Sunday, November 26, 2006

Gandhi Gita Golvalkar : My Reply

गांधी गीता गोलवलकर : मेरा उत्तर

आज अफ़लातून जी का यह लेख पढ़ा। उत्तर के रूप में पहले तो अफ़लातून जी से मैं यह कहना चाहूँगा कि मैंने कहीं भी महात्मा गांधी की हत्या को सही नहीं ठहराया है। न ही मैं संघ की हिन्दुत्व की अवधारणा से सहमत हूँ। मैंने अपने इन दो लेखों – “ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी” और “हिन्दू दृष्टिकोण से गांधीगिरी” में केवल गांधीवाद की समालोचना करने का यत्न किया है।

हाँ, तो मैं कह रहा था कि मैं किसी भी बात को आँख मूंद कर स्वीकार नहीं करता... चाहे वो गांधी हों या फिर गोलवलकर। जहाँ तक गांधी जी की गीता की व्याख्या का सवाल है, स्पष्ट ही वह पक्षपातपूर्ण है। यानि कि उनके पसंद के सिद्धान्तों के पक्ष में झुकी हुई है। गीता के बारे में गांधी जी जो कहते हैं, उसे मानने से बेहतर क्या यह नहीं है कि खुद ही गीता पढ़ ली जाए? क्या आप यह नकार सकते हैं कि गीता में अर्जुन युद्ध से इन्कार कर रहा था और श्रीकृष्ण ने शत-शत युक्तियों द्वारा समझाकर उसे युद्ध के लिए प्रेरित किया। अब खुद समझ में न आए तो किसी बच्चे से भी पूछा जा सकता है, कि युद्ध करना अहिंसा कहलाएगा या हिंसा। यहाँ गोलवलकर या गांधी की बात मानने की ज़रूरत नहीं है, ज़रूरत है अपनी अक़्ल का इस्तेमाल करने की।

जो इंसान जिस सिद्धान्त के प्रति दुराग्रही है, उसे गीता में वही सिद्धान्त नज़र आएगा। क्योंकि गीता पूर्ण है, उसमें अहिंसा के साथ हिंसा की भी स्वीकृति है। गीता में निषेध के लिए जगह नहीं है। मैंने कहीं सुना है कि एक बार जाड़े की सुबह थी और चारों तरफ़ घना कोहरा छाया हुआ था। एक सुनसान जगह पर एक ठूंठ लगा हुआ था। उस रोज़ सुबह-सुबह वहाँ से एक वियोगी प्रेमी गुज़रा, ठूंठ में उसे अपनी प्रेयसी नज़र आई। कुछ वक़्त बाद वहीं से एक चोर गुज़रा, उसे ठूंठ में कोतवाल नज़र आया। फिर थोड़ी देर बाद एक भक्त गुज़रा, उसे ठूंठ में भगवान की प्रतिमा दिखाई दी। उस ठूंठ में तो जबकि कुछ भी नहीं था – न प्रेयसी, न कोतवाल और न ही कोई प्रतिमा; लेकिन जिसके मन में जो था, उसने वही देखा। गीता में तो सभी कुछ स्वीकृत है – हिंसा, अहिंसा, सत्य, असत्य सभी। उसमें तो अपनी इच्छित चीज़ देखना बहुत ही सरल काम है। गांधी जी ने भी वही किया। उनका दुराग्रह अहिंसा के प्रति था, इसलिए गीता में उन्हें अहिंसा ही नज़र आई – इसमें कुछ ख़ास आश्चर्य नहीं है। गीता ठीक-ठीक वही समझ सकता है, जो किसी भी तरह के दुराग्रह से मुक्त हो।

दूसरी बात अफ़लातून जी ने कही कि गांधी जी के अनुसार हमें क़ानून हाथ में नहीं लेना चाहिए। ठीक है, लेकिन अंग्रेज़ों के समय में भी क़ानून था जिसे खुद गांधी जी ने कई बार तोड़ा। इसका एक अच्छा उदाहरण है नमक क़ानून। जिसे गांधी जी ने पूरे प्रचार और हो-हल्ले के साथ तोड़ा। उन्होंने अपने इस काम को सत्याग्रह कहा, लेकिन जब भगत सिंह और अन्य क्रान्तिकारियों ने भी देश की आज़ादी के लिए क़ानून की अवज्ञा की तो उसे गांधी जी ने ग़लत ठहराया और उसका पूरी शक्ति से तिरस्कार किया। वे चाहते तो कुछ क्रान्तिकारियों की फाँसी रुकवाने की कोशिश कर सकते थे, लेकिन गांधी और उनका गांधीवाद तो अहिंसावादी है... उन हिंसा करने वालों को क्यों बचाया जाए। हिंसा करने वालों (आप और हम आजकल जिन्हें क्रान्तिकारी कहते हैं) को फाँसी पर लटकने देना ही गांधीवादी अहिंसा है? यानि कि जो गांधी जी की इच्छा हो, वही सही है और बाक़ी ग़लत। और अब गांधीजी के अंधभक्त भी वही करते हैं, तो इसमें कुछ नया नहीं है।

