Saturday, October 28, 2006

A Future with Hindi in Roman Script

रोमन लिपि के साथ हिन्दी का भविष्य

An example of Hindi written in Roman scriptकल अनुराग भाई ने रीडिफ़ के इस लेख की कड़ी दी – अ फ़्यूचर विद हिन्दी इन इंग्लिश स्क्रिप्ट। लेखक ने सम्भावना जताई है कि आने वाले समय में रोमन लिपि के ज़रिए हिन्दी को लिखा-पढ़ा जाएगा। लेखक के हिसाब से आज, जबकि हिन्दी एसएमएस और ई-मेल वगैरह रोमन में भेजे जा रहे हैं, तो ऐसे में हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं के लिए रोमन लिपि का प्रयोग बेहतर साबित होगा।

लेकिन मेरे ख़्याल से यह होना हाल-फ़िलहाल नामुमकिन ही है। क्योंकि हिन्दी के लिए देवनागरी इस वक़्त काफ़ी प्रचलित है। जो लोग नागरी में हिन्दी पढ़ने को लेकर सहज हैं, उनके मुक़ाबले आसानी से रोमन में एसएमएस और ई-मेल करने और पढ़ सकने वाले लोगों की तादाद काफ़ी कम है। इसके अलावा इनमें से भी ज़्यादातर लोग इसलिए रोमन का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि या तो उनके मोबाइल और कम्प्यूटरों में देवनागरी में लिखने की सुविधा नहीं है या फिर उन्हें इसके बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं है। रोमन में ई-मेल वगैरह लिखने वाले लोग खुद रोमन में पढ़ने की अपेक्षा देवनागरी में लिखा पढ़ने में ज़्यादा सहज हैं। इसका मतलब यह है कि रोमन का इस्तेमाल मजबूरी के कारण ज़्यादा होता है, बजाय कि अपनी पसंद से करने के।

लेखक ने यह भी तर्क दिया है कि जो चीज़ प्रचलित जो जाती है, उसे बदलना काफ़ी मुश्किल होता है। और जब कि रोमन का QWERT कुंजी-पटल प्रचलन में आ चुका है, इसलिए इसकी जगह देवनागरी के की-बोर्ड को बढ़ावा देना सम्भव नहीं होगा। हालाँकि इस तर्क में काफ़ी-कुछ सच्चाई है और कम्प्यूटर पर नागरी के प्रसार में विभिन्न की-बोर्ड ले-आउट की समस्या काफ़ी जटिल है, लेकिन फिर भी यह तर्क पूरी तरह ठीक नहीं है। क्योंकि अगर यह बात बिल्कुल सही है कि प्रचलित चीज़ को बदलना बहुत ज़्यादा मुश्किल होता है, तो फिर जबकि देवनागरी प्रचलन में है, इसे बदलना और हिन्दी को रोमन में लिखना ख़ासा मुश्किल काम साबित होगा। इसके अलावा तकनीक के विकास के साथ-साथ कम्प्यूटर पर हिन्दी आदि भारतीय भाषाओं में काम करना आसान होता जा रहा है। ऐसे में पहिए को फिर पीछे की ओर घुमा कर रोमन का प्रयोग चालू करना कितना सही होगा। मेरे ख़्याल से कुछ वर्षों में कम्प्यूटर पर हिन्दी को पढ़ना-लिखना उतना ही आसान होगा, जितना आज अंग्रेज़ी को पढ़ना-लिखना है। ग़ौरतलब है कि मनीष भाई अपने ब्लॉग 'एक शाम मेरे नाम' को मूलत: रोमन में ही लिखते थे और अभी भी उनके ब्लॉग का रोमन संस्करण काफ़ी पढ़ा जाता है। इस मुद्दे पर आप लोगों की क्या राय है?

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Friday, October 27, 2006

PM Likes Lage Raho Munna Bhai

Arshad Varsi and Sanjay Dutt in Lage Raho Munna Bhaiआजकल चारों ओर 'लगे रहो मुन्ना भाई' और 'गांधीगिरी' की ही चर्चा है। शायद ही इससे कोई अछूता बच पाया हो। 'लगे रहो मुन्ना भाई' के प्रशंसकों की सूची काफ़ी लम्बी ही नहीं, बल्कि 'ऊँची' भी है। 'ऊँची' बोले तो कई हाई प्रोफ़ाइल लोगों को भी यह फ़िल्म बहुत पसन्द आई है, और इसमें हमारे प्रधानमन्त्री डॉ. मनमोहन सिंह भी शामिल हैं।

हाल में प्रधानमंत्री ने अपने व्यस्त कार्यक्रम में से वक़्त निकाल कर पूरे परिवार के साथ इस फिल्म का लुत्फ़ उठाया और इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। अपने आवास पर हुई विशेष स्क्रीनिंग के बाद प्रधानमंत्री ने कहा - ''यह फ़िल्म बापू के सत्य और मानवता के संदेश को दर्शाती है।'' प्रधानमंत्री के साथ प्रधानमंत्री-कार्यालय के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों ने भी फ़िल्म को देखा और सराहा। कुछ दिनों पहले अपनी दक्षिण अफ़्रीका यात्रा के दौरान भी प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने 'लगे रहो मुन्ना भाई' की काफ़ी तारीफ़ की थी।

