Tuesday, June 26, 2007

“आउटसोर्सिंग के आगे जहाँ और भी हैं”

हाल में “वर्ल्ड इज़ फ़्लैट” पढ़ी। बढ़िया किताब है। कम-से-कम हिन्दुस्तानी तो इसे पढ़कर ख़ुश हो ही सकते हैं। इसके शुरू के अध्यायों में भारत को आउटसोर्स की जाने वाली सेवाओं का ख़ासा उल्लेख है। हम लोग भी आजकल आउटसोर्सिंग पर काफ़ी मुग्ध हैं। लेकिन अगर देखा जाए तो यह एक दोयम दर्जे का काम है। अगर तुलना करनी हो तो मैं आउटसोर्सिंग के काम में लगे भारतीयों की तुलना मज़दूरों से करूंगा। “तेजस्वी मन” (Ignited Minds) में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने ज्ञान-आधारित समाज के तौर पर भारत को विकसित करने की बात कही है। और हम उस दिशा में कुछ-कुछ बढ़ भी रहे हैं। लेकिन विडम्बना यह है कि इस सूचना-केन्द्रित समाज में हम सूचना-मज़दूर भर बनकर रह गए हैं। जोकि पश्चिम (ख़ास तौर पर अमेरिका) के लिए मज़दूरी कर रहे हैं। हमारी बड़ी कम्पनियों को ही लीजिए, जैसे कि इंफ़ोसिस। इंफ़ोसिस का काम भी दूसरों के लिए उत्पादों को तैयार करना भर है, न कि खुद के लिए उत्पाद बनाना।

यानी कि मेहनत तो पूरी हमारी ही है लेकिन फ़ायदा तो उनका ज़्यादा है, जिनका उत्पाद है। भारत को अब आउटसोर्सिंग से आगे सोचने की ज़रूरत है। अब हमें ऐसे प्रोडक्ट तैयार करने की ज़रूरत है, जो अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में अपनी पहचान बना सकें। और मेरे ख़्याल से ऐसा होना ज़्यादा मुश्किल नहीं है, क्योंकि आईटी के क्षेत्र में “ब्राण्ड इण्डिया” एक जाना-पहचाना और भरोसेमन्द नाम है। दिक़्क़त केवल इतनी है कि मार्केटिंग में हम कमज़ोर हैं। दूसरों के लिए हम चीज़ें (विशेषतः सॉफ़्टवेयर) बना सकते हैं, लेकिन खुद ब्रांड के तौर पर उनको विश्व-बाज़ार में मार्केट न कर पाना हमारी कमज़ोरी है। और आज की दुनिया में सारा खेल मार्केटिंग का ही है। पता नहीं यह भी समस्या है या नहीं, क्योंकि शायद ही अभी तक किसी भारतीय आईटी कम्पनी ने अपने नाम से कोई बड़ा उत्पाद बाज़ार में उतारा हो। शायद हमें यह भय अधिक है कि हम विफल हो जाएंगे। लेकिन दुनिया में ब्रांड इंडिया का सिक्का चलने के बाद हमें चुनौतियों को स्वीकारना शुरू करना चाहिए और आउटसोर्सिंग से संतुष्ट होने की बजाय बड़ी अमेरिकी कम्पनियों से प्रतिस्पर्धा के लिए कटिबद्ध हो जाना चाहिए।

8 comments:

रजनीश मंगला said...

भाई, आप भारतीय बाज़ार के लिए उत्पाद बनाने की बात कर रहे हैं या अंतरराष्ट्रिय बाज़ार के लिए। वैसे भारत में करोड़ों मोबाइल बिकते हैं, खरबों का बाज़ार है केवल भारत में, क्या भारत एक मोबाइल खुद नहीं बना सकता?

eSwami said...

रजनीश ने मेरे मन की बात कह दी है! आऊटसोर्सिंग से कमाए पैसे को घरेलू बाजार को बनाने और उसके लिये घरेलू उत्पादों को बनाने में लगाना चाहिए! उत्पादों को पर्फ़ेक्ट करने के बाद फ़िर बाकियों को टिकाना चाहिए.

Hindi Blogger said...

