Monday, October 16, 2006

Ye World Hai Na World...

ये वर्ल्ड है न वर्ल्ड...

ये वर्ल्ड है न वर्ल्ड, इसमें दो टाइप के लोग होते हैं – पहले, जो कहते हैं कि अफ़ज़ल को फांसी दो और दूसरे वो जो कहते हैं कि फांसी मत दो। तो भैया, पहले टाइप में तो लगभग सारा इण्डिया आता है, लेकिन दूसरे टाइप में ग़ुलाम नबी आज़ाद, फ़ारुख अब्दुल्लाह समेत कश्मीर के कई राजनेता और वामपन्थी आते हैं। लेकिन एक तीसरा टाइप भी है – जैसे मेल और फ़ीमेल के अलावा ‘हाय-हाय’ की तीसरी कैटेगरी होती है, उसी तरह पहले कहे गए दो टाइपों के अलावा इस मामले में भी ‘हाय-हाय’ वाला एक तीसरा ही टाइप भी है और इस टाइप मैं कांग्रेस आती है। जिसे यह नहीं मालूम कि उसका ... क्या है। अरे भैया, क्या सोचने लगे? हम कह रहे हैं कि उसे यह नहीं मालूम कि उसका ‘स्टेण्ड’ क्या है?

आप लोगों ने पंचतंत्र नहीं पढ़ी ढंग से, उसमें एक कहानी है। चलिए हम ही बताए देते हैं। तो हुआ यूँ कि एक बार प्राचीन इन्द्रप्रस्थ यानि की वर्तमान दिल्ली में गिरगिटों और कांग्रेसियों के बीच रंग बदलने का बड़ा भारी कम्पटीशन हुआ। गिरगिटों ने जीतने के लिए जान लड़ा दी, लेकिन अन्तत: वही हुआ जो विधि को मंज़ूर था। मतलब कि कांग्रेसियों ने बाज़ी मार ली और तब से आज तक कोई भी रंग बदलने में कांग्रेसियों का मुक़ाबला नहीं कर सका है। लेकिन ये कांग्रेसी गिरगिटों से एक नहीं बल्कि कई क़दम आगे हैं। गिरगिट केवल रंग बदलना जानता है, लेकिन कांग्रेसी रंग के साथ-साथ सुर बदलना भी जानते हैं – कश्मीर में कोई सुर और दिल्ली में कुछ और। हालाँकि दूसरे दलों के राजनेताओं ने भी कांग्रेसियों से इस गुण को ग्रहण किया है, लेकिन ‘ऑरिजिनल इज़ ऑलवेज़ ऑरिजिनल’। ब्लॉगर बीटा आने के बाद से जिस तरह ब्लॉग की फ़ीड पता लगाना मुश्किल हो गया है, ठीक उसी तरह राजनेताओं की जात भी समझो। हाँ, थोड़ा-सा ग़ौर करने पर दोनों पता पड़ जाते हैं। सत्ता में इनकी जात कुछ और होती है, विपक्ष में कुछ और। अब फ़ारूख़ अब्दुल्लाह साहब को ही ले लीजिए; अभी कल ही एक कार्यक्रम में तैश में चीख रहे थे – ‘अगर सज़ा माफ़ नहीं हुई तो कश्मीर जल उठेगा। आपको (टीवी कार्यक्रम में उपस्थित उन्य सज्जनों को) कुछ बोलने का हक़ नहीं है, कश्मीर वाले ही वहाँ के हालात समझ सकते हैं।’ वाह भई, वाह... कश्मीर पहले ‘शिवपालगंज’ तो था ही, सब वहाँ जाने से घबराते थे। लेकिन अब ऐसा लगता है कि कश्मीर के बारे में बोलने से भी घबराने लगेंगे।