एक और बात अफ़लातून जी कहते हैं – “मारने का प्रश्न खडा होने के पहले हम इस बात का अचूक निर्नय करने की शक्ति अपने में पैदा करें कि आततायी कौन है?” मुझे नहीं लगता कि यह बात गांधीजी ने कही होगी। लेकिन अगर उन्होंने कही है, तो उनसे बड़ा भ्रमित इंसान कौन हो सकता है? क्या स्पष्ट तौर पर अंग्रेज़ आततायी नहीं थे? क्या अपने क्षुद्र स्वार्थों के लिए दूसरों पर अत्याचार करना आततायी होने की निशानी नहीं है? कौरवों ने तो बस पाण्डवों को उनके राज्य से बेदखल किया था। महाभारत में कहीं ऐसा कोई उल्लेख नहीं है कि कौरवों ने आम जनता पर अत्याचार किए हों। लेकिन केवल पाँच लोगों पर अत्याचार करने वाले को भी श्रीकृष्ण ने आततायी कहा और अर्जुन से कहा – “उठ खड़ा हो और युद्ध में इन आततायियों का संहार कर।” फिर अंग्रेज़ तो तीस कोटि जनता पर अत्याचार कर रहे थे, उनके बारे में वे फ़ैसला न कर सके? कैसी विडम्बना है। और जिन्होंने अचूक निर्णय किया – चन्द्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह आदि – उन्हें गांधी जी ने ही हिंसक आततायियों की संज्ञा दी। क्या अहिंसा है... वाह रे गांधीवाद!!!

अफ़लातून जी बार-बार संघ को बीच में लेकर आए हैं, लेकिन मालूम नहीं क्यों? हालाँकि मैं संघ की विचारधारा से असहमत हूँ, लेकिन इतना ज़रूर मानता हूँ कि संघ वाले दोगले नहीं है। वे उन तथाकथित गांधीवादियों की तरह नहीं हैं, जिनकी कथनी और करनी में महाभेद है।

सवाल यह है कि कुछ लोग पिछले पचास वर्षों में गांधीवाद की विफलता के बावजूद उससे क्यों चिपके रहना चाहते हैं? वे यह क्यों नहीं समझते हैं कि गांधीवाद बहुत ही संकुचित दायरे में ही प्रयोग किया जा सकता है? लेकिन मेरे ख़्याल से अंधभक्ति और दुराग्रह उन्हें सोचने नहीं देता, निष्पक्ष विचार नहीं करने देता है। इस पर मुझे एक चुटकुला याद आता है - “एक लड़का था जो अभी-अभी १२वीं में उत्तीर्ण होकर कॉलेज में आया था। उसके सभी दोस्त कार से कॉलेज जाते थे, लेकिन वह बेचारा पैदल ही कॉलेज जाता था। उसके दिल में केवल एक ही उम्मीद थी कि पिताजी उसकी बेचारगी को देखें और उसे भी एक कार दिलवा दें। लेकिन उसे अपनी ये आशा धूमिल होती नज़र आयी, पितीजी इस ओर कभी ध्यान ही नहीं देते ‍थे। सो वह एक ‍‍‍दिन अपने ‍पिताजी के पास गया और सारा हाल कह सुनाया। पिताजी बोले - अरे ओ नालायक! घर की दीवार से लगा हुआ तो तेरा कॉलेज है वहाँ भी कार से जाना चाहता है, भगवान ने ये दो पैर किस लिए दिए हैं? – आखिर पिताजी भी यूँ‍ही करोड़पति नहीं बन गये थे, कंजूसी में पीएचडी की थी और पाई-पाई को निचोड़ना अच्छी तरह से जानते थे, उन्हें उम्मीद थी कि बेटा भी यही गुण सीखेगा लेकिन हो उल्टा रहा था – बेटा बोला, दो पैर किस लिए दिये हैं? आपने बिल्कुल ठीक सवाल पूछा। एक पैर दिया है एक्सिलरेटर पर रखने ‍के लिए और दूसरा पैर दिया है ब्रेक पर रखने के लिए।” हर कोई चीज़ों को अपने-अपने नज़रिए से देखता है। इस देश में समस्याएँ बहुत जटिल हैं, लेकिन गांधीवादी उन्हें अपने चश्मे से देखते हैं और संघ वाले अपने चश्मे से। इन समस्याओं को सुलझाने के लिए अलग-अलग 'वाद' के चश्मे उतार फेंकने होंगे और निष्पक्ष व तटस्थ रूप से देखना पड़ेगा। लेकिन लोगों को इतनी साधारण सी बात समझ में नहीं आती है कि गीता का दर्शन अत्यन्त व्यापक है और उसकी तुलना में गांधीवाद बहुत ही छोटा और सीमित।

