Thursday, August 16, 2007

सेक्स के २३७ कारण

गहन शोध के बाद शोधकर्ताओं ने २३७ ऐसे कारण चिह्नित किए हैं, जो लोगों को सेक्स के लिए प्रेरित करते हैं। शोध के मुताबिक़, यह देखा गया है कि युवा अमूमन एक से कारणों के चलते एक-दूसरे के क़रीब आते हैं। कॉलेज जाने वाले ज़्यादातर युवाओं का कहना था कि दूसरों की तरफ़ आकर्षित होने का सबसे बड़ा कारण यह है कि वे “शारीरिक सुख” का अनुभव करना चाहते हैं और यह “अच्छा महसूस होता है”।

प्रेम की अभिव्यक्ति और लगाव ज़ाहिर करना, पुरुषों और स्त्रियों दोनों के लिए शुरुआती १० कारणों में शुमार करता है। लेकिन इनको पीछे ढकेलने वाला नं. १ कारण है – “मैं उसकी तरफ़ आकर्षित हूँ”। २३७ कारणों में से सबसे अजीब है “बदला लेने के लिए सेक्स”।

टैक्सस विश्वविद्यालय ने इस शोध को करने के लिए पाँच साल लगाए और खुद अपने पैसे भी ख़र्च किए। डॉ. इरविन गोल्डस्टेन के अनुसार, “‘मेन आर फ़्रॉम मार्स, वीमन आर फ़्रॉम वीनस’ वाला सिद्धांत इस शोध में ग़लत साबित हो गया है, क्योंकि सेक्स के लिए प्रेरित करने वाले कारण स्त्री-पुरुषों में समान पाए गए हैं।” इस शोध पर विस्तार से ख़बर यहाँ पढ़ी जा सकती है।

पता नहीं इस शोध के परिणाम भारत के परिप्रेक्ष्य में कितने सार्थक हैं, क्योंकि यह शोध अमेरिका में किया गया है। सेक्स को लेकर अमेरिकी मानसिकता भारत से कितनी अलग है, यह तो तभी पता चल सकता है जब भारत में भी इस तरह का कोई शोध व्यापक पैमाने पर किया जाए।

Tuesday, August 14, 2007

दो बार अवतरित होते-होते रह गए बुद्ध

J Krishnamurtiआज ज्ञानदत्तजी ने कहा कि अगर बुद्ध पैदा होना चाहेंगे तो कोई नहीं रोक सकता, बस ज़रूरत है तो सही परिस्थितियों की। भगवान बुद्ध ने वचन दिया था कि वे मैत्रेय के रूप में फिर आएंगे। शायद यही कारण है कि पिछली सदी में दो बार यह घोषित किया जा चुका है कि बुद्ध आ गए हैं। सृजन शिल्पी जी यह पहले ही अपनी पोस्ट ‘जब बुद्ध ढ़ाई हज़ार साल बाद फिर लौटे’ में बतला चुके हैं कि १९८८ में किस तरह ओशो ने यह घोषणा की थी मैत्रेय बुद्ध की आत्मा उनमें प्रविष्ट हो गई है। हालाँकि कुछ ही दिनों बाद ओशो ने कहा कि मैत्रेय उनके शरीर को छोड़ चुके हैं, क्योंकि परिस्थितियाँ अभी अनुकूल नहीं हैं।

इससे पहले भी थोयोसॉफ़िकल सोसायटी द्वारा बड़े पैमाने पर मैत्रेय बुद्ध की आत्मा के आगमन की तैयारी की गई थी। इसके लिए थियोसॉफ़िस्ट्स द्वारा बचपन से ही जे कृष्णमूर्ति को मैत्रेय की आत्मा के वहन के लिए ख़ास तौर पर तैयार किया गया था। मैत्रेय बुद्ध के आगमन के लिए एक संगठन भी खड़ा किया गया – ऑर्डर ऑफ़ द स्टार। जिसका प्रमुख जे कृष्णमूर्ति को घोषित किया गया था। इस संगठन के लगभग सत्तर हज़ार सदस्य थे, जो कृष्णमूर्ति को बुद्ध का अवतार समझते थे। लेकिन जे कृष्णमूर्ति वाक़ई बुद्ध की तरह ही क्रांतिकारी विचारों के निकले और सन् १९२९ में एक प्रसिद्ध व्याख्यान के ज़रिए उन्होंने ‘ऑर्डर ऑफ़ द स्टार’ को भंग कर दिया। कृष्णमूर्ति ने अपने व्याख्यान में कहा –

