Sunday, December 31, 2006

Mirza Ghalib's Home Disappeared

मिर्ज़ा ग़ालिब का घर हुआ ग़ायब

Mirza Ghalib's Home Kalan Mahalमहान उर्दू शायर मिर्ज़ा ग़ालिब आगरा में पैदा हुए थे। हाल में सारे देश में उनका जन्मदिन मनाया गया। अगर आप आगरा में किसी से पूछें कि मिर्ज़ा ग़ालिब कहाँ पैदा हुए थे, तो शायद ही कोई आपको बता पाएगा। दरअसल सारा दोष पुरातत्व विभाग का है, जिसने ग़ालिब के जन्म-स्थल को बचाने की कोई कोशिश नहीं की।

शहर के इतिहासकार और वयोवृद्ध बताते हैं कि कालां महल इलाक़े में एक बड़ी हवेली हुआ करती थी, जहाँ सन् १७९७ में ग़ालिब का जन्म हुआ था। लेकिन कालां महल इलाक़े में कोई भी उस जगह के बारे में पक्के तौर पर नहीं कह सकता, जहाँ मियाँ ग़ालिब का जन्म हुआ था। हालाँकि एक इमारत है, जो ग़ालिब की हवेली की ली गई एक बहुत पुरानी तस्वीर से मिलती-जुलती है। बचपन में मुंशी शिव नारायण को ग़ालिब द्वारा लिखे गए एक पत्र से उनकी हवेली के बारे में जानकारी मिलती है, जिसमें उन्होंने अपने घर के बारे में काफ़ी कुछ लिखा है। उन्हीं को लिखे एक अन्य ख़त में उन्होंने आर्थिक तंगी के चलते पैतृक सम्पत्ति छोड़ने की इच्छा का भी उल्लेख किया है। उन्होंने अपनी सम्पत्ति १८५७ के गदर के आस-पास सेठ लक्ष्मीचंद को बेच दी थी।

अब एक स्कूल ट्रस्ट उस सम्पत्ति का मालिक है, लेकिन ट्रस्ट प्रबंधन के मुताबिक़ उस सम्पत्ति का ग़ालिब से कुछ लेना-देना नहीं है। पुराने रिकॉर्ड के मुताबिक़ वहाँ जो ख़ूबसूरत बग़ीचा था, वह कब का ग़ायब हो चुका है और अब वहाँ एक बड़ा सा पानी का टेंक है। इमारत के वर्तमान मालिक के हिसाब से ग़ालिब का उस भवन से कोई सम्बन्ध नहीं है। हालाँकि तथ्य कुछ और ही बयान करते हैं। १९५७ में ग़ालिब की सालगिरह के मौक़े पर मशहूर उर्दू शायद मैकश अकबराबादी की एक तस्वीर है, जो प्रधानाचार्य के वर्तमान दफ़्तर के ठीक सामने ली गई है।

ग़ालिब से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम १९६० तक बाक़ायदा वहीं आयोजित किए जाते रहे हैं। ट्रस्ट द्वारा बड़े पैमाने पर की गई तोड़-फोड़ और निर्माण के चलते अब भवन काफ़ी बदल चुका है। विख्यात शायर फिराक़ गोरखपुरी और अभिनेता फ़ारुक़ शेख़, जिन्होंने ग़ालिब पर एक फ़िल्म का निर्माण किया था, भी इस इमारत को देखने आए थे। ऐतिहासिक तथ्य पुख़्ता तौर पर इशारा करते हैं कि वही भवन मिर्ज़ा ग़ालिब का जन्मस्थल है, जहाँ आज एक गर्ल्स इंटर कॉलेज चल रहा है। हालाँकि इस बारे में अभी और शोध की ज़रूरत है कि क्या वही इमारत ग़ालिब की पुश्तैनी हवेली है।

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सम्बन्धित आलेख:
१. Why are girls scared of visiting Elephant tower?