आख़िरी बात, अफ़लातून जी को मुझे और पंकज जैसे लोगों को देखकर कनपुरिया अन्दाज़ में कुछ बातें याद आई हैं। मुझे विवेकशून्य गांधीवादियों को देखकर कठोपनिषद का यह मंत्र याद आता है –
अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितंमन्यमानाः।
जङ्घन्यमानाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः॥
यानि कि “खुद अविद्या में डूबे हुए हैं और बावजूद इसके स्वयं को पण्डित समझते हैं। और अन्धे के द्वारा मार्ग दिखाए जाने वाले अन्धे की तरह ये लोग और इनके अनुयायी, दोनों ही गड्ढे में गिरते हैं।”

सम्बन्धित आलेख :
१. ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी
२. हिन्दू दृष्टिकोण से गांधीगिरी

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Saturday, November 25, 2006

Firefox has a Password Flaw

mozilla firefoxन्यूजफ़ैक्टर डॉट कॉम की इस ख़बर के मुताबिक़ फ़ायरफ़ॉक्स २ के "पासवर्ड मैनेजर" में कुछ समस्या है, जिसका बेजा फ़ायदा उठाकर हैकर आपके यूज़रनेम और पासवर्ड को हथिया सकते हैं। मोज़िला फ़ाउण्डेशन ने भी इस ख़ामी की बात को स्वीकारा है। यहाँ पर "bug #360 493" नाम के इस बग पर काफ़ी चर्चा चल रही है। न्यूज़फ़ैक्टर के अनुसार यही समस्या इंटरनेट ऐक्सप्लोरर को भी प्रभावित कर सकती है।

हालाँकि इस समस्या के हल के लिए न तो मोज़िला ने और न ही माइक्रोसॉफ्ट ने अभी तक कोई पैच जारी किया है। लेकिन ब्राउज़र की autosave features को बन्द करके इससे बचा जा सकता है। मोज़िला ने संकेत दिए हैं कि इस समस्या का समाधान फ़ायरफ़ॉक्स संस्करण २.०.०.१ या २.०.०.२ में किया जाएगा।

Monday, November 20, 2006

Gandhigiri from Hindu Point of View

हिन्दू दृष्टिकोण से गांधीगिरी

गांधीगिरी पर अपने पिछले लेख में मैंने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी का विश्लेषण करने की कोशिश की थी। साथ ही अन्त में यह भी कहा था कि मैं गांधीगिरी का विश्लेषण विभिन्न आयामों से करने का यत्न करूंगा। हालाँकि व्यस्तता के चलते मैं काफ़ी समय तक इस विषय पर कुछ लिख नहीं सका। अब अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए हिन्दू दृष्टिकोण से गांधीगिरी का विश्लेषण करने की कोशिश करता हूँ।

हिन्दुत्व के दृष्टिकोण से गांधीगिरी का विश्लेषण और भी ज़रूरी हो जाता है, क्योंकि पहली नज़र में गांधीवाद हिन्दु धर्म पर आधारित नज़र आता है। गांधी जी भी दावा करते हैं कि उनके सिद्धान्त गीता पर पूरी तरह आश्रित हैं। निर्विवाद रूप से गीता आध्यात्मिक साहित्य के महानतम रत्नों में से एक है और हिन्दू धर्म का आधार ग्रंथ है। यह हर दृष्टि से पूर्ण है, यानि कि इसमें जहाँ संन्यासियों के लिए मुक्ति का मार्ग निर्देशित किया गया है; तो वहीं दूसरी ओर गृहस्थों के लिए भी अपरोक्षानुभूति पाने का द्वार दिखलाया गया है। इसलिए स्वभावत: जहाँ एक ओर गीता अहिंसा की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ़ हिंसा को भी परिस्थिवश ज़रूरी मानती है। लेकिन गांधी जी ने गीता से केवल अहिंसा का सिद्धान्त लेकर बाक़ी सब कुछ नकारने की चेष्टा की है।

