Thursday, May 31, 2007

हिन्दी चिट्ठाकारी के तीन साल

हिन्दी ब्लॉग जगत में सालगिरह टाइप चीज़ें मनाने की ख़ासी परम्परा है, तो मैंने सोचा कि अपन भी इस परंपरा को निभाते हैं। हिन्दीं में आपको पकाते हुए यानि ब्लॉगिंग करते हुए आज तीन साल पूरे हो गए हैं। अपने तब के ब्लॉग पर पहली पोस्ट 31 मई 2004 को ही लिखी थी। पहली पोस्ट पर विजय जी, शैल जी और विनय जी की टिप्पणियाँ आते ही दिल "बरखा में मोर" सा नाचने लगा था। हाँ, उससे पहले डायनमिक फ़ॉण्ट वगैरह झमेले कर के देख चुका था, लेकिन वो सब कुछ ख़ास काम के नहीं लगे। फिर धीरे-धीरे यहाँ एक परिवार मिल गया। जिनसे जुड़ाव की शुरुआती वजह तो हिन्दी ब्लॉगिंग थी, लेकिन बाद में दिल का दिल से रिश्ता जुड़ गया..... भले ही ये सब थोड़ी फ़िल्मी डायलॉगबाज़ी लग रही है, लेकिन मैं यह मानकर कि आप झेलने में सक्षम हैं, जारी रखता हूँ।

हाँ, तो मैं कह रहा था कि जब मैंने हिन्दी में ब्लॉग बनाया तो मुझे लगा कि कोई बड़ा क्रांतिकारी काम मेरे हाथों से हो गया है, कि मैंने हिन्दी का पहला ब्लॉग बना लिया है। लेकिन विनय जी और आलोक जी जैसे तोप टाइप लोग पहले-से मौजूद मिले तो यह ख़ुशफ़हमी फ़ौरन छू हो गई। जहाँ तक मुझे याद पड़ता है, उस वक़्त तक़रीबन आठ ब्लॉग रहे होंगे हिन्दी में। दु:ख की बात है उनमें से बहुतों ने अब लिखना बंद कर दिया है। लेकिन ख़ुशी यह है कि बहुतेरे किसी स्पेशल चक्की का आटा खाकर अभी भी मैदान में डटे हैं। तो जो लोग डटे हुए हैं उनसे गुज़ारिश है कि चक्की के नाम या अगर पैक्ड आटा इस्तेमाल कर रहे हों तो आटे के ब्राण्ड का खुलासा करें, ताकि दूसरे लोग भी उसे हजम करके यहाँ वर्चुअल पन्नों को सालों-साल तलक काला कर सकें और हिन्दी ब्लॉगिंग को आगे ले जा सकें। आज आप लोगों का काफ़ी वक़्त ज़ाया किया, अपने चिट्ठे की अगली सालगिरह से पहले फिर मिलने का संकल्प लेते हुए विदाई लेता हूँ। नमस्कार।

Sunday, May 27, 2007

Vote the Taj to the New Seven Wonders of the World

Taj Mahal, Agraताज महल को आपकी मदद की ज़रूरत है! अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर दुनिया के नए सात अजूबे खोजने के लिए एक प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है, जिसमें ताज महल 21 अन्य ऐतिहासिक इमारतों की सूची में पीछे से दूसरे स्थान पर है। दुनिया के नए सात अजूबों की घोषणा इसी साल 7 जुलाई को लिस्बन, पुर्तगाल में की जाएगी। हाल में मशहूर संगीतकार एआर रहमान ने 1 मीडिया कॉर्प लि. द्वारा चलाई जा रही इस मुहीम हो आगे बढ़ाने के लिए एक दिलकश धुन तैयार की है, यह ताज महल, आगरा को वोट करने की मुहीम इसे दुनिया के नए सात अजूबों में जगह दिलाने के लिए है। इस धुन को यहाँ सुनिए।

इंटरनेट के ज़रिए वोट करने के लिए इंडियाइंफ़ो.कॉम पर जाएँ या 'TAJ' लिखकर 4567 पर एसएमएस करें या फिर '1255545' डायल करें (बीएसएनएल मोबाइल/लैण्डलान उपभोक्ता), '127777' डायल करें (एमटीएनएल उपभोक्ता) या सीधे वोट करने के लिए न्यू7वंडर्स.कॉम पर जाएँ।