Monday, December 25, 2006

I am Blessed

हम धन्य हैं

आज क्रिसमस है। नीरज भाई ने अपने गूगल टॉक में टांक रखा है – “धन्य हैं वे लोग, जो पंक्ति में अन्तिम खड़े होने का साहस करते हैं।” इसे पढ़ते ही हम फूल कर कुप्पा हो गए, क्योंकि आजतक हम अपने आप को बहुत ही ‘अधन्य’ टाइप का समझ रहे थे। हमें पता ही नहीं था कि हम इतने धन्य हैं। हम पाठशाला में हमेशा प्रार्थना के लिए खड़ी पंक्ति में देर से आने की वजह से सबसे पीछे लगते थे। इतना ही नहीं, हम तो डबल धन्य हैं। क्योंकि गप्पें लड़ाने के लिए हम कक्षा में बैठते भी सबसे पीछे ही थे।

इस बाबत नीरज भाई से वार्तालाप हुआ, तो हमारी धन्यता की और बहुतेरी वजहें उभर कर सामने आईं। हालाँकि कुछ आगे वाले नासमझ बच्चे और शिक्षक कहते थे कि पीछे वाले शोर मचाते हैं। हाँ, बात तो सच ही थी। लेकिन पीछे वाले इतने धन्य थे, तो अपना अहोभाव प्रकट करने के लिए हर्षध्वनि करना तो स्वाभाविक है। परीक्षा में पिछड़ने के कारण हमारी वजह से ही दूसरे लोगों को आगे (प्रथम, द्वितीय वगैरह) गिनाए जाने का सुख प्राप्त होता था।

बातों-बातों में फिर हम ईसा के आध्यात्मिक स्तर पर आरोहण करने लगे। खुद तो धन्य थे ही, दूसरों को भी धन्य बनाने लगे। हमारे साथ फ़्लैशबैक में चलिए, जब हम स्कूल में हुआ करते थे। हमने याद करना शुरू किया, कक्षा में पीछे बैठे हम कह रहे हैं – “धन्य है मास्टर जी... आपकी गरिमामयी उपस्थिति से हम पीछे वाले अपने भाग्य को धन्य मानते हैं।” फिर मास्टर जी अपनी धन्यता प्रदर्शित करने के लिए सोंटे से प्रसाद वितरित कर रहे हैं। प्रसाद पाते ही सभी धन्य लड़कों का अहोभाव चित्र-विचित्र आवाज़ों के ज़रिए मुँह से प्रकट हो रहा है। प्रसाद पाकर हमको लगता कि सारे जग में प्रभु ईशू के अलावा हमें ढंग से कोई और न समझ सका। अब मास्टर जी की उपस्थिति के बारे में हमारे विचार थोड़े बदले और इस तरह हो गए – “मास्टर जी, जब आप कक्षा में नहीं आ पाते, तब हम आपकी उपस्थिति से भी ज़्यादा गरिमामयी अनुपस्थिति से अधिक धन्य अनुभव करते हैं।” यह सुनकर हमारे सहपाठी ने जोड़ा – “और आपकी अनुपस्थिति में खूब सारे काग़ज़ के हवाई जहाज़ उड़ा कर अपनी धन्यता को अभिव्यक्त करते हैं।” आगे बैठे हुए बालकों को हम चमकाते हैं, धमकाते हैं – “स्सालों!!! खुद पढ़कर आते नहीं हो... तभी मास्टर जी हमको उठाते हैं जवाब के लिए।”

अर्रर्रर्र.... ये क्या, हम अपनी ‘धन्यता’ की यादों में खोए थे और आपने टोक दिया। पूछ रहे हो कि वो पुरानी बात है, अब काहे अपने को धन्य कहते हो? हम अभी भी धन्य हैं, बाइबल इसका प्रमाण है – “धन्य हैं वे जो ग़रीब हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज उनके लिए है।” हम तो हमेशा से ही ठन-ठन गोपाल हैं और अभी भी वही हालत बरकरार है। इसलिए हमारी ‘धन्यता’ एकदम सातत्य में, कॉन्टिन्यूटी में है। ख़ैर, आखिर में वह बात जो न ईसा ने कही और न ही जॉन, मैथ्यू वगैरह को सूझी। चूँकि हम ईसा के स्तर पर आरोहण कर रहे हैं, सो कहे देते हैं – “धन्य हैं वो जो ब्लॉगिंग में समय नष्ट कर रहे हैं, धन्य हैं वो जो ब्लॉग पर लिखी जाने वाली कविताएँ पढ़ सकते हैं, धन्य हैं वो जो सोचते हैं कि उनका लिखा भी पढ़ा जाता है, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं के लिए है।” :-)

