Saturday, March 31, 2007

जल्द आ raha है "मस्ती की बस्ती"

पहला विज्ञापन- वैद्यानथ का

वोट किसको दें
जिसका आचरण तपा-तपाया हो
जो कट्टर देशभक्त और निस्वार्थी हो
जो जनकल्याण की भावना से ओतप्रोत हो
जिसने आयुर्वेद को राष्ट्रीय चिकित्सा बनाने की प्रतिज्ञा ली हो

-श्री वैद्यानाथ आयुर्वेद भवन,आयुर्वेद औषधियों के श्रेष्ठ निर्माता
(विज्ञापन प्रकाशित- 6 नवंबर,1952, नवभारत टाइम्स, दिल्ली)


दूसरा विज्ञापन- एक फिल्म का

जल्द आ रहा है-
जैमिनी का हदयस्पर्शी चित्र
जिसे देखकर गृहणियों के अश्रू आ जाएं

(विज्ञापन प्रकाशित- 1952 हिन्दुस्तान, दिल्ली)

तीसरा विज्ञापन- "मस्ती की बस्ती"

जल्द आ रही है-"मस्ती की बस्ती"
एक गली-एक मोहल्ला-एक कस्बा-एक शहर-एक चौपाल
जहां नुक्ताचीनी है-कांटे की बात है और हैं टेढे-मेढ़े सवाल
जहां आप पढ़ेगे व्यंग्य और रखा जाएगा आपके हंसने का ख्याल
तो इंतज़ार कीजिए-"मस्ती की बस्ती" का
एक अनूठे ब्लॉग का.......

(31 मार्च, 2007, ब्लॉग पर)

विज्ञापनों का रंग-ढंग बदल गया। पुराने विज्ञापन इतिहास में दर्ज हो गए और नए भविष्य को बनाने के मकसद से आते गए।

फिलहाल जनाब,हम भी इतिहास में दर्ज हो गए। हिन्दी ब्लॉग के इतिहास में। जब कभी हिन्दी ब्लॉग के विज्ञापन की बात आएगी-तो खबरदार पाठकों! अगर आप इस ब्लॉग "मस्ती की बस्ती" का ज़िक्र करना भूले तो।

इस ब्लॉग पर पहला चिठ्ठा यानि व्यंग्य एक अप्रैल यानि मूर्ख दिवस पर नज़र आएगा और वरिष्ठ व्यंग्यकार आलोक पुराणिक लेकर आएंगे-मूरखों के बारे मे अपनी दिलचस्प टिप्पणी।

लगे मौके इस ब्लॉग को शुरु करने का मकसद भी बता दिया जाए। दरअसल, इऩ दिनों हिन्दी ब्लॉग की दुनिया में बहार आयी हुई है। नए चिठ्ठाकारों की बहार। उऩके कहे अलग और दिलचस्प चिठ्ठों की बहार। इस बहार में हमने भी सोचा कि कुछ नए फूल उगा दिए जाए-सो ये प्रयोग है। इस चिठ्ठे में दिखेंगे आपको करारे व्यंग्य और दिलचस्प टिप्पणियां। सभी व्यंग्यकारों का चिठ्ठे पर स्वागत है।

वैसे, एक दूसरा मकसद भी है। मैं भी "क्योंकि हर ब्लॉग कुछ कहता है.." विषय पर शोध कर रही हूं। इस शोध के दौरान एक प्रोजेक्ट के तौर पर इस ब्लॉग को स्थापित करने की कोशिश करुंगी। देखना है- कितनी सफलता मिलती है?

