Tuesday, September 11, 2007

“दस दिनों में बनें परफ़ेक्ट दंगाई”

चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

अभी कुछ दिनों पहले आगरा में दंगा-फ़साद हुआ। सम्वाददाता ने पूरे दंगे को ग़ौर से देखा और अब आपके सामने पेश है दंगे का आँखों देखा हाल –

Riots in Agra, the city of Taj Mahalइस दंगे में हमेशा की तरह कुछ लोग मारे भी गए। मारे गए लोग काफ़ी नौसीखिए थे और उन्हें दंगों का कोई ख़ास अनुभव नहीं था; तभी दंगे की इस पावन वेला में, जो हर कुछ सालों में एक बार आती है, औरों को टपकाने की बजाय ख़ुद ही टपक गए। हिन्दुस्तान में इत्ते दंगे होते हैं कि कई लोगों ने तो अब इसे अपना फ़ुल-टाइम धन्धा ही बना लिया है। गली-मुहल्ले में दंगे करने के क्रैश कोर्स चलने लगे हैं, जगह-जगह बोर्ड लगे हैं – “एक सप्ताह में दंगा करना सीखें”, “दस दिनों में बनें परफ़ेक्ट दंगाई”, “क्या आपके दोस्त पक्के दंगाई हैं और आप आगज़नी, पथराव, नारेबाज़ी में हिचकिचाते हैं। डरिए मत... अब आ गया है ‘दस दिनों में बनें दंगाई’ क्रैश कोर्स” वगैरह वगैरह। मैंने, यानी संवाददाता ने एक इंस्टीट्यूट के मालिक का इंटरव्यू भी किया। पूछा कि आपका लक्ष्य क्या है? वह बोला – “हम घर-घर दंगाई तैयार करना चाहते हैं... छोटा दंगाई, मोटा दंगाई, बूढ़ा दंगाई, बच्चा दंगाई... सपना फ़सादी भारत का।”

“लगे रहो मुन्ना भाई” ने हिन्दुस्तानी मानस पर कितना गहरा प्रभाव डाला है, यह दंगों के दौरान पता लगा। जितने भी दंगाई मिले, सब-के-सब गांधीवादी। गांधीजी की तरह हर चीज़, हर मौक़े का पूरा इस्तेमाल करने में यक़ीन रखते हैं। जैसे गांधीजी आए हुए शोक-पत्र को भी फाड़ कर नहीं फेंकते थे, दूसरी कोरी तरफ़ ख़त लिखकर पोस्टकार्ड की तरह उसका प्रयोग करते थे... यह आदर्श हम लोगों के दिलो-दिमाग़ में समा गया है। इसलिए लोगों ने ट्रकों, बसों, कारों, दुकानों, कारख़ानों और गोदामों में आग लगा दी और शब-ए-बारात की रात को लगे हाथ दीवाली मनाने का सुख भी लूट लिया। इसे कहते हैं एक तीर से दो शिकार।

इस गड़बड़झाले में सम्वाददाता ने सोचा कि अल्लाह की ख़बर रखने का प्रेरोगेटिव केवल शुएब भाई को तो है नहीं, सो उसने भी इस मामले में अल्लाह की राय जाननी चाही और उसका साक्षात्कार लिया। पूछा, आपकी क्या राय है? अल्लाह ने जवाब दिया, “शब-ए-बारात की रात को, जब मैं सातवें आसमान से उतरकर पहले आसमान पर आया, तो कम दूरी से देखने पर बिल्कुल साफ़-साफ़ दिखाई दिया कि मेरे ये सो-कॉल्ड बन्दे कितने बेवकूफ़ हैं। इन लोगों की वजह से कई लोगों ने भी मुझपर आरोप लगाया कि मैं नीचे उतरकर आया, इसी वजह से यह सारा फ़साद हुआ। आइ एम वेरी सेड।” अल्लाह को ज़्यादा सेंटी होते देख सम्वाददाता सहानुभूति जताकर निकल लिया।

