ठण्डा मतलब...?
जब यह पहेलीनुमा सवाल हमने अपने दो दोस्तों से किया, तो एक ने कहा ‘कोकाकोला’ और दूसरे ने कहा ‘टॉयलेट क्लीनर’। यह तो हम जानते थे कि अपना भीखू ऐश्वर्या का पंखा है, इसलिए कोकाकोला कह रहा है। लेकिन बाबा रामदेव के कपालभाति की हवा नाक के ज़रिए पेट से होते हुए बनवारी के भेजे में घुस चुकी है, इससे हम वाकिफ़ नहीं थे।
ख़ैर, हमने बनवारी का पक्ष लेते हुए भीखू को समझाना चाह – इसमें कीटनाशक होते हैं, इसलिए पेप्सी-कोला नहीं पीनी चाहिए। बनवारी भी बोला, ‘टॉयलेट’ में डालने से टॉयलेट बिल्कुल साफ़ हो जाती है। इसपर भीखू ने अपना अकाट्य कुतर्कपूर्ण ज्ञान झाड़ा – ‘ठण्डा पीना बहुत ज़रूरी है। सबसे पहले तो इसकी ख़ास वजह यह है कि ऐश्वर्या और आमिर, करीना और शाहरुख़ सब-के-सब ठण्डा पीने को कहते हैं। प्रियंका चौपड़ा कहती हैं कि चूंकि वे पेप्सी को एंडोर्स करती हैं, इसलिए पेप्सी तो पीनी ही चाहिए। अगर ठण्डा पीना बन्द कर दिया, तो इन सबके पेट पर लात पड़ेगी। इसका पाप किस पर पड़ेगा, बाबा रामदेव से पूछकर बताओ तो भला? दूसरा फ़ायदा यह है कि इसमें जो कीटनाशक है, उससे पेट में कीड़े नहीं पड़ते और ये बहुत सेहतमंद तो है ही, जैसा कि बनवारी ने कहा इससे टॉयलेट इकदम साफ़ होती है – पेट खुल जाता है ..... आहहहा।’ यह कहते-कहते उसने अपने पेट पर हाथ फेरा, पेट खुलने से प्राप्त सन्तुष्टि का भाव उसके चेहरे पर साफ़ झलक रहा था।
लेकिन हम भी बहुत अडियल किस्म के हैं, ऐसे कहाँ मानने वाले थे। सो हम बोले – ‘देखो भई, किसान इस देश का आधार ठीक उसी तरह हैं जिस तरह लट्टू का आधार उसकी नुक्क होती है। कोक-पेप्सी वाले भूमिगत जल का दोहन भारी मात्रा में कर किसानों को नुक़सान पहुँचा रहे हैं, जिससे बेचारे किसानों को खेती-बाड़ी छोड़नी पड़ रही है।’ इसपर भीखू बोला – भैया, पचास ख़बरिया चैनल दिन रात गला फाड़ चिल्लाचोट मचाते रहते हैं, किसी एक-आध को तो देख लिया करो। तुम्हें मालूम नहीं कि कृषि मंत्री शरद पवार ने क्या कहा है। उनने कहा है कि ‘‘खेती-बाड़ी में ज़रूरत से ज़्यादा लोग लगे हैं, इसीलिए कृषि का बुरा हाल है। जितने ज़्यादा किसान खेती-बाड़ी छोड़ कर दूसरे धंधे करेंगे, उतनी ही कृषि की उन्नति होगी। इसलिए पेप्सी-कोक पर पाबंदी की बात सोचना भी ग़लत है।’’ भीखू ने बोलना जारी रखा – सुना तुमने, तुममें ज़्यादा अक़ल है या देश के कृषि मंत्री में? तुमसे कबड्डी भी ढंग से नहीं खेली जाती, कबड्डी-कबडी... के बीच में ही साँस टूट जाती है और ये आदमी देश की खेती-बाड़ी और क्रिकेट, दोनों इक्किला सम्हाल रहा है। बूढ़ापे में भी साँस है कि टूटने का नाम ही नहीं ले रही है। अब बताओ किसकी बात में दम है? हम निरुत्तर थे और बनवारी तो पहले से ही अनासक्त सिद्ध की भांति हमारी इस चर्चा पर ग़ौर नहीं कर रहा था। उसका सारा ध्यान नुक्कड़ पर शून्य से प्रकट हो शून्य में ही विलीन हो रही अप्सराओं पर था।
ये देश और इसकी जनता कुछ ऐसी ही है। अब क्या करें हम इसमें? यहाँ स्वामी रामदेव पर शरद पवार हमेशा भारी साबित होते हैं। सो हम और बनवारी गरम दूध पीने आगरा के मशहूर हीरा हलवाई की दुकान की ओर चल दिए और भीखू खोखे वाले से एक और कोक लेकर भोग लगाने लगा।
Wednesday, August 09, 2006
Tuesday, August 08, 2006
Future of Islam in India
भारत में इस्लाम का भविष्य