गीता की तरफ़ दृष्टिपात करने से साफ़ देखा जा सकता है कि गीता हर हालत में अहिंसा का प्रतिपादन नहीं करती है। अर्जुद तो ख़ुद अहिंसा की बात कर रहा था। वह कह रहा था कि युद्ध व्यर्थ है और हिंसा पाप है। लेकिन भगवान श्रीकृष्ण ने उसे युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। जिसने भी गीता पढ़ी है, उसके सामने यह बात स्पष्ट है। लेकिन इस तर्क से बचने के लिए महात्मा गांधी कहते हैं कि महाभारत का युद्ध ऐतिहासिक नहीं, वरन एक आध्यात्मिक घटना है। महाभारत में मनुष्य के भीरत सदवृत्तियों और बुरी वृत्तियों के बीच युद्ध को आलंकारिक तौर पर दर्शाया गया है। यदि ऐसा भी मान लिया जाए, फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि गीता में हिंसा का निषेध किया गया है। जहाँ सत्य और धर्म की रक्षा के लिए अहिंसा कारगर न हो, वहाँ हिंसा जायज़ है।

दरअसल गांधी जी का अहिंसा का सिद्धान्त वह नहीं है, जो हिन्दू धर्म द्वारा प्रतिपादित है। बल्कि यह सिद्धान्त ईसाईयत से उधार लिया गया है। जिन्होंने ‘मेरे सत्य के प्रयोग’ पढ़ी है, वे जानते होंगे कि गांधी जी ईसाईयत से बहुत प्रभावित थे। उन्होंने इंग्लैण्ड में ईसाईयत अपनाने की इच्छा भी ज़ाहिर की थी और बाइबल का विशेष अध्ययन किया था। साथ ही उनका पालन-पोषण जैन रीति-रिवाज़ों में हुआ था। हिन्दू धर्म में अहिंसा का सिद्धान्त लचीला है, यानि कि अपरिहार्य कारणों से हिंसा करना ग़लत नहीं माना गया है। मनु-स्मृति में कहा गया है कि यदि ब्राह्मण भी आपको शारीरिक हानि पहुँचाने की मंशा से आए, तो उसकी हत्या करना पाप नहीं है। अकर्मण्यता इस उधार के अहिंसा-सिद्धान्त का सहज फल है। और इस तरह प्रकारान्त से गांधीवाद अकर्मण्यता को भी बढ़ावा देता है, जिसमें हमारा देश विगत दो सहस्राब्दियों से जकड़ा हुआ है। इस विषय पर स्वामी विवेकानन्द के वचन उद्धृत करना अनुकूल रहेगा:

विधि की विडम्बना देखो। योरोपवासियों के देवता ईसा मसीह ने सिखाया ‘किसी से बैर मत करो, जो तुम्हें गाली दें उन्हें आशीर्वाद दो, यदि कोई तुम्हारे बाएँ गाल पर थप्पड़ मारे तो उसकी ओर दाहिना गाल भी कर दो, सब कामकाजों को त्याग कर परलोक की तैयारी करो क्योंकि संसार का अन्त निकट है।’ इसके विपरीत हमारे भगवान श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं, “सदैव महान उत्साह से कर्म करो, अपने शुत्रुओं का‍ विनाश कर संसार का भोग करो।” लेकिन अन्त में जो कुछ कृष्ण या ईसा मसीह चाहते थे, उसका बिल्कुल उल्टा हो गया।

