Wednesday, July 05, 2006

“करिए छिमा”

हाल में मैंने प्रसिद्ध लेखिका शिवानी जी का कहानी-संग्रह ‘करिए छिमा’ पढ़ा। शिवानी जी के लेखन से यह मेरा पहला परिचय था। इस संग्रह में छ: कहानियाँ हैं और सभी कहानियाँ बेहद मार्मिक हैं।

एक बार किताब खोलकर पढ़ना शुरू किया तो पाँच कहानियाँ पढ़ डालीं। छठी कहानी भी पढ़ने की इच्छा थी, लेकिन चाह कर भी मैं पढ़ न सका। क्योंकि एक को छोड़कर सभी कहानियाँ दु:खान्त हैं और शिवानी जी की शैली सीधे हृदय पर असर करती है। उन्होंने अपनी इन कहानियों में स्त्री की व्यथा और सामाजिक बन्धनों को बेहद संजीदगी से उकेरा है। पाठक स्त्री पात्रों के कष्टों से अपना तादात्म्य महसूस करता है और उसका हृदय इन पात्रों की व्यथा-कथाओं में डूब जाता है। नारी के मनोभावों के विस्तृत आयामों का ऐसा गम्भीर चित्रण मैंने आज तक और कहीं नहीं पढ़ा।

पढ़ते-पढ़ते मैं इतना भावुक हो गया, कि अपने आँसुओं को टपकने से सम्हालना पड़ा। इससे पहले मैं अपने आप को काफ़ी कठोर और भावुकता के प्रति एक हद तक असम्वेदनशील भी समझता था, लेकिन मुझे क्या मालूम था कि शिवानी जी की क़लम का जादू सभी चट्टानें तोड़ कर अन्दर की तरलता आँखों तक ला देता है।

शिवानी जी की सभी कहानियों में उनकी पृष्टभूमि की छाप साफ़ तौर पर झलकती है। लेखक जब अपने अनुभवों के कैनवस पर कल्पना के रंग चढ़ाता है, तभी उसकी कृति दूसरे के मनोभावों को भी रंगने में सक्षम होती है। उनकी हर कहानी उत्तरांचल की सुगन्ध से सुवासित लगी और पात्र भी वहीं की संस्कृति के क़रीब नज़र आए। शायद कल्पना और ज़मीन से जुड़े अनुभवों का अद्भुत सम्मिश्रण ही उनकी कृतियों को इतना जीवन्त बनाता है।

8 comments:

SHUAIB said...
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रणवीर said...

शिवानी जी ने जो स्त्री-व्यथा दर्शाने का जो महान कार्य किया है, आपने उनकी कृति के बारे में ब्लॉग लिखकर कुछ वैसा ही महान कार्य किया है। धन्यवाद

Pratyaksha said...

मुझे भी इनकी किताबें बेहद पसंद हैं खासकर कृष्ण्कली .

SHUAIB said...

इस लेख पर धन्यवाद। आपइका उर्दू ब्लॉग दुबारा पढा और पढ कर बहुत हंसी आई ;) प्रातिक भाई आपकी उर्दू बहुत अच्छी है मगर आपने लिखना क्यों छोडदिया? हां

Vijay Wadnere said...

शुऐब भाई,

व्लाग पढकर बहुत हँसी आई...याने कि जो लिखा था उसपर, यार लिखने वाले पर..? या ब्लाग पर?? :) थोडा तफ़्सील से बताया करो यार.

Manish said...

शिवानी के कई उपन्यास पढ़े हैं । अच्छी लेखिका हैं पर मेरी प्रिय कथाकार मन्नू भंडारी और आशापूर्णा देवी हैं।

renu ahuja said...

प्रतीक सही लिखा है शिवानी की धारा प्रवाहिता के बारे में, दूसरी बात ये है कि मैनें अब तक शिवानी जी के जितने भी उपन्यास पढे, सबमें एक बात काफ़ी कामन है.... नायिका की सुंदरता, उनके उपन्यासों मे चाहे उनकी नायिका काले या गौर वर्ण की हो परंतु उसका रूप वर्णन एसा होता है कि पाठक उसके सौर्न्दय कल्पना में एक रसिक की भांति खो जाए..और बड़ी बात ये की नख-शिख वर्णन के साथ शालीनता भी उस नायिका की विशेषता को बढ़ा देती है........!!!

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