क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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Tuesday, December 19, 2006

Free Download Bollywood Hindi Songs & Music

Great Bollywood Actor & Singer Kishore KumarI’ve recently developed the taste for old classical and filmy Hindi music and songs. Old songs are usually more melodious and heart-touching. But the problem is that there’s no music library for old songs around, so I thought to google it and found really some very interesting websites. This is the best website to free download hindi songs - Hindi Songs. I’m a great fan of Kishore Kumar. And if you’re his torrid fan too, visit this website dedicated to this great personality. You’ll find almost all the songs of Kishore da here. Indian Screen has a huge collection of old songs. Even I got some very old songs dating back to the 1930’s, isn’t it amazing? These people have put a lot of hard work to collect and digitalize old songs. Do visit Indian Screen; if you are an ardent fan of old songs like me.

Cool Toad is another great site, where you’ll get most of the new and old songs. But first registration is required in order to access the vast database of this website. Here you’ll get all kind of music – pop, rock, punk, hip hop, jazz, country, hindi, english… everything you can think of. So don’t forget to add Cool Toad in your list of favorites. Enjoy.

हाल में मुझे पुराने हिन्दी गाने सुनने का नया-नया शौक़ पैदा हुआ है। अमूमन पुराने गाने ज़्यादा मधुर और हृदय-स्पर्शी लगते हैं। लेकिन दिक़्क़त यह है कि यहाँ आस-पास कोई ऐसी दुकान नहीं है, जहाँ पुराने गानों की कैसट या सीडी ख़रीदा जा सके। तो मैंने इस बारे में गूगलाने की सोची और वाक़ई कई बेहतरीन वेबसाइट्स मिलीं, जहाँ से पुराने गाने मुफ़्त में डाउनलोड किए जा सकते हैं। हिन्दी गाने मुफ़्त में डाउनलोड करने के लिए मेरे हिसाब से सबसे बढ़िया वेबसाइट है - हिन्दी सॉङ्ग्स।  मैं किशोर कुमार का बड़ा प्रशंसक हूँ। अगर आपका नाम भी उनके प्रशंसकों की फ़ेहरिस्त में शुमार करता है, तो इस महान व्यक्तित्व को समर्पित इस वेबसाइट को देखिए। यहाँ पर आप किशोर दा के सारे गाने पाएंगे।

इसके अलावा इण्डियन स्क्रीन पर भी पुराने गानों का बड़ा संग्रह है। यहाँ तक कि १९३० के ज़माने के भी कुछ बहुत पुराने हिन्दी गाने यहाँ से डाउनलोड किए जा सकते हैं। है न कमाल? वाक़ई इन लोगों ने पुराने गानों को खोजने और उनके डिजिटलीकरण के लिए बहुत मेहनत की है। आप भी अगर मेरी तरह पुराने गानों के शौक़ीन हैं, तो इंडियन स्क्रीन देखना मत भूलिए।

कूल टोड भी एक और बढ़िया वेबसाइट है, जहाँ आपको ज़्यादातर नए-पुराने गाने मिल जाएंगे। लेकिन इस वेबसाइट के विशाल डाटाबेस को खंगालने के लिए पहले आपको इस पर रजिस्ट्रेशन करना पड़ेगा। यहाँ आपको हर तरीक़े का संगीत मिलेगा - पॉप, रॉक, पंक, हिप हॉप, जैज़, कण्ट्री, हिन्दी, अंग्रेज़ी... वो सब कुछ जिसके बारे में आप सोच सकते हैं। तो कूल टोड को भी अपनी पसन्दीदा साइट्स की सूची में जोड़ लीजिए। इन वेबसाइटों से गाने डाउनलोड कीजिए और एक बार फिर पुराने ज़माने में खो जाइए।

सम्बन्धित आलेख :
१. Record Streaming Music and Songs

Friday, December 15, 2006

Yoga & Tantra in World of Consumerism

उपभोक्तावाद के दौर में योग और तंत्र

उपभोक्तावाद की गति अजीब है। यह हर उस चीज़ को, जिसमें बिकने की सम्भावना है, उपभोक्ता के मुताबिक़ ढाल कर पेश करता है। और अगर किसी चीज़ में बिकने की सम्भावना नहीं है तो उसे तोड़-मरोड़ कर इस तरह बना दिया जाता है, ताकि लोगों को ललचाकर उसे बेचा जा सके।