योरोपवासियों ने ईसा मसीह के शब्दों को गम्भीरतापूर्वक नहीं लिया। सदैव कार्यशील स्वभाव अपनाकर अत्यन्त प्रचण्ड रजोगुण से सम्पन्न होकर वे बड़े उत्साह और युवकोचित उत्सुकता के साथ विश्व के विभिन्न देशों के सुख और विलासों को बटोर रहे हैं और मन भर कर उन्हें भोग रहे हैं। और हम! हम एक कोने में बैठे, अपने सब साज-सामान के साथ, दिन-रात मृत्यु का ही आह्वान कर रहे हैं और गा रहे हैं –
नलिनिदलगतजल‍मतितरलं
तद्वज्जीवनमतियचपलम्।
अर्थात्, “कमलपत्र पर पड़ी हुई जल की बूंदें जितनी चंचल और अस्थिर हैं उतना ही यह मानव-जीवन क्षीण और चलायमान है।” इस सबका परिणाम हुआ है कि मृत्युराज यम के भय से हमारी धमनियों का रक्त ठण्डा पड़ जाता है तथा सम्पूर्ण शरीर काँपने लगता है। और ओफ़! यम ने भी हमारे शब्दों को सच मान लिया है और शायद इसीलिए महामारी आदि संसार भर के रोग हमारे देश में भेज दिए हैं।

अब कहो! गीता का उपदेश किसने सुना? यूरोपियनों ने। और ईसा की इच्छानुसार कौन आचरण कर रहे हैं? भगवान कृष्ण के वंशज। ईसा ने ग्रीस और रोम को चौपट किया। किन्तु कुछ ही समय पश्चात् सौभाग्य से योरोपवासी प्रोटेस्टेंट हो गए। उन्होंने ईसा के उन वचनों का, जिनका प्रतिनिधित्व पोप की सत्ता द्वारा होता है, परित्याग कर दिया और संतोष की सांस ली। लेकिन हम अन्जाने में उन उपदेशों से चिपके हुए हैं।

भारत में एक बार फिर रजोगुण उद्दीप्त हो रहा है और हम लोग पुन: कर्म करने को उद्यत हो रहे हैं। यही कर्माकांक्षा हिन्दू धर्म और गीता का मूल है। ऐसे में गांधीगिरी के ये उपदेश हमें फिर अकर्मण्यता में ढकेल देंगे, जिससे निकलने का हम प्रयत्न कर रहे हैं। हालाँकि गांधीवाद बिल्कुल ही बेकार हो, ऐसा नहीं है। लेकिन उसका दायरा बहुत सीमित है और व्यापक तौर पर उसका प्रयोग करना ठीक उसी तरह मूर्खतापूर्ण होगा, जिस तरह सब्ज़ी काटने के चाकू का इस्तेमाल युद्धक्षेत्र में करना। हिन्दू धर्म के गीता में प्रतिपादित सिद्धान्त हर देश-काल में कार्य रूप में परिणत किए जा सकते हैं और गांधीगिरी की तरह सीमित नहीं है।

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Friday, November 17, 2006

इस देश की मिट्टी में कुछ जादू है

hollywood star Angelina Jolie, wife of star brad pittवाक़ई हमारे देश की मिट्टी में जादू है। अक़्सर लोग कहते हैं कि भारतीय विदेशों में तो सभ्यता का आचरण करते हैं, लेकिन अपने देश में वापिस आते ही नियम-क़ायदों को धता बताने लगते हैं। लेकिन ये एंजलिना के बॉडीगार्ड्स तो अमरीकन हैं भई और अमेरिका में इन्होंने ऐसी कोई बदतमीज़ी की हो, कभी सुना नहीं। अगर भारत में आकर ऐसी हरकतें कर रहे हैं, तो इसमें उनका कोई दोष नहीं है। ये तो इस देश की मिट्टी का ही जादू है, जो सब पर चलता है - क्या हिन्दुस्तानी, क्या अमरीकी। हम लोगों की ग़ुलामी की आदत है कि जाने का नाम ही नहीं लेती। गोरी चमड़ी के हाथों पिटने का, गाली खाने का पुराना शौक़ जान पड़ता है। तिस पर हमारी सरकार भी गर्वान्वित होकर उन्हें भोज पर आमंत्रित करती है। वाह भई, वाह...