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Thursday, October 26, 2006

किसके सर फोड़ा जाए हार का ठीकरा

Indian Captain Rahul Dravid and coach Greg Chappellअपने सिर पर इस ठीकरे को फुड़वाने के दो प्रबल दावेदार हैं - ग्रेग चैपल और राहुल द्रविड़। दोनों ही भारत की हार को पक्का करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते हैं। वेस्टइण्डीज़ जैसी फिसड्डी टीम पर भी जीत हासिल करना इनके लिए नामुमकिन साबित हो रहा है। वेस्टइण्डीज़ से हुए आख़िरी छ: मुक़ाबलों में से पाँच में भारत को हार का मुँह देखना पड़ा है। सवाल यह है कि गुरू ग्रेग अपने मूर्खतापूर्ण प्रयोगों को कब बन्द करेंगे। ये अजीबो-ग़रीब प्रयोग न केवल बार-बार भारत की हार का कारण बन रहे हैं, बल्कि खिलाड़ियों का मनोबल भी मटिया-मेट कर रहे हैं। फिर भी ग्रेग चैपल का कहना है कि वो इन प्रयोगों का जारी रखेंगे। अब तो भगवान ही मालिक है भारतीय क्रिकेट टीम का।

लेकिन इसके ज़िम्मेदार सिर्फ़ ग्रेग चैपल ही नहीं हैं, बल्कि राहुल द्रविड़ की भी इसमें भूमिका है। राहुल द्रविड़ भले ही एक अच्छे बल्लेबाज़ हों, लेकिन कप्तान के तौर पर वे विफल साबित हो रहे हैं। कप्तान में जो आक्रामकता और जोश चाहिए, वह राहुल द्रविड़ से नदारद है। कल फ़ील्डिंग के लिए आते वक़्त ही उनके चेहरे पर निराशा का भाव साफ़ देखा जा सकता था। कप्तान को पूरे दल में उत्साह और जोश फूँकने के लिए पहले इन गुणों से खुद लबरेज़ होना चाहिए; लेकिन जब द्रविड़ खुद ही हताश नज़र आते हैं तो टीम का क्या हाल होता होगा, आप खुद ही अन्दाज़ा लगा सकते हैं।

इसके अलावा अब हमें भारतीय टीम को हारते हुए देखने की आदत डाल लेनी चाहिए। क्योंकि जब तक योग्यता और प्रदर्शन पर राजनीति हावी रहेगी, तब तक जीत दूर ही रहेगी। टीम प्रबन्धन न जाने क्यों सहवाग को उसी तरह चिपकाए हुए है, जिस तरह बन्दरिया अपने बच्चे को खुद से हमेशा चिपकाए रहती है। सहवाग का टीम में होना केवल क्रिकेट में फैली राजनीति को ही दर्शाता है, जबकि कई क़ाबिल लोग बाहर ही बैठे रह जाते हैं। पिछले तीस मैचों में सहवाग का रन औसत गांगुली से भी कम है, तो फिर ये दोहरा मापदण्ड नहीं तो और क्या है?

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Wednesday, October 25, 2006

Movie Review : DON - The Chase Begins Again (2006)

फ़िल्म समीक्षा : डॉन - द चेस बिगिन्स अगेन (२००६)

DON - The Chase Begins Again (2006)इस समीक्षा की शुरूआत एक प्रश्न से करते हैं – फ़रहान अख़्तर को डाइरेक्टर किसने बनाया? वह व्यक्ति जो भी रहा हो, मेरा मानना है‍ कि सारा-का-सारा दोष उसी का है। फिल्म का पहला हाफ़ असली ‘डॉन’ की फ़्रेम-टू-फ़्रेम यानि कि हूबहू नक़ल है और वहीं तक आप इस ‘डॉन’ को भी झेल सकते हैं। लेकिन दूसरे हाफ़ में जहाँ से फ़रहान अख़्तर और उनके सिपहसालारों ने अपनी बुद्धि का प्रयोग करना चालू किया है, फिल्म वहीं से अनझेलेबल हो गयी है।

डॉन में काम करना शाहरुख़ के लिए भी आसान काम नहीं था, क्योंकि ऐसा करने पर अमिताभ बच्चन से तुलना होना लाज़मी था। लेकिन फिर भी शाहरुख़ ख़ान ने इस चुनौती को स्वीकार कर साहस का परिचय तो दिया ही है। और ये भी ज़ाहिर सी बात है फिल्म में अगर शाहरुख़ की तुलना अमिताभ से की जाए, तो वे कहीं टिकते नहीं है। डॉन की भूमिका में अमिताभ बच्चन ने गंभीर चेहरे और बॉडी लेंग्वेज से जो अपने चारों ओर जो ऑरा खड़ा किया था, शाहरुख़ उसे पैदा करने के लिए बहुत जूझते दिखाई दिए हैं। हालाँकि एक हद तक वे इसमें सफल साबित हुए हैं, लेकिन वे वह बात न ला सके जो अमिताभ ने डॉन के व्यक्तित्व में उकेरी थी। हालाँकि शाहरुख़ ख़ान से इससे ज़्यादा उम्मीद भी नहीं थी। उन्होंने अपने सीमित दायरे में रहकर भी ठीक काम किया है। अगर अमिताभ की छवि को दिमाग़ से निकाल कर फ़िल्म को देखा जाए, तो शाहरुख़ ने भी किरदार के साथ न्याय किया है।