बहरहाल, क्या होगा खुदा जाने-पर इतिहास में नाम तो दर्ज हो ही गया। तो हे चिठ्ठाकारों इंतजार कीजिए...और मत भूलिए कि ब्लॉग के इतिहास में पहला विज्ञापन (संभवत:) जारी हो चुका है।

धन्यवाद
-गौरी पालीवाल

तो फिर मित्रों, व्यंग्यों और मशहूर व्यंग्यकारों से भरा यह ब्लॉग देखना न भूलें जो कल से शुरू हो रहा है। बुकमार्क करें - मस्ती की बस्ती (http://www.hindiblogs.com/masti/)

Friday, March 30, 2007

बस, ट्रेन और तरह-तरह के प्राणी

हाल में मेरी परीक्षाएँ ख़त्म हुई हैं और मैं काफ़ी घूम-फिर रहा हूँ। अब सौभाग्य या दुर्भाग्य से मैं कोई करोड़पति तो हूँ नहीं, इसलिए अक़्सर बस और ट्रेन के जनरल कम्पार्टमेण्ट में यात्रा करता हूँ। इनमें यात्रा करने का एक अलग ही मज़ा है, जो आपको हवाई-जहाज़ में यात्रा करके नहीं मिल सकता है।

अगर आप कभी ट्रेन के जनरल डिब्बे में सफ़र करें तो पाएँगे कि वहाँ लोग कभी ख़ामोश नहीं बैठे होते हैं। हमेशा धर्म, अध्यात्म, अर्थशास्त्र जैसे किसी-न-किसी गूढ़ विषय पर चर्चा चल रही होती है। एक-से-एक धुर विद्वान टाइप के लोग यहाँ मिलते हैं। लेकिन अगर आपमें सुनने की कुव्वत नहीं है तो कभी इन चर्चाओं में टांग नहीं अड़ानी चाहिए। कुछ दिनों पहले मैं दिल्ली से आगरा जा रहा था तो इसी तरह की एक चर्चा में फँस गया। चर्चा का विषय था अर्थशास्त्र और आम से दिखने वाले लोग 'गहन विवेचनाएँ' कर रहे थे। तभी ग़लती से एक बच्चे ने 'अंकल चिप्स' का पैकेट ख़रीद लिया, फिर तो कई 'आम इंसानों की खाल में उद्भट विद्वान' लोग उस पर टूट पड़े।
पान की पीक सीट के नीचे थूकते हुए एक चश्माधारी सज्जन बोले, "यह देखिए तो ज़रा... देश का पैसा बाहर जा रहा है।"
यह सुनते ही वह बच्चा और मैं दोनों घबरा गए। मैं इसलिए घबराया कि अब ये लोग बहुत झिलाएंगे और बच्चा इसलिए कि पैसे तो उसने चाय-चिप्स वाले को दिए, बाहर कैसे चले गए?
इतने में बीड़ी सुलगाते हुए दूसरे सज्जन ने कहा, "यहाँ 'मांग की लोच' बढ़ाने के लिए बच्चों का दिमाग़ विकृत किया जा रहा है। सब उदारीकरण का दोष है।"
फिर एक बोला, "लेकिन थोड़े वक़्त में इसके लाभ 'ऊपर' से रिसकर 'नीचे' आम आदमी तक पहुँचेंगे और उदारीकरण से आख़िरकार फ़ायदा ही होगा।"
इस तरह एक अंतहीन चर्चा शुरू हो गई। मैं और वह बच्चा, दोनों ही सो गए। शायद बच्चा भी टीवी की तेज़ आवाज़ में सोने का अभ्यस्त होगा।