Friday, May 11, 2007

कहानी टीवी धारावाहिकों की

आजकल के हिन्दी धारावाहिक बड़े ही अद्भुत हैं। इन्हें देखकर मैं आश्चर्यचकित रह जाता हूँ। पहली बात तो यह कि इनका नाम ही देखने लायक होता है। मैंने देखने लायक कहा, न कि पढ़ने लायक; क्योंकि इनके नामों की वर्तनी ही इतनी निराली होती है कि उसे पढ़ना अपने आप में काफ़ी मुश्किल काम है। e की जगह a का, a की जगह e का और जगह-जगह पर ii (दो बार आई) का इस्तेमाल तो एक आम-सी बात है। फिर इन धारावाहिकों के नाम के पहले अक्षर में 'क' की वही अहमियत है; जो वेदों में ओंकार की, नाज़ियों में स्वस्तिक की और मर्सिडीज़ कार में आगे लगे सितारे की होती है।

ख़ैर ये तो कुछ भी नहीं है जनाब ! इनकी कहानी तो देखने वालों का भेजा घुमा देती है। आपकी सारी पूर्वनिर्धारित धारणाएँ ध्वस्त हो जाती हैं। जैसे कि इन धारावाहिकों में दिखाए जाने वाले विभिन्न किरदारों को बार-बार 'संस्कारी' कहा जाता है। लीजिए, खा गए न गच्चा। अरे ये वो संस्कारी नहीं हैं, जो आप समझ रहे हैं। इनकी परिभाषा ज़रा हट कर है। अब आप पूछेंगे भला कैसे हटकर है? इनके अनुसार संस्कारी होने से मतलब उस इंसान से है; जिसके विवाहेतर सम्बन्ध हों, जो दूसरों की बातें बाहर से दरवाज़े पर कान लगाकर सुनने का चिर अभ्यासी हो, जो दूसरे को नीचा दिखाने का कोई भी मौक़ा न गंवाता हो और षड्यन्त्र करने में माहिर हो।

इन धारावाहिकों के सम्वाद बड़े ही उबाऊ होते हैं, लेकिन दर्शक फिर भी पूरी तल्लीनता से कान लगाकर इन्हें सुनते हैं। हालाँकि शुरु में सम्वाद-लेखक का नाम भी लिखा आता है, लेकिन मैं नहीं मानता कि ये सम्वाद किसी इंसान ने लिखे हैं। मुझे पूरा यक़ीन है कि ये सम्वाद कम्प्यूटरीकृत होते हैं। मेरे हिसाब से सम्वाद लिखने का काम कोई सॉफ़्टवेयर करता है, जो अपने सीमित डेटाबेस के 'संस्कार', 'सिंदूर', 'आदर्श', 'परम्परा', 'परिवार' और 'आदर' वगैरह शब्दों को randomly लगाकर नए-नए वाक्यों को गढ़ता रहता है। जैसे कि 'बुज़ुर्गों का आदर करना हमारे परिवार की परम्परा है' वगैरह वगैरह।

ये सभी 'क' अक्षर से शुरू धारावाहिक वक़्त बर्बाद करने के लिए बेहतरीन ज़रिया हैं। यदि आप खाली बैठे हैं और समय काटे नहीं कट रहा (भगवान करे ऐसा आपके साथ कभी न हो, क्योंकि ऐसा तो सिर्फ़ नौकरी छूटने के बाद ही होता है), तो अपना टीवी खोलें और ऐसा ही कोई धारावाहिक ज़रूर देखें। फिर मुझे बताएँ कि इन धारावाहिकों के बारे में मेरे विचार कितने सही हैं।

Thursday, May 10, 2007

विचार का हत्यारा इंटरनेट

आदि काल से मनुष्य एक ऐसी शक्ति का प्रयोग करता रहा है, जो उसके विकास के लिए ज़िम्मेदार है। और यह शक्ति है 'विचार' की। यहाँ मैं विचार शब्द का इस्तेमाल कल्पना और सोचने से ज़्यादा प्रेक्षण के अर्थ में कर रहा हूँ, अवलोकन के अर्थ में कर रहा हूँ। मनुष्य ने जो भी प्रगति की है, वह प्रकृति के अवलोकन द्वारा ही की है। जहाँ विज्ञान की प्रगति बाह्य प्रकृति के अवलोकन का परिणाम हैं, वहीं अध्यात्म की प्रगति अंत:प्रकृति के सतत अवलोकन से हुई है।