अब बात करते हैं सर्वप्रिय वामपन्थियों की। वैसे, इतना तो मानना पड़ेगा कि ये वामपन्थी बहुत ही सिद्धान्तवादी लोग होते हैं। चाहे कुछ हो जाए, बुश और लादेन में दोस्ती हो जाए, सपा और कांग्रेस यूपी में फिर गठबंधन कर लें, मोदी और लालू ट्रेन के एक ही डिब्बे में बैठकर भारत की परिक्रमा करें, दुनिया इधर की उधर हो जाए – ये वामपंथी अपने सिद्धान्त नहीं छोड़ते। अब आप ही देखिए कि आज़ादी से पहले बोस को तोजो का कुत्ता कहना, भारत छोड़ो आन्दोलन का विरोध करना वगैरह वगैरह इनकी सिद्धान्त-निष्ठा के अनगिनत उदाहरण हैं। लेकिन सिद्धान्तनिष्ठा हो तो ऐसी, आज़ादी के बाद भी अपने सिद्धान्तों पर बदस्तूर चलते रहे और आज भी उनपर क़ायम हैं। आज भी अपनी विचारधारा पर चलते हुए अफ़ज़ल की फांसी माफ़ करने का समर्थन कर रहे हैं। हमको तो यह लगता है भैया, कि अगर वामपंथियों की केन्द्र में सरकार होती तो कश्मीर को चमकती लाल पन्नी में रैप कर और उसपर ‘टू पाकिस्तान विथ लव – वामपन्थीज़’ की चिप्पी चिपका कर उसे पाकिस्तान को भेंट कर देते।

लेकिन ये वर्ल्ड है वर्ल्ड, यहाँ हमेशा दो तरह के लोग होते हैं – एक वामपंथी हैं तो दूसरे राष्ट्रवादी भी हैं। इसलिए कुछ बचा-खुचा कश्मीर अभी तक हिन्दुस्तान में है। लेकिन हर बार की तरह इस बार भी तीसरे तरह के लोग भी वर्ल्ड में पाए गए हैं – मानवाधिकारवादी। जिस तरह पतंगे वगैरह सिर्फ़ बरसात में ही नज़र आते हैं, ठीक उसी तरह ये लोग भी केवल तभी दिखाई देते हैं जब किसी आतंकवादी को सज़ा हो रही हो। सेना और पुलिस वाले मरें तो मरें अपनी बला से, लेकिन मानवाधिकार वालों के कानों पर जू तक नहीं रेंगती है। ये लोग आजकल यह कहते सुने जा सकते हैं कि केपिटल पनिशमेंट की सज़ा मानव-अधिकारों के ख़िलाफ़ है। तो साहब, हमारा इन लोगों से कोई विरोध नहीं है। बस इतनी गुज़ारिश है कि इन लोगों पर ‘मानवाधिकार’ शब्द कुछ जँचता नहीं है, इसलिए इसे बदलकर ‘आतंकवादी-अधिकार संगठन’ किया जाना चाहिए। ‘आतंकवादी-अधिकार संगठन’ – अहा! सुनने में कितना अच्छा लग रहा है, कर्णप्रिय, मधुर, बिल्कुल लता मंगेशकर की आवाज़ की तरह। हमारी बस इत्ती सी गुज़ारिश है, मान लो मानवाधिकार वाले भाईयों और उनकी बहनों।

आप लोग कह सकते हो कि सबको गरिया रहे हो तो सरकार को काहे बख़्श दिया भला? तो भैया, हम रिक्स नहीं लेंगे। लेकिन दिक़्क़त ये है कि सरकार को नालायक़ कहना कुछ सुहाता नहीं है, कोई नया लफ़्ज़ सुझाइए अब। सरकार के लिए ‘नालायक़’ शब्द तो अब cliché हो गया है। लगना चाहिए कि कहने वाला कुछ गहरे सोच-विचार के बाद गरिया रहा है। वैसे भी मनमोहन-मुशर्रफ़ तो हीरा-मोती बैल हैं। कुछ भी कर लें, आख़िर में अपने मालिक बुश के पास पहुँच जाते हैं। कहानी में डीविएशन बस इतना है कि यहाँ ये दोनों बैल आपस में ही जूतम-पैजार करके मामला सुल्टाने के लिए मालिक के पास जाते हैं। हालाँकि पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सुबूत लेकर मनमोहन जी दर-दर भटक रहे हैं, लेकिन होता-जाता कुछ नहीं है... वही ढाक के तीन पात। और कुछ हो भी गया, मान लो कि पाकिस्तान ने दाऊद वगैरह किसी को भारत को सौंप दिया, तो यहाँ ख़्वामख़्वाह सज़ा माफ़ी के लिए बवंडर होगा और ख़बरिया चैनल वाले उसे 24x7 दिखलाने लगेंगे और हम अफ़ज़ल के बाद टीवी पर फिर वही सब टॉर्चर नहीं झेल सकते एक बार फिर।