इन 'विद्वानों' के अलावा भी कई ख़ास प्रजातियों के प्राणी बसों-ट्रेनों में पाए जाते हैं। ऐसी ही एक प्रजाति है 'बाबू' लोगों की। इन्हें पहचानने का तरीक़ा यह है कि इनके बालों में इतना तेल लगा होता है कि अगर निचोड़ कर घर ले जाया जाए तो दो-तीन रोज़ का खाना बन सकता है, ये हमेशा सफ़ारी सूट धारण करते हैं और एक ख़ास तरह का चमड़े का झोला अपने पास रखते हैं, अस्सी के दशक का काला चश्मा पहनते हैं जैसा 'बंटी और बबली' में अमिताभ बच्चन पहनता था, हर दिन अप-डाउन करते हैं और हमेशा समूह में रहते हैं। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि कोका कोला के 'छोटा कोक पाँच रुपये' वाले विज्ञापन में आमिर ख़ान की जैसी शक्ल-सूरत थी, इनकी भी कमोबेश वैसी ही होती है। ये लोग बहुत ही ख़तरनाक होते हैं। ये लोग भारी तादाद में चढ़ते हैं और चार लोगों की सीट पर छ: से लेकर आठ लोग तक बैठते हैं, जिसमें आपकी हालत सेण्ड्विच के बीच उस आलू जैसी हो जाती है जो कसमसाने के सिवा और कुछ नहीं कर सकता है। फिर ट्रेन चलते ही ये लोग ताश की गड्डी निकालकर खेलने लगते हैं। और यह खेल महज़ टाइमपास के लिए नहीं खेलते, बल्कि बहुत गंभीरता से खेलते हैं और एक काग़ज़ पर प्वाइंट वगैरह भी नोट करते रह्ते हैं। बीच में दबे-पिसे आप बैठे-बैठे खीझ तो सकते हैं पर इनसे कुछ कह नहीं सकते, क्योंकि इनकी तादाद काफ़ी ज़्यादा होती है। कुछ कह कर फ़ायदा भी नहीं होता, क्योंकि ये आपकी सुनते भी नहीं हैं।

फिर आपको यात्रा के दौरान बहुत से 'सफ़रिया रंगबाज़' भी मिलेंगे। कम-से-कम मुझे तो बस-ट्रेन में हर बार दो-एक तो मिलते ही हैं। हाँलाकि दिखने में ये लोग पिद्दी होते हैं, लेकिन सफ़र के दौरान रंगबाज़ी करने से बाज़ नहीं आते हैं। आप जैसे ही खिड़की के पास वाली सीट पर बैठने वाले होंगे, एक लहराता हुआ रुमाल (जिससे नाक पोंछी गई हो) न जाने कहीं से सीट पर आ गिरेगा। इस रुमाल को कोई आम रुमाल समझकर लाइटली नहीं लेना चाहिए, दरअसल यह किसी सफ़रिया रंगबाज़ के आने की पूर्व-सूचना होता है। सो आपको रुमाल देखते ही सावधान हो जाना चाहिए और अपनी सीट के लिए जूतम-पैजार करने की तैयारी कर लेनी चाहिए। दरअसल इस रूमाल की अद्भुत शक्ति यह है कि यह जिस जगह पर भी गिरेगा, वह जगह सफ़रिया रंगबाज़ की हो जाती है। बस और ट्रेन में तो चलो ठीक भी है, लेकिन किसी दिन ऐसा न हो कि ये लोग ताजमहल, लालक़िला या राष्ट्रपति भवन पर रुमाल डालकर उन्हें भी कब्ज़ा लें।

'सफ़रिया रंगबाज़' का महिला संस्करण भी कभी-कभी देखने को मिलता है। ये अपने छोटे-छोटे बच्चों से रुमाल का काम लेती हैं। अरे यार, हाथ-मुँह पोंछने के लिए नहीं बल्कि सीट कब्ज़ाने के लिए। अगर आप भी मेरी ही तरह ख़ुद पर 'सज्जन' होने की चिप्पी चिपकाए घूमते हैं, तो 'सफ़रिया रंगबाज़' के इस महिला संस्करण से अपनी सीट मुक्त कराना "मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है।" क्योंकि महिलाओं और बच्चों से लड़ाई-झगड़ा भी नहीं किया जा सकता है।

जैसे-जैसे आप ऊँचे दर्ज़े की ओर जाते हैं, ऐसे लोग और इसीलिए मज़े भी कम होते जाते हैं। हवाईजहाज़ में मैंने जब भी सफ़र किया है (बताना ज़रूरी है कि मैंने भी हवाईजहाज़ में सफ़र किया है :-) तो यही पाया कि आपका सहयात्री पूरी कोशिश करेगा कि आपसे कम-से-कम 'इंटरेक्शन' हो। इसलिए हवाईजहाज़ और ट्रेन के फ़र्स्ट क्लास में वो आनन्द नहीं हैं, जो बस और रेल के जनरल कम्पार्टमेण्ट में हैं। क्या कहते हैं आप?