मुम्बई बम विस्फोटों के बाद एक बार फिर यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या इसलाम ही आतंकवाद की जड़ में है? जनसाधारण में यह धारणा अब पक्की हो चुकी है कि भारत में चल रहे आतंकवाद की असली वजह इस्लाम ही है। वहीं कुछ इस्लामी विद्वानों का कहना है कि ऐसा कहना ग़लत है, इस्लाम अमन का मज़हब है। अगर क़ुरआन और शरीयत को देखें, तो यह पशोपेश अपने आप ही समाप्त हो जाता है। मैं किसी की आस्था को चोट नहीं पहुँचाना चाहता हूँ, लेकिन तथ्यों के आधार पर कहा जाए तो इस बात को कोई नहीं नकार सकता कि इस्लाम स्वभावत: कट्टर, आक्रामक और मध्ययुगीन है। क़ुरआन में विधर्मियों को जान से मारने का आदेश साफ़-साफ़ पढ़ा जा सकता है। इसी वजह से शुऐब जैसे पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी लोग इस्लाम से दूर हो रहे हैं।
ईसाईयत के बाद इस दुनिया में इस्लाम के अनुयायियों की संख्या सबसे ज़्यादा है। भारत में भी इस्लाम के अनुयायी भारी तादाद में रहते हैं। इनमें से ज़्यादातर ऐसे हैं, जिनका आतंकवाद से कोई सरोकार नहीं है और वे भी भारत को उसी तरह अपना देश मानते हैं, जिस तरह कि हिन्दू मानते हैं। इसलिए विश्व हिन्दू परिषद और बजरंगदल के ये कथन कि भारत में इस्लाम का ख़ात्मा किए जाने की ज़रूरत है, असम्भव ही नहीं बल्कि घातक भी हैं। इस्लाम के ख़ात्मे का मतलब होगा २० करोड़ इंसानों का ख़ात्मा, जो एक आमानुषिक कृत्य होगा। अगर भारत के सभी मुसलमानों के पन्थान्तरण की बात कही जाए, तो वह भी व्यावहारिक तौर पर असम्भव ही है।
भारत में इस्लाम की ऐसी दुविधापूर्ण स्थिति है, जिसके बारे में कहा जा सकता है कि न इसे उगला जा सकता है और न ही निगलना मुमकिन है। इस समस्या का बस एक ही समाधान नज़र आता है और वह है एक वैचारिक तौर पर आधुनिक और उदारवादी इस्लामी सम्प्रदाय का प्रसार। जो मध्ययुगीन और कट्टर विचारों से पूरी तरह मुक्त हो। जिस तरह यूरोप में कैथॉलिक कट्टरता से आज़ादी पाने के लिए प्रोटेस्टेंट पंथ का प्रचार किया गया था, ठीक उसी तरह की प्रक्रिया इस्लाम के लिए भी ज़रूरी है।
भारत में यह होना तो दुनिया के दूसरे हिस्सों की तुलना में ख़ासा आसान है। इसकी वजह है – भारतीय इस्लाम पर सूफ़ीवाद का गहरा प्रभाव और भारत में सूफ़ियों की लम्बी परम्परा का होना। सूफ़ीवाद और वेदान्त यानी कि तात्विक हिन्दू धर्म वैचारिक तौर पर एक कहे जा सकते हैं, दोनों में ज़रा भी फ़र्क़ नहीं है। अगर सूफ़ियों के कथनों पर ग़ौर किया जाए, तो उनकी अनुभूति हिन्दू सन्तों के से सैद्धान्तिक धरातल पर आ टिकती है। अगर ध्यान से देखा जाए, तो भारतीय इस्लाम अपने मूल स्वरूप में सूफ़ीवादी इस्लाम ही है। लेकिन कई ख़ासे आधुनिक ऐतिहासिक कारणों से यह अब अपना मूल चरित्र विस्मृत कर चुका है। अगर भारत में इस्लाम को प्रगतिशील और उदारवादी होना है, तो इसके मूल सूफ़ीवादी चरित्र का पुनरुत्थान ज़रूरी है। इसके लिए न सिर्फ़ मुसलमानों को कोशिश करनी होगी, बल्कि हिन्दुओं को भी इसमें अपना पूरा सहयोग देना होगा। भारत में अगर इस्लाम फिर इस सूफ़ीवादी प्रभाव से सम्पन्न हो जाता है, तो बाक़ी की दुनिया के लिए यह एक सबक़ होगा और यह उदारवादी इस्लाम भारत से बाहर भी तेज़ी से फैल सकेगा।
आप लोगों की इस बारे में क्या राय है? क्या इस्लाम इस तरह उदारवादी और प्रगतिशील हो सकता है? या फिर इसका कोई और उपाय भी है?