Monday, November 06, 2006

Gandhigiri in Historical Context

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में गांधीगिरी

‘लगे रहो मुन्ना भाई’ वाक़ई कमाल की फ़िल्म है। मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि सिद्धान्त को जब तक व्यावहारिक स्तर पर इस्तेमाल न किया जा सके, तब तक सिद्धान्त व्यर्थ हैं। इस फ़िल्म ने सैद्धान्तिक गांधीवाद को व्याव‍हारिक गांधीगिरी बना कर एक नया आयाम दिया है। यह फिल्म आम जनता में गांधी के सिद्धान्तों के प्रति कौतुहल जगाने में क़ामयाब रही है।

सार संक्षेप (जो पूरा पढ़ना चाहते हैं, वे इसे छोड़ दें)

‘लगे रहो मुन्ना भाई’ वाक़ई कमाल की फ़िल्म है। इसलिए, क्योंकि सिद्धान्त को जब तक व्यावहारिक स्तर पर इस्तेमाल न किया जा सके, तब तक सिद्धान्त व्यर्थ हैं। इस फ़िल्म ने सैद्धान्तिक गांधीवाद को व्याव‍हारिक गांधीगिरी बना कर एक नया आयाम दिया है। गांधीगिरी या गांधीवाद या इसे चाहे जो भी नाम दें – गांधी की खोज नहीं है। पिछले दो हज़ार सालों से यह हमारी जीवन-शैली का अंग है। इनका मूल हैं बौद्ध और जैन सुधार, जो बाद में गांधीवाद के रूप में परिणत हुए हैं।

लेकिन ग़ौर करने लायक बात यह भी है कि जबसे हमने इन सिद्धान्तों को पकड़ा है, हमारा पतन हुआ है। कईयों ने हमें ग़ुलाम बनाया – नादिरशाह, तैमूर, चंगेज़ ख़ान, मुग़ल, अंग्रेज़ – यह सूची बुहत लम्बी है।

लोग प्राय: कहते हैं और इस पर गौरव करते हैं कि दूसरे देश तो ख़त्म हो गए, लेकिन हमारा देश कभी मरा नहीं। लेकिन स्वाभिमानी इंसान ग़ुलामी और मृत्यु के बीच हमेशा मृत्यु का वरण करता है। जो बात व्यक्तियों पर लागू होती है, वही बात राष्ट्रों पर भी लागू होती है। हम आज भी खड़े हैं अपनी ऐतिहासिक मूर्खताओं के जीवन्त उदाहरण के तौर पर, और विडम्बना यह है कि हमें इस बात पर गर्व है।

अहिंसा निश्चय ही श्रेष्ठ है, लेकिन विकृत अहिंसा को ही हम आजतक अहिंसा समझते रहे हैं। अहिंसा हर दिशा में होती है, बाहर भी और भीतर भी। हमने बाहर अहिंसा की चेष्टा की और अपने ऊपर ही हिंसा की। दूसरे के अन्याय सहना और प्रतिकार न करना अपने ऊपर हिंसा करना है। इसीलिए हमें गांधीगिरी बहुत पसंद आती है, क्योंकि यह दो हज़ार वर्षों के अकर्मण्य राष्ट्रीय जीवन के अनुकूल है।

हर मुल्क में क्रान्तिकारियों ने राजशाही के तख़्ते पलटे हैं, क्योंकि इन मुल्कों में क्रान्ति जनसाधारण में फैल चुकी थी। लेकिन यहाँ क्रान्ति कभी फैल ही न सकी, आम जनता का क्रान्ति से कोई सरोकार नहीं था। जनता में था तो बस प्रमाद और आज भी इसमें ख़ास कमी नहीं आई है। भारत उस काल में सोने की चिड़िया कहलाता था जब हममें संघर्ष की, लड़ने की शक्ति थी। गांधीगिरी का दुष्परिणाम यही है कि यह सिद्धान्त उन पुराने सड़े-गले मूल्यों को पुन: प्रतिष्ठित कर रहा है, जो हमारी ग़ुलामी के कारण स्वरूप हैं।


लेकिन सोचने लायक बात यह है कि क्या गांधीगिरी देश को सही दिशा में ले जाने का काम कर सकती है? क्या गांधीगिरी आज के युग में भी सार्थक है? क्या समाज गांधीगिरी को आत्मसात करने में सक्षम है और क्या ऐसा करने से समाज का कुछ भला होगा? इन बातों को समझने के लिए गांधीगिरी को व्यापक तौर पर देखने की आवश्यकता है, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में इसका विश्लेषण किए जाने की ज़रूरत है। क्योंकि गांधीगिरी का सवाल केवल एक फ़िल्म से ही नहीं जुड़ा है, न ही गांधी नामक किसी व्यक्ति-विशेष से – यह जुड़ा है हमारे इतिहास से, हमारे वर्तमान हालात की वजहों से।