“सत्य एक मार्गविहीन मंज़िल है और कोई भी सत्य तक किसी भी मज़हब या सम्प्रदाय के माध्यम से नहीं पहुँच सकता है। यह मेरा दृष्टिकोण है और मैं इससे पूर्णतः सहमत हूँ। सत्य; जोकि निःसीम, बिनाशर्त, पथविहीन है, संगठित नहीं किया जा सकता है और न ही ऐसा कोई संगठन खड़ा किया जा सकता है जो लोगों को सत्य की तरफ़ ले जाने का दावा कर सके। ...” पूरा भाषण यहाँ पढ़ा जा सकता है।

जिद्दू कृष्णमूर्ति द्वारा मैत्रेय होने की बात नकारे जाने पर उनसे सब कुछ ले लिया गया, जो भी ‘ऑर्डर ऑफ़ द स्टार’ के सदस्यों और थियोसॉफ़िस्ट्स द्वारा उन्हें दिया गया था। हालाँकि इसके बाद भी कृष्णमूर्ति ने अपनी शिक्षाएँ देना जारी रखा और पूरी दुनिया में, ख़ास तौर पर भारत, अमेरिका और ब्रिटेन में अपने स्वतंत्र विचारों से लोगों को परिचित कराते रहे।

पढ़िए:
१. जे कृष्णमूर्ति की प्रसिद्ध किताब ‘द फ़र्स्ट एण्ड द लास्ट फ़्रीडम’
२. जे कृष्णमूर्ति का सम्पूर्ण साहित्य

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भारतीय विद्वानों ने की न्यूटन से पहले गणित की महत्वपूर्ण खोज

गणित के महत्वपूर्ण सिद्धांत की खोज, जिसका श्रेय सर आइज़ेक न्यूटन को दिया जाता है, दरअसल भारतीय विद्वानों की खोज थी। न्यूटन से क़रीब ढाई सौ साल पहले केरल के गणितज्ञों ने कैलकुलस के मूलभूत सिद्धांतों में से एक ‘अनंत श्रेणी’ (Infinite Series) की खोज की थी। इस तथ्य का खुलासा हाल में लन्दन में किए गए एक शोध से हुआ है। मेनचेस्टर विश्वविद्यालय के डॉ. जॉर्ज जोसेफ़ के मुताबिक़ सन् १३५० ई. के आस-पास गणित के ‘केरल स्कूल’ में पाई शृंखला की भी खोज की थी और पाई का मान १७ अंकों तक सही-सही निकाला था। यह भारतीय खोज केरल की जेसुइट मिशनरियों के ज़रिए इंग्लैंड पहुँची व उन्हीं से इसकी जानकारी न्यूटन को भी हुई। बाद में इसकी खोज का श्रेय न्यूटन को ही दिया गया। यह ख़बर विस्तार से यहाँ पढ़ें

दुर्भाग्य की बात यह नहीं है कि इसका श्रेय किसी ग़ैरहिन्दुस्तानी को मिला, बल्कि यह है कि ये बात भी लन्दन में शोध के दौरान सामने आई। क्या हम भारतीय इतने जड़ हो चुके हैं कि अपनी उपलब्धियों को भी इस तरह भुला देते हैं, मानो कोई भारी भूल कर दी हो। फिर अपने इतिहास से इतने अनभिज्ञ रहने की कोशिश करते हैं, जैसे हमारे इतिहास में कुछ अच्छा हो ही नहीं सकता। अजंता-एलोरा, एलीफ़ेण्टा, सिन्धुघाटी की सभ्यता आदि ज़्यादातर खोजें पश्चिमीं विद्वानों द्वारा की गई हैं और दुःख है कि शायद ही भारतीयों ने अपनी थाती को खंगालने की कभी कोशिश तक की हो। क्या यह मानसिकता कभी बदल भी पाएगी?