Sunday, March 25, 2007

एक नई शुरुआत : HindiBlogs.com

HindiBlogs.com एक बार फिर हाज़िर है बहुत-सी नई सुविधाओं और विशेषताओं के साथ। आशा है कि यह तेज़ी से फैलते हुए हिन्दी चिट्ठा जगत को आम लोगों तक पहुंचाने में अपना छोटा सा योगदान दे पाएगा। इन नई ख़ूबियों से लैस हिन्दीब्लॉग्स.कॉम को देखिए और अपनी अमूल्य राय दीजिए :
  • प्रत्येक पोस्ट के साथ उसकी पाठक-संख्या की जानकारी - जाने क्या है हिट और क्या है फ्लॉप
  • हिन्दीब्लॉग्स.कॉम की आरएसएस फ़ीड की सुविधा - प्रयोग करें अपना खुद का एग्रीगेटर
  • हर पोस्ट के साथ तारीख़ और समय - जाने क्या है नया
  • पुरानी पोस्ट्स को देखने की सुविधा - आज तक की सभी प्रविष्टियां आर्काइव में
  • पहले से कहीं ज़्यादा तेज़ और बेहतर
  • MarathiBlogs.com की नई शुरुआत - मराठी पाठकों के लिए तेजतर्रार एग्रीगेटर
  • कई सारे बग फ़िक्सिज़ (और कई सारे नए बग्स भी ;-) )
  • ज्यादा पठनीय बनाने के लिए टैम्पलेट में कुछ परिवर्तन (परन्तु अभी भी भद्दे नीले रंग से मुक्ति नहीं)
मैं रवि रतलामी जी, जीतू भाई और उन सभी लोगों को धन्यवाद कहना चाहूँगा, जिन्होंने HindiBlogs.com को बेहतर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। यह सारे सुधार पिछले दो दिनों में किए गए हैं और मुमकिन है कि इस कारण कुछ बग रह गए हों। अगर आप कोई बग देखें तो कृपया ज़रूर बताएँ।

Why Team India Lost in World Cup

आख़िर क्यों हारा भारत?

सचिन तेन्दुलकर, एक ऐसा नाम जिसे विश्व क्रिकेट के सर्वकालिक महानतम बल्लेबाज़ों में शुमार किया जाता है। सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़, वीरेन्द्र सहवाग - ये सभी वे खिलाड़ी हैं जिन्हें आज के दौर में क्रिकेट की बड़ी शख़्सियत माना जाता है। कल तक मीडिया इन लोगों की प्रशस्तियाँ गा रहा था, तारीफ़ में कसीदे पढ़ रहा था और आज खलनायकों की तरह पेश कर रहा है, पानी पी-पी के कोस रहा है।

प्रश्न उठता है कि फिर ये रणबांकुरे क्यों न तार सके विश्वकप में हिन्दुस्तान की नैया? ये वही खिलाड़ी हैं जिनके नाम हज़ारों रन दर्ज हैं। तो क्या ये खिलाड़ी अचानक खेलना ही भूल गए? अगर हम भारतीय खिलाड़ियों की तुलना ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों से करें, तो पाएंगे कि व्यक्तिगत रूप से भारतीय खिलाड़ी कहीं बेहतर हैं। लेकिन फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि भारतीय खिलाड़ी बड़े मैचों में दबाव को नहीं सह पाते हैं और बिखर जाते हैं। वहीं ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी अपनी दबाव झेलने की क्षमता के चलते कई दफ़ा हारे हुए मैच भी जीत जाते हैं।