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6 comments:

  1. अच्छा लिखे हो. लेकिन बरखुरदार यह बाबा आदम के जमाने के टेम्पलेट काहे नही बदलते. इसे बदलो कौन्हो अच्छा टेम्पलेट चेंपो और सबसे जरूरी काम यह कि नारद का लोगो चिपका दो वहाँ. अब मियाँ तुम्हारे जइसन लोकप्रिय ब्लाग नारद को लिंक नही करेंगे तो कौन करेगा, जुम्मन मियाँ?

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  2. प्रतीक भैया टेंशन नही लेने का. जब तक हमारी सुप्रीम कोर्ट है तब तक इन मानवाधिकारियों की बोल्ती बन्द कर दी जयेगी. मुझे तो अब लग रहा है कि संसद संविधान में संशोधन करके न्याय्पालिका को ही नहीं हटा दे.

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  3. आज बहुत दिनों बाद कुछ अच्‍छा पढने को मिला, जो कुछ हो आज कल राजनीति मे नीत‍ि का रंचमात्र भी नही बचा है। सभी के सभी सत्‍ता लोभ मे बिक चुके है। आज की सरकार की यह स्‍िथति है कि कोलकता और त्रिवेन्‍दम मे एक दूसरे को गाली देते है तो दिल्‍ली तो दिल्‍ली तो दिल्‍ली मे रंगरलिया मनाते है।
    बंगाल और केरल मे जनता कंग्रेस और वाम मोर्चा के खिलाफ एक दूसरे को वोट देती है, कि काग्रेस का शासन ठीक नही है या वाममोर्चा का। किन्‍तु एक दूसरे के खिलाफ का वोट लेकर जनता को धोखा देते है। केरल और बंगाल का एक बोट राजग या भाजपा के विरोध मे होता है। क्‍योकि सीधा मुकाबला इन्‍ही दोनो के बीच रहा है।
    बात रही अफजल की तो कब काग्रेस ने सही किया है। भगत सिंह राजगुरू और सुखदेव के समय अग्रेजो के पक्ष मे थी और आज अफजल के।

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  4. भुवनेश जी, भारतीय लोकतन्‍त्र बहुत मजबूत है। आखिर नेताओं को भी वोट मांगने जनता के पास ही आना है। सो किसी भी एसे संशोधन का सवाल ही नहीं उठता।

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  5. ये वर्ल्ड है ना वर्ल्ड,
    इसमें दो तरह के राष्ट्रपति होते हैं,
    एक वो जो मुहर होते हैं, केवल नाम की मुहर
    दूसरे वो होते हैं जो अपना जीवन समर्पित कर चुके होते हैं देश के लिये नायाब हथियार बनाने में ताकि देश अपने दुशमनों से लड़ सके। दूसरी तरह के जो राष्ट्रपति होते हैं, वो अफ़जल की सज़ा माफ़ नहीं कर सकते। हो सकता है वो दबाव में आकर मामले को लटकाएँ और माहौल ठंडा होने का इंतज़ार करें, लेकिन जब बारी फ़ैसला लेने की आती है, तब दूसरे टाइप के राष्ट्रपति जनता को निराश नहीं करते।
    बढ़िया लिखा है आपने।

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  6. " वैसे भी मनमोहन-मुशर्रफ़ तो हीरा-मोती बैल हैं। कुछ भी कर लें, आख़िर में अपने मालिक बुश के पास पहुँच जाते हैं। "

    वाह! पंडित प्रतीक ,
    तुम्हारी यह दो पंक्तियों की एक टिप्पणी दक्षिण-एशिया पर लिखे गये बड़े-बड़े सैद्धांतिक लेखों का सार-तत्व है . 'साम्राज्यवाद की सवारी के बैल' क्या रूपक है.कमाल कर दिया भइये .

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