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Monday, August 13, 2007

वेद भाष्यों पर कुछ विचार

Ancient Vedic Textपिछले कुछ समय में वैदिक संहिताओं के कई एक भाष्यों के अवलोकन का मौक़ा मिला। संहिताओं के भाष्यों में मेरे ख़्याल से सायण, मैक्समूलर, महर्षि दयानन्द सरस्वती और श्री अरविन्द के भाष्य मुख्य हैं। वैदिक संहिताओं की संस्कृत बहुत पुरानी और जटिल है। कई शब्द ऐसे हैं जिसके बारे में निरुक्तकार मुनि यास्क तक ने कहा है कि उन शब्दों का अर्थ वे नहीं जानते। ऐसे में वैदिक संहिताओं पर भाष्य लिखना अपने-आप में बहुत ही दुष्कर कार्य है। वैदिक संस्कृत के बारे में स्वामी विवेकानन्द का कहना था – “वैदिक संस्कृत इतनी जटिल है और इसकी व्याकरण अपने आप में इतनी पूर्ण है, कि एक-एक शब्द को लेकर वर्षों तक शास्त्रार्थ किया जा सकता है।” इस कारण समस्या यह है कि जो भाष्य उपलब्ध हैं, उनमें किए गए अर्थ न केवल भिन्न हैं बल्कि कई ऋचाओं में तो परस्पर विरोधी अर्थ भी देखने को मिल जाते हैं।

सबसे प्राचीन भाष्य, जो अभी भी उपलब्ध है, सायण का है। सायण का भाष्य काफ़ी हद तक कर्मकाण्डपरक है। कह सकते हैं कि संहिताओं का अर्थ करने के लिए सायण ने ब्राह्मण ग्रंथों की परम्परा को सबसे पुख़्ता आधार माना है। वैसे भी सायण-भाष्य में पूर्वमीमांसा का गहरा प्रभाव साफ़ नज़र आता है। सायण भाष्य के बारे में महर्षि अरविन्द का कथन है – “सायण की प्रणाली की केन्द्रिय त्रुटि यह है कि वह सदा कर्मकाण्ड विधि में ही ग्रस्त रहता है और निरंतर वेद के आशय को बलपूर्वक कर्मकाण्ड के संकुचित सांचे में डालकर वैसा ही रूप देने का यत्न करता है। फिर भी सायण का ग्रंथ एक ऐसी चाबी है जिसने वेद के आंतरिक आशय पर दोहरा ताला लगा दिया है, तो भी वह वैदिक शिक्षा की प्रारम्भिक कोठरियों को खोलने के लिए अत्यंत अनिवार्य है।” तो सायण भाष्य पढ़कर कोई इतना भर कह सकता है कि यह ब्राह्मण-ग्रंथों का एक्सटेंशन भर है।

मैक्समूलर को आधुनिक सायण कहा जा सकता है। मैक्समूलर के अथक प्रयासों के फलस्वरूप वैदिक संहिताएँ फिर प्रकाश में आईं। मैक्समूलर के भाष्य से पहले वैदिक संहिताओं को प्राप्त करना दुःसाध्य काम था। आम जनता की क्या कहें, पण्डितों में से भी अधिकांश ने कभी संहिताओं को देखा तक नहीं था। लेकिन मैक्समूलर के भाष्य का सबसे बड़ा दोष यह है भाष्यकार को संस्कृत का गम्भीर ज्ञान न होने की वजह से ज़्यादातर अर्थ सतही ही रह जाता है। इसके अलावा कई पूर्वाग्रह भी साफ़ तौर पर परिलक्षित होते हैं, हालाँकि हो सकता है ऐसा जानबूझ न हो बल्कि अवचेतन रूप से हो गया हो। दूसरा, मैक्समूलर ने कई औसत बुद्धि पण्डितों की सहायता से भाष्य तैयार किया था, इसलिए भाष्य का स्तर उतना अच्छा नहीं है। साथ ही भाष्य में जगह-जगह ‘कंसिस्टेंसी’ का अभाव है।