गांधीगिरी या गांधीवाद या इसे चाहे जो भी नाम दें – गांधी की खोज नहीं है। पिछले दो हज़ार सालों से यह हमारी जीवन-धारा है, हमारी जीवन-शैली का अंग है। हालाँकि गांधी जी को यह श्रेय जाता है कि उन्होंने इसे कारगर ढंग से अंग्रेज़ों के खिलाफ़ इस्तेमाल किया। गांधीवाद का मतलब सत्य, अहिंसा और सत्याग्रह आदि सिद्धान्तों की गांधी जी की व्याख्या से है। और यह सैद्धांतिक व्याख्या पिछले दो हज़ार सालों में विकसित हुए हैं, और हमारे अन्त:करण का एक अंग बन गए हैं। इनका मूल हैं बौद्ध और जैन सुधार, जो बाद में गांधीवाद के रूप में परिणत हुए हैं।

लेकिन ग़ौर करने लायक बात यह भी है कि जबसे हमने इन सिद्धान्तों को पकड़ा है, हमारा पतन हुआ है, हम गिरते चले गए हैं और अपनी हालत उस कीड़े की तरह बना ली है, जिसे चाहे जो भी पैरों तले कुचल सकता है। हर ऐरा-ग़ैरा, जो भी यहाँ से गुज़रा उसने हमें पीटा और हम दो सहस्राब्दियों से लगातार यूं ही पिटते चले आ रहे हैं। नादिरशाह, तैमूर, चंगेज़ ख़ान, मुग़ल, अंग्रेज़ – यह सूची बुहत लम्बी है। दुनिया में हमारे अलावा और कोई भी दूसरी जाति नहीं है, जो हज़ार साल ग़ुलाम रही हो। हमारी कई पुश्तें ग़ुलामी में ही बीत गईं हैं। ऐसा लगता है कि हमारे राष्ट्रीय जीवन का उद्देश्य ग़ुलाम होना ही रहा हो।

लोग प्राय: कहते हैं और इस पर गौरव करते हैं कि हमारा देश कभी मरा नहीं, हम अमर हैं – यूनान, रोमां, मिस्र सब मिट गए जहाँ से, कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। लेकिन यह गौरव की नहीं, सबसे बड़ी शर्म की बात है। हमारे देश में यह बेहूदगी बहुत प्रचलित है – जिस बात पर हमें शर्मिन्दा होना चाहिए, उसे लेकर हम गौरवान्वित हैं। लेकिन हम हैं कि हमें लज्जा नहीं आती, हमने उसे तिरोहित कर दिया है। आप सबने चन्द्रशेखर आज़ाद के बारे में सुना होगा। जब अंग्रेज़ों से उस वीर क्रान्तिकारी को चारों ओर से घेर लिया और उसके निकलने का कोई उपाय नहीं शेष रहा, तो उसने अपनी कनपटी पर पिस्तौल रख कर स्वयं को गोली मार ली – वह शहीद हो गया, अमर हो गया। इसे कहते हैं अमर होना। स्वाभिमानी इंसान ग़ुलामी और मृत्यु के बीच हमेशा मृत्यु का वरण करता है। इसकी तुलना एक जेब कतरे से करो, पुलिस उसे पकड़ लेती है, गाली देती है, डंडे मारती है, जेल में ठूंस देती है – वह जीवित रहता है, क्योंकि उसमें कोई स्वाभिमान नहीं। उसमें स्वाभिमान नहीं हो सकता है, क्योंकि उसने जो काम किया है, उससे कभी स्वाभिमान नहीं पैदा हुआ करता है। जो बात व्यक्तियों पर लागू होती है, वही बात राष्ट्रों पर भी लागू होती है। जो राष्ट्र स्वाभिमानी थे वे सब मिट गए और अपनी गौरव गाथाएँ छोड़ गए; यूनान, रोम, मिस्र – सब स्वाभिमानी थे। हम आज भी खड़े हैं अपनी ऐतिहासिक मूर्खताओं के जीवन्त उदाहरण के तौर पर, और हमें इस पर गर्व है। हमारी हालत उस जेब कतरे से कुछ बेहतर नहीं है।