लेकिन अगर बात केवल शाहरुख़ ख़ान की ही होती, तो ठीक था। फ़िल्म में फ़रहान अख़्तर ने भी कुछ काम किया है। और ऐसा काम किया है कि फ़िल्म को वाहियात बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। फ़िल्म की कहानी से तो आप सभी वाकिफ़ हैं ही। लेकिन अच्छी ख़ासी पटकथा को किस तरह बकवास बनाया जाए, कोई फ़रहान अख़्तर से इसे बखूबी सीख सकता है। कहानी में जो तथाकथित ट्विस्ट दिया गया है, उसे में यहाँ नहीं बताऊंगा। क्योंकि हो सकता है कि कई लोग वाक़ई यह देखना चाहते हों कि एक अच्छी पिक्चर का कचूमर कैसे निकाला जाता है। लेकिन अगर मेरी मानें, तो सिनेमा हॉल में जाकर पैसे बर्बाद करने से बेहतर होगा कि कुछ और करें।

अन्य फिल्म समीक्षाएँ :
१. खोसला का घोंसला
२. ओंकारा
३. गोलमाल
४. अपहरण

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Monday, October 23, 2006

HindiBlogs.com नए रूप में

HindiBlogs.com को देखने और क़ीमती सुझावों के लिए हिन्दी ब्लॉग मण्डल का हार्दिक धन्यवाद। आपके सहयोग से प्रेरित होकर "हिन्दीब्लॉग्स डॉट कॉम" आपके सामने एक बार फिर हाज़िर है नई ख़ूबियों और सुविधाओं के साथ। भारतीय पाठकों को ध्यान में रखकर पिछले दिनों इसमें कई बदलाव किए गए हैं। उम्मीद है कि ये बदलाव आपको पसंद आएंगे और आपकी अपेक्षाओं पर खरे उतरेंगे। कुछ नए बदलाव इस तरह हैं -
  • लगभग सभी सक्रिय हिन्दी चिट्ठों का संचयन
  • तेज़ रफ़्तार - हर 15 मिनट में चिट्ठा जगत् की नई प्रविष्टियों का एग्रीगेशन
  • एजेक्स (AJAX) आधारित डिज़ाइन
  • कई नए ब्लॉग स्रोतों का समन्वय जैसे -
  • बॉलीवुड की ताज़ातरीन ख़बरें, गपशप, फिल्म समीक्षाएँ और भी बहुत कुछ
  • क्रिकेट की दुनिया की नई हलचल, लाइव स्कोर कार्ड और समाचार
  • शेयर बाज़ार का उतार-चढ़ाव
  • ज्योतिष और राशिफल, एवं अन्य बहुत कुछ

आपके सुझावों का इन्तज़ार रहेगा। अगर आपका चिट्ठा अभी तक यहाँ प्रदर्शित नहीं हो रहा है, तो कृपया मुझे इस ई-पते पर सूचित करें -

तो देर किस बात की, देखिए HindiBlogs.com और खो जाइए चिट्ठों के संसार में।

Saturday, October 21, 2006

मासिक राशिफल - अक्‍टूबर 2006

(Monthly Forecast for October 2006)
चंद्र राशि आधारित

मेष राशि
(चू, चे, चो, ला, ली, ले, लू, ले, लो, आ)
माह का प्रथम पक्ष आर्थिक तथा स्वास्थ्य की दृष्टि से कष्टप्रद साबित हो सकता है। नौकरी परिवर्तन का योग है। व्यापार व रचनात्मक क्षेत्रों से जुड़े हुए व्यक्तियों को सहकर्मियों के असहयोग के चलते तनाव का सामना करना पड़ सकता है। धन प्राप्ति के लिए कानूनी पचड़े में पड़ने की सम्भावना है। विपरीत लिंग के मित्रों से सावधान रहें अन्यथा नुकसान हो सकता है। पारिवारिक एवं व्यावसायिक दायित्वों के कारण दवाब महसूस करेंगे। आध्यात्मिक गुरू की प्राप्ति हो सकती है। विदेश में शिक्षा अथवा प्रवास के क्षेत्र में प्रगति होने की सम्भावना है। पारीवारिक तनाव चरम पर पहुँच सकता है। सेक्स संबधी बिमारियों से सावधान रहने की आवश्यकता है।

वृष राशि
(इ, वी, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो)
भौतिक व आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में विकास का योग है। आत्मविकास से साथ-साथ आर्थिक विकास की भी सम्भावना है। कृषि, पषुपालन, डेरी उद्योग इत्यादि क्षेत्रों से जुड़े व्यक्तियों के लिए माह रोज़गार के नये अवसर लेकर आएगा। नौकरीपेशा लोग उच्चाधिकारियों के असहयोग के चलते तनावग्रस्त हो सकते हैं। अस्वस्थता के कारण व्यय संभावित है। कोलेस्ट्रॉल व ब्लडप्रेशर की अधिकता गंभीर बीमारी का रुप ले सकती है। कामकाजी महिलाओं के लिए वर्तमान समय श्रेष्ठ है, यश व सम्मान में वृध्दि होने की सम्भावना है। माह के मध्य में कुंटुंब में धार्मिक व शुभ कार्यों का आयोजन संभव है।