महर्षि दयानन्द ने “निरुक्त” के आधार पर वैदिक संहिताओं का एक नितांत अलग अर्थ ही किया है, जिसे शायद उनसे पहले किसी ने सोचा भी नहीं था। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने धातुओं की अनेकार्थकता का प्रयोग कर अपने विवेक से वेदों का सुसामंजस्यपूर्ण अर्थ किया है, जो काफ़ी हद तक मौलिक काम है। हालाँकि कई विद्वानों का मानना है कि उनके द्वारा किया गया भाष्य संस्कृत-प्रदत्त शब्द की अनेकार्थकता के बेहतरीन प्रयोग के सिवा कुछ नहीं है। दयानन्द के भाष्य पर स्वामी विवेकानन्द का मत है कि “वैदिक संहिताओं के जिस नवीन अर्थ के आधार पर महर्षि दयानन्द सरस्वती ने एक सामंजस्यपूर्ण धर्म के निर्माण की चेष्टा की है, उपनिषदों के आधार पर बिना अधिक भाषा-शास्त्रीय पाण्डित्य के उसे सहज ही स्थापित किया जा सकता है।” समस्या यह है कि महर्षि दयानन्द सरस्वती के इस अर्थ को किसी प्राचीन भाष्यकार या स्मृतिकार से समर्थन नहीं मिलता।

महर्षि अरविन्द का भाष्य आधुनिक काल में सबसे प्रचलित भाष्यों में से एक है। हालाँकि जो अर्थ उन्होंने किया है, उसका आधार उन्होंने ध्यान से प्राप्त अंतःस्फुरण (इंट्यूशन) को बनाया है और भाषा-शास्त्र और संस्कृत व्याकरण को एक तरह से दरकिनार कर दिया है। जिस तरह सायण ने कर्मकाण्डपरक अर्थ की चेष्टा की, मुझे लगता है कि श्री अरविन्द ने आध्यात्मिक अर्थ के प्रति विशेष आग्रह किया है। यानी कि ऐसे कई अवसरों पर जबकि ऋचाओं में कोई सम्भव आध्यात्मिक अर्थ नज़र नहीं आता, श्री अरविन्द ने अध्यात्मपरक व्याख्या की चेष्टा की है। इसके अलावा महर्षि अरविन्द कई जगहों पर अपने अतिमानस के सिद्धांत का साम्य ऋचाओं से दर्शाने की कोशिश करते हैं, जो मेरे ख़्याल से सही नहीं बैठता।

जहाँ तक मुझे लगता है, बिना अष्टाध्यायी और महाभाष्य का अध्ययन किए संहिताओं के अर्थ का ओर-छोर पाना भी असम्भव है। मैं कोई विद्वान नहीं हूँ और मैंने अधिकांश ग्रंथों को हिन्दी या अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ पढ़ा है, तो हो सकता है कि मेरी धारणा कई बार ग़लत हो। लेकिन इतना तो तय है कि कोई भी सटीक धारणा केवल तभी बनाई जा सकती है, जबकि ख़ुद मूल ग्रंथ यानी वैदिक संहिताओं का मूल भाषा यानी वैदिक संस्कृत में अध्ययन किया जाए।

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दो ग़रीब चिट्ठाकारों की भेंटवार्ता

मीट करने के इस बेहतरीन मौसम में, जबकि हर किसी के मीट करने का मीटर बढ़ता जा रहा है, हमारा ज़ीरो पर अटका हुआ था। सो मुरैना के ब्लॉगर श्री भुवनेश शर्मा से कल मुलाक़ात करने का मौक़ा हाथ लगा, तो उसे हमने झट से दबोच लिया। तो टेलीफ़ून पर भुवनेश भाई से पहले ही मीटियाने का वक़्त मुकर्रर किया और उन्हें आगरा में अपने ग़रीबख़ाने पर आमंत्रित कर लिया। हमें पूरी उम्मीद थी कि भुवनेश भाई डिजिटल कैमरा लेकर मीटियाने आएंगे, ताकि बाद में भेंटवार्ता का ज़ोरदार सचित्र विवरण अपने ब्लॉग पर चिपकाया जा सके। लेकिन वे भी हमारी तरह निकले, यानी कि ग़रीब टाइप। अब आप पूछेंगे कि ग़रीब कैसे? हम दोनों के पास तो कम्प्यूटर वगैरह है। लेकिन चिट्ठाकारों की जमात में जिसके पास डिजिटल कैमरा नहीं, हमारे हिसाब से वह ग़रीब है। जिस तरह कार वालों की जमात में मारुति ८०० वाला ग़रीब समझा जाता है। वैसे भी जब तक भेंटवार्ता के विवरण के साथ बढ़िया-सा फ़ोटू न चमचमाए, तब तक भेंटवार्ता करने का न कोई फ़ायदा है और न ही कोई सबूत।