जो लोग मनोविज्ञान को समझते हैं, वो जानते होंगे कि दबाव में प्रदर्शन करना सबसे मुश्किल काम है। दरअसल टीम इण्डिया को मनोवैज्ञानिक की ज़रूरत है जो उन्हें समझा सके, सिखा सके कि बड़े मैचों में मन को दबाव के इस हौवे से कैसे दूर रखा जा सके। किसी बड़े मैच से पहले खिलाड़ी जिस मानसिक तनाव से गुज़रते हैं, आम लोगों के लिए उसे समझ पाना भी मुश्किल है।

Saturday, March 24, 2007

A Letter to my Husband...

एक गाँव में एक स्त्री थी। उसके पती आई टी में कार्यरत थे। वह अपने पती को पत्र लिखना चाहती है पर अल्पज्ञानी होने के कारण उसे यह पता नहीं होता है कि पूर्णविराम कहाँ लगेगा। इसलिये उसका जहाँ मन करता है वहीं पूर्णविराम लगाती है और इस प्रकार चिठ्ठी लिखती है।

"मेरे प्यारे जीवनसाथी मेरा प्रणाम आपके चरणों में। आप ने अभी तक चिठ्ठी नहीं लिखी मेरी सहेली को। नौकरी मिल गयी है हमारी गाय ने। बछडा दिया है दादाजी ने। शराब शुरू कर दी है मैंने। तुमको बहुत ख़त लिखे पर तुम नहीं आये कुत्ते के बच्चे। भेड़िया खा गया दो महीने का राशन। छुट्टी पर आते वक़्त ले आना एक ख़ूबसूरत औरत। मेरी सहेली बन गयी है। और इस वक़्त टीवी पर गाना गा रही है हमारी बकरी। बेच दी गयी है तुम्हारी माँ। तुमको याद कर रही है एक पड़ोसन। हमें बहुत तंग करती है तुम्हारी बहन। सिरदर्द से लेटी है तुम्हारी पत्नी।"

ये ई-मेल मुझे थोड़ी देर पहले मिली। उम्मीद है आपका भी कुछ टाइमपास होगा। :)

Wednesday, March 21, 2007

HindiBlogs.com on CNBC-Aawaz

आज हिन्दीब्लॉग्स को सीएनबीसी आवाज़ पर देखकर अच्छा लगा। मैं शशिजी को धन्यवाद कहना चाहूँगा, जिनका प्रयास हिन्दी चिट्ठा जगत् को आम लोगों तक पहुँचा रहा है। उनके जैसे समर्पित चिट्ठाकारों के कारण हिन्दी ब्लॉग जगत् अब जनसाधारण को प्रभावित करने में सक्षम हो रहा है।

Tuesday, March 20, 2007

Cricket Proved Jinnah Wrong

क्रिकेट ने साबित किया जिन्ना को ग़लत

Indian Cricket Team Captain Rahul Dravidजिन्ना का द्विराष्ट्रवाद का सिद्धांत आख़िरकार ग़लत साबित हो ही गया। भारत और पाकिस्तान, दोनों मुल्क भले ही पचास साल पहले अलग हो गए हों, लेकिन विश्वकप में दोनों देशों के ख़राब प्रदर्शन ने दिखला दिया कि दोनों कमोबेश एक जैसे ही हैं। जहाँ पाकिस्तान ने आयरलैंड के हाथों पटखनी खाई, वहीं हिन्दुस्तान ने बांग्लादेश से हार का स्वाद चखा। दोनों का ख़ून वही है, जो कब क्या रंग दिखाए यह पता नहीं चलता है। दोनों शुरुआती दौर में ही फिसड्डी टीमों के हाथों हार गए।