योग और तन्त्र के साथ भी यही विडम्बना है कि दोनों ही उपभोक्तावाद में जकड़ गए हैं। यानि कि मूलत: जहाँ दोनों आत्मज्ञान की विधियाँ हैं और इसलिए इन्हें बेचना मुमकिन नहीं है, क्योंकि आत्मज्ञान की कोई उपयोगितावादी क़ीमत नहीं है, इन्हें बाज़ार के हिसाब से पुनर्परिभाषित कर दिया गया है। जहाँ योग को स्वस्थ रहने के एक साधन के तौर पर पेश किया जाता है, वहीं तन्त्र ‘सेक्रेड सेक्स’ मतलब कि ‘पवित्र संभोग’ का पर्याय बन कर रह गया है।

जिस तरह उपभोक्तावादी बाज़ार पर अमेरिका का कब्ज़ा है, उसी तरह इंटरनेट पर भी अमेरिका ही छाया हुआ है। यह हम हिन्दुस्तानियों के लिए निहायत शर्म की बात है कि योग और तन्त्र पर बनी ज़्यादातर वेबसाइट्स भी अमरीकी हैं। इंटरनेट पर ‘योग’ खोजने पर आसनों के अलावा कुछ क़ायदे की जानकारी मुश्किल से मिलती है, मानो आसन ही योग हों। हाँ, स्वामी रामदेव के उदय के साथ प्राणायाम को भी इसमें जोड़ा जा सकता है। वहीं तन्त्र की हालत और भी ख़राब है। वामाचार तन्त्र का बहुत ही छोटा भाग है और उस पर भी वामाचार की हज़ारों व्याख्याएँ हैं। लेकिन तन्त्र के नाम पर सिर्फ़ sacred sex ही देखने को मिलता है। तिस पर भी दु:ख की बात यह है कि हम भारतीय भी योग और तन्त्र की इस नई व्याख्या को आँख मूंद कर स्वीकार कर चुके हैं। तो हम कह सकते हैं कि न योग में और न ही तंत्र में कोई शक्ति है, शक्ति का केन्द्र तो उपभोक्तावाद ही है।

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Wednesday, December 13, 2006

दलितों का सराहनीय क़दम

आज बीबीसी हिन्दी पर यह ख़बर पढ़ी – दलितों ने मांगा पूजा का अधिकार। आज़ादी को मिले साठ वर्ष होने को हैं, लेकिन लोगों की संकीर्ण सोच ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेती है। यह आश्चर्यजनक है और साथ में बेहद दु:खद भी, कि आज भी दलितों को मन्दिरों में प्रवेश करने से रोका जाता है। इसे विसंगति ही कहा जाएगा कि समाज में भेद-भाव अभी भी व्याप्त है और हम विकसित राष्ट्र बनने का सपना देख रहे हैं।

लेकिन यह घटना दलितों की सकारात्मक सोच को दर्शाती है। दलितों ने भारी तादाद में जाकर उस मन्दिर में पूजा-अर्चना की और अपनी आत्मशक्ति का परिचय दिया। यह घटना पूरे देश के दलितों के लिए पथ-प्रदर्शन का काम कर सकती है। दलितों के अधिकारों का हनन किए जाने पर मतान्तरण करके भागना उपाय नहीं है, बल्कि डटे रहना और अपना हक़ प्राप्त करना श्रेयस्कर है। क्योंकि विशुद्ध हिन्दूधर्म सभी की समानता की घोषणा करता है। भेद-भाव करने वाले लोग वस्तुत: हिन्दू कहलाने के अधिकारी ही नहीं हैं। दलितों का यह काम समानता की स्थापना का, विशुद्ध हिन्दुत्व की स्थापना का कार्य है। घर गन्दा होने पर उसे छोड़ा नहीं जाता, बल्कि उसकी सफ़ाई की जाती है। डट कर इस वि‍कृति को दूर करने का यत्न कर रहे भीलवाड़ा के दलित निश्चय ही आदर्श स्थापित कर रहे हैं और तारीफ़ के हक़दार हैं।