लेकिन इसकी वजह क्या है? अहिंसा निश्चय ही श्रेष्ठ है, लेकिन विकृत अहिंसा को ही हम आजतक अहिंसा समझते रहे हैं। जैन और बौद्ध सुधार 500 सालों के भीतर ही विकृत हो गए, सारी जाति अकर्मण्य और आलसी बन गई, मठप्रेमी बन गई, संन्यासप्रेमी बन गई, भगोड़ी बन गई। और आजतक हममें कोई ख़ास सुधार नहीं आया है। अहिंसा हर दिशा में होती है, बाहर भी और भीतर भी। हमने बाहर अहिंसा की चेष्टा की और अपने ऊपर ही हिंसा की। दूसरे के अन्याय सहना और प्रतिकार न करना कोई बहुत श्रेष्ठ बात नहीं है, यह अपने ऊपर हिंसा करना है। इसमें दूसरे का कोई दोष नहीं है। जो धर्म कहता है कि अत्याचार करने वाला दोषी है, वह ग़लत है। हिंसा अत्याचार करना नहीं बल्कि अत्याचार सहना है। हाँ, दूसरे पर अत्याचार भी हिंसा है, लेकिन बाहरी हिंसा है, छोटी हिंसा है। लेकिन खुद अत्याचार सहना भीतरी हिंसा है, अपने ऊपर हिंसा है, बड़ी हिंसा है। इसीलिए हमें गांधीगिरी बहुत पसंद आती है, क्योंकि यह हमारे पिछले दो हज़ार वर्षों के राष्ट्रीय जीवन के अनुकूल है। हमारे अकर्मण्य स्वभाव के अनुकूल है, हमारे आलस्य के अनुकूल है, हमारी ग़ुलाम मानसिकता के अनुकूल है।

एक बात पर और ध्यान दो, हर मुल्क में क्रान्तिकारियों ने राजशाही के तख़्ते पलटे – फ्रांस में, इंग्लैंड में, अमरीका में, हर जगह। ऐसा क्यों कर हो सका? क्योंकि इन मुल्कों में मुट्ठीभर क्रान्तिकारी न थे, क्रान्ति जनसाधारण में फैल चुकी थी, हर देशवासी क्रान्तिकारी था। लेकिन यहाँ क्रान्ति कभी फैल ही न सकी, दो-एक भगत सिंह हुए, दो-एक चन्द्रशेखर आज़ाद हुए, लेकिन आम जनता का उनसे कभी कोई सरोकार नहीं था। क्योंकि यहाँ जनता में संघर्ष की क्षमता नहीं थी, संघर्ष के लिए आवश्यक रजोगुण नहीं था। हमारी जनता में था तो बस प्रमाद, तमोगुण की पराकाष्ठा, हताशा – और आज भी इसमें कुछ ख़ास कमी नहीं आई है। इसलिए गांधी जी को इस देश में बहुत अनुयायी मिले, सारा देश गांधी जी का अनुयायी हो गया। लेकिन गांधी अगर अमेरिका में पैदा होते तो कोई बड़े राजनेता न होते, उनका कोई अनुयायी न होता। क्योंकि वहाँ की जनता का ख़ून सूखा नहीं है, मस्तिष्क दुर्बल नहीं है, उनमें संघर्ष करने की क्षमता है।

अपने देश के इतिहास को देखो तब भी यही पाओगे; जब तक हम विकृत अहिंसा, तथाकथित वैराग्य, संसार की असत्यता जैसे मूढ़ सिद्धान्तों से दूर थे तभी तक हमने प्रगति की। भारत उस काल में सोने की चिड़िया कहलाता था जब हममें संघर्ष की, लड़ने की शक्ति थी। वैदिक संहिताओं को उठाकर देखो, प्राचीन आर्य एक संघर्षप्रिय जाति थे। गांधीगिरी का दुष्परिणाम यही है कि यह सिद्धान्त उन पुराने सड़े-गले मूल्यों को पुन: प्रतिष्ठित कर रहा है, जो हमारी ग़ुलामी के कारण स्वरूप हैं। भारत एक बार फिर अपने पैरों पर खड़ा होने लगा है, लड़ने को तैयार है, संघर्ष के लिए सचेष्ट है। ऐसे में गांधीगिरी अगर प्रभावी होती है तो हम फिर उसी कूँए में गिर जाएंगे, जिसमें पिछले हज़ार वर्षों से पड़े हुए थे।

यह विषय बहुत लम्बा है। इस पर और चिन्तन किए जाने की ज़रूरत है। इसलिए आज की बात को अगली में पोस्ट में आगे बढ़ाऊँगा। आशा है आप केवल प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी न देकर क्रियात्मक टिप्पणी देंगे।
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