ख़ैर, दोनों ग़रीब ब्लॉगर्स ने निहायत ही दुःखी मन से बातचीत शुरू की। जैसा कि होना लाज़मी था, हिन्दी ब्लॉग जगत के मुख़्तलिफ़ पहलुओं पर हम दोनों काफ़ी देर तक बतियाते रहे। बहुतेरे ब्लॉगर्स का भी ज़िक्र आता-जाता रहा, लेकिन दुर्भाग्यवश निन्दा-सुख से हमें पूरी तरह वंचित रहना पड़ा। ज़रूरत से ज़्यादा भले टाइप के लोगों से बातचीत करने का यही नुक़सान है। बात आगे बढ़ती रही और साथ में खाने-पीने का काम भी चलता रहा। न... न... “पीने” से कुछ और मतलब मत निकालिए, महज़ तुक के लिए जोड़ दिया है। काफ़ी देत यूँ ही चर्चा चलती रही, फिर उसका रुख़ बदलकर देश-समाज वगैरह-वगैरह की समस्याओं की तरफ़ चला गया। इस तरह की बात करके लगता है कि अपन की अक़ल में भी बुद्धि है... तो अपन ने अपनी अक़ल का पूरा इस्तेमाल करते हुए बातचीत का कंवर्सेशन जारी रखा।

लेकिन जैसे ही दुनिया की सारी समस्याएँ सुलझने की कगार पर पहुँच गई थीं, तभी भुवनेश भाई को याद आया कि उनकी ट्रेन का वक़्त भी होने वाल है। निकलना ज़रूरी था, इसलिए उन समस्याओं को अधसुलझा छोड़कर उन्हें लेकर मैं रेलवे स्टेशन की ओर चल दिया। कमाल की बात यह कि टिकिट-विकिट भी जल्दी मिल गई और कमाल-पर-कमाल यह कि सात मिनट बाद ट्रेन भी बिल्कुल ठीक समय पर आ गई। भारतीय रेल के इस कारनामे से हम दोनों को शॉक तो काफ़ी लगा, लेकिन किसी तरह अपने को सम्हालते हुए मैंने भुवनेश भाई को विदा किया। और इस तरह दो ग़रीब चिट्ठाकारों की भेंटवार्ता बिना फ़ोटू लिए ही “इति सम्पन्नम्” हो गई।

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Sunday, August 12, 2007

राइनाइटिस ऍलर्जी का आयुर्वेदिक उपचार

क्या आपकी नाक हमेशा अगर एक बार बहना शुरू हो जाए, तो थमने का नाम नहीं लेती? छींक पर छींक आती रहती हैं? आँखों से आँसू बहने लगते है और गले में खराश पैदा हो जाती है? अगर इन सवालों का जवाब “हाँ” है, तो आप राइनाइटिस ऍलर्जी के शिकार हैं। दुर्भाग्यवश ऍलोपेथी में इसकी रोकथाम के उपाय तो हैं, लेकिन जड़ से सही करने का कोई इलाज नहीं है।

हालाँकि इस व्याधि में आयुर्वेदिक उपचार बहुत कारगर है। आयुर्वेद का प्रयोग कर इस बीमारी से पूरी तरह निजात पा सकते हैं। इसके लिए कुछ ख़ास बातें ध्यान में रखनी होंगी –


  • “अणु तैल” की दो-दो बूंदों से दिन में दो बार नस्य-क्रिया करें।
  • “ब्राह्म रसायन” का सेवन करें।
  • रात को देर तक न जागें और सुबह जल्दी उठें।
  • कफ-वर्धक पदार्थों के सेवन से दूर रहें।

Ayurvedic Treatment of Rhinitis Allergy

Symptoms: Are you agitated with your runny nose? Do you sneeze unstoppably? Are you suffering from itchy throat and eyes? If your answers of these questions are affirmative, you might be suffering from rhinitis allergy. Allopathic treatment can only suppress the symptoms. There’s no cure for this disease using Allopathic treatment.

Although ayurvedic treatment can be very useful in it. Simply by following Ayurvedic medication, one can be cured utterly. You should remember some points:

  • Do the Nasya Kriya with two drops of Anu Tailam.
  • Take Brahma Rasayan daily.
  • Don’t stay awake late in the night and get up early in the morning.
  • Don’t consume the foodstuff that stir up Kapha.