टैग : Islam, इस्लाम
मुम्बई बम विस्फोटों के बाद एक बार फिर यह चर्चा शुरू हो गई है कि क्या इसलाम ही आतंकवाद की जड़ में है? जनसाधारण में यह धारणा अब पक्की हो चुकी है कि भारत में चल रहे आतंकवाद की असली वजह इस्लाम ही है। वहीं कुछ इस्लामी विद्वानों का कहना है कि ऐसा कहना ग़लत है, इस्लाम अमन का मज़हब है। अगर क़ुरआन और शरीयत को देखें, तो यह पशोपेश अपने आप ही समाप्त हो जाता है। मैं किसी की आस्था को चोट नहीं पहुँचाना चाहता हूँ, लेकिन तथ्यों के आधार पर कहा जाए तो इस बात को कोई नहीं नकार सकता कि इस्लाम स्वभावत: कट्टर, आक्रामक और मध्ययुगीन है। क़ुरआन में विधर्मियों को जान से मारने का आदेश साफ़-साफ़ पढ़ा जा सकता है। इसी वजह से शुऐब जैसे पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी लोग इस्लाम से दूर हो रहे हैं।
ईसाईयत के बाद इस दुनिया में इस्लाम के अनुयायियों की संख्या सबसे ज़्यादा है। भारत में भी इस्लाम के अनुयायी भारी तादाद में रहते हैं। इनमें से ज़्यादातर ऐसे हैं, जिनका आतंकवाद से कोई सरोकार नहीं है और वे भी भारत को उसी तरह अपना देश मानते हैं, जिस तरह कि हिन्दू मानते हैं। इसलिए विश्व हिन्दू परिषद और बजरंगदल के ये कथन कि भारत में इस्लाम का ख़ात्मा किए जाने की ज़रूरत है, असम्भव ही नहीं बल्कि घातक भी हैं। इस्लाम के ख़ात्मे का मतलब होगा २० करोड़ इंसानों का ख़ात्मा, जो एक आमानुषिक कृत्य होगा। अगर भारत के सभी मुसलमानों के पन्थान्तरण की बात कही जाए, तो वह भी व्यावहारिक तौर पर असम्भव ही है।
भारत में इस्लाम की ऐसी दुविधापूर्ण स्थिति है, जिसके बारे में कहा जा सकता है कि न इसे उगला जा सकता है और न ही निगलना मुमकिन है। इस समस्या का बस एक ही समाधान नज़र आता है और वह है एक वैचारिक तौर पर आधुनिक और उदारवादी इस्लामी सम्प्रदाय का प्रसार। जो मध्ययुगीन और कट्टर विचारों से पूरी तरह मुक्त हो। जिस तरह यूरोप में कैथॉलिक कट्टरता से आज़ादी पाने के लिए प्रोटेस्टेंट पंथ का प्रचार किया गया था, ठीक उसी तरह की प्रक्रिया इस्लाम के लिए भी ज़रूरी है।
भारत में यह होना तो दुनिया के दूसरे हिस्सों की तुलना में ख़ासा आसान है। इसकी वजह है – भारतीय इस्लाम पर सूफ़ीवाद का गहरा प्रभाव और भारत में सूफ़ियों की लम्बी परम्परा का होना। सूफ़ीवाद और वेदान्त यानी कि तात्विक हिन्दू धर्म वैचारिक तौर पर एक कहे जा सकते हैं, दोनों में ज़रा भी फ़र्क़ नहीं है। अगर सूफ़ियों के कथनों पर ग़ौर किया जाए, तो उनकी अनुभूति हिन्दू सन्तों के से सैद्धान्तिक धरातल पर आ टिकती है। अगर ध्यान से देखा जाए, तो भारतीय इस्लाम अपने मूल स्वरूप में सूफ़ीवादी इस्लाम ही है। लेकिन कई ख़ासे आधुनिक ऐतिहासिक कारणों से यह अब अपना मूल चरित्र विस्मृत कर चुका है। अगर भारत में इस्लाम को प्रगतिशील और उदारवादी होना है, तो इसके मूल सूफ़ीवादी चरित्र का पुनरुत्थान ज़रूरी है। इसके लिए न सिर्फ़ मुसलमानों को कोशिश करनी होगी, बल्कि हिन्दुओं को भी इसमें अपना पूरा सहयोग देना होगा। भारत में अगर इस्लाम फिर इस सूफ़ीवादी प्रभाव से सम्पन्न हो जाता है, तो बाक़ी की दुनिया के लिए यह एक सबक़ होगा और यह उदारवादी इस्लाम भारत से बाहर भी तेज़ी से फैल सकेगा।