मिथुन राशि
(का, की, कू, घ, घा, के, को, ह)
इस माह आय की अपेक्षा व्यय में वृध्दि होने की सम्भावना है, लेकिन सहकर्मियों के सहयोग से मान-सम्मान बढ़ सकता है। माह के मघ्य में आपको आर्थिक कारणों से चिंतित रहना पड़ सकता है। पारिवारिक व सामाजिक कार्यो की अधिकता हो सकती है। किसी बहुमूल्य वस्तु की चोरी होने की भी सम्भावना है। प्रियजनों से व्यर्थ विरोधाभास होने की सम्भावना है। आवश्यकता से अधिक कार्य करने के कारण आप अस्वस्थ भी हो सकते हैं। वाहन चालन में सावधानी अपेक्षित है। अविवाहितों की जीवनसाथी की तलाश समाप्त हो सकती है। प्रेम संबंधों को नया आयाम प्राप्त होगा। महिलाएं पारिवारिक तनाव महसूस कर सकती हैं। दाम्पत्य सुख की दृष्टि से यह माह आंशिक फलदायी रहेगा।

कर्क राशि
(ही, हू, हे, हो, ड, डे, डू, डो)
सम्पूर्ण माह आर्थिक तंगी का सामना करना पडेग़ा। व्यय पर नियन्त्रण करने की ज़रूरत है। सहकर्मियों के कारण परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। व्यावसायिक भागीदार की वजह से किसी नई मुसीबत में पड़ेंगे। नए कानूनी विवाद में उलझेंगे। अकाउण्ट्स, वित्त व बैंकिग से संबधित युवाओं को उच्च शिक्षा एवं विदेश गमन का मौका मिलेगा। महिलाएं मददगार साबित हो सकती हैं। कोई बुरा समाचार सुनने को मिल सकता है। अचानक ही स्वयं को प्रेम में पाएंगे। जीवन साथी से हर तरह का सहयोग मिलेगा। मदिरा एवं धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त ही खतरनाक साबित हो सकते हैं, अत: सावधान रहें।

सिंह राशि
(मा, मी, मु, मे, मो, टा, टी, टु, टे)
वित्तीय दृष्टि से माह का पूवार्ध उत्तम व उत्तरार्ध सामान्य है। शेयर बाज़ार व अन्य किसी भी तरह की सट्टेबाजी से नुकसान होने की सम्भावना है। व्यवसाय परिवर्तन का विचार अपने दिमाग से निकाल दें। सकारात्मक प्रयासों से वांछित ऋण की प्राप्ति हो सकती है। इस माह बड़े व्यय को टालना अच्छा साबित होगा। अपने पुत्र के कॅरियर व स्वास्थ्य को लेकर परेशानी सम्भव है। लेखन व पत्रकारिता आदि से जुड़े लोगों के लिए अच्छा समय है। वैवाहिक संबंधों में तनाव उत्पन्न हो सकता है। कानूनी पचड़ों से बचें अन्यथा नुकसान होगा। स्वास्थ्य के प्रति विशेष सावधानी अपेक्षित है।

कन्या राशि
(टो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो)
इस माह आय में वृध्दि होने की सम्भावना है। ऋण प्राप्ति में विलम्ब हो सकता है। लम्बे समय से अटका हुआ धन मिलने की सम्भावना है। किसी सामाजिक संस्था में कोई उच्च पद प्राप्त होने की सम्भावना है। वाहन खरीदने का योग है। नौकरी के कारण कुछ परेशान रहेंगे। माह के अन्तिम सप्ताह में पेट एवं जोड़ों की बीमारी तंग कर सकती हैं। परीक्षा परिणाम सकारात्मक होंगे। सीए, सीएस, एमबीए कर रहे युवाओं को रोजगार के नए अवसर मिल सकते हैं। घर में किसी नए महमान के आने का समाचार मिल सकता है। किन्ही कारणों से परिजनों से दूर रहने की परिस्थिति बनेगी।

तुला राशि
(रा, री, रु, रे, रो, ता, ती, तू, ते)
वित्तीय दृष्टि से माह का पूवार्ध उत्तम व उत्तरार्ध सामान्य है। शेयर बाज़ार व अन्य किसी भी तरह की सट्टेबाजी से नुकसान होने की सम्भावना है। व्यवसाय परिवर्तन का विचार अपने दिमाग से निकाल दें। सकारात्मक प्रयासों से वांछित ऋण की प्राप्ति हो सकती है। इस माह बड़े व्यय को टालना अच्छा साबित होगा। पारिवारिक सदस्यों में वृध्दि होगी। अपने पुत्र के कॅरियर व स्वास्थ्य को लेकर परेशानी सम्भव है। लेखन व पत्रकारिता आदि से जुड़े लोगों के लिए अच्छा समय है। वैवाहिक संबंधों में तनाव उत्पन्न हो सकता है। परिजनों के साथ सम्बन्धों में मिठास आएगी। कानूनी पचड़ों से बचें अन्यथा नुकसान होगा।