लेकिन आज हालात बदल चुके हैं, जिसका ज़िम्मेदार इंसान का तकनीक को इस्तेमान करने का तरीक़ा है। कोई भी समस्या यह मौक़ा देती है कि उसका सामना किया जाए, उसे समझा जाए और उस पर विचार किया जाए। जिस तरह कसरत शरीर के लिए आवश्यक है, ठीक उसी तरह यह विचार, यह अवलोकन की क्रिया दिमाग़ के लिए ज़रूरी है। आज कोई भी समस्या सामने आने पर व्यक्ति उसका हल तुरंत इंटरनेट पर खोजने की कोशिश करता है, बजाय कि उस समस्या के सामने प्रेक्षक भाव से खड़े होने के, बजाय उस पर विचार करने के। और यह ज़हर की तरह घातक प्रवृत्ति धीरे-धीरे दिमाग़ को कुन्द कर रही है, ज़ंग लगा रही है।

ऐसी ही एक कहानी मैंने सुनी है कि संता सिंह के पास एक तलवार थी। तलवार पुरखों की थी और उस तलवार के बारे में कहा जाता था कि वह इतनी घातक है कि वह तलवार जिसके पास हो, उसके सामने पूरी सेना भी नहीं टिक सकती। संता सिंह उसे हमेशा अपने पास रखता था। उसका पड़ोसी बंता सिंह उस तलवार को पाना चाहता था। एक सुबह इसी बात को लेकर दोनों की आपस में कहा-सुनी हो गई। बंता ग़ुस्से में भर उठा और एक डण्डा उठाकर संता को मारने दौड़ा, संता - जिसके पास वह तलवार थी - हाथ में तलवार लिए बंता से बचने के लिए भागने लगा। बहुत दौड़ने के बाद बंता ने उसे पकड़ लिआ और डंडे से जमकर उसकी धुनाई की, साथ ही तलवार भी छीन ली। घर लौटने पर संता सिंह की पत्नी ने पूछा कि उसके पास तलवार थी तो फिर वो पिटा क्यों? इस पर संता बोला - "बहुत वक़्त से तलवारबाज़ी न करने की वजह से मैं तलवार चलाना भूल चुका हूँ, इसलिए लड़ते मैं तलवार डंडे की तरह इस्तेमाल कर रहा था। लेकिन बंता को तलवारबाज़ी आती है, इसलिए वह डण्डा भी तलवार की तरह चला रहा था। यही वजह है कि मैं पिट गया।" इंटरनेट भी हमारी विचार-शक्ति पर ऐसा ही दुष्प्रभाव डाल रहा है। हम तुरंत हल पाने के चक्कर में सोचने की क्षमता खोते जा रहे हैं।

किसी चीज़ का उपयोग अगर सही जगह पर किया जाए तो वह फ़ायदेमन्द होती है। सूचना के लेन-देन के लिए इंटरनेट महत्वपूर्ण है इसलिए सूचना के तल पर इसका इस्तेमाल वांछित है। लेकिन विचार के तल पर यह बहुत ख़तरनाक है। क्योंकि यह दिमाग़ को पराश्रित बनाता है। इंसान में यह प्रवृत्ति पुरानी है कि उसे पका-पकाया हल मिला जाए, लेकिन इंटरनेट से पहले यह आसान न था। इसलिए उसे अनमने तौर पर ही सही, लेकिन खुद ही विचार करना पड़ता था।