आप लोगों की इस बारे में क्या राय है? क्या इस्लाम इस तरह उदारवादी और प्रगतिशील हो सकता है? या फिर इसका कोई और उपाय भी है?
टैग : Islam, इस्लाम
Saturday, August 05, 2006
Great Gama Pahalwan: The Indian Wrestler
आज मैं अपने एक दोस्त से यूँ ही गप्पें लड़ा रहा था। वह ख़ुद को बहुत बड़ा बॉडीबिल्डर समझता है। हाँलाकि कम तो मैं भी नहीं हूँ (आपने शायद जिम में मेरे शुरूआती तजुर्बे पढ़े होंगे), लेकिन वो मुझसे ख़ासा तगड़ा है। बातचीत के दौरान मैंने कहा - "मैंने कहीं पर पढ़ा है कि हम हिन्दुस्तानी पश्चिमी पहलवानों की तरह ताक़तवर और तगड़े नहीं हो सकते, हमारी नस्ल 'जेनेटिकली वीक' है।" इसपर उसने गामा पहलवान का क़िस्सा सुनाया, जिसे सुनकर मैं बहुत प्रभावित हुआ और सोचा कि गामा के बारे में कुछ गूगलाया जाए। गामा पहलवान उन लोगों में से है, जो ऐसे मूर्खतापूर्ण सिद्धांतों की हवा निकालने के लिए काफ़ी हैं। गामा पहलवान के बारे में कुछ तथ्य -असली नाम: ग़ुलाम मोहम्मद क़द: 5'7" वज़न: 104.33 किग्रा जन्म: 1888
जब कभी लोग दुनिया के महानतम पहलवान कि चर्चा करेंगे, तो गामा पहलवान (Gama Pehalwan) और उसके परिवार का नाम उस सूची में सबसे ऊपर होगा। 1888 में अमृतसर, पंजाब में जन्मे गामा पहलवान के पिता का नाम अज़ीज़ था। गामा पहलवान और उनके भाई, इमाम, ऐसे पहलवान थे जिनसे सारे भारत के पहलवान घबराते थे।

गामा ने सन् 1909 में रुस्तम-ए-हिन्द (Champion of India) का ख़िताब अपने नाम कर लिया और हिन्दुस्तान के सभी पहलवानों के सामने ख़ुद को हराने की चुनौती रखी। गामा से मुक़ाबले की शर्त यह थी कि चुनौती देने वाला पहलवान या तो रुस्तम-ए-हिन्द का ख़िताब जीत चुका हो, या फिर वो पहले गामा के छोटे भाई इमाम को हराए। इमाम ख़ुद ग़ज़ब का पहलवान था और उसे कोई भी हरा नहीं सका, वह अपनी पूरी ज़िन्दगी में सिर्फ़ एक बार हारा था।
हिन्दुस्तान के सभी पहलवानों पर जीत हासिल करने के बाद गामा, इमाम और आर.बी. बेंजामिन का भारतीय पहलवानों का दल (R. B. Benjamin's circus of Indian wrestlers) इस चुनौती के साथ पूरे यूरोप में घूमे कि जो भी पहलवान चाहे, वह आकर उनसे मुक़ाबला कर ले। इस दौरान गामा ने कई मशहूर पहलवानों को हराया जिनमें अमेरिका के "डॉक" बेंजामिन रोलर, फ़्रांस के मॉरिस डेरिआज़, स्विट्ज़रलॅण्ड के जॉहन लेम (यूरोप विजेता) और स्वीडन के जेस पीटर्सन (विश्व विजेता) शामिल थे। गामा का सबसे प्रसिद्ध मुक़ाबला था तत्कालीन विश्वविजेता पोलॅण्ड के स्टेनिस्लॉस बाइज़्को (Stanislaus Zbyszco) के साथ। गामा से घबराकर बाइज़्को पूरे मुक़ाबले में रक्षात्मक खेल खेलता रहा और हारते-हारते बचा, हालाँकि वह यह विवादित मुक़ाबला ड्रॉ करवाने में क़ामयाब रहा। रोलर के ख़िलाफ़ केवल 15 मिनट के मुक़ाबले में गामा ने "डॉक" को 13 बार चित कर दिया।