वृश्चिक राशि
(तो, ना, नी, नू, ने, नो, यी, यू)
आर्थिक दृष्टि से समय उत्तम है। यद्यपि आय में वृध्दि होगी, किन्तु व्यय भी साथ-साथ बढ़ेगा। फैशन, फिल्म, गायन आदि कला से जुड़े लोगों के लिए समय विशेष उत्तम है। लम्बे समय से चले आ रहे मुकदमे का निर्णय अन्तत: आपके पक्ष में आ सकता है। किसी भी प्रकार के अनैतिक एवं असामाजिक कार्यों से दूर रहें, अन्यथा विशेष परेशानी में पड़ सकते हैं। स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहने की ज़रुरत है। इस माह मांस व मदिरा आदि अभक्ष्य पदार्थों के इस्तेमाल से बचने का यत्न करें। कामकाजी महिलाओं के लिए यह समय विशेष उत्तम है। यश व सम्मान में वृध्दि होगी एवं सहकर्मियों से सहयोग प्राप्त होगा।

धनु राशि
(ये, यो, भा, भी, भू, ध, प, फ, ढ, भे)
वित्तीय तौर पर यह समय सकारात्मक है, किन्तु किसी भी महत्वपूर्ण निर्णय से पूर्व परिवार के बड़े-बुजुर्गों की राय लेना न भूलें। नवीन स्रोतों से धन की प्राप्ति होगी। नौकरीपेषा व्यक्तियों को पदोन्नति मिलेगी तथा व्यापारियों को बड़े पैमाने पर सौदे मिलेंगे। आध्यात्मिक जीवन की ओर झुकाव बढ़ेगा। पितृ पक्ष से रिश्तों में खटास आ सकती है। साथ ही माता को स्वास्थ्य संबधी परेशानियां भी संभावित हैं। किसी अतिथि के अचानक आने की सम्भावना है। सूचना तकनीकी और कम्प्यूटर क्षेत्र से जुड़े लोगों के विदेश जाने की सम्भावना है। कामकाजी महिलाओं को महत्वपूर्ण सफलताएं मिलेंगी परन्तु उन्हें बोलने से ज्यादा करने पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए।

मकर राशि
(भो, जा, जी, जू, जे, जो, खा, खी, खू, खे, खो, गा, गी)
अक्टूबर माह में भाग्य आपके अनूकूल रहेगा। वित्तीय दृष्टिकोण से भी लाभ की स्थिति में रहेंगे। प्रषासन व वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग प्राप्त होगा। फैशन डिजाइनिंग, वास्तुशास्त्र, ज्वेलरी डिजाइनिंग जैसे क्षेत्रों से जुड़े युवाओं के लिए माह रोजगार के नये अवसर लेकर आएगा। प्रबन्धन, अकाउन्ट्स व विज्ञान से जुड़े लोग अत्यन्त सावधान रहें, अन्यथा उन्हें अपना रोज़गार खोना पड़ सकता है। प्रेम संबध प्रगाढ़ होंगे। परिवार समेत छोटी दूरी की यात्राएं हो सकती हैं। कामकाजी महिलाओं को पदोन्नति व आर्थिक लाभ मिलने की सम्भावना है। घर में उत्साह एवं खरीददारी का माहौल रहेगा।

कुंभ राशि
(गू, गे, गो, सा, सू, से, सो, दा)
यह माह आय की अपेक्षा व्यय में अधिकता लेकर आएगा। उच्चाधिकारियों की मदद से बड़ी सफलता अर्जित करेंगे। रचनात्मकता को नवीन आयाम प्राप्त होगा। आय के नए एवं अपारम्परिक स्रोत मिलेंगे जोकि दीर्घकालिक लाभ के साबित होंगे। व्यवयास में नए भागीदार भी मिल सकते हैं। विशेषकर माह के पूवार्ध में किसी भी प्रकार के निवेश से संबन्धित निर्णय न लें। रक्त से जुड़े रोग के होन की सम्भावना है। डॉक्टर से सलाह लेने में ज़रा भी देर न करें। महिलाओं के लिए उत्तम समय है, परिवार में समरसता बढ़ेगी एवं सदस्यों से हर प्रकार का सहयोग मिलेगा। देशाटन का भी योग बन रहा है।

मीन राशि
(दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, चि)
आर्थिक दृष्टि से माह का पूवार्ध उत्तम एवं उत्तरार्ध सामान्य है। सामाजिक प्रतिष्ठा में वृध्दि होगी, साथ ही व्यवसाय में भी सफलता प्राप्त होने का योग है। हाईटैक, आईटी एवं कम्प्यूटर से जुड़े लोंगों की विदेश जाने की चाह पूर्ण होगी। जुए, सट्टे या शेयर आदि अनिष्चित क्षेत्रों में क्षमता से ज्यादा निवेश परेशानी का कारण बन सकता है। प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग ले रहे विद्यार्थियों को सफलता मिलने की सम्भावना है। विवाह को लेकर जल्दबाजी न करें। खोया हुआ प्यार वापस मिलेगा, परन्तु जल्दबाजी हानिकारक साबित होगी। रिश्तों में मधुरता आएगी। गर्भवती महिलाओं को स्वास्थ्य संबधी सावधानी बरतने की आवश्‍यकता है।