पुनर्जन्म के लिए बुद्ध को लेनी होगी चीन की इजाज़त

tibetan spiritual leader Dalai Lamaतिब्बत के प्रमुख लामा को बुद्ध का अवतार माना जाता है। हर मुख्य लामा अपनी मृत्यु से पूर्व उन संकेतों की घोषणा करता है, जिनके आधार पर तिब्बत में उसे फिर से पैदा होने पर खोजा जाता है। यह परम्परा सदियों से चली आ रही है। चीनी सरकार ने हाल में यह बयान जारी किया है – “बिना सरकारी अनुमति के तथाकथित जीवित बुद्ध यानी दलाई लामा का पुनर्जन्म असंवैधानिक और ग़ैरक़ानूनी है।” यह आदेश १ सितम्बर २००७ से प्रभावी होगा।

यानी कि अब बेचारे दलाई लामा को तिब्बत में फिर से पैदा होने के लिए चीनी सरकार की अनुमति लेनी होगी और चीन की वामपंथी सरकार, जो धर्म में यक़ीन नहीं रखती, यह तय करेगी कि दलाई लामा को कब और कहाँ जन्म लेना होगा। दरअसल चीन की सरकार बुद्ध को फिर से पैदा नहीं होने देना चाहती है और इस परम्परा को हमेशा के लिए ख़त्म करना चाहती है, ताकि तिब्बत पर पकड़ को मज़बूत किया जा सके। देखते हैं लोकतांत्रिक भारत में रह रहे बुद्ध चीन की साम्यवादी सरकार का कैसे मुक़ाबला करते हैं?

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Saturday, August 11, 2007

पार्टनर : नक़्ल के लिए भी होनी चाहिए अक़्ल

Bollywood Hindi Movie/Film Partner staring Govinda & Salman Khan“नक़ल के लिए भी अक़ल होनी चाहिए” – यह बात बचपन में कई दफ़ा सुनी थी और डेविड धवन की नई फ़िल्म “पार्टनर” देखकर इस बात पर पूरी तरह यक़ीन भी हो गया। हालाँकि मुझे पूरी शंका थी कि हो-न-हो हमेशा की तरह एक और हॉलीवुड फ़िल्म का कचरा किया गया होगा, लेकिन फिर भी दोस्तों के कहने पर मैंने इसे देखने का ख़तरा मोल लिया और सिनेमा हॉल में पहुँच गया। हालाँकि गोविन्दा और सलमान ख़ान का अभिनय ठीक है, लेकिन “हिच” की अच्छी-ख़ासी कहानी को ख़ामख़्वाह में ज़बरदस्ती तोड़-मरोड़कर फ़िल्म की ऐसी-तैसी कर दी गई है।

“पार्टनर” में “हिच” के कई दृश्य जस-के-तस ले लिए गए हैं, लेकिन उन्हें इतने निष्प्रभावी तरीक़े से फ़िल्माया गया है कि मूल फ़िल्म के दृश्यों का जादुई असर ग़ायब हो गया है। हमेशा की तरह कहानी चोरी करते वक़्त पर्याप्त सावधानी भी नहीं बरती गई है, इसलिए कहानी में कहीं-कहीं लूपहोल रह गए हैं। हाँ, इतना ज़रूर है कि मेरे बाक़ी मित्रों को पिक्चर ठीक लगी, इसलिए अगर आपने मूल फ़िल्म नहीं देखी है तो आप इसे थोड़ी आसानी से देख सकते हैं। शायद दिमाग़ में अपने आप लगातार चलने वाली तुलना की वजह से मुझे यह फ़िल्म कुछ ज़्यादा ही बेकार लगी। तो बस इतना ही कहना कि यदि आपने “हिच” पहले से देख रखी है, तो “पार्टनर” क़तई न देखें।

हाल में मूल फ़िल्म की निर्माता कम्पनी ने इस फ़िल्म पर चोरी का इल्ज़ाम लगाते हुए मुक़दमा भी कर दिया है। बॉलीवुड में तो हॉलीवुड से चोरी करने का लम्बा इतिहास है, लेकिन यह अपनी तरह की पहली ही घटना है। शायद हॉलीवुड वाले भी इतनी घटिया नक़ल को बर्दाश्त नहीं कर सके।

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