Thursday, August 03, 2006

Film Review : Omkara

फ़िल्म समीक्षा : ओंकारा

यह बात अब मुझे बिल्कुल सही मालुम होती है कि इंदौर "इन्द्र की नगरी" है, क्योंकि जब से मैं इंदौर आया हूँ, यहाँ बारिश हो रही है। पिछ्ले दस दिनों से कभी तेज़ बारिश होती है तो कभी फुहार पड़ने लगती है, लेकिन बारिश पूरी तरह बन्द नहीं होती। इतने दिनों तक घर पर पड़े-पड़े मैं बुरी तरह ऊब गया और सोचा कि क्यों न चल के कोई धाँसू-सी फ़िल्म ही देख ली जाए, सो ओंकारा देखने पीवीआर पहुँच गया।

मक़बूल देखने के बाद और पीवीआर का 150 रू. का टिकट लेने के बाद मुझे भी औरों की ही तरह विशाल भारद्वाज से बहुत उम्मीदें थीं। लेकिन ओंकारा किसी भी एंगल से मक़बूल की तरह सॉलिड नहीं है। तो भाई लोग, अगर ओंकारा देखने की इच्छा हो तो इसकी तुलना मक़बूल से क़तई मत करना। इसका मतलब यह नहीं है कि ओंकारा बिल्कुल ही बक़वास है, लेकिन इतना ज़रूर है कि मक़बूल की टक्कर की नहीं है।

अब इस पिक्चर की कहानी क्या बताऊँ, कभी-न-कभी स्कूल के दौरान तो "ऑथेलो" पढ़ी ही होगी। लेकिन अगर आप भी मेरी कैटेगरी में लटके हुए हो, तो यहाँ पढ़ लो। "केसू फिरंगी" यानी कि विवेक ओबरॉय का उम्मीद के मुताबिक़ बहुत ही ढ़ीला अभिनय देखने को मिला। लेकिन जिसकी उम्मीद नहीं थी वह था केन्द्रिय किरदार "ओंकारा" = अजय देवगन का पिटी-पिटाई लीक पर वही पुराना मोनोटोनस-सा, एकरस-सा अभिनय। ऐसा लगता है कि अजय देवगन ने इस किरदार के लिए कोई ख़ास मेहनत नहीं की है। इस फ़िल्म में अपनी (?) "बिल्लो" उर्फ़ बिपाशा बसु चने के खेत में गन्ने कि तरह नज़र आई हैं, मतलब कि बिलकुल आउट ऑफ़ प्लेस। जिस तरह का माहौल पिक्चर में दिखाया गया है, उसमें बिपाशा ज़रा भी फ़िट नहीं होतीं हैं।

लेकिन सैफ़ अली खान ने "लंगड़ा त्यागी" के पात्र में अपनी ज़ोरदार अदाकारी से जान फूँक दी है। यूँ कह लीजिए कि सैफ़ ने ही पूरी फ़िल्म को अपने कन्धों पर ढ़ोया है। ये जानकर ख़ुशी हुई कि आख़िर सैफ़ अभिनय करना सीख ही गए। सैफ़ के अलावा कोंकणा सेन शर्मा भी दूध में पानी की तरह लगी हैं यानी की यूपी के ग्रामीण परिवेश में पूरी तरह घुली-मिली नज़र आई हैं।

लेकिन एक बात जो कि बिल्कुल भी मेरी समझ में नही आई, वो थी यूपी की लोकेशन्स पर फ़िल्म के किरदारों द्वारा हरियाणवी बोली का इस्तेमाल। यूपी में हरियाणवी कहाँ बोलते हैं भई? इससे पहले भी मुझे "बंटी और बबली" में ऐसा ही लोच्चा लगा था। लखनऊ का बंटी पूरी फ़िल्म में इलाहाबादी बोली बोलता दिखाया गया था। अजीब था... नहीं? बचपन में अपने गाँव में "आल्हा" सुना था - "आल्हा-ऊदल बड़े लड़ैया, उनकी मार सही न जाए" - ऐसा कुछ था। ओंकारा का यह गाना उससे बहुत प्रभावित लगा - "धम-धम धड़म धड़ैया रे, सबसे बड़े लड़ैया रे... ओंकारा"। अगर बॉस नहीं देख रहा है, तो ये भी देख लो - ओंकारा की वेब साइट

5 comments:

आलोक said...

हाँ, भाषा कभी हरियाणवी और कभी राजस्थानी थी। और दृश्य भी कभी लखनऊ के आसपास के कभी कहीं और के। बेअक्ली की हद।
इस मामले में सहर फ़िल्मी ही सही निकली थी। जैसे सीधे लखनऊ पहुँच गए हों।

हिंदी ब्लॉगर said...

अंग्रेज़ी सबटाइटल वाला प्रिंट देख रहा था, वरना आधे डायलॉग(ग़ाली-गलौच)तो सिर के ऊपर से ही निकल जाते. इतना ज़्यादा ग़ाली-गलौच डालने की कोई ज़रूरत भी नहीं थी.

पहली बार आपराधिक विषय पर कोई फ़िल्म देखी, जिसमें पुलिस की कोई भूमिका नहीं हो.

लंगड़ा त्यागी(सैफ़) और उसका दोस्त बने एक बंदे की एक्टिंग सबसे अच्छी लगी.

Anonymous said...

I don't agree with you. Omkara is a very good movie and omkara's music also rocks. I must say it's one of the best hindi movie. I liked Kareena Kapoor's performance most in this film.

- sanjay

protsahan said...

h

himanshu singh said...

तो चलो,

कोई तो जगह मिली जहाँ इस फिल्म के बनाने वालों को गाली दे सकूँ.

1. फिल्म की भाषा: पता नहीं भैया कौन सी भाषा मे बात कर रहे थे यह लोग.

2. गालियाँ: क्या यह फिल्म 15 साल के बच्चे के देखने लायक है ? इस फिल्म को तो A मिलना चाहिये था.

3. ऐक्टिंग: एक कुत्ते को भी कैमरे के सामने खङा कर दिया जाये, तो इस वह इस फिल्म के "कलाकारों" से ज्यादा अच्छा एक्टिंग कर लेगा.

4. फिल्म की कहानी में कोई भी दम नहीं था. सिनेमा हाल में आथे से ज्यादा लोग तो खुले आम इस फिल्म को गाली देने लग गये थे.

5. बिपाशा बासु जी का रोल देख कर तो मन गार्डन-गार्डन हो गया. यह औरत भी आखिर अपनी औकात पर आ ही गयी. सच में, लोग पैसे के लिये क्या नहीं करते :)

और पूछ्ने पर अंग्रेजी में डायलौग मारेंगे की वह नंगा नाच तो "स्क्रिप्ट की डिमांड थी" ....

सच में, इस फिल्म को बनाने वाला किसी दिन मेरे हाथ चढ गया तो बेडम पिटाई खायेगा.

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