Monday, December 11, 2006

सागर भाई को हँसाना है

आजकल कविराज चिट्ठा मण्डल में लोगों को पकड़-पकड़ कर सागर जी को हँसवाने का काम करा रहे हैं। हम यूँ ही निर्द्वन्द्व भाव से चिट्ठा जगत् में विचरण कर रहे थे, इतने में कविराज ने पकड़ लिया और बोले – “अब तुम्हारी बारी है। कुछ भी करो, लेकिन सागर भाई को हँसाओ।” हमने बहुत मान-मनुहार की कि हमें बख़्श दो, जाने दो, लेकिन कविराज थे कि टस-से-मस नहीं हुए। हालाँकि हम भी मूर्ख हैं जो कविराज से अनुनय-विनय कर रहे थे। क्योंकि इंसान कवि बन ही तब पाता है जब उसमें दूसरे को पकड़ कर रखने का (दुर्)गुण विकसित हो गया हो, दूसरा चाहे कितना ही गिड़गिड़ाए लेकिन कवि उसे कविता झिलाए बिना नहीं छोड़ता है। पहले तो हमारे मन मैं आया कि कहें – किसी बेचारे को अपनी ख़तरनाक कविताएँ ज़बरदस्ती पढ़ा-पढ़ा कर इतना टॉर्चर ही काहे करते हो, कि बाद में हँसाने के लिए ज़मीन-आसमान एक करने पड़ें। लेकिन अपनी अघोषित सज्जनता दिखलाने के लिए हमने ऐसा कुछ कहने से गुरेज़ किया।

ख़ैर, जिस तरह पाकिस्तान अपने मिसाइल कार्यक्रम के लिए हमेशा चीन की सूरत ताकता है, ठीक उसी तरह हम इस काम को पूरा करने के लिए दूसरे चिट्ठाकारों की मदद लेने की कोशिश करने लगे। हमने सोचा कि पहले महाचिट्ठाकार जीतू भाई को पकड़ा जाए। उन्हें तो झक मार कर मदद करनी ही पड़ेगी, क्योंकि उन पर हमारे सौ रूपए जो उधार हैं। सो सबसे पहले उन्हें पकड़ा, लेकिन जीतू भाई का मूड ज़रा ऑफ़ था। हम तुरन्त समझ गए, हो-न-हो जीतू-नामधारी छद्म ब्लॉगर की कहीं ताज़ी टिप्पणी हो चुकी है। तो हमने सहानुभूति के दो शब्द कहे, जीतू भाई से राम-राम की और निकल लिए। वैसे हम बता दें, अगर किसी भी पोस्ट पर ‘जीतू’ नाम से दो टिप्पणियाँ नज़र आएँ, तो समझो कि नीचे वाली टिप्पणी में लिखा होगा – यह ऊपर वाली टिप्पणी हमने नहीं की है।

फिर हमने सोचा कि केवल आलोक जी ही हमारी मदद कर सकते हैं, क्योंकि आदि काल से वो लोगों की कम्प्यूटर पर हिन्दी लिखने में मदद करते आ रहे हैं। स्वभाव से ही मदद-प्रिय हैं, तो हमारा काम ज़रूर बनवा देंगे। पहले हमने उनकी थोड़ी मक्खनबाज़ी की, तारीफ़ की – आप तो हिन्दी ब्लॉग जगत् के पितामह हैं वगैरह, वगैरह। सुनकर आलोक जी गदगद हो गए और हमें लगा कि हमारा काम बन गया। वे बोले – “वत्स, हम खुश हुए। लाओ तुम्हारी यह पोस्ट हम लिख देते हैं। जाओ, अब कल आना।” हमारी ख़ुशी का तो कोई ठिकाना ही न रहा। हम अगले दिन पहुँचे और पोस्ट मांगी। उन्होंने विजिटिंग कार्ड के आकार का काग़ज़ एक टुकड़ा हमारी तरफ़ सरका दिया, उस पर लिखा था – “सागर भाई को हँसाना है... हा हा हा।” हमें लगा कि आलोक जी से ज़रूर कौन्हूँ भूल हो गई है और हम बोले – आपसे समझने में कुछ ग़ल्ती हो गई है, हमें सागर जी को तार नहीं भेजना है। हमें तो पूरी ब्लॉग पोस्ट लिखनी है। सुनकर आलोक भाई हँसे और हमें सदमा देने के लिए बोले – “बच्चा, ये पूरी पोस्ट ही है।” इत्ते में पीछे बैकग्राउण्ड सांग बजने लगा – मैं रोऊँ या हँसू, करूँ मैं क्या करूँ। हमने उन्हें प्रणाम किया और निकल लिए उस ‘वेद मंत्र’ वाली पर्ची को हाथ में लेकर।