ख़ैर, इससे ज्योतिष की विश्वसनीयता भी साबित होती है। भारत-पाकिस्तान भले ही अपना स्वतंत्रता दिवस अलग-अलग दिन मनाते हों, लेकिन आज़ाद एक ही दिन हुए हैं और इसीलिए दोनों के कुण्डलियाँ भी लगभग एक-सी हैं। लगता है कि दोनों के नक्षत्र ख़राब चल रहे हैं और जन्म-पत्रियों में बच्चे देशों के हाथों पिटना लिखा था। भारत-पाकिस्तान की हालत देखकर तो लगता है मानो गली-मुहल्ले के किसी ढीली चड्ढी पहने अंगूठा चूसते बच्चे ने गामा और सेण्डो पहलवानों को धराशायी कर दिया हो।

Ex-English Cricketer and coach of Pakistan Bob Woolmerख़ैर, जो हुआ सो हुआ। लेकिन अपना वूल्मर बेचारा बात दिल पर ले गया। यहाँ करोड़ों भारतीय आस लगाए बैठे थे कि शायद सदमा चैपल को लगे और टीम इंडिया की ग्यारह भेड़ों को बेरहमी से ठोंक-ठोंक कर हाँकने वाले गढ़रिये का खेल निपटे, लेकिन जैसा बिन्दु के पिताजी ने कहा है - "जब-जब जो-जो होना है, तब-तब सो-सो होता है" (अरे यार, "पड़ोसन" में भोले की प्रेमिका बिन्दु) यानि जो होना होता है वही होता है और हुआ भी वही जो होना था। गुरू ग्रेग टीम के शर्मनाक प्रदर्शन पर अभी भी मीडिया के सामने खींसें निपोर रहे हैं और वहीं बेचारे बॉब साहब इतने आहत हुए कि इस लोक से ही अपना बोरिया-बिस्तर समेट लिया।

बचपन में पाठशाला में एक 'अचार जी' गणित पढ़ाते थे। उनसे मैं जब भी कोई सवाल पूछता था और वो बतला नहीं पाते थे, और ऐसा अक़्सर होता था, तो वो किसी और बच्चे को खड़ा करते, उससे एक कठिन-सा सवाल पूछते और न बता पाने पर बबूल की संटी से उसकी जमकर धुनाई करते थे और मेरा ग़ुस्सा उसपर उतार देते थे। हमारी टीम इंडिया का हाल भी काफ़ी-कुछ उन अचारजी की ही तरह है। बांग्लादेश ने पछीट-पछीट के धोया तो उसका ग़ुस्सा बेचारी बरमूडा पर उतारा। लेकिन मैं न कभी अचारजी से पिटने वाले उन बच्चों के लिए कुछ कर सका और न ही बरमूडा के लिए कुछ कर सकता हूँ, सिवाय सहानुभूति रखने के।

Friday, March 09, 2007

HindiBlogs.com in Digit Magazine

चिट्ठाकार बन्धुओं, परीक्षाओं के चलते मैं काफ़ी दिनों से चिट्ठाकारी से दूर हूँ। हाल में देखा तो पाया कि डिजिट के फ़रवरी अंक में हिन्दीब्लॉग्स.कॉम का उल्लेख किया गया है। दरअसल फ़रवरी में डिजिट के सा‍थ ब्लॉगिंग विषय पर आई बुकलेट Fast Track to Blogging में हिन्दीब्लॉग्स.कॉम के बारे में लिखा गया है –

Hindi Blogs (http://www.HindiBlogs.com) is a free Hindi blog aggregator and is a great place to get into whole Hindi blog movement........

हिन्दीब्लॉग्स.कॉम का नाम देसीपंडित के नाम के साथ देखकर भी बहुत खुश का अनुभव हुआ। डिजिट का यह काम सराहनीय है। उम्मीद है कि इसी तरह ज़्यादा-से-ज़्यादा पत्र-पत्रिकाएँ समय-समय में हिन्दी चिट्ठा जगत् पर सामग्री छापकर इसके प्रसार में सहयोग देंगी।

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