इसके बाद गामा ने बाक़ी दुनिया के सामने, जो विश्व विजेता होना चाहते थे, अपनी चुनौती पेश की; जिसमें जापान के जूडो चैम्पियन टारो मियाक (Taro Miyake), रूस के जॉर्जिस हैकेंशमिड (Georges Hackenschmidt) और अमेरिका के फ़्रेंक गोश (Frank Gotch) शामिल थे। लेकिन सभी ने गामा की चुनौती अस्वीकार कर रिंग में गामा के ख़िलाफ़ उतरने से इंकार कर दिया। इसके बाद गामा ने चुनौती रखी कि वह एक के बाद एक लगातार बीस पहलवानों से लड़ेगा और सभी को हराएगा, नहीं तो सभी को जीता हुआ क़रार देकर ख़ुद इनाम का सारा ख़र्च देगा - लेकिन इसके बावजूद कोई गामा का मुक़ाबला करने की हिम्मत नहीं जुटा सका।
इसके बाद गामा एक महानायक की तरह वापस भारत लौट आया और अगले 15 सालों तक कुश्ती लड़ता रहा। बाद में एक बार फिर वह पोलॅण्ड के स्टेनिस्लॉस बाइज़्को के ख़िलाफ़ मुक़ाबले में उतरा और यूरोप दौरे के दौरान हुए ड्रॉ मैच का बदला बाइज़्को को मात्र 21 सेकेण्ड में हरा कर लिया। अपने करियर में गामा ने 5,000 मुक़ाबले लड़े और कभी कोई मुक़ाबला नहीं हारा। विभाजन के बाद गामा पाकिस्तान चला गया और 1953 में पंजाब के इस शेर का देहांत हो गया। ग़ौरतलब है कि गामा अपने जीवन के आख़िरी सालों में फिर भारत लौटना चाहता था। आज भी गामा को सार्वकालिक महानतम पहलवानों में शुमार किया जाता है।
(सभी चित्र साभार : रेसलिंग म्यूज़ियम)
टैग : Gama Pahalwan, गामा पहलवान, wrestling, wrestler
Friday, August 04, 2006
Movie Review : Golmaal
फ़िल्म समीक्षा : गोलमाल
"गोलमाल" बोले तो फ़ुल टाइमपास फ़िल्म है बाबा। आपको यह फ़िल्म पसन्द आएगी, लेकिन एक शर्त है। वो ये कि देखते वक़्त अपनी लॉजिकात्मक बुद्धि न लगाएँ और दिमाग़ को कुछ देर के लिए ज़रा किनारे रख दें। और हाँ, इस पिक्चर के नाम से कंफ़्यूज़ होकर इसे अमोल पालेकर वाली पुरानी गोलमाल के स्तर की क्लास मूवी मत समझ लेना। उसके सामने तो ये कहीं भी नहीं ठहरती है।
इस कहानी के केन्द्र में हैं चार चौंघड़ - गोपाल (अजय देवगन), महादेव (अर्शद वार्सी), लकी (तुषार कपूर) और लक्ष्मन (शर्मन जोशी)। ये सब निहायत ही आवारा किस्म के हैं और खाओ-पीओ-ऐश करो टाइप के बन्दे हैं। इनकी हरकतों की वजह से कॉलेज से इनका बोरिया-बिस्तर उठाकर बाहर फेंक दिया जाता है। फिर ये रहने-खाने की जुगाड़ में एक बूढ़े दम्पत्ति के बंगले में घुस जाते हैं। इस दंपत्ति का पोता पहले ही मर चुका है, इसलिए लक्ष्मण इनका पोता बन कर रहता है और चारों में से सिर्फ़ गोपाल ही बोलता है ताकि उन्हें चारों के होने की भनक न लगे। बाक़ी के तीनों ख़ामोश रहते हैं और ये परिस्थितियाँ कॉमेडी पैदा करती हैं।