“जो हुआ सो हुआ, फ़ुरसतिया जी सदा सहाय” – मन में ये शब्द न जाने कहाँ से गूंजे और दिल को बहुत तसल्ली दे गए। फ़ुरसतिया जी ने भी सहायता का वचन दिया और अगले दिन आने को कहा। हम दिल में हर्ष और भय मिश्रित भाव लेकर लौट आए। हर्ष इसलिए कि महान व्यंग्यकार हमारी मदद करेंगे तो सागर भाई का हँसना पक्का है, लेकिन भय इसलिए कि आलोक भाई ने भी इसी तरह अगले दिन बुला कर खर्रा पकड़ा दिया था। जैसे सुख का विलोम दु:ख होता है, आसमान का पाताल होता है, वैसे ही ‘आलोक’ का विलोम ‘अनूप’ होता है – ये बात हमें नई-नई पता लगी। अगले दिन पहुँचे तो अनूप जी ने हज़ार पन्नों की एक पांडुलिपी निकाल कर दे दी, बोले – “तुम्हारे लिए कल ये लिख दी थी, बस टाइप कर लेना।” हमें फिर लगा कि हो-न-हो, अनूप जी हमारी बात समझ नहीं पाए हैं। हमने कहा – “शायद आपको कुछ ग़लतफ़हमी हो गई है। हमने उपन्यास के लिए नहीं कहा था। हमें तो एक छोटी-सी ब्लॉग पोस्ट लिखनी है।” वे बोले – “ये तुम्हारे ब्लॉग के लिए ही है। अब नाटक मत करो और इसे चुपचाप ले जाओ। हमारे ब्लॉग के हिसाब से यह बहुत छोटी पोस्ट बनेगी।” बात तो ठीक ही लगी, फ़ुरसतिया जी की ब्लॉग पोस्ट का आकार तो इससे बहुत बड़ा होता है। सो हम पांडुलिपी ले तो आए, लेकिन टाइप करने की हिम्मत नहीं जुटा सके।

थक-हार कर हम आखिरकार समीर लाल जी के पास पहुँचे। कहा कि ‘अब तो बस आप ही उबारिए, कोई कुण्डलिया रच संकट से हमें तारिए’। किसी नौसीखिए कवि की तरह की गई हमारी इस ऊट-पटांग तुकबंदी से समीर जी प्रसन्न हो गए और हमें संकट से उबारने का वचन दे बाद में फिर बुलाया। बाद में पहुँचने पर यह रचना हमारे हाथ में थमा दी -

सागर भाई को हँसाना है, काम नहीं है आसान
विफल हुए ये करते-करते, बहुत से लोग महान
बहुत से लोग महान, हार समाए काल के गाल
उनमें जीत सका बस एक, नाम है समीर लाल
कहे ‘समीर’ तुममें नैक सी भी अक़ल हो अगर
छोड़ो ये सब काम, क्या कभी हँसा भी है सागर?

हमने कहा कि आपकी कविता तो बढ़िया है, लेकिन ये तो आपके ही नाम से है। हमारा इसमें क्या है, लिखना था तो हमारे नाम से लिखते न। इस पर समीर जी ने अफ़सोस जताया – “अपने नाम से पचास कुण्डलिया प्रतिदिन की दर से लिखते-लिखते आदत पड़ गई है बीच में नाम घुसाने की। अब यही ले जाओ।” तो हम वही लेते आए उनके पास से।

