Monday, December 25, 2006

I am Blessed

हम धन्य हैं

आज क्रिसमस है। नीरज भाई ने अपने गूगल टॉक में टांक रखा है – “धन्य हैं वे लोग, जो पंक्ति में अन्तिम खड़े होने का साहस करते हैं।” इसे पढ़ते ही हम फूल कर कुप्पा हो गए, क्योंकि आजतक हम अपने आप को बहुत ही ‘अधन्य’ टाइप का समझ रहे थे। हमें पता ही नहीं था कि हम इतने धन्य हैं। हम पाठशाला में हमेशा प्रार्थना के लिए खड़ी पंक्ति में देर से आने की वजह से सबसे पीछे लगते थे। इतना ही नहीं, हम तो डबल धन्य हैं। क्योंकि गप्पें लड़ाने के लिए हम कक्षा में बैठते भी सबसे पीछे ही थे।

इस बाबत नीरज भाई से वार्तालाप हुआ, तो हमारी धन्यता की और बहुतेरी वजहें उभर कर सामने आईं। हालाँकि कुछ आगे वाले नासमझ बच्चे और शिक्षक कहते थे कि पीछे वाले शोर मचाते हैं। हाँ, बात तो सच ही थी। लेकिन पीछे वाले इतने धन्य थे, तो अपना अहोभाव प्रकट करने के लिए हर्षध्वनि करना तो स्वाभाविक है। परीक्षा में पिछड़ने के कारण हमारी वजह से ही दूसरे लोगों को आगे (प्रथम, द्वितीय वगैरह) गिनाए जाने का सुख प्राप्त होता था।

बातों-बातों में फिर हम ईसा के आध्यात्मिक स्तर पर आरोहण करने लगे। खुद तो धन्य थे ही, दूसरों को भी धन्य बनाने लगे। हमारे साथ फ़्लैशबैक में चलिए, जब हम स्कूल में हुआ करते थे। हमने याद करना शुरू किया, कक्षा में पीछे बैठे हम कह रहे हैं – “धन्य है मास्टर जी... आपकी गरिमामयी उपस्थिति से हम पीछे वाले अपने भाग्य को धन्य मानते हैं।” फिर मास्टर जी अपनी धन्यता प्रदर्शित करने के लिए सोंटे से प्रसाद वितरित कर रहे हैं। प्रसाद पाते ही सभी धन्य लड़कों का अहोभाव चित्र-विचित्र आवाज़ों के ज़रिए मुँह से प्रकट हो रहा है। प्रसाद पाकर हमको लगता कि सारे जग में प्रभु ईशू के अलावा हमें ढंग से कोई और न समझ सका। अब मास्टर जी की उपस्थिति के बारे में हमारे विचार थोड़े बदले और इस तरह हो गए – “मास्टर जी, जब आप कक्षा में नहीं आ पाते, तब हम आपकी उपस्थिति से भी ज़्यादा गरिमामयी अनुपस्थिति से अधिक धन्य अनुभव करते हैं।” यह सुनकर हमारे सहपाठी ने जोड़ा – “और आपकी अनुपस्थिति में खूब सारे काग़ज़ के हवाई जहाज़ उड़ा कर अपनी धन्यता को अभिव्यक्त करते हैं।” आगे बैठे हुए बालकों को हम चमकाते हैं, धमकाते हैं – “स्सालों!!! खुद पढ़कर आते नहीं हो... तभी मास्टर जी हमको उठाते हैं जवाब के लिए।”

अर्रर्रर्र.... ये क्या, हम अपनी ‘धन्यता’ की यादों में खोए थे और आपने टोक दिया। पूछ रहे हो कि वो पुरानी बात है, अब काहे अपने को धन्य कहते हो? हम अभी भी धन्य हैं, बाइबल इसका प्रमाण है – “धन्य हैं वे जो ग़रीब हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज उनके लिए है।” हम तो हमेशा से ही ठन-ठन गोपाल हैं और अभी भी वही हालत बरकरार है। इसलिए हमारी ‘धन्यता’ एकदम सातत्य में, कॉन्टिन्यूटी में है। ख़ैर, आखिर में वह बात जो न ईसा ने कही और न ही जॉन, मैथ्यू वगैरह को सूझी। चूँकि हम ईसा के स्तर पर आरोहण कर रहे हैं, सो कहे देते हैं – “धन्य हैं वो जो ब्लॉगिंग में समय नष्ट कर रहे हैं, धन्य हैं वो जो ब्लॉग पर लिखी जाने वाली कविताएँ पढ़ सकते हैं, धन्य हैं वो जो सोचते हैं कि उनका लिखा भी पढ़ा जाता है, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं के लिए है।” :-)

क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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8 comments:

  1. धन्य है वो आदमी जिसने इस पोस्ट पर पहली टिप्पणी की क्योंकि उसे भी इसके बदले अपने चिट्ठे पर टिप्पणी मिलेगी। :)

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  2. यह लेख पढ़ कर हम भी धन्य हो गये हैं। यह लेख पढ़ कर जो लोग आपके इस लेख पर टिप्पणी महीं करते वे भी धन्य है। ऐसे लोगों के लिये जीसस के ही शब्दों में कहें तो
    "है प्रभू इन्हें क्षमा करना ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं"

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  3. टिप्पणी नहीं करते पढ़ें

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  4. धन्य हैं आप जिन्होंने हमारा स्वर्ग में ताज स्थापित करवाया...हम तो बहुते खुश हो गये. :)

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  5. धन्य हैं आप प्रतीक जी!

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  6. धन्य हैं आप यानी ब्लॉगर और धन्य हूं मैं यानी टिप्पणीकार . अहो रूपम अहो ध्वनिम .इस 'गिव एण्ड टेक' पर राजस्थानी में कहावत है :

    'आजा मेरे सप्पमपाट. मैं तने चाटूं तू मने चाट।'

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  7. “धन्य हैं वो जो ब्लॉगिंग में समय नष्ट कर रहे हैं, धन्य हैं वो जो ब्लॉग पर लिखी जाने वाली कविताएँ पढ़ सकते हैं, धन्य हैं वो जो सोचते हैं कि उनका लिखा भी पढ़ा जाता है, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं के लिए है।”
    धन्य हैं आप भी जो आप ने हमें दिव्य ज्ञान दिया।

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  8. “धन्य हूं मैं जो ब्लॉगिंग में समय नष्ट कर रहा हूं, धन्य हूं मैं जो ब्लॉग पर लिखी जाने वाली कविताओं को पढ़ सकता हूं, धन्य हूं मैं जो सोचता है कि मेरा लिखा भी पढ़ा जाता है, क्योंकि स्वर्ग का राज्य मेरे के लिए है।”

    धन्‍यवाद मुझे मेरी हैसियत का अरसास कराने के लियं।

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