ओंकारा की ही तरह इस फ़िल्म में भी अजय देवगन का बहुत कमज़ोर अभिनय है। लगता है आजकल अजय कुछ महनत-मशक्कत के मूड में नहीं हैं। अर्शद अब कॉमेडी में रम गए लगते हैं और बाक़ियों का काम भी ठीक है। कुल मिला के पिक्चर कम-से-कम एक बार देखने लायक बन पड़ी है। चाहो तो गोलमाल की वेब साइट भी देख लो।
"गोलमाल" बोले तो फ़ुल टाइमपास फ़िल्म है बाबा। आपको यह फ़िल्म पसन्द आएगी, लेकिन एक शर्त है। वो ये कि देखते वक़्त अपनी लॉजिकात्मक बुद्धि न लगाएँ और दिमाग़ को कुछ देर के लिए ज़रा किनारे रख दें। और हाँ, इस पिक्चर के नाम से कंफ़्यूज़ होकर इसे अमोल पालेकर वाली पुरानी गोलमाल के स्तर की क्लास मूवी मत समझ लेना। उसके सामने तो ये कहीं भी नहीं ठहरती है।इस कहानी के केन्द्र में हैं चार चौंघड़ - गोपाल (अजय देवगन), महादेव (अर्शद वार्सी), लकी (तुषार कपूर) और लक्ष्मन (शर्मन जोशी)। ये सब निहायत ही आवारा किस्म के हैं और खाओ-पीओ-ऐश करो टाइप के बन्दे हैं। इनकी हरकतों की वजह से कॉलेज से इनका बोरिया-बिस्तर उठाकर बाहर फेंक दिया जाता है। फिर ये रहने-खाने की जुगाड़ में एक बूढ़े दम्पत्ति के बंगले में घुस जाते हैं। इस दंपत्ति का पोता पहले ही मर चुका है, इसलिए लक्ष्मण इनका पोता बन कर रहता है और चारों में से सिर्फ़ गोपाल ही बोलता है ताकि उन्हें चारों के होने की भनक न लगे। बाक़ी के तीनों ख़ामोश रहते हैं और ये परिस्थितियाँ कॉमेडी पैदा करती हैं।
ओंकारा की ही तरह इस फ़िल्म में भी अजय देवगन का बहुत कमज़ोर अभिनय है। लगता है आजकल अजय कुछ महनत-मशक्कत के मूड में नहीं हैं। अर्शद अब कॉमेडी में रम गए लगते हैं और बाक़ियों का काम भी ठीक है। कुल मिला के पिक्चर कम-से-कम एक बार देखने लायक बन पड़ी है। चाहो तो गोलमाल की वेब साइट भी देख लो।
Thursday, August 03, 2006
Film Review : Omkara
फ़िल्म समीक्षा : ओंकारायह बात अब मुझे बिल्कुल सही मालुम होती है कि इंदौर "इन्द्र की नगरी" है, क्योंकि जब से मैं इंदौर आया हूँ, यहाँ बारिश हो रही है। पिछ्ले दस दिनों से कभी तेज़ बारिश होती है तो कभी फुहार पड़ने लगती है, लेकिन बारिश पूरी तरह बन्द नहीं होती। इतने दिनों तक घर पर पड़े-पड़े मैं बुरी तरह ऊब गया और सोचा कि क्यों न चल के कोई धाँसू-सी फ़िल्म ही देख ली जाए, सो ओंकारा देखने पीवीआर पहुँच गया।
मक़बूल देखने के बाद और पीवीआर का 150 रू. का टिकट लेने के बाद मुझे भी औरों की ही तरह विशाल भारद्वाज से बहुत उम्मीदें थीं। लेकिन ओंकारा किसी भी एंगल से मक़बूल की तरह सॉलिड नहीं है। तो भाई लोग, अगर ओंकारा देखने की इच्छा हो तो इसकी तुलना मक़बूल से क़तई मत करना। इसका मतलब यह नहीं है कि ओंकारा बिल्कुल ही बक़वास है, लेकिन इतना ज़रूर है कि मक़बूल की टक्कर की नहीं है।