ग्रह स्थिति
सूर्य 17 अक्टूबर से तुला में,
मंगल 14 से तुला में,
बुध 24 से वृश्चिक में,
गुरू 27 से वृश्चिक में,
शुक्र 19 से तुला में,
शनि कर्क में,
राहु 13 से कुम्भ में,
केतु 13 से सिंह में।

(source: http://www.AstroSage.com)

Tuesday, October 17, 2006

Rawalpindi Express Got Derailed

पटरी से उतरी रावलपिण्डी ऐक्सप्रेस

Pakistany Cricket Star Shoaib Akhtarये पाकिस्तान वाले भी कमाल के लोग हैं। खुद ही अपनी रावलपिंडी ऐक्सप्रेस को धकिया के पटरियों से उतार दिया। इतना ही नहीं, दुनिया के सामने रावलपिण्डी ऐक्सप्रेस की तेज़ी का राज़ भी खोल दिया कि काहे से ये सरपट भागी जा रही थी दनादन। यहाँ हम अपने पठान को दूध-घी खिला-पिला रहे थे, सुबह-सांझ बदाम घिस के देते थे; फिर भी क्या मजाल कि लड़का १२० के ऊपर फेंक दे और वहाँ उनने धाँय-फाँय मचा रखी थी। ससुरी बड़ी टेंशन थी, लेकिन अब दिल को नैक तसल्ली हुई। काहे कि यहाँ हमारा दूध-घी वगैरह कुछ बर्बाद ज़रूर हुआ, लेकिन वहाँ वो महँगा प्रोटीन पाउडर खिला रहे थे ससुरों को। फिर भी वो तेज़ नहीं फेंकेगा, तो क्या हमारी छिरिया तेज़ फेंकेगी... हैं...? ख़ैर, उनने रावलपिण्डी ऐक्सप्रेस के साथ जो किया सो किया, लेकिन सुपरफ़ास्ट के साथ में पैसेंजर को भी हिल्ले लगा दिया। ये कहाँ का इंसाफ़ है भई?

हमें तो लगता है कि आईसीसी की इस नई नीति के नाम पर पीसीबी के माई-बाप अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। जो भी उनकी आँख की किरकिरी था, उसे दूध में से मक्खी की तरह निकालने का कोई-न-कोई बहाना तो चाहिए ही था। सो ये मौक़ा खूब हाथ लगा और उनने क्या सुपरफ़ास्ट क्या पैसेंजर, जिसे मन आया उसे पंक्चर कर दिया सा‍इकिल की नाईं। साइकिल तो फिर भी जल्दी ही चलने लायक हो जाती है, लेकिन ऐक्सप्रेस को तो दो साल के लिए लूप लाइन पर टिका दिया। हमें जान पड़ता है कि दो साल तो बस एक बहाना है, मक़सद तो इस सुपरफ़ास्ट को हमेशा के लिए म्यूजियम में लगाना है। यानि कि पीसीबी का मक़सद है – रावलपिंडी ऐक्सप्रेस के करियर का अन्त तुरन्त।

अब पूछो कि हम इत्ता सब काहे सोच-विचार रहे हैं। तो वो इसलिए चचे, क्योंकि हम ख़ुश भी हैं और ग़मगीन भी। ख़ुश इसलिए कि पहले से टूटी-फूटी पाकिस्तान की टीम इससे और खचाड़ा हो गई और दु:खी इससे कि हम देखना चाहते थे कि चैम्पियन्स ट्रॉफ़ी में ‘रावलपिण्डी ऐक्सप्रेस’ ‘मुम्बई जंक्शन’ पर टिक पाती है या नहीं? ख़ैर, शोएब के लिए एक गाना श्रद्धांजलि के तौर पर – दिल के अरमाँ आँसुओं में बह गए... हमारी आवाज़ फटे बाँस जैसी है, जिसकी ठीक-ठाक हो वो हमारी तरफ़ से शोएब के लिए गा देना ज़रा। और आख़िर में जाते-जाते शोएब को एक नेक सलाह – कुछ दिन पहले तुम्हें बॉलीवुड के जिन प्रोड्यूसर महाशय ने अपनी फिल्म में विलेन का रोल देना चाहा था और तुमने नखरे दिखा कर मना कर दिया था, अब उड़के सीधे उनके चरणों में गिर जैयो और पैर पकड़ कर माफ़ी मांग लियो भाई। आख़िर राशन-पानी का सवाल है।

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Monday, October 16, 2006

Ye World Hai Na World...

ये वर्ल्ड है न वर्ल्ड...

ये वर्ल्ड है न वर्ल्ड, इसमें दो टाइप के लोग होते हैं – पहले, जो कहते हैं कि अफ़ज़ल को फांसी दो और दूसरे वो जो कहते हैं कि फांसी मत दो। तो भैया, पहले टाइप में तो लगभग सारा इण्डिया आता है, लेकिन दूसरे टाइप में ग़ुलाम नबी आज़ाद, फ़ारुख अब्दुल्लाह समेत कश्मीर के कई राजनेता और वामपन्थी आते हैं। लेकिन एक तीसरा टाइप भी है – जैसे मेल और फ़ीमेल के अलावा ‘हाय-हाय’ की तीसरी कैटेगरी होती है, उसी तरह पहले कहे गए दो टाइपों के अलावा इस मामले में भी ‘हाय-हाय’ वाला एक तीसरा ही टाइप भी है और इस टाइप मैं कांग्रेस आती है। जिसे यह नहीं मालूम कि उसका ... क्या है। अरे भैया, क्या सोचने लगे? हम कह रहे हैं कि उसे यह नहीं मालूम कि उसका ‘स्टेण्ड’ क्या है?