इसके बाद तो हमसे एक बहुत बड़ी ग़लती हो गई कि हम अमित भाई के पास पहुँच गए। अमित भाई से मदद के लिए कहा तो न जाने किस बात पर नाराज़ हो गए। उनका रंग लाल हो गया, सर पर दो सींग निकल आए, नाक और कान से धूआँ निकलने लगा और वे ज़ोर-ज़ारे से उछलने लगे। ग़ुस्से में बोले – “मुझे सब ख़बर है कि तुम कई ब्लॉगरों को परेशान करके आ रहे हो। अब मैं तुम्हें और ब्लॉगर्स को परेशान नहीं करने दूंगा। वैसे भी तुम हमेशा ग़लत कैटेगरी में थ्रेड चालू करते हो। तुम्हारा यह बेहूदा थ्रेड यहीं बन्द किया जाता है।” हम वहाँ से उल्टे पांव दौड़ आए और अपनी जान बचाई।

हम जाना तो और भी बहुत-से दूसरे चिट्ठाकारों के पास चाहते थे, लेकिन अब हमारा थ्रेड ही अमित भाई ने बंद कर दिया है तो क्या करें। सो अब हमें ही कुछ करना पड़ेगा। जहाँ तक हमें याद पड़ता है, हमें ब्लॉग पर इंटरनेट से चुराए हुए सुन्दरियों के फोटुओं को चिपकाने के अलावा बाक़ी कुछ नहीं आता है। सो फ़ोटू चिपकाए देते हैं, देखकर सागर भाई को हँसी आए, रोना आए या दिल में कुछ और ही ख़्याल आए... ये खुद उनकी ज़िम्मेदारी है। यहाँ पर देख लीजिए।

Sunday, December 10, 2006

आओ मूर्तियाँ तोड़ें

यूँ तो हम, बनवारी, भीखू और पुत्तन लंगोटिया यार हैं। लेकिन जैसा कि अक़्सर लंगोटिया यारों में होता है, कभी-कभी हममें भी जूतम पैजार की नौबत आ जाती है। सो एक दिन भिखू भड़क गया कि तुम लोग हमको ख़्वामख़्वाह ही ताने मारते रहते हो और हम आसाराम बापू के प्रवचन में बैठी जनता की नाईं बिना चूँ-चपड़ किए तुम्हारी बक़वास सुनते रहते हैं। हम भी ब्रजवासी हैं, कन्हैया हज़ार के उपर शिशुपाल की गाली नहीं सुन सके तो हम तुम्हारे ताने काहे सुनें? अब तो तुम लोगों को भुगतना ही पड़ेगा।

सो वह डंडा उठाए के हमारे मुहल्ले में पहुँचा और बनवारी के घर के सामने लगी उसके के दादाजी की मूर्ति पर पिल पड़ा – दादाजी रईस ज़मींदार थे, सो मूर्ति-उर्ति लगवाने का पैसा रहा होगा। वैसे तो हमें भीखू की अक़्ल पर हमेशा से शक था, लेकिन यह बात तो बिल्कुल ही समझ में नहीं आ रही थी कि भीखू के भेजे में मूर्ति तोड़ने का इतना सॉलिड आइडिया कैसे आया। पता किया तो मालूम पड़ा कि मंथरा के आधुनिक संस्करण ख़बरिया चैनलों को देखने से उसे अम्बेडकर-मूर्ति प्रकरण वाली बात पता चली थी, वहीं से ये आइडिया उड़ाया था।

ख़ैर, बनवारी भी भीखू की इस हरक़त से भड़क गया। उसके मुहल्ले में गया लेकिन भीखू के दादाजी की मूर्ति कहीं ढूंढे नहीं मिली, काहे से कि उसके दादाजी तो ग़रीब किसान थे – खाने को ढंग से नहीं मिला जिन्दगी भर, ससुरी मूर्ति कहाँ से लगवाते। सो उसने भीखू के घर में टंगी उसके दादाजी की फूलचढ़ी इकलौती तस्वीर पर ही अपने हाथ आज़माए – अब पाँच-सात लौंडे-लपाड़े इकट्ठे करके ले गया था, कुछ-न-कुछ तो आखिर तोड़ के आना ही था। लेकिन जब यह बात भीखू की बिरादरी वालों का मालूम पड़ी, तो बड़ा बवेला मच गया। सभा हुई, सभा में शिरकत कर भीखू को एक नई ही बात मालुम पड़ी – भीखू के दादा की तस्वीर तोड़ना दरअसल भीखू से नि‍जी रंजिश की वजह से नहीं है, बल्कि ये सवर्णों का दलितों पर अत्याचार है जो पिछले हज़ारों सालों से चल रहा है।