अब इस पिक्चर की कहानी क्या बताऊँ, कभी-न-कभी स्कूल के दौरान तो "ऑथेलो" पढ़ी ही होगी। लेकिन अगर आप भी मेरी कैटेगरी में लटके हुए हो, तो यहाँ पढ़ लो। "केसू फिरंगी" यानी कि विवेक ओबरॉय का उम्मीद के मुताबिक़ बहुत ही ढ़ीला अभिनय देखने को मिला। लेकिन जिसकी उम्मीद नहीं थी वह था केन्द्रिय किरदार "ओंकारा" = अजय देवगन का पिटी-पिटाई लीक पर वही पुराना मोनोटोनस-सा, एकरस-सा अभिनय। ऐसा लगता है कि अजय देवगन ने इस किरदार के लिए कोई ख़ास मेहनत नहीं की है। इस फ़िल्म में अपनी (?) "बिल्लो" उर्फ़ बिपाशा बसु चने के खेत में गन्ने कि तरह नज़र आई हैं, मतलब कि बिलकुल आउट ऑफ़ प्लेस। जिस तरह का माहौल पिक्चर में दिखाया गया है, उसमें बिपाशा ज़रा भी फ़िट नहीं होतीं हैं।
लेकिन सैफ़ अली खान ने "लंगड़ा त्यागी" के पात्र में अपनी ज़ोरदार अदाकारी से जान फूँक दी है। यूँ कह लीजिए कि सैफ़ ने ही पूरी फ़िल्म को अपने कन्धों पर ढ़ोया है। ये जानकर ख़ुशी हुई कि आख़िर सैफ़ अभिनय करना सीख ही गए। सैफ़ के अलावा कोंकणा सेन शर्मा भी दूध में पानी की तरह लगी हैं यानी की यूपी के ग्रामीण परिवेश में पूरी तरह घुली-मिली नज़र आई हैं।
लेकिन एक बात जो कि बिल्कुल भी मेरी समझ में नही आई, वो थी यूपी की लोकेशन्स पर फ़िल्म के किरदारों द्वारा हरियाणवी बोली का इस्तेमाल। यूपी में हरियाणवी कहाँ बोलते हैं भई? इससे पहले भी मुझे "बंटी और बबली" में ऐसा ही लोच्चा लगा था। लखनऊ का बंटी पूरी फ़िल्म में इलाहाबादी बोली बोलता दिखाया गया था। अजीब था... नहीं? बचपन में अपने गाँव में "आल्हा" सुना था - "आल्हा-ऊदल बड़े लड़ैया, उनकी मार सही न जाए" - ऐसा कुछ था। ओंकारा का यह गाना उससे बहुत प्रभावित लगा - "धम-धम धड़म धड़ैया रे, सबसे बड़े लड़ैया रे... ओंकारा"। अगर बॉस नहीं देख रहा है, तो ये भी देख लो - ओंकारा की वेब साइट।
Wednesday, August 02, 2006
Record Streaming Music and Songs
रिकॉर्ड करें स्ट्रीमिंग संगीत और गाने
बहुत दिनों से मैं एक गाना खोज रहा था। गाने का मुखड़ा था - "जा नहीं सकता है दिल, उनका ख़याल आया हुआ।" नूरजहाँ का यह गाना आज़ादी से पहले की "विलेज गर्ल" (Village Girl) नाम की एक बहुत पुरानी फ़िल्म से है। मैनें अंतर्जाल पर इस गाने को बहुत ढूंढा, लेकिन डाउनलोड करने के लिए यह गाना कहीं भी नहीं मिला। फिर मैनें चिट्ठा-जगत् के संगीत विशेषज्ञ रजनीश भाई को ई-मेल कर मदद की गुहार लगाई, लेकिन उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए।
हालाँकि यह गाना राग डॉट कॉम पर मिल गया और ऑनलाइन सुना जा सकता था। लेकिन अब समस्या यह थी कि ऑफ़लाइन होने पर इसे नहीं सुना जा सकता था और न ही अपनी प्ले-लिस्ट में जोड़ा जा सकता था। फिर मैंने जुगत लगाकर स्ट्रीमिंग संगीत या गाना रिकॉर्ड करने का उपाय भी आख़िरकार खोज ही निकाला। आप भी देखिए, अगर कोई ऑनलाइन स्ट्रीमिंग गाना रिकॉर्ड करना है तो इस आसान उपाय का इस्तेमाल किया जा सकता है।