ख़ैर, जैसा कि पड़ोसन में बिन्दु के पिताजी ने कहा है – “जब-जब जो-जो होना है, तब-तब सो-सो होता है।” तो जो होना था, सो हो गया। लेकिन रिपोर्टर ने निष्कर्ष निकाल लिया है कि ग़लती किसकी है। दंगाई तो बेचारे भोले-भाले लोग हैं, वो तो ये सब करने के लिए मजबूर थे। उन्हें क्या दोष देना! साथ ही प्रशासन की भी कोई ग़लती नहीं है। जो गड़बड़ होने से पहले काम शुरू करे, वह प्रशासन कैसा? प्रशासन का काम ही होता है दंगे के बाद उसे काबू करने की कोशिश करना। भले ख़ुदा खुद को कितना ही निर्दोष बताए, दरअसल सारी-की-सारी ग़लती उसी की है। क्या ज़रूरत है सातवें आसमान नीचे उतरकर आने की? अल्लाह के बाद बाक़ी ज़िम्मेदारी है ट्रकों की, बसों की, कारों की, दुकानों की, पर्यटक वाहनों की और कारख़ानों की; ये चीज़ें थी तभी दंगाई बेचारे आगज़नी को मजबूर हुए।

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Monday, September 10, 2007

क्रांतिकारियों के लिए सूत्र : जॉर्ज बर्नार्ड शॉ

famous author george bernard shaw“क्रांतिकारियों के लिए सूत्र” जॉर्ज बर्नार्ड शॉ या जीबीएस, जैसा कि आम तौर पर उन्हें कहा जाता है, की सबसे कम चर्चित रचनाओं में से एक है। जीबीएस ने १९०३ में यह संक्षिप्त किताब लिखी थी। इस किताब में विभिन्न विषयों पर छोटे-छोटे सूत्र दिए गए हैं। मुझे इसकी ख़ासियत यह लगी कि इसके गूढ़ सूत्र जगह-जगह व्यांग्यत्मक लहज़े से भी परिपूर्ण हैं। इस किताब के सूत्रों के बारे में यह बात बिल्कुल सही लगती है – “देखन में छोटे लगें, घाव करें गम्भीर”। उदाहरण के लिए सबसे पहले सूत्र पर ही ग़ौर फ़रमाएँ –

एकमात्र स्वर्णिम सूत्र यह है कि कोई भी स्वर्णिम सूत्र नहीं है।
(The only golden rule is that there are no golden rules.)

शिक्षा पर जीबीएस कहते हैं –

जो कर सकता है, वह करता है और जो नहीं कर सकता, वह पढ़ाता है।
(He who can, does. He who cannot, teaches.)

पढ़ा-लिखा इंसान दरअसल एक फ़ालतू व्यक्ति है, जो पढ़ने में वक़्त बर्बाद करता है। उसके झूठे ज्ञान से सावधान रहो : यह अज्ञान से भी ख़तरनाक है।
(A learned man is an idler who kills time with study. Beware of his false knowledge : it is more dangerous than ignorance.)

खुद करके देखना ही ज्ञान अर्जित करने का अकेला मार्ग है।
(Activity is the only road to knowledge.)

भाषा पर जीबीएस ने बहुत मार्के की बात कही है, जो भारत के आज के हालात में बहुत सही बैठती है –

कोई भी इंसान जो खुद अपनी भाषा में सक्षम नहीं है, कभी भी दूसरी भाषा पर अधिकार प्राप्त नहीं कर सकता।
(No man fully capable of his own language ever masters another.)

यह किताब इंटरनेट पर भी उपलब्ध है। आप इसे यहाँ पढ़ सकते हैं –
क्रांतिकारियों के लिए सूत्र : जॉर्ज बर्नार्ड शॉ

नोट : इन सूत्रों का हिन्दी भावानुवाद मैंने किया है। इसलिए हो सकता है कि इनमें ग़लतियाँ रह गई हों। तो आप टिप्पणी करके बताएँ, इससे पहले ही मैं एड्वांस में माफ़ी मांग लेता हूँ। :)

पढ़िए किताबों से जुड़ी कुछ और पोस्ट्स -
१. मुफ़्त डाउनलोड करें हिन्दी ई-किताबें और साहित्य
२. ऑनलाइन हिन्दी साहित्य
३. हिन्दी पत्रिका "हंस" इंटरनेट पर

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हिन्दी कॉमिक्स के शौक़ीनों के लिए

Famous Indian Coimcs Characters Chacha Chaudhary & Sabuशायद ही कोई हो जो बचपन में चाचा चौधरी, साबू, बिल्लू, पिंकी, नागराज, राम-रहीम जैसे कॉमिक पात्रों का दीवाना न रहा हो। बचपन में चंचल शरीर को केवल ये आकर्षक कॉमिक्स ही कुछ देर के लिए शांत बैठने पर मजबूर कर पाती थीं। तो एक बार फिर बचपन की यादों को ताज़ा कीजिए इन रोचक कॉमिक्स के साथ। राज कॉमिक्स की वेबसाइट पर आप ऑनलाइन पढ़ सकते हैं सुपर कमाण्डो ध्रुव, बांकेलाल और डोगा वगैरह की कई सारी कॉमिक्स बिल्कुल मुफ़्त। इंडियन कॉमिक्स से भी आप बहुतेरी हिन्दी कॉमिक्स डाउनलोड कर सकते हैं। साथ ही विशाल पटेल की वेबसाइट पर चाचा चौधरी की कई सारी कॉमिक्स पढ़ी जा सकती हैं। अगर आपको भी हिन्दुस्तानी कॉमिक्स का कोई ऑनलाइन स्रोत पता हो, तो कृपया ज़रूर बतलाएँ।

पढ़िए यह भी : भारतीय कॉमिक्स : चाचा चौधरी और साबू

यह पोस्ट लिखने के बाद एक कॉमिक मैंने भी पढ़ी... बांकेलाल की। मज़ा आ गया तुम्हारी कसम। किस तरह कनकच्चा ऋषि ने श्राप दिया, किस तरह बांकेलाल ने बजरबट्ट से पीछा छुड़ाकर कनकटा दैत्य को परास्त किया... एक बार फिर, मज़ा आ गया। :)

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Sunday, September 09, 2007

मदर टेरेसा : टीस से भरी एक ज़िन्दगी

Mother Teresa of Calcutta : Shaken faithमदर टेरेसा आज भी दुनिया के लिए एक मिसाल हैं। उन्होंने दिखलाया कि किस तरह अपना सर्वस्व समर्पित कर दीन-हीनों और निराश्रितों की सेवा की जाती है। लेकिन हाल में आई एक किताब “मदर टेरेसा : कम बी माई लाइट” (Mother Teresa : Come Be My Light) ने ईश्वर पर उनकी आस्था को लेकर नए सवाल खड़े किए हैं। किताब में मदर के कई ख़तों को प्रकाशित किया गया है, जिससे यह पता लगता है कि अपनी ज़िन्दगी के आख़िरी वक़्त तक वे ईश्वर के अस्तित्व को लेकर संशय में थीं। इन ख़तों में बार-बार मदर ने कहा कि उन्हें महसूस होता है कि ईश्वर नहीं है, क्योंकि उन्हें न तो कभी उसकी अनुभूति हुई और न ही कभी प्रार्थनाओं का जवाब मिला। क्रिसमस के बाद लिखे गए एक पत्र में मदर टेरेसा ने लिखा, “मेरे लिए सन्नाटा और खालीपन बहुत गहरा है। इतना गहरा कि मैं देखना चाहती हूँ और देख नहीं पाती, सुनना चाहती हूँ और सुनाई नहीं देता।”

ये सभी पत्र ऐसे लोगों को लिखे गए थे, जो उनके बहुत क़रीबी थे। सार्वजनिक तौर पर उन्होंने हमेशा इस तरह दर्शाया मानो उन्हें अपेक्षित अनुभूति हो चुकी है। क्या यह मज़हबों के पाखण्ड को नहीं दिखलाता है? हालाँकि उनका कार्य निश्चय ही महान था, लेकिन अगर वे यह कहतीं कि ईश्वर नहीं है तो क्या चर्च उन्हें मान्यता देता? क्या अपने जीवन के अंत में भी पाखण्ड की पीड़ा के साथ नहीं मरी होंगी? हालाँकि उनका काम महान था, लेकिन क्या यह टीस उससे भी बड़ी नहीं रही होगी? ईश्वर की बहुतेरी अजीबोग़रीब धारणाएँ गढ़ कर और उसे आस्था के जर्जर आधार पर टिकाकर, क्या मज़हबों ने लोगों को छला नहीं है? क्या बेहतर न होता कि ईसा के नाम पर लोगों की सेवा करने की बजाय वे खुद अपने लिए इसे छोड़ सत्य को खोजने का साहस करतीं? शायद ऐसा करने से वे मरते वक़्त ज़्यादा संतुष्ट होतीं। अंत में मदर की एक प्रसिद्ध कविता Anyway की पंक्तियाँ -

People are often unreasonable, illogical and self centered;
Forgive them anyway.

If you are kind, people may accuse you of selfish, ulterior motives;
Be kind anyway.

If you are successful, you will win some false friends and some true enemies;
Succeed anyway.

If you are honest and frank, people may cheat you;
Be honest and frank anyway.

What you spend years building, someone could destroy overnight;
Build anyway.

If you find serenity and happiness, they may be jealous;
Be happy anyway.

The good you do today, people will often forget tomorrow;
Do good anyway.

Give the world the best you have, and it may never be enough;
Give the world the best you've got anyway.

You see, in the final analysis, it is between you and your God;
It was never between you and them anyway.

लेकिन जब खुद मदर और “उनके भगवान” के बीच ही वास्तविक विश्वास का रिश्ता न क़ायम हो सका, तो क्या ये अंतिम पंक्तियाँ खोखलेपन की गूंज नहीं लगती हैं?

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Saturday, September 08, 2007

बुश का बेवकूफ़ाना कारनामा एक बार फिर

US President George W. Bush | संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुशअपनी बेवकूफ़ियों के लिए मशहूर बुश ने एक बार फिर ऐसा कारनामा किया, जिससे लोगों में उनकी मूर्खता के लिए बचा-खुचा शक भी ख़त्म हो गया। बुश की ज़ुबान फ़िसलना तब शुरू हुई, जब बुश ने शुक्रवार को ऑस्ट्रेलिया में “एपेक” सम्मेलन से पहले अपने सम्बोधन में कहा, “‘ऑपेक’ सम्मेलन की बेहतरीन तरीक़े से मेज़बानी करने के लिए शुक्रिया।” फिर बुश ने ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री जॉन होवार्ड की ईराक़ यात्रा को भी याद किया, जिसमें वे ईराक़ में “ऑस्ट्रिया” के सैनिकों से मिलने गए थे। यह अलग बात है कि ईराक़ में ऑस्ट्रिया का कोई सैनिक नहीं है। अलबत्ता वहाँ ऑस्ट्रेलिया के १,५०० सैनिक ज़रूर तैनात हैं। इसके बाद बुश शायद यह भी भूल गए कि वे मंच पर कहाँ से चढ़े थे और उतरने के लिए मंच के उस छोर पर पहुँच गए, जहाँ बदकिस्मती से उतरने के लिए सीढ़ियाँ थी ही नहीं।

इसीलिए कहते हैं कि इंसान को ज़रूरत से ज़्यादा तनाव से बचना चाहिए। दिमाग़ में अगर हर समय ईराक़, कोरिया, पाकिस्तान, ओसामा वगैरह ही चलता रहे तो बेचारे इंसान की क्या हालत हो जाती है!!! वैसे, बुश की एकमात्र बड़ी उपलब्धि यह है कि वे सारी संस्कृतियों, देशों की सीमाओं को तोड़ते हुए दुनिया भर में मूर्खता के निर्विवाद प्रतीक बन गए हैं। १ अप्रैल को लोग अब ऐसे कार्ड देने लगे हैं, जिनके ऊपर बुश की तस्वीर छपी होती है। और तो और, आजकल लोग बेवकूफ़, मूर्ख वगैरह के पर्यायवाची के रूप में “बुश” शब्द का भी प्रयोग करने लगे हैं। है न वाक़ई बड़ी उपलब्धि? अगर टाइम हो तो बुश पर एक मज़ेदार चुटकुला भी टाइमपास पर पढ़िए।

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