ब्रांड इंडिया के स्थापित हो जाने तक एक और रास्ता अपनाया जा सकता है- टेकओवर और मर्जर का रास्ता. ये अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी पर वैध तरीक़े से हाथ डालने का शॉर्टकट रास्ता है. चीनी कंपनियाँ इस रास्ते पर चल कर खूब फ़ायदा उठा रही हैं.

भारत की ब्लूचिप कंपनियों के पास भी अथाह पैसा है. लेकिन अभी टाटा, बिड़ला, रैनबैक्सी जैसी कुछ कंपनियाँ ही बाहर क़दम निकालने को तैयार हुई हैं.

maithily said...

प्रतीक जी; मैं भी आउटसोर्सिंग के काम को हम्माली यानी बोरा ढोने का काम मानता हूं. लेकिन इस हम्माली ने हमें आईटी में ब्रांड इण्डिया तो बना ही दिया है.

इंटरनेट के बाद मार्केटिंग उतनी मुश्किल नहीं रह गयी है. यदि आपके पास एल थोड़ा भी काम का उत्पाद है तो आप पैसे बना ही सकते हैं.

भारतीय साफ्टवेयर के चमकने वाले सितारे किन्ही बड़ी कम्पनियों के टेकओवर/मर्जर से नहीं निकलेंगे. ये सितारे तो गुमनाम कस्बों से निकलेंगे और जरूर निकलेंगे. आप सिर्फ आने वाले पांच साल की प्रती़क्षा कीजिये.

Gaurav Pratap said...

विश्व बज़ार मे एक प्रोडक्ट कम्पनी को टिकना ज़्यादा मुश्किल है. जब सोफ़्ट्वेयर की बात करते हैं तो ये कहना प्रासंगिक होगा की विश्व की दूसरी बडी कम्पनी (आई.बी. एम. के बाद) ई. डी. एस. भी एक सर्विस कम्पनी है. माईक्रोसोफ़्ट एक प्रोडक्ट कम्पनी होकर भी तीसरे नम्बर पे आती है. सबसे बडी कम्पनी आई. बी. एम. भी तो अब "बिजनस ओन डिमान्ड" का नारा देने लगी है. विश्व पटल पे आज चीन एक उत्पादन स्थल बन के उभार रहा है वहीं भारत एक सेवा प्रदाता के रूप में. मुझे इसमें कोइ बुराई नज़र नहीं आती.

Punit Pandey said...

व्‍यापार के लिए पैसे की जरूरत होती है, और अब वह धीरे धीरे हमारे पास आ रहा है। आने वाले समय में उम्‍मीद की जा सकती है कि हम अपने प्रोडक्‍टस बेचने में भी सफल होंगे। एसा नहीं है कि भारतीयों के पास सोच नहीं है, बल्कि संसाधन नहीं हैं।
- पुनीत
PunitPandey.com

Anonymous said...

प्रतीकजी,
आपका सोचना सही है और भारतीय सॉफ़्टवेयर न तो विदेशी स्तर में बेचा जाता है और न ही भारत में।

परन्तु यह अच्छी बात है क्योंकि सॉफ़्टवेयर बाज़ार में काफी बदलाव आ रहे हैं। लिनक्स का प्रभाव बढ़ रहा है, और कई लोग विन्डोस छोड़ रहे हैं। इस मामले में भारतीय का योगदान बहुत प्रभावशाली है। लिनक्स इस्तमाल के लिए मुफ्त है, और इसे हम बदल भी सकते हैं।

हम जैसे छात्रों के श्रम का फल है कि लिनक्स अब हिन्दी में चलता है। मुझ से पूछिए, मैं यह एक लिनक्स कम्प्पूटर पर लिख रहा हूं।

Yogendra Singh Shekhawat said...

दोस्तों ये कोई नयी बात नही है। कारोबार पहले भी आता था और अब भी आता है हम लोगों को।
लेकिन क्या आप लोगों को ये नही लगता की इसके पीछे हमारी सरकार भी एक बडा कारण है, जो विदेशी कम्पनियों के लिए येन-केन प्रकारेण अनुकूल वातावरन बनाने को सदैव तत्पर रहती है पर जब स्वदेशी कम्पनियों की बात आती है तो ....।

वेसे इसका मतलब ये नही है कि कुछ नही हो सकता, इसका मतलब ये है कि हमारी लडाई बड़ी है और हमें जीतना है तो ज्यादा ताकत लगानी होगी।

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