सबसे पहले कोई भी रिकॉर्डिंग सॉफ़्टवेयर (जैसे कि ऑडसिटी वगैरह) खोलें और सोर्स (Source) में "मोनो मिक्सर" या "स्टीरिओ मिक्सर" (Mono mixer or Stereo mixer) चुनें। फिर इंटरनेट पर किसी भी साइट से मनचाहा ऑनलाइन गाना शुरू करें और रिकॉर्डिंग सॉफ़्टवेयर में रिकॉर्ड के बटन पर क्लिक करें। बस, आपका काम ख़त्म हुआ। अब आप आराम से बैठकर गाने के ख़त्म होने का इंतज़ार करें और गाना समाप्त होने पर रिकॉर्डिंग को भी बंद कर दें। आपका पसंदीदा गाना रिकॉर्ड होने पर अब फ़ाइल मेन्यू में जाकर उसे एमपी3 फ़ॉर्मेट में सेव कर दें।
अगर इतना पढ़ने के बाद भी कोई दिक़्क़त पेश आ रही है, तो बेहिचक पूछें। वैसे, आजकल मैं इन्दौर में हूँ। वरना अपने उस पसन्दीदा गाने को अपलोड कर उसकी कड़ी ज़रूर देता, जिसके चक्कर में यह सब सीखना पड़ा।
बहुत दिनों से मैं एक गाना खोज रहा था। गाने का मुखड़ा था - "जा नहीं सकता है दिल, उनका ख़याल आया हुआ।" नूरजहाँ का यह गाना आज़ादी से पहले की "विलेज गर्ल" (Village Girl) नाम की एक बहुत पुरानी फ़िल्म से है। मैनें अंतर्जाल पर इस गाने को बहुत ढूंढा, लेकिन डाउनलोड करने के लिए यह गाना कहीं भी नहीं मिला। फिर मैनें चिट्ठा-जगत् के संगीत विशेषज्ञ रजनीश भाई को ई-मेल कर मदद की गुहार लगाई, लेकिन उन्होंने भी हाथ खड़े कर दिए।
हालाँकि यह गाना राग डॉट कॉम पर मिल गया और ऑनलाइन सुना जा सकता था। लेकिन अब समस्या यह थी कि ऑफ़लाइन होने पर इसे नहीं सुना जा सकता था और न ही अपनी प्ले-लिस्ट में जोड़ा जा सकता था। फिर मैंने जुगत लगाकर स्ट्रीमिंग संगीत या गाना रिकॉर्ड करने का उपाय भी आख़िरकार खोज ही निकाला। आप भी देखिए, अगर कोई ऑनलाइन स्ट्रीमिंग गाना रिकॉर्ड करना है तो इस आसान उपाय का इस्तेमाल किया जा सकता है।
सबसे पहले कोई भी रिकॉर्डिंग सॉफ़्टवेयर (जैसे कि ऑडसिटी वगैरह) खोलें और सोर्स (Source) में "मोनो मिक्सर" या "स्टीरिओ मिक्सर" (Mono mixer or Stereo mixer) चुनें। फिर इंटरनेट पर किसी भी साइट से मनचाहा ऑनलाइन गाना शुरू करें और रिकॉर्डिंग सॉफ़्टवेयर में रिकॉर्ड के बटन पर क्लिक करें। बस, आपका काम ख़त्म हुआ। अब आप आराम से बैठकर गाने के ख़त्म होने का इंतज़ार करें और गाना समाप्त होने पर रिकॉर्डिंग को भी बंद कर दें। आपका पसंदीदा गाना रिकॉर्ड होने पर अब फ़ाइल मेन्यू में जाकर उसे एमपी3 फ़ॉर्मेट में सेव कर दें।
अगर इतना पढ़ने के बाद भी कोई दिक़्क़त पेश आ रही है, तो बेहिचक पूछें। वैसे, आजकल मैं इन्दौर में हूँ। वरना अपने उस पसन्दीदा गाने को अपलोड कर उसकी कड़ी ज़रूर देता, जिसके चक्कर में यह सब सीखना पड़ा।
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