Sunday, October 01, 2006

Santhara : My Viewpoint

संथारा पर मेरे विचार

आजकल संथारा को लेकर काफ़ी विवाद चल रहा है। कई लोग इसे ग़लत मानते हैं, तो कईयों का कहना है कि यह एक धार्मिक परम्परा है और इसमें किसी भी तरह की दखलंदाज़ी नहीं होनी चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत जैसे देश में इस तरह की बहस का कोई औचित्य है? जहाँ हर रोज़ कई लोग भुखमरी का शिकार हो रहे हैं। जिस मुल्क़ के 24 फ़ीसदी लोगों को दो जून की रोटी भी नहीं नसीब होती है, वहाँ अगर दो-चार लोग खुद ही अन्न-जल त्याग रहे हैं तो इससे क्या फ़र्क पड़ता है? हज़ारों की तादाद में लोग बिना खाए मरते हैं तो कोई कैमरा-माइकधारी प्राणी वहाँ झाँकने भी नहीं जाता, लेकिन दो-एक बूढ़े लोग संथारा लेते हैं तो हायतौबा मच जाती है।

कोई अपनी इच्छा से बीमारी और बुढ़ापे के चलते मरना चाहता है तो मरने दो, लेकिन जो जीवित रहना चाहते हैं कम-से-कम उन्हें तो अन्न मुहैया कराओ। संथारा पर शोर-गुल बहुत है, लेकिन देश की निराहारा चतुर्थांश आबादी पर कोई आवाज़ तक नहीं। वाह रे महान देश, वाह रे महान अदालतें और वाह रे इस महान देश का महान मीडिया...

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3 comments:

नीरज दीवान said...

एक बंदा कह रहा था- कैसी सरकार है ना जीने के लिए अनाज देती है और ना ही मरने देती है. वैसे ही आपके क्रांतिकारी विचार हैं. किंतु मसला दिवंगत विमलादेवी से जुड़ा था जो हाईकोर्ट में चला गया. इसलिए यह ख़बर सुर्खियों में आ गई. वरना बीकानेर जैसे इलाक़ों से संथारे की ख़बरें आए दिन आती रहती हैं. हाल ही में दो ख़बरें और आई हैं.

प्रभाकर पाण्डेय said...

यथार्थ और जबरदस्त लेख.

Nitin Hindustani said...

You have written Ultimate about santhara. I really apriciate it. You have command over hindi language.

I also have a hindi blog
http://nitinhindustani.blogspot.com

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