भीखू भी मन-ही-मन ख़ुश हो गया, सोचा – अभी तक तो मैं नाहक ही परेशान था कि मेरी तोड़फोड़, गुण्डागर्दी की वजह से ये सब हुआ; लेकिन ये तो सवर्णों के हज़ारों सालों के अत्याचारों का फल है... मेरी भला क्या ग़लती इसमें! सो बदला लेने जाते अपने ‘समाज’ वालों के साथ हो लिया। सबके साथ मिलकर भीखू ने अबकी तथाकथित सवर्णों की खूब मूर्तियाँ तोड़ीं, थोड़ा-बहुत बस-कार वगैरह जलाने को भी ऐन्जॉय किया। अब भला सवर्ण कैसे पीछे रहते, बैठक हुई – इन लोगों की ये हिम्मत... इनकी जात ही ऐसी है, हमने ज़्यादा ही छूट दे दी है लेकिन अब औकाद याद दिलानी होगी। सुन कर बनवारी को भी तसल्ली हुई, सोचा कि ख़्वामख़्वाह आत्मग्लानि पाल रहा था कि मेरी वजह से ये सब हो रहा है। सो बनवारी भी नाश्ता करने से पहले लोगों के साथ जा कर एक-आध ट्रेन जला आया, दूसरी जाति वालों की कई सारी मूर्तियाँ तोड़ आया।

लगभग एक हफ़्ते बाद भीखू और बनवारी, दोनों का ही ग़ुस्सा ठण्डा पड़ गया था। सो हम चारों दोस्त हलवाई के यहाँ भल्ले खाते-खाते गप्पें मार रहे थे। इतने में पुत्तन बोला – "तुम लोगों को कोई काम ढंग से नहीं करना आता। अभी तक मेरे मुहल्ले में एक मूर्ति सही-सलामत खड़ी है। जब बाक़ी की 19 तोड़ीं, तो वो एक क्यों छोड़ दी।" अपना केमिस्ट्री ज्ञान झाड़ता हुआ आगे बोला – "इसीलिए तुम दोनों तो ChuSO4 हो, यानि कि चूतियम सल्फ़ेट।" अब पुत्तन को ऐसी ही केमिस्ट्री आएगी, हम आपको उसके नक़लचीपने के बारे में पहले ही बतला चुके हैं। पढ़ेगा नहीं तो यही होगा न। हालाँकि भीखू और बनवारी ने अपनी ग़लती स्वीकार की और वादा किया कि कल जाकर उस मूर्ति को भी तोड़ आएंगे।

अगले दिन मूर्ति तोड़ने के बाद दोनों जब अपने-अपने घर पहुँचे, तो उनके नाम एक ख़त आया हुआ था। ख़त ‘तालीबान लड़ाका भर्ती परिषद’ से आया था। ख़त में लिखा था – "जितने बुत आप लोगों ने तोड़े, उतने तो हम तालिबान वाले यहाँ अफ़ग़ानिस्तान में भी नहीं तोड़ सके। आप लोगों ने अपने पूरे-के-पूरे शहर को हमारे सपनों के अफ़ग़ानिस्तान के मुक़ाबले का बना दिया है – जहाँ देखो टूटे बुत, जलती गाडियाँ, शोर-शराबा, ख़ून-खराबा... वाह !! वाह!! आप जैसे क़ाबिल और होनहार लोगों की हमें सख़्त ज़रूरत है। आप लोगों को आपकी ख़्वाहिश के मुताबिक़ तन्ख़्वाह दी जाएगी, साथ में कई पर्क्स भी मिलेंगे। कृपया जितनी जल्दी हो सकें, हमें ज्वाइन करें।" नीचे मुल्ला उमर के दस्तख़त थे। पहले दोनों को नौकरी के लाले थे, अब तो उनकी डिमाण्ड है। तालीबान के अलावा कई राजनैतिक दल वाले भी ऑफ़र दे रहे हैं। आजकल बेचारे दोनों उधेड़-बुन में लगे हैं, किसे ज्वाइन करें - जाएँ तो जाएँ कहाँ?
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