hinduism

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  11. मैने अक्षरधाम मंदिर(गुजरात) पर हुए सितम्बर, २००२ के हमले के बाद कुछ पंक्तियाँ लिखी थीं जिसका भाव यह था कि यदि हिन्दू-धर्म को सबसे अधिक खतरा है तो वह बाह्यविध्वंसकारियों से उतना नहीं है, जितना कि तथाकथित अपने लोगों से. आज भी हम हिन्दू अपने भाईयों को देखना नहीं चाहते. जितनी बातें हमारे पवित्र ग्रन्थों में उद्धृत हैं, उसे तो हमने कब का हीं नदियों में प्रवाहित कर दिया. रोज हमारे लोगों की संख्या घट रही है और वह दिन दूर नहीं जब हम गर्व से यह कहना बन्द कर देंगे कि-
    "यूनान-मिश्र-रोमाँ सब मिट गये जहाँ से, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी."
    अभी भी समय चुका नही है, शर्त इतनी ही है कि "संकीर्ण मानसिकता" को त्यागकर इस वैश्विक "सनातन धर्म" में सबका स्वागत करें.
    सधन्यवाद..........
    मणिदिवाकर

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  12. ज़रूरी ये नहीं की उन्हें सिर्फ मंदिर में प्रवेश मिल जाए बल्कि ज़रूरी ये है की हम उनसे इंसानों जैसा ब्यवहार करें , उन्हें बराबरी का दर्जा दें . पहल इन चीज़ों में ही होनी चाहिए .


    मसूद रियाज़ खान

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