दुनिया की जितनी भी समस्याएँ हैं उसकी जड़ में एक ही चीज़ है - मनुष्य की दिक़्क़तों का 'रेडी मेड' हल पाने की इच्छा। मज़हब के नाम पर दुनिया भर में हुए इतने रक्तपात का क्या कारण है? यही कि लोगों ने जीवन समस्या का रेडी मेड हल खोजा और उससे जौंक की तरह चिपक गए। कुछ मुहम्मद के बताए हल से, कोई ईसा के हल से, दूसरे प्राचीन ऋषियों के बताए हल से चिपके रहे। और जड़ समाधानों से चिपका व्यक्ति मृत हो जाता है क्योंकि उसके विचार भी मृत हैं, वह उधार के विचारों से चिपका हुआ है। पहले यह हालात केवल आम ज़िन्दगी और धर्म के क्षेत्र में ही थे, विज्ञान इससे अछूता था। लेकिन इंटरनेट की विज्ञान में गहरी पैठ है और यह उसमें भी जड़त्व पैदा कर रहा है। अगर किसी प्रोग्रामर से पूछा जाए तो तुरंत पता चल जाएगा कि किसी समस्या के आने पर वह उस समस्या से विचार-शक्ति के साथ जूझता है या फिर उसे गूगल पर खोजता है? और धीरे-धीरे इंटरनेट का ऐसा इस्तेमाल तकनीक के क्षेत्र में भी पूरी तरह सड़ान्ध पैदा कर देगा, आज नहीं तो कल यह तय है। इसकी शुरुआत तो हो ही चुकी है। क्योंकि तकनीक से जुड़े लोग इस उधार के समाधान से पैदा हुए जड़त्व से बंध रहे हैं। हर इंसान उस समष्टि की इकाई है और अगर व्यष्टि के स्तर पर यह क्रमिक जरावस्था फैल रही है, तो समष्टि का भी उससे अछूता रह पाना मुमकिन नहीं है।

युवा और वृद्ध में क्या अंतर है? बस इतना ही कि युवा स्वतंत्र चिंतन में समर्थ है, उससे भयाक्रांत नहीं है। और यह स्वतंत्र विचारणा ही कुछ नया सीखने की क्षमता है। यही वजह है कि वृद्ध नया सीखने में अक्षम होने के कारण दिनों-दिन जड़ता की ओर खिसक रहा है - हर रोज़ मर रहा है - क्योंकि उसमें मौलिक सोच का साहस नहीं है, अपने पैरों पर खड़े होकर - अपने बल पर अज्ञात को खोजने की पिपासा नहीं है। इंटरनेट तरुणों की तरुणाई तोड़ रहा है, अज्ञात में निर्भीक होकर छलांग लगाने की क्षमता को तोड़ रहा है। उन्हें पराश्रित बना रहा है रेडी मेड समाधान दे कर।

मैं यह नहीं कहता कि इंटरनेट व्यर्थ है। यह सूचना के तल पर परम-उपयोगी है, लेकिन आगे बढ़ने के लिए चिंतन के तल पर इसे छोड़ना ज़रूरी है। इसलिए यह समझने की ज़रूरत है कि इसे कहाँ उपयोग करना है और कब नहीं। इस पर विचार करने की ज़रूरत है।

Saturday, May 05, 2007

और गधे ने गाया गान

लाठी लेकर भालू आया
चम चम चम
ढोल बजाता मेंढक आया
ढम ढम ढम
मेंढक ने ली मीठी तान
और गधे ने गाया गान

बहुत दिनों से इस कविता को खोज रहा था। आज मिली है। शायद कक्षा एक में यह कविता पढ़ी थी। अगर आपको इस कालजयी कविता के कवि, इस भारतीय मोज़ार्ट का नाम पता हो तो कृपया बताएँ। नहीं भी पता तो कम-से-कम कविता का आनन्द ले ही सकते हैं। :)

Tuesday, May 01, 2007

Blog Plagiarism : Someone Copying Your Blog?

क्या कोई आपके ब्लॉग की सामग्री चुरा रहा है?

प्लेजरिज़म ऐसा शब्द है जिसे काव्या विश्वनाथन ने काफ़ी लोकप्रिय कर दिया है। ख़ुशी की बात यह है कि वे भारतीय हैं..... क्या? आप कह रहे हैं कि ख़ुशी की बात नहीं है! ठीक है, फिर दु:ख की बात ही मान लेते हैं। लेकिन मुद्दे की बात यह है - अब आप जान सकते हैं कि कहीं इंटरनेट पर कोई आपके ब्लॉग या वेबसाइट की सामग्री को चुरा तो नहीं रहा है? तो कॉपीस्केप खोलिए और अपने ब्लॉग का पता डालिए। आप पाएंगे उन साइटों की सूची जहाँ आपकी सामग्री का इस्तेमाल किया गया है। तो फिर देर किस बात की, आप भी http://www.copyscape.com/ देखिए क्या कोई आपके ब्लॉग की सामग्री चोरी कर रहा है? और अगर कोई चोरी कर रहा है तो ख़ुश हो जाएँ, क्योंकि फिर आपका ब्लॉग वाक़ई काफ़ी मशहूर है।

Blog Plagiarism : Someone Copying Your Blog?
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