आप लोगों ने पंचतंत्र नहीं पढ़ी ढंग से, उसमें एक कहानी है। चलिए हम ही बताए देते हैं। तो हुआ यूँ कि एक बार प्राचीन इन्द्रप्रस्थ यानि की वर्तमान दिल्ली में गिरगिटों और कांग्रेसियों के बीच रंग बदलने का बड़ा भारी कम्पटीशन हुआ। गिरगिटों ने जीतने के लिए जान लड़ा दी, लेकिन अन्तत: वही हुआ जो विधि को मंज़ूर था। मतलब कि कांग्रेसियों ने बाज़ी मार ली और तब से आज तक कोई भी रंग बदलने में कांग्रेसियों का मुक़ाबला नहीं कर सका है। लेकिन ये कांग्रेसी गिरगिटों से एक नहीं बल्कि कई क़दम आगे हैं। गिरगिट केवल रंग बदलना जानता है, लेकिन कांग्रेसी रंग के साथ-साथ सुर बदलना भी जानते हैं – कश्मीर में कोई सुर और दिल्ली में कुछ और। हालाँकि दूसरे दलों के राजनेताओं ने भी कांग्रेसियों से इस गुण को ग्रहण किया है, लेकिन ‘ऑरिजिनल इज़ ऑलवेज़ ऑरिजिनल’। ब्लॉगर बीटा आने के बाद से जिस तरह ब्लॉग की फ़ीड पता लगाना मुश्किल हो गया है, ठीक उसी तरह राजनेताओं की जात भी समझो। हाँ, थोड़ा-सा ग़ौर करने पर दोनों पता पड़ जाते हैं। सत्ता में इनकी जात कुछ और होती है, विपक्ष में कुछ और। अब फ़ारूख़ अब्दुल्लाह साहब को ही ले लीजिए; अभी कल ही एक कार्यक्रम में तैश में चीख रहे थे – ‘अगर सज़ा माफ़ नहीं हुई तो कश्मीर जल उठेगा। आपको (टीवी कार्यक्रम में उपस्थित उन्य सज्जनों को) कुछ बोलने का हक़ नहीं है, कश्मीर वाले ही वहाँ के हालात समझ सकते हैं।’ वाह भई, वाह... कश्मीर पहले ‘शिवपालगंज’ तो था ही, सब वहाँ जाने से घबराते थे। लेकिन अब ऐसा लगता है कि कश्मीर के बारे में बोलने से भी घबराने लगेंगे।

अब बात करते हैं सर्वप्रिय वामपन्थियों की। वैसे, इतना तो मानना पड़ेगा कि ये वामपन्थी बहुत ही सिद्धान्तवादी लोग होते हैं। चाहे कुछ हो जाए, बुश और लादेन में दोस्ती हो जाए, सपा और कांग्रेस यूपी में फिर गठबंधन कर लें, मोदी और लालू ट्रेन के एक ही डिब्बे में बैठकर भारत की परिक्रमा करें, दुनिया इधर की उधर हो जाए – ये वामपंथी अपने सिद्धान्त नहीं छोड़ते। अब आप ही देखिए कि आज़ादी से पहले बोस को तोजो का कुत्ता कहना, भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध करना वगैरह वगैरह इनकी सिद्धान्त-निष्ठा के अनगिनत उदाहरण हैं। लेकिन सिद्धान्तनिष्ठा हो तो ऐसी, आज़ादी के बाद भी अपने सिद्धान्तों पर बदस्तूर चलते रहे और आज भी उनपर क़ायम हैं। आज भी अपनी विचारधारा पर चलते हुए अफ़ज़ल की फांसी माफ़ करने का समर्थन कर रहे हैं। हमको तो यह लगता है भैया, कि अगर वामपंथियों की केन्द्र में सरकार होती तो कश्मीर को चमकती लाल पन्नी में रैप कर और उसपर ‘टू पाकिस्तान विथ लव – वामपन्थीज़’ की चिप्पी चिपका कर उसे पाकिस्तान को भेंट कर देते।

लेकिन ये वर्ल्ड है वर्ल्ड, यहाँ हमेशा दो तरह के लोग होते हैं – एक वामपंथी हैं तो दूसरे राष्ट्रवादी भी हैं। इसलिए कुछ बचा-खुचा कश्मीर अभी तक हिन्दुस्तान में है। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी तीसरे तरह के लोग भी वर्ल्ड में पाए गए हैं – मानवाधिकारवादी। जिस तरह पतंगे वगैरह सिर्फ़ बरसात में ही नज़र आते हैं, ठीक उसी तरह ये लोग भी केवल तभी दिखाई देते हैं जब किसी आतंकवादी को सज़ा हो रही हो। सेना और पुलिस वाले मरें तो मरें अपनी बला से, लेकिन मानवाधिकार वालों के कानों पर जू तक नहीं रेंगती है। ये लोग आजकल यह कहते सुने जा सकते हैं कि केपिटल पनिशमेंट की सज़ा मानव-अधिकारों के ख़िलाफ़ है। तो साहब, हमारा इन लोगों से कोई विरोध नहीं है। बस इतनी गुज़ारिश है कि इन लोगों पर ‘मानवाधिकार’ शब्द कुछ जँचता नहीं है, इसलिए इसे बदलकर ‘आतंकवादी-अधिकार संगठन’ किया जाना चाहिए। ‘आतंकवादी-अधिकार संगठन’ – अहा! सुनने में कितना अच्छा लग रहा है, कर्णप्रिय, मधुर, बिल्कुल लता मंगेशकर की आवाज़ की तरह। हमारी बस इत्ती सी गुज़ारिश है, मान लो मानवाधिकार वाले भाईयों और उनकी बहनों।

आप लोग कह सकते हो कि सबको गरिया रहे हो तो सरकार को काहे बख़्श दिया भला? तो भैया, हम रिक्स नहीं लेंगे। लेकिन दिक़्क़त ये है कि सरकार को नालायक़ कहना कुछ सुहाता नहीं है, कोई नया लफ़्ज़ सुझाइए अब। सरकार के लिए ‘नालायक़’ शब्द तो अब cliché हो गया है। लगना चाहिए कि कहने वाला कुछ गहरे सोच-विचार के बाद गरिया रहा है। वैसे भी मनमोहन-मुशर्रफ़ तो हीरा-मोती बैल हैं। कुछ भी कर लें, आख़िर में अपने मालिक बुश के पास पहुँच जाते हैं। कहानी में डीविएशन बस इतना है कि यहाँ ये दोनों बैल आपस में ही जूतम-पैजार करके मामला सुल्टाने के लिए मालिक के पास जाते हैं। हालाँकि पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सुबूत लेकर मनमोहन जी दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन होता-जाता कुछ नहीं है... वही ढाक के तीन पात। और कुछ हो भी गया, मान लो कि पाकिस्तान ने दाऊद वगैरह किसी को भारत को सौंप दिया, तो यहाँ ख़्वामख़्वाह सज़ा माफ़ी के लिए बवंडर होगा और ख़बरिया चैनल वाले उसे 24x7 दिखलाने लगेंगे और हम अफ़ज़ल के बाद टीवी पर फिर वही सब टॉर्चर नहीं झेल सकते एक बार फिर।

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Friday, October 13, 2006

शेयर मार्केट में गफला

आज शुक्रवार के दिन शेयर बाजार नें अपने उच्‍चतम बिन्‍दु को छू लिया। इस सबका आज रिलीज हुई फिल्‍म गफला से तो कोई लेना देना नहीं ;-) ?

Wednesday, October 04, 2006

HindiBlogs.com Announcement

मित्रों,

नए कलेवर के साथ हिन्दीब्लॉग्स डॉट कॉम आपके सामने फिर उपस्थित है। इस बार यह बहुत-सी नई सुविधाओं और ख़ूबियों से सुसज्जित है। अब आपको सभी चिट्ठों के नाम याद रखने की कोई ज़रूरत नहीं है, सिर्फ़ ब्राउज़र में www.hindiblogs.com डालिए और खो जाइए हिन्दी चिट्ठों के तेज़ी से बढ़ रहे संसार में।

नए हिन्दीब्लॉग्स डॉट कॉम की विशेषताएँ -
  • हर आधे घण्टे में हिन्दी चिट्ठा जगत् से ताज़ी प्रविष्टियों की जानकारी
  • नया कलेवर और बेहतर रंग-रूप
  • सिर्फ़ हिन्दी चिट्ठों पर फ़ोकस
  • पहले से बेहतर और तीव्र प्रस्तुतीकरण
  • कई कमियों में सुधार

Sunday, October 01, 2006

Santhara : My Viewpoint

संथारा पर मेरे विचार

आजकल संथारा को लेकर काफ़ी विवाद चल रहा है। कई लोग इसे ग़लत मानते हैं, तो कईयों का कहना है कि यह एक धार्मिक परम्परा है और इसमें किसी भी तरह की दखलंदाज़ी नहीं होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत जैसे देश में इस तरह की बहस का कोई औचित्य है? जहाँ हर रोज़ कई लोग भुखमरी का शिकार हो रहे हैं। जिस मुल्क़ के 24 फ़ीसदी लोगों को दो जून की रोटी भी नहीं नसीब होती है, वहाँ अगर दो-चार लोग खुद ही अन्न-जल त्याग रहे हैं तो इससे क्या फ़र्क पड़ता है? हज़ारों की तादाद में लोग बिना खाए मरते हैं तो कोई कैमरा-माइकधारी प्राणी वहाँ झाँकने भी नहीं जाता, लेकिन दो-एक बूढ़े लोग संथारा लेते हैं तो हायतौबा मच जाती है।

कोई अपनी इच्छा से बीमारी और बुढ़ापे के चलते मरना चाहता है तो मरने दो, लेकिन जो जीवित रहना चाहते हैं कम-से-कम उन्हें तो अन्न मुहैया कराओ। संथारा पर शोर-गुल बहुत है, लेकिन देश की निराहारा चतुर्थांश आबादी पर कोई आवाज़ तक नहीं। वाह रे महान देश, वाह रे महान अदालतें और वाह रे इस महान देश